विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 806, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व] चतुर्दशोऽध्यायः [७८३
मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तपसा निर्मितः प्रभुः। तस्मै कन्या द्वादशेमा दक्षस्ता अन्वमन्यत ॥ ३२ ॥
मरीचिके पुत्र प्रभावशाली कश्यप हुए, जिनकी तपस्या-द्वारा सृष्टि की गयी थी। दक्षने अपनी ये बारह कन्याएँ उन्हींको ब्याह दीं ॥ ३२ ॥
नक्षत्राख्यानि सोमाय वसवे दत्तवानृषिः। रोहिण्यादीनि सर्वाणि पुण्यानि जनमेजय ॥ ३३ ॥
जनमेजय ! रोहिणी आदि जो सारी पुण्यनक्षत्रस्वरूपा कन्याएँ थीं, उन्हें महर्षि दक्षने सोम नामक वसुको ब्याह दिया ॥ ३३ ॥
लक्ष्मीः कीर्तिस्तथा साध्या विश्वा कामानुगा शुभा । देवी मरुत्वती चैव ब्रह्मणा निर्मिता पुरा ॥ ३४ ॥
लक्ष्मी, कीर्ति, साध्या, इच्छानुसार विचरनेवाली शुभ लक्षणा विश्वा और देवी मरुत्वती—इन पाँच कन्याओंको पूर्वकालमें ब्रह्माजी (दक्ष प्रजापति) ने उत्पन्न किया था ॥
एताः पञ्च वरिष्ठा वै सुरश्रेष्ठाय भारत । दत्ता धर्माय भद्रं ते ब्रह्मणा दृष्टधर्मणा ॥ ३५ ॥
भारत ! तुम्हारा कल्याण हो, धर्मदर्शी ब्रह्मा (दक्ष) ने ये पाँच श्रेष्ठ कन्याएँ सुरश्रेष्ठ धर्मको दे दीं ॥ ३५ ॥
या रूपादर्द्धमयी पत्नी ब्रह्मणः कामरूपिणी । सुरभिः सा तु गौर्भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता ॥ ३६ ॥
ब्रह्माजीकी जो इच्छाके अनुसार रूप धारण करनेवाली अर्द्धाङ्गरूपा पत्नी थी, उसका नाम सुरभि था। वह गायका रूप धारण करके ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ ३६ ॥
ततस्तामगमद् ब्रह्मा मैथुने लोकपूजितः। लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय भारत ॥ ३७॥
भारत ! तब लोकसृष्टिके हेतुको जाननेवाले लोकपूजित ब्रह्माजीने गौओंकी उत्पत्तिके लिये सुरभिके साथ मैथुन किया ॥ ३७ ॥
जज्ञे चैकादश सुतान् विपुलान् धर्मसंहितान् । रक्तसंध्याभ्रसदृशान् दहनोपमतेजसः ॥ ३८ ॥
उसके गर्भसे उन्होंने ग्यारह पुत्र उत्पन्न किये, जो हृष्ट-पुष्ट, धर्मपरायण, संध्याकालके लाल बादलोंके समान कान्तिमान् तथा अग्निके तुल्य तेजस्वी थे ॥ ३८ ॥
ते रुदन्तो द्रवन्तश्च भगवन्तं पितामहम् । रोदनाद् रावणाच्चैव ततो रुद्रा इति स्मृताः ॥ ३९ ॥
वे रोते और दौड़ते हुए भगवान् ब्रह्माजीके पास गये। रोदन करने और दौड़नेके कारण वे रुद्र कहलाये ॥ ३९ ॥
निर्ऋतिश्चैव सर्पश्च तृतीयो ह्यज एकपात् । मृगव्याधः पिनाकी च दहनोऽथेश्वरश्च वै ॥ ४० ॥
अहिर्बुध्न्यश्च भगवान् कपाली चापराजितः । सेनानीश्च महातेजा रुद्रा एकादश स्मृताः ॥ ४१ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—निर्ऋति, सर्प, तीसरे अजैकपात्, मृगव्याध, पिनाकी, दहन, ईश्वर, अहिर्बुध्न्य, भगवान् कपाली, अपराजित तथा महातेजस्वी सेनानी। ये ग्यारह रुद्र माने गये हैं ॥ ४०-४१ ॥
तस्यामेव सुरभ्यां तु जज्ञे गोवृषभस्तथा । अकृष्टपच्य तथा माषाः सिकताः प्रश्रयोऽक्षताः ॥ ४२ ॥ अजाश्चैव तु वत्साश्च तथैवामृतमुत्तमम् । ओषध्यः प्रवरा याश्च सुरभ्यां ताः समुत्थिताः ॥ ४३ ॥
उसी सुरभिके गर्भसे साँड़का जन्म हुआ। बिना जोते-बोये होनेवाले अनाज, उड़द, सिकता (लोणी शाक), प्रश्रि, अक्षत(धान, जौ आदि); बकरे, बछड़े, उत्तम अमृत तथा श्रेष्ठ ओषधियाँ—इन सबका प्राकट्य सुरभिसे ही हुआ है ॥ ४२-४३ ॥
धर्माल्लक्ष्म्युद्भवः कामः साध्या साध्यान् व्यजायत । भवं च प्रभवं चैवमीशानं सुरभी तथा ॥ ४४ ॥ अरुन्धत्यारुणी चैव विश्वावसुवलभ्रूवौ । महिषश्च तनूजश्च विज्ञातमनसावपि ॥ ४५ ॥ मत्सरश्च विभूतिश्च सर्वाः सुरभिसूनवः ।
धर्मसे लक्ष्मीके गर्भसे कामकी उत्पत्ति हुई। साध्याने साध्य देवताओंको जन्म दिया। ब्रह्माजीकी पत्नी सुरभीने भव, प्रभव और ईशानको उत्पन्न किया। अरुन्धती, आरुणी, विश्वावसु, बलध्रुव, विज्ञात हृदयवाले, महिष और तनूज, मत्सर और विभूति—ये सब सुरभिकी संतानें हैं ॥ ४४-४५ १/२ ॥
सुपर्वतं विषं नागं साध्या लोकनमस्कृता ॥ ४६ ॥ वासवानुगता देवी जनयामास वै सुतान् ।
विश्ववन्दिता देवी साध्याने इन्द्रका अनुसरण करके सुपर्वत, विष और नाग नामक पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥
धरं वै प्रथमं देवं द्वितीयं ध्रुवमव्ययम् ॥ ४७ ॥ विश्वावसुं तृतीयं च चतुर्थं सोममीश्वरम् । पञ्चमं पर्वतं चैव योगेन्द्रं तदनन्तरम् ॥ ४८ ॥ सप्तमं च ततो वायुमष्टमं निर्ऋतिं वसुम् । धर्मस्यापत्यमित्येवं सुरभ्यां समजायत ॥ ४९ ॥
(धर्मकी एक पत्नीका नाम सुरभि भी था।) उस सुरभिने प्रथम धर्म, द्वितीय अविनाशी ध्रुव, तृतीय विश्वावसु, चतुर्थ सोमेश्वर, पञ्चम पर्वत, छठे योगेन्द्र, सातवें वायु और आठवें निर्ऋति नामक वसुको उत्पन्न किया। इस प्रकार सुरभीसे धर्मकी संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ४७-४९ ॥
विश्वेदेवास्तु विश्वायां धर्माज्जाता इति श्रुतिः। सुधर्मा च महाबाहुः शङ्खपाच्च महाबलः ॥ ५० ॥