भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व] चतुर्दशोऽध्यायः [७८३

मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तपसा निर्मितः प्रभुः। तस्मै कन्या द्वादशेमा दक्षस्ता अन्वमन्यत ॥ ३२ ॥

मरीचिके पुत्र प्रभावशाली कश्यप हुए, जिनकी तपस्या-द्वारा सृष्टि की गयी थी। दक्षने अपनी ये बारह कन्याएँ उन्हींको ब्याह दीं ॥ ३२ ॥

नक्षत्राख्यानि सोमाय वसवे दत्तवानृषिः। रोहिण्यादीनि सर्वाणि पुण्यानि जनमेजय ॥ ३३ ॥

जनमेजय ! रोहिणी आदि जो सारी पुण्यनक्षत्रस्वरूपा कन्याएँ थीं, उन्हें महर्षि दक्षने सोम नामक वसुको ब्याह दिया ॥ ३३ ॥

लक्ष्मीः कीर्तिस्तथा साध्या विश्वा कामानुगा शुभा । देवी मरुत्वती चैव ब्रह्मणा निर्मिता पुरा ॥ ३४ ॥

लक्ष्मी, कीर्ति, साध्या, इच्छानुसार विचरनेवाली शुभ लक्षणा विश्वा और देवी मरुत्वती—इन पाँच कन्याओंको पूर्वकालमें ब्रह्माजी (दक्ष प्रजापति) ने उत्पन्न किया था ॥

एताः पञ्च वरिष्ठा वै सुरश्रेष्ठाय भारत । दत्ता धर्माय भद्रं ते ब्रह्मणा दृष्टधर्मणा ॥ ३५ ॥

भारत ! तुम्हारा कल्याण हो, धर्मदर्शी ब्रह्मा (दक्ष) ने ये पाँच श्रेष्ठ कन्याएँ सुरश्रेष्ठ धर्मको दे दीं ॥ ३५ ॥

या रूपादर्द्धमयी पत्नी ब्रह्मणः कामरूपिणी । सुरभिः सा तु गौर्भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता ॥ ३६ ॥

ब्रह्माजीकी जो इच्छाके अनुसार रूप धारण करनेवाली अर्द्धाङ्गरूपा पत्नी थी, उसका नाम सुरभि था। वह गायका रूप धारण करके ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ ३६ ॥

ततस्तामगमद् ब्रह्मा मैथुने लोकपूजितः। लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय भारत ॥ ३७॥

भारत ! तब लोकसृष्टिके हेतुको जाननेवाले लोकपूजित ब्रह्माजीने गौओंकी उत्पत्तिके लिये सुरभिके साथ मैथुन किया ॥ ३७ ॥

जज्ञे चैकादश सुतान् विपुलान् धर्मसंहितान् । रक्तसंध्याभ्रसदृशान् दहनोपमतेजसः ॥ ३८ ॥

उसके गर्भसे उन्होंने ग्यारह पुत्र उत्पन्न किये, जो हृष्ट-पुष्ट, धर्मपरायण, संध्याकालके लाल बादलोंके समान कान्तिमान् तथा अग्निके तुल्य तेजस्वी थे ॥ ३८ ॥

ते रुदन्तो द्रवन्तश्च भगवन्तं पितामहम् । रोदनाद् रावणाच्चैव ततो रुद्रा इति स्मृताः ॥ ३९ ॥

वे रोते और दौड़ते हुए भगवान् ब्रह्माजीके पास गये। रोदन करने और दौड़नेके कारण वे रुद्र कहलाये ॥ ३९ ॥

निर्ऋतिश्चैव सर्पश्च तृतीयो ह्यज एकपात् । मृगव्याधः पिनाकी च दहनोऽथेश्वरश्च वै ॥ ४० ॥

अहिर्बुध्न्यश्च भगवान् कपाली चापराजितः । सेनानीश्च महातेजा रुद्रा एकादश स्मृताः ॥ ४१ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—निर्ऋति, सर्प, तीसरे अजैकपात्, मृगव्याध, पिनाकी, दहन, ईश्वर, अहिर्बुध्न्य, भगवान् कपाली, अपराजित तथा महातेजस्वी सेनानी। ये ग्यारह रुद्र माने गये हैं ॥ ४०-४१ ॥

