विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 808, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | पञ्चदशोऽध्यायः | ७८५ |
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जो महात्मा पुरुष सावधान होकर इस श्रेष्ठ एवं प्रथम पुराणका सदा पाठ करता है, वह इस जगत्में सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त करके शोकरहित हो पर-लोकमें स्वर्गीय फलोंका उपभोग करता है॥ ६७॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सर्वभूतोत्पत्तौ चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसंगमें सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः
जनमेजयके द्वारा महाभारत-वर्णित चरित्रकी प्रशंसा
जनमेजय उवाच
श्रुतं नः परमं ब्रह्मन् स्ववंशचरितं महत् ।
दिव्यमन्योन्यसम्भूतं मानितं बहुभिर्गुणैः ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— ब्रह्मन् ! मैंने अपने वंशके उत्तम, महान् एवं दिव्य चरित्रका वर्णन सुना, जो हमारे पूर्वजोंके परस्पर सहयोगसे सम्भव हुआ था। वह चरित्र अनेक गुणोंसे सम्मानित है ॥ १ ॥
छन्दोभिर्वृत्तसंजातैः समासैश्च सविस्तरैः ।
लघुभिर्मधुराभाषैर्ग्रथितं पदविग्रहैः ॥ २ ॥
वह छन्दःशास्त्रोक्त छन्दों, संक्षेप और विस्तारयुक्त छोटे-छोटे पदों तथा मधुर भाषामें ग्रथित किया गया है॥२॥
त्रिवर्गेणाभिसम्पन्नं धर्मेणार्थेन भोगिनाम् ।
कामेन बहुरूपेण शरीरान्तर्गतेन च ॥ ३ ॥
उसमें धर्म, अर्थ और भोगी पुरुषोंके शरीरके भीतर अनेक रूपसे निवास करनेवाले काम नामक त्रिवर्गका भी वर्णन है ॥ ३ ॥
ब्राह्मणानां प्रभावैश्च योधानां च पराक्रमैः ।
वैरनिर्यातनैश्चैव प्रतिज्ञानां च पारगैः ॥ ४ ॥
इस चरित्रमें ब्राह्मणोंके प्रभावों, योद्धाओंके पराक्रमों, वैरका बदला लेनेकी घटनाओं तथा प्रतिज्ञाके पारगामी पुरुषोंके तदनुरूप प्रयत्नोंका भी उल्लेख है ॥ ४ ॥
रिपुस्तवसुसम्पन्नैर्नानुबन्धः प्रचोदितः ।
वंशयोर्निर्विनाशाय नृपेण द्विज विग्रहात् ॥ ५ ॥
ब्रह्मन् ! जिन लोगोंकी शत्रु भी स्तुति करते थे ऐसे वीर पुरुषोंके चरित्रोंका भी इसमें वर्णन है। राजा (दुर्योधन) ने पाण्डवोंके साथ जो विग्रह छोड़कर प्रेमपूर्ण सम्बन्ध नहीं स्थापित होने दिया, वही दोनों कुलोंके विनाशका कारण हुआ ॥ ५ ॥
ये च तस्मिन् महारेौद्रे संग्रामे निहता नृपाः ।
तेषां सर्वाणि राष्ट्राणि पुत्राः सर्वे प्रपेदिरे ॥ ६ ॥
उस महाभयंकर संग्राममे जो-जो राजा मारे गये थे, उनके समस्त राष्ट्रोंको उन्हींके सभी पुत्रोंने प्राप्त किया ॥ ६ ॥
कौरवः प्रथितो राजा भगवच्छासनानुगः ।
धर्मेश्च बहुधा प्रोक्तस्त्रयाणां वर्णसम्पदाम् ।
शूराणामपि विख्यातः स्वर्गहेतुर्द्विजर्षभ ॥ ७ ॥
द्विजश्रेष्ठ ! कुरुवंशके सुविख्यात राजा युधिष्ठिर भगवान्की आज्ञाके अनुकूल चलते थे । उन्होंने तीनों वर्णोंके लिये धर्मका बारंबार वर्णन किया है। वे शूरवीरोंको स्वर्गकी प्राप्ति करानेके प्रधान हेतुके रूपमें विख्यात हैं॥ ७ ॥
अनुग्रहार्थं भूतानां नोत्सेकाय कथंचन ।
चतुर्णां वर्णसंज्ञानां पृथक्पृथगनेकधा ॥ ८ ॥
उन्होंने किसी तरह अहंकार प्रकट करनेके लिये नहीं, समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये ही चारों वर्णोंके पृथक्-पृथक् अनेक धर्म बताये हैं ॥ ८ ॥
गर्भवासं पतन्तश्च भूतानां सम्प्रबोधिताः ।
पृच्छन्तो देवसंचारं क्षीणे पुण्ये च कर्मणि ॥ ९ ॥
प्राणियोंमेंसे जो लोग गर्भवासमें गिर रहे थे और पुण्यकर्मके क्षीण हो जानेपर पुनः देवलोकमें प्रवेशका उपाय पूछते थे (उन सबके लिये वे पृथक्-पृथक् धर्मका उपदेश देते थे) ॥ ९ ॥
दाने यश्चापि संयोगः स चापि बहुधा कृतः ।
द्वयोः संयोगविहितं मधु वाग्वचनं तयोः ॥ १० ॥
दानमें जो स्वयं लगने और दूसरे लोगोंको भी लगानेका कार्य है, वह भी उन्होंने बहुत बार किया है। जब पाण्डव और श्रीकृष्ण दोनोंका संयोग प्राप्त होता था, तब उनमें बड़ा मधुर वार्तालाप (सत्संग) आरम्भ हो जाता था ॥ १० ॥
न तच्छक्यं मयाऽऽख्यातुं भारताध्ययनं महत्।
एकाह्नेन महान् ब्रह्मन्नपि दिव्येन चक्षुषा ॥ ११ ॥
महान् ब्राह्मणदेव ! महाभारतका जो विशाल अध्ययन है, उसका एक दिनमें दिव्य-दृष्टिसे भी महत्त्व बताना मेरे लिये असम्भव है ॥ ११ ॥
ब्रह्मणोऽहस्तु विस्तारं संक्षेपं च सुसंग्रहम् ।