भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 809
७८६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

श्रोतुमिच्छामि भगवन् महत् कौतूहलं हि मे ॥ १२॥
भगवन् ! मैं ब्रह्माजीके दिन (या यज्ञ) का विस्तार, संक्षेप और उत्तम संग्रह सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे हृदयमें बड़ा कौतूहल है ॥ १२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे जनमेजयवाक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसंगमें जनमेजयका वाक्यविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥


षोडशोऽध्यायः

सृष्टिविषयक वर्णनके प्रसङ्गमें ज्ञान और योगका विचार

वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वैकमना राजन् पञ्चेन्द्रियसमाहितः।
कथां कथयतो राजन् निर्विकारेण चेतसा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तुम पाँचों इन्द्रियों तथा मनको एकाग्र करके निर्विकार चित्तसे मेरी कही हुई कथा सुनो ॥ १ ॥

ब्रह्मसम्बन्धसम्बद्धमबद्धं कर्मभिर्नृप।
पुरस्ताद् ब्रह्म सम्पन्नं ब्रह्मणो यद्दक्षिणम् ॥ २ ॥
अव्यक्तं कारणं यत् तन्नित्यं सदसदात्मकम्।
निष्कलः पुरुषस्तस्मात् सम्बभूवात्मयोनिनः ॥ ३ ॥
नरेश्वर ! जो वेदके सम्बन्धसे अर्थात् वेदमूलक होनेके कारण सबसे सम्बन्ध रखता है, तथापि जो किसीके कर्मोंसे बँधा हुआ नहीं है, ब्रह्मा या ब्रह्मवेत्तासे पहलेसे ही जो सबमें अनुगत, नित्यसिद्ध है, दक्षिणाप्रधान यज्ञ आदिसे ऊपर उठा हुआ है और जो अव्यक्त, सबका कारण, नित्य तथा सदसत्स्वरूप है, वह परब्रह्म परमात्मा ही निष्कल पुरुष है, उसीसे स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रकट हुए ॥ २-३ ॥

दिव्यो दिव्येन वपुषा सर्वभूतपतिर्विभुः।
अचिन्त्यश्चाव्ययश्चैव युगानां प्रभवोऽव्ययः ॥ ४ ॥
वे ब्रह्माजी स्वयं तो दिव्य हैं ही, दिव्य शरीरसे भी संयुक्त हैं। वे समस्त प्राणियोंके पालक, प्रभु, अचिन्त्य, निर्विकार, युगोंकी उत्पत्तिके कारण और अविनाशी हैं ॥४॥

अभूतश्चाप्यजातश्च सर्वत्र समतां गतः।
अव्यक्तात् परं यत् तन्नारायणविदो विदुः ॥ ५ ॥
वे अभूत अर्थात् स्वयम्भू हैं, उनका किसी दूसरेसे जन्म नहीं हुआ है—इसलिये अजन्मा हैं, उनका सर्वत्र समान भाव है। जो अव्यक्तसे परे परमात्मतत्त्व है, उसे नारायणके स्वरूपको जाननेवाले उनके उपासक ही जानते हैं ॥ ५ ॥

सर्वतःपाणिपादं तं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ ६ ॥
उसके सब ओर हाथ और पैर हैं, सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं तथा उसके सब ओर कान हैं, वह लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ ६ ॥

असतश्च सतश्चैव विज्ञेयं तत्र कारणम्।
अव्यक्तो व्यक्तरूपस्थश्चरन्नपि न दृश्यते ॥ ७ ॥
उसीको असत् और सत्‌का कारण जानना चाहिये, वह अव्यक्त है; व्यक्त रूपोंमें स्थित होकर विचर रहा है, तो भी किसीको दिखायी नहीं देता ॥ ७ ॥

विकारपुरुषोऽव्यक्तो ह्यरूपी रूपमाश्रितः।
चरत्यचिन्त्यः सर्वेषु गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ ८ ॥
विकारयुक्त अर्थात् क्षर पुरुष रूपवान् है, जिसका अव्यक्त एवं रूपहीन चिन्मय पुरुष परमात्माने आश्रय ले रखा है। जैसे लकड़ियोंमें आग गूढ़रूपसे छिपी हुई है, उसी प्रकार वे अचिन्त्य परमात्मा समस्त भूतोंमें गूढ़रूपसे स्थित होकर विचरते हैं ॥ ८ ॥

भूतभव्योद्भवो नाथः परमेष्ठी प्रजापतिः।
प्रभुः सर्वस्य लोकस्य नाम चास्येति तत्त्वतः ॥ ९ ॥
वे ही भूत, भविष्य और वर्तमानकी उत्पत्तिके कारण हैं, सबके स्वामी एवं संरक्षक हैं, परमेष्ठी प्रजापति तथा सर्वलोकप्रभु आदि इनके यथार्थ नाम हैं ॥ ९ ॥

अपदान्तु पदो जातस्तस्मान्नारायणोऽभवत्।
अव्यक्तो व्यक्तिमापन्नो ब्रह्मयोगेन कामतः ॥ १० ॥
अपद अर्थात् निर्गुण निराकारसे पद अर्थात् सगुण साकार रूपमें प्रकट हुए वे परमात्मा नार अर्थात् जलको अयन अर्थात् निवासस्थान बनानेके कारण नारायण नामसे प्रसिद्ध हुए। वे पहले अव्यक्त थे; फिर ब्रह्मयोगसे इच्छानुसार संकल्प करके व्यक्तभावको प्राप्त हुए ॥ १० ॥

ब्रह्मभावे च तं विद्धि सशब्दं लब्धवान् प्रभुः।
प्रभुः सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्येतरस्य च ॥ ११ ॥
उन्हींको ब्रह्मरूपमें स्थित हुआ समझो। उन्हीं प्रभुने ब्रह्मा नाम प्राप्त किया। वे स्थावर-जङ्गम रूप सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी हैं ॥ ११ ॥