तस्यामेव सुरभ्यां तु जज्ञे गोवृषभस्तथा । अकृष्टपच्य तथा माषाः सिकताः प्रश्रयोऽक्षताः ॥ ४२ ॥ अजाश्चैव तु वत्साश्च तथैवामृतमुत्तमम् । ओषध्यः प्रवरा याश्च सुरभ्यां ताः समुत्थिताः ॥ ४३ ॥

उसी सुरभिके गर्भसे साँड़का जन्म हुआ। बिना जोते-बोये होनेवाले अनाज, उड़द, सिकता (लोणी शाक), प्रश्रि, अक्षत(धान, जौ आदि); बकरे, बछड़े, उत्तम अमृत तथा श्रेष्ठ ओषधियाँ—इन सबका प्राकट्य सुरभिसे ही हुआ है ॥ ४२-४३ ॥

धर्माल्लक्ष्म्युद्भवः कामः साध्या साध्यान् व्यजायत । भवं च प्रभवं चैवमीशानं सुरभी तथा ॥ ४४ ॥ अरुन्धत्यारुणी चैव विश्वावसुवलभ्रूवौ । महिषश्च तनूजश्च विज्ञातमनसावपि ॥ ४५ ॥ मत्सरश्च विभूतिश्च सर्वाः सुरभिसूनवः ।

धर्मसे लक्ष्मीके गर्भसे कामकी उत्पत्ति हुई। साध्याने साध्य देवताओंको जन्म दिया। ब्रह्माजीकी पत्नी सुरभीने भव, प्रभव और ईशानको उत्पन्न किया। अरुन्धती, आरुणी, विश्वावसु, बलध्रुव, विज्ञात हृदयवाले, महिष और तनूज, मत्सर और विभूति—ये सब सुरभिकी संतानें हैं ॥ ४४-४५ १/२ ॥

सुपर्वतं विषं नागं साध्या लोकनमस्कृता ॥ ४६ ॥ वासवानुगता देवी जनयामास वै सुतान् ।

विश्ववन्दिता देवी साध्याने इन्द्रका अनुसरण करके सुपर्वत, विष और नाग नामक पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥

धरं वै प्रथमं देवं द्वितीयं ध्रुवमव्ययम् ॥ ४७ ॥ विश्वावसुं तृतीयं च चतुर्थं सोममीश्वरम् । पञ्चमं पर्वतं चैव योगेन्द्रं तदनन्तरम् ॥ ४८ ॥ सप्तमं च ततो वायुमष्टमं निर्ऋतिं वसुम् । धर्मस्यापत्यमित्येवं सुरभ्यां समजायत ॥ ४९ ॥

(धर्मकी एक पत्नीका नाम सुरभि भी था।) उस सुरभिने प्रथम धर्म, द्वितीय अविनाशी ध्रुव, तृतीय विश्वावसु, चतुर्थ सोमेश्वर, पञ्चम पर्वत, छठे योगेन्द्र, सातवें वायु और आठवें निर्ऋति नामक वसुको उत्पन्न किया। इस प्रकार सुरभीसे धर्मकी संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ४७-४९ ॥

विश्वेदेवास्तु विश्वायां धर्माज्जाता इति श्रुतिः। सुधर्मा च महाबाहुः शङ्खपाच्च महाबलः ॥ ५० ॥

७८४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


दक्षश्चैव महाबाहुर्वपुष्मांश्च तथैव च। चाक्षुषस्य मनोरेते तथानन्तमहीरणौ ॥ ५१ ॥

सुना जाता है कि धर्मसे विश्वाके गर्भसे विश्वेदेवोंकी उत्पत्ति हुई है। महाबाहु सुधर्मा, महाबली शङ्खपात्, महाबाहु दक्ष, वपुष्मान्, अनन्त तथा महीरण—ये चाक्षुष मनुके पुत्र हैं (जो विश्वेदेव बनकर उत्पन्न हुए थे) ५०-५१

विश्वावसुस्सुपर्वाणौ विष्टरश्च महायशाः। रुरुश्च ऋषिपुत्रो वै भास्करप्रतिमद्युतिः ॥ ५२ ॥

