भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 807

७८४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


दक्षश्चैव महाबाहुर्वपुष्मांश्च तथैव च। चाक्षुषस्य मनोरेते तथानन्तमहीरणौ ॥ ५१ ॥

सुना जाता है कि धर्मसे विश्वाके गर्भसे विश्वेदेवोंकी उत्पत्ति हुई है। महाबाहु सुधर्मा, महाबली शङ्खपात्, महाबाहु दक्ष, वपुष्मान्, अनन्त तथा महीरण—ये चाक्षुष मनुके पुत्र हैं (जो विश्वेदेव बनकर उत्पन्न हुए थे) ५०-५१

विश्वावसुस्सुपर्वाणौ विष्टरश्च महायशाः। रुरुश्च ऋषिपुत्रो वै भास्करप्रतिमद्युतिः ॥ ५२ ॥

इनके सिवा विश्वावसु, सुपर्वा, महायशस्वी विष्टर तथा सूर्यके समान तेजस्वी ऋषिपुत्र रुरु भी (विश्वेदेव हुए थे) ॥ ५२ ॥

विश्वेदेवान् देवमाता विश्वेशाञ्जनयत् सुतान्। मरुत्वती मरुत्वतो देवानजनयच्छुभान् ॥ ५३ ॥

इन सामर्थ्यशाली विश्वेदेवोंको देवमाता विश्वाने पुत्र-रूपमें उत्पन्न किया था। मरुत्वतीने मरुत्वान् नामवाले शुभलक्षण देवताओंको जन्म दिया ॥ ५३ ॥

अग्निं चक्षुर्हविर्ज्योतिः सावित्रं मित्रमेव च। अमरं शरवृष्टिं च संक्षयं च महाभुजम् ॥ ५४ ॥ विरजं चैव शुक्रं च विश्वावसुविभावसू। अश्मन्तं चित्ररश्मिं च तथा निष्कुपितं नृपम् ॥ ५५ ॥ हूयमानं च हूतिं च चारित्रं बहुपन्नगम्। बृहन्तं च बृहद्रूपं तथैव परतापनम् ॥ ५६ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—अग्नि, चक्षु, हवि, ज्योति, सावित्र, मित्र, अमर, शरवृष्टि, महाबाहु संक्षय, विरज, शुक्र, विश्वावसु, विभावसु, अश्मन्त, चित्ररश्मि, राजा निष्कुपित, हूयमान, हूति, चारित्र, बहुपन्नग, बृहन्त, बृहद्रूप तथा परतापन ॥ ५४–५६ ॥

मरुत्वत्यां पुरा धर्माज्जज्ञे पुत्रद्वयं शुभम्। अदित्यां जज्ञिरे राजन्नादित्याः कश्यपादथ। इन्द्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा वरुणोऽशोऽर्यमा रविः॥ ५७ ॥ पूषा मित्रश्च वरदो मनुः पर्जन्य एव च। इत्येते द्वादशादित्या वरिष्ठास्त्रिदिवौकसः ॥ ५८ ॥

पूर्वकालमें धर्मसे मरुत्वतीके गर्भसे दो शुभलक्षण पुत्र और उत्पन्न हुए थे। राजन् ! कश्यपसे अदितिके गर्भसे बारह आदित्य उत्पन्न हुए, जिनके नाम यों हैं—इन्द्र, विष्णु, भग, त्वष्टा, वरुण, अंश, अर्यमा, रवि, पूषा, मित्र, वरदायक मनु और पर्जन्य-ये बारह आदित्य श्रेष्ठ देवता हैं ॥ ५७-५८ ॥

आदित्यस्य सरस्वत्यां जज्ञे पुत्रद्वयं शुभम्। रूपश्रेष्ठं बलश्रेष्ठं त्रिदिवे रूपिणां वरम् ॥ ५९ ॥

आदित्यके सरस्वतीके गर्भसे दो शुभलक्षण पुत्र उत्पन्न हुए, जो रूप और बलमें श्रेष्ठ थे। वे स्वर्गके रूपवान् पुरुषों-में सबसे उत्तम थे ॥ ५९ ॥

दनुस्तु दानवाञ्जज्ञे दितिर्दैत्यान् व्यजायत। काला नु कालकेयांश्च ह्यसुरान् राक्षसांस्तथा ॥ ६० ॥

दनुने दानवोंको जन्म दिया। दितिने दैत्योंको उत्पन्न किया। कालाने कालकेयों, असुरों तथा राक्षसोंको पैदा किया ॥ ६० ॥

दनायुषायास्तनया व्याधयश्चाधयस्तथा। सिंहिका ग्रहमाता च गन्धर्वजननी मुनिः ॥ ६१ ॥

दनायुषाके पुत्र आधि और व्याधि हुए; सिंहिका राहु-ग्रहकी माता और मुनि गन्धर्वोंकी जननी हुई ॥ ६१ ॥

प्रबोधाप्सरसां माता सुरसायां सरीसृपाः। क्रोधायाः सर्वभूतानि पिशाचाश्चैव भारत ॥ ६२ ॥

भारत ! प्रबोधा अप्सराओंकी माता हुई । सुरसाके गर्भसे सर्प हुए । क्रोधासे सम्पूर्ण भूतों और पिशाचोंका जन्म हुआ ॥ ६२ ॥

तथा यक्षगणांश्चैव गुह्यकाश्च विशाम्पते। चतुष्पदानि सर्वाणि ऋते गावस्तु सौरभाः ॥ ६३ ॥

प्रजानाथ ! यक्षगण, गुह्यक तथा समस्त चौपाये भी क्रोधाके ही पुत्र हैं। परंतु सुरभिकी संतानभूत गौओंको क्रोधाके पुत्रोंमें नहीं गिनना चाहिये ॥ ६३ ॥

अरुणो गरुडश्चैव विनतायां व्यजायत। महीधरान् सर्पनागान् देवी कद्रूर्व्यजायत ॥ ६४ ॥

अरुण और गरुड़ विनताके गर्भसे उत्पन्न हुए। देवी कद्रूने पृथ्वीको धारण करनेवाले सर्पों और नागोंको जन्म दिया ॥

एवं विवृद्धिमगमन् विश्वे लोकाः परस्परम्। तदा पौष्करके राजन् प्रादुर्भावे महात्मनः ॥ ६५ ॥

राजन् ! महात्मा श्रीहरिके उस पुष्कर-प्रादुर्भावके समय इस प्रकार समस्त लोक एक दूसरेके सहयोगसे वृद्धिको प्राप्त हुए ॥ ६५ ॥

पुराणे पौष्करं चैव मया द्वैपायनाच्छ्रुतम्। कथितं तेन पूर्वेण यत् कृतं परमर्षिभिः ॥ ६६ ॥

मैंने गुरुदेव द्वैपायनके मुखसे पुराणमें यह पुष्कर-प्रादुर्भावका प्रसङ्ग सुना है। पहले महर्षियोंने जो कुछ किया था, वह सब उन्होंने मुझसे कहा था ॥ ६६ ॥

यश्चेदमग्र्यं प्रथमं पुराणं सदाप्रमत्तः पठते महात्मा। अवाप्य कामानिह वीतशोकः परत्र स स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ॥ ६७ ॥