इनके सिवा विश्वावसु, सुपर्वा, महायशस्वी विष्टर तथा सूर्यके समान तेजस्वी ऋषिपुत्र रुरु भी (विश्वेदेव हुए थे) ॥ ५२ ॥

विश्वेदेवान् देवमाता विश्वेशाञ्जनयत् सुतान्। मरुत्वती मरुत्वतो देवानजनयच्छुभान् ॥ ५३ ॥

इन सामर्थ्यशाली विश्वेदेवोंको देवमाता विश्वाने पुत्र-रूपमें उत्पन्न किया था। मरुत्वतीने मरुत्वान् नामवाले शुभलक्षण देवताओंको जन्म दिया ॥ ५३ ॥

अग्निं चक्षुर्हविर्ज्योतिः सावित्रं मित्रमेव च। अमरं शरवृष्टिं च संक्षयं च महाभुजम् ॥ ५४ ॥ विरजं चैव शुक्रं च विश्वावसुविभावसू। अश्मन्तं चित्ररश्मिं च तथा निष्कुपितं नृपम् ॥ ५५ ॥ हूयमानं च हूतिं च चारित्रं बहुपन्नगम्। बृहन्तं च बृहद्रूपं तथैव परतापनम् ॥ ५६ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—अग्नि, चक्षु, हवि, ज्योति, सावित्र, मित्र, अमर, शरवृष्टि, महाबाहु संक्षय, विरज, शुक्र, विश्वावसु, विभावसु, अश्मन्त, चित्ररश्मि, राजा निष्कुपित, हूयमान, हूति, चारित्र, बहुपन्नग, बृहन्त, बृहद्रूप तथा परतापन ॥ ५४–५६ ॥

मरुत्वत्यां पुरा धर्माज्जज्ञे पुत्रद्वयं शुभम्। अदित्यां जज्ञिरे राजन्नादित्याः कश्यपादथ। इन्द्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा वरुणोऽशोऽर्यमा रविः॥ ५७ ॥ पूषा मित्रश्च वरदो मनुः पर्जन्य एव च। इत्येते द्वादशादित्या वरिष्ठास्त्रिदिवौकसः ॥ ५८ ॥

पूर्वकालमें धर्मसे मरुत्वतीके गर्भसे दो शुभलक्षण पुत्र और उत्पन्न हुए थे। राजन् ! कश्यपसे अदितिके गर्भसे बारह आदित्य उत्पन्न हुए, जिनके नाम यों हैं—इन्द्र, विष्णु, भग, त्वष्टा, वरुण, अंश, अर्यमा, रवि, पूषा, मित्र, वरदायक मनु और पर्जन्य-ये बारह आदित्य श्रेष्ठ देवता हैं ॥ ५७-५८ ॥

आदित्यस्य सरस्वत्यां जज्ञे पुत्रद्वयं शुभम्। रूपश्रेष्ठं बलश्रेष्ठं त्रिदिवे रूपिणां वरम् ॥ ५९ ॥

आदित्यके सरस्वतीके गर्भसे दो शुभलक्षण पुत्र उत्पन्न हुए, जो रूप और बलमें श्रेष्ठ थे। वे स्वर्गके रूपवान् पुरुषों-में सबसे उत्तम थे ॥ ५९ ॥

दनुस्तु दानवाञ्जज्ञे दितिर्दैत्यान् व्यजायत। काला नु कालकेयांश्च ह्यसुरान् राक्षसांस्तथा ॥ ६० ॥

दनुने दानवोंको जन्म दिया। दितिने दैत्योंको उत्पन्न किया। कालाने कालकेयों, असुरों तथा राक्षसोंको पैदा किया ॥ ६० ॥

दनायुषायास्तनया व्याधयश्चाधयस्तथा। सिंहिका ग्रहमाता च गन्धर्वजननी मुनिः ॥ ६१ ॥

दनायुषाके पुत्र आधि और व्याधि हुए; सिंहिका राहु-ग्रहकी माता और मुनि गन्धर्वोंकी जननी हुई ॥ ६१ ॥

प्रबोधाप्सरसां माता सुरसायां सरीसृपाः। क्रोधायाः सर्वभूतानि पिशाचाश्चैव भारत ॥ ६२ ॥

भारत ! प्रबोधा अप्सराओंकी माता हुई । सुरसाके गर्भसे सर्प हुए । क्रोधासे सम्पूर्ण भूतों और पिशाचोंका जन्म हुआ ॥ ६२ ॥

तथा यक्षगणांश्चैव गुह्यकाश्च विशाम्पते। चतुष्पदानि सर्वाणि ऋते गावस्तु सौरभाः ॥ ६३ ॥

प्रजानाथ ! यक्षगण, गुह्यक तथा समस्त चौपाये भी क्रोधाके ही पुत्र हैं। परंतु सुरभिकी संतानभूत गौओंको क्रोधाके पुत्रोंमें नहीं गिनना चाहिये ॥ ६३ ॥

अरुणो गरुडश्चैव विनतायां व्यजायत। महीधरान् सर्पनागान् देवी कद्रूर्व्यजायत ॥ ६४ ॥

अरुण और गरुड़ विनताके गर्भसे उत्पन्न हुए। देवी कद्रूने पृथ्वीको धारण करनेवाले सर्पों और नागोंको जन्म दिया ॥

एवं विवृद्धिमगमन् विश्वे लोकाः परस्परम्। तदा पौष्करके राजन् प्रादुर्भावे महात्मनः ॥ ६५ ॥

राजन् ! महात्मा श्रीहरिके उस पुष्कर-प्रादुर्भावके समय इस प्रकार समस्त लोक एक दूसरेके सहयोगसे वृद्धिको प्राप्त हुए ॥ ६५ ॥

पुराणे पौष्करं चैव मया द्वैपायनाच्छ्रुतम्। कथितं तेन पूर्वेण यत् कृतं परमर्षिभिः ॥ ६६ ॥

मैंने गुरुदेव द्वैपायनके मुखसे पुराणमें यह पुष्कर-प्रादुर्भावका प्रसङ्ग सुना है। पहले महर्षियोंने जो कुछ किया था, वह सब उन्होंने मुझसे कहा था ॥ ६६ ॥

यश्चेदमग्र्यं प्रथमं पुराणं सदाप्रमत्तः पठते महात्मा। अवाप्य कामानिह वीतशोकः परत्र स स्वर्गफलानि भुङ्क्ते ॥ ६७ ॥

भविष्यपर्व ]पञ्चदशोऽध्यायः७८५

जो महात्मा पुरुष सावधान होकर इस श्रेष्ठ एवं प्रथम पुराणका सदा पाठ करता है, वह इस जगत्‌में सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त करके शोकरहित हो पर-लोकमें स्वर्गीय फलोंका उपभोग करता है॥ ६७॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सर्वभूतोत्पत्तौ चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसंगमें सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥


पञ्चदशोऽध्यायः

जनमेजयके द्वारा महाभारत-वर्णित चरित्रकी प्रशंसा

जनमेजय उवाच

श्रुतं नः परमं ब्रह्मन् स्ववंशचरितं महत् ।
दिव्यमन्योन्यसम्भूतं मानितं बहुभिर्गुणैः ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा— ब्रह्मन् ! मैंने अपने वंशके उत्तम, महान् एवं दिव्य चरित्रका वर्णन सुना, जो हमारे पूर्वजोंके परस्पर सहयोगसे सम्भव हुआ था। वह चरित्र अनेक गुणोंसे सम्मानित है ॥ १ ॥

छन्दोभिर्वृत्तसंजातैः समासैश्च सविस्तरैः ।
लघुभिर्मधुराभाषैर्ग्रथितं पदविग्रहैः ॥ २ ॥

वह छन्दःशास्त्रोक्त छन्दों, संक्षेप और विस्तारयुक्त छोटे-छोटे पदों तथा मधुर भाषामें ग्रथित किया गया है॥२॥

त्रिवर्गेणाभिसम्पन्नं धर्मेणार्थेन भोगिनाम् ।
कामेन बहुरूपेण शरीरान्तर्गतेन च ॥ ३ ॥

उसमें धर्म, अर्थ और भोगी पुरुषोंके शरीरके भीतर अनेक रूपसे निवास करनेवाले काम नामक त्रिवर्गका भी वर्णन है ॥ ३ ॥

ब्राह्मणानां प्रभावैश्च योधानां च पराक्रमैः ।
वैरनिर्यातनैश्चैव प्रतिज्ञानां च पारगैः ॥ ४ ॥

इस चरित्रमें ब्राह्मणोंके प्रभावों, योद्धाओंके पराक्रमों, वैरका बदला लेनेकी घटनाओं तथा प्रतिज्ञाके पारगामी पुरुषोंके तदनुरूप प्रयत्नोंका भी उल्लेख है ॥ ४ ॥

रिपुस्तवसुसम्पन्नैर्नानुबन्धः प्रचोदितः ।
वंशयोर्निर्विनाशाय नृपेण द्विज विग्रहात् ॥ ५ ॥

ब्रह्मन् ! जिन लोगोंकी शत्रु भी स्तुति करते थे ऐसे वीर पुरुषोंके चरित्रोंका भी इसमें वर्णन है। राजा (दुर्योधन) ने पाण्डवोंके साथ जो विग्रह छोड़कर प्रेमपूर्ण सम्बन्ध नहीं स्थापित होने दिया, वही दोनों कुलोंके विनाशका कारण हुआ ॥ ५ ॥

ये च तस्मिन् महारेौद्रे संग्रामे निहता नृपाः ।
तेषां सर्वाणि राष्ट्राणि पुत्राः सर्वे प्रपेदिरे ॥ ६ ॥

उस महाभयंकर संग्राममे जो-जो राजा मारे गये थे, उनके समस्त राष्ट्रोंको उन्हींके सभी पुत्रोंने प्राप्त किया ॥ ६ ॥

कौरवः प्रथितो राजा भगवच्छासनानुगः ।
धर्मेश्च बहुधा प्रोक्तस्त्रयाणां वर्णसम्पदाम् ।
शूराणामपि विख्यातः स्वर्गहेतुर्द्विजर्षभ ॥ ७ ॥

द्विजश्रेष्ठ ! कुरुवंशके सुविख्यात राजा युधिष्ठिर भगवान्‌की आज्ञाके अनुकूल चलते थे । उन्होंने तीनों वर्णोंके लिये धर्मका बारंबार वर्णन किया है। वे शूरवीरोंको स्वर्गकी प्राप्ति करानेके प्रधान हेतुके रूपमें विख्यात हैं॥ ७ ॥

अनुग्रहार्थं भूतानां नोत्सेकाय कथंचन ।
चतुर्णां वर्णसंज्ञानां पृथक्पृथगनेकधा ॥ ८ ॥

उन्होंने किसी तरह अहंकार प्रकट करनेके लिये नहीं, समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये ही चारों वर्णोंके पृथक्-पृथक् अनेक धर्म बताये हैं ॥ ८ ॥

गर्भवासं पतन्तश्च भूतानां सम्प्रबोधिताः ।
पृच्छन्तो देवसंचारं क्षीणे पुण्ये च कर्मणि ॥ ९ ॥

प्राणियोंमेंसे जो लोग गर्भवासमें गिर रहे थे और पुण्यकर्मके क्षीण हो जानेपर पुनः देवलोकमें प्रवेशका उपाय पूछते थे (उन सबके लिये वे पृथक्-पृथक् धर्मका उपदेश देते थे) ॥ ९ ॥

दाने यश्चापि संयोगः स चापि बहुधा कृतः ।
द्वयोः संयोगविहितं मधु वाग्वचनं तयोः ॥ १० ॥

दानमें जो स्वयं लगने और दूसरे लोगोंको भी लगानेका कार्य है, वह भी उन्होंने बहुत बार किया है। जब पाण्डव और श्रीकृष्ण दोनोंका संयोग प्राप्त होता था, तब उनमें बड़ा मधुर वार्तालाप (सत्संग) आरम्भ हो जाता था ॥ १० ॥

न तच्छक्यं मयाऽऽख्यातुं भारताध्ययनं महत्।
एकाह्नेन महान् ब्रह्मन्नपि दिव्येन चक्षुषा ॥ ११ ॥

महान् ब्राह्मणदेव ! महाभारतका जो विशाल अध्ययन है, उसका एक दिनमें दिव्य-दृष्टिसे भी महत्त्व बताना मेरे लिये असम्भव है ॥ ११ ॥

ब्रह्मणोऽहस्तु विस्तारं संक्षेपं च सुसंग्रहम् ।

७८६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

श्रोतुमिच्छामि भगवन् महत् कौतूहलं हि मे ॥ १२॥
भगवन् ! मैं ब्रह्माजीके दिन (या यज्ञ) का विस्तार, संक्षेप और उत्तम संग्रह सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे हृदयमें बड़ा कौतूहल है ॥ १२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे जनमेजयवाक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसंगमें जनमेजयका वाक्यविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥


षोडशोऽध्यायः

सृष्टिविषयक वर्णनके प्रसङ्गमें ज्ञान और योगका विचार

वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वैकमना राजन् पञ्चेन्द्रियसमाहितः।
कथां कथयतो राजन् निर्विकारेण चेतसा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तुम पाँचों इन्द्रियों तथा मनको एकाग्र करके निर्विकार चित्तसे मेरी कही हुई कथा सुनो ॥ १ ॥

ब्रह्मसम्बन्धसम्बद्धमबद्धं कर्मभिर्नृप।
पुरस्ताद् ब्रह्म सम्पन्नं ब्रह्मणो यद्दक्षिणम् ॥ २ ॥
अव्यक्तं कारणं यत् तन्नित्यं सदसदात्मकम्।
निष्कलः पुरुषस्तस्मात् सम्बभूवात्मयोनिनः ॥ ३ ॥
नरेश्वर ! जो वेदके सम्बन्धसे अर्थात् वेदमूलक होनेके कारण सबसे सम्बन्ध रखता है, तथापि जो किसीके कर्मोंसे बँधा हुआ नहीं है, ब्रह्मा या ब्रह्मवेत्तासे पहलेसे ही जो सबमें अनुगत, नित्यसिद्ध है, दक्षिणाप्रधान यज्ञ आदिसे ऊपर उठा हुआ है और जो अव्यक्त, सबका कारण, नित्य तथा सदसत्स्वरूप है, वह परब्रह्म परमात्मा ही निष्कल पुरुष है, उसीसे स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रकट हुए ॥ २-३ ॥

दिव्यो दिव्येन वपुषा सर्वभूतपतिर्विभुः।
अचिन्त्यश्चाव्ययश्चैव युगानां प्रभवोऽव्ययः ॥ ४ ॥
वे ब्रह्माजी स्वयं तो दिव्य हैं ही, दिव्य शरीरसे भी संयुक्त हैं। वे समस्त प्राणियोंके पालक, प्रभु, अचिन्त्य, निर्विकार, युगोंकी उत्पत्तिके कारण और अविनाशी हैं ॥४॥

अभूतश्चाप्यजातश्च सर्वत्र समतां गतः।
अव्यक्तात् परं यत् तन्नारायणविदो विदुः ॥ ५ ॥
वे अभूत अर्थात् स्वयम्भू हैं, उनका किसी दूसरेसे जन्म नहीं हुआ है—इसलिये अजन्मा हैं, उनका सर्वत्र समान भाव है। जो अव्यक्तसे परे परमात्मतत्त्व है, उसे नारायणके स्वरूपको जाननेवाले उनके उपासक ही जानते हैं ॥ ५ ॥

सर्वतःपाणिपादं तं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ ६ ॥
उसके सब ओर हाथ और पैर हैं, सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं तथा उसके सब ओर कान हैं, वह लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ ६ ॥

असतश्च सतश्चैव विज्ञेयं तत्र कारणम्।
अव्यक्तो व्यक्तरूपस्थश्चरन्नपि न दृश्यते ॥ ७ ॥
उसीको असत् और सत्‌का कारण जानना चाहिये, वह अव्यक्त है; व्यक्त रूपोंमें स्थित होकर विचर रहा है, तो भी किसीको दिखायी नहीं देता ॥ ७ ॥

विकारपुरुषोऽव्यक्तो ह्यरूपी रूपमाश्रितः।
चरत्यचिन्त्यः सर्वेषु गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ ८ ॥
विकारयुक्त अर्थात् क्षर पुरुष रूपवान् है, जिसका अव्यक्त एवं रूपहीन चिन्मय पुरुष परमात्माने आश्रय ले रखा है। जैसे लकड़ियोंमें आग गूढ़रूपसे छिपी हुई है, उसी प्रकार वे अचिन्त्य परमात्मा समस्त भूतोंमें गूढ़रूपसे स्थित होकर विचरते हैं ॥ ८ ॥

भूतभव्योद्भवो नाथः परमेष्ठी प्रजापतिः।
प्रभुः सर्वस्य लोकस्य नाम चास्येति तत्त्वतः ॥ ९ ॥
वे ही भूत, भविष्य और वर्तमानकी उत्पत्तिके कारण हैं, सबके स्वामी एवं संरक्षक हैं, परमेष्ठी प्रजापति तथा सर्वलोकप्रभु आदि इनके यथार्थ नाम हैं ॥ ९ ॥

अपदान्तु पदो जातस्तस्मान्नारायणोऽभवत्।
अव्यक्तो व्यक्तिमापन्नो ब्रह्मयोगेन कामतः ॥ १० ॥
अपद अर्थात् निर्गुण निराकारसे पद अर्थात् सगुण साकार रूपमें प्रकट हुए वे परमात्मा नार अर्थात् जलको अयन अर्थात् निवासस्थान बनानेके कारण नारायण नामसे प्रसिद्ध हुए। वे पहले अव्यक्त थे; फिर ब्रह्मयोगसे इच्छानुसार संकल्प करके व्यक्तभावको प्राप्त हुए ॥ १० ॥

ब्रह्मभावे च तं विद्धि सशब्दं लब्धवान् प्रभुः।
प्रभुः सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्येतरस्य च ॥ ११ ॥
उन्हींको ब्रह्मरूपमें स्थित हुआ समझो। उन्हीं प्रभुने ब्रह्मा नाम प्राप्त किया। वे स्थावर-जङ्गम रूप सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी हैं ॥ ११ ॥

भविष्यपर्व ] | षोडशोऽध्यायः | ७८७

अहं त्विति स होवाच प्रजाः स्रक्ष्यामि भारत ।
प्रभवः सर्वभूतानां यस्य तन्तुरिमाः प्रजाः ॥ १२ ॥
भारत ! उन्होंने पहले-पहल यह संकल्प प्रकट करते हुए कहा कि मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा, अतः वे ही सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिके कारण हैं। यह सारी प्रजा उन्हींकी संतान है ॥१२॥

स्वभावाज्जायते सर्वं स्वभावाच्च तथाभवत् ।
अहंकारः स्वभावाच्च तथा सर्वमिदं जगत् ॥ १३ ॥
स्वभावसे ही सबकी उत्पत्ति होती है, स्वभावसे ही परमात्मा पूर्वोक्तरूपमें प्रकट हुआ, स्वभावसे ही अहंकार तथा यह सारा जगत् प्रकट हुआ है ॥ १३ ॥

सर्वव्यापी निरालम्बो ह्यग्राह्योऽथ जयो ध्रुवः ।
एष ब्रह्ममयो ज्योतिर्ब्रह्मशब्देन शब्दितः ॥ १४ ॥
यह सर्वव्यापी, आश्रयरहित, इन्द्रियातीत, जयस्वरूप, अविनाशी ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप परमात्मा ही ब्रह्म नामसे प्रतिपादित होता है ॥ १४ ॥

अव्यक्तो व्यक्तिमापन्नः पञ्चभिः क्रतुलक्षणैः ।
धारयन् ब्रह्मणो व्यक्तं विविधं चिन्तितं त्वरन् ॥ १५ ॥
वह स्वरूपसे अव्यक्त होनेपर भी संकल्पसे प्रकट हुए पाँच सूक्ष्मभूतरूप उपाधियोंसे व्यक्तभाव (पुरुषशरीर) को प्राप्त हुआ और वेदसे ज्ञात हुए विविध संकल्पित जगत्‌को हृदयमें धारण करके उसकी सृष्टिके लिये उतावला हो उठा ॥ १५ ॥

अथ मूर्तिं समाधाय स्वभावाद् ब्रह्मचोदितः ।
ससर्ज सलिलं ब्रह्म येन सर्वमिदं ततम् ॥ १६ ॥
जिसने इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है, उस ब्रह्म तथा स्वभावसे प्रेरित हो शरीर धारण करके ब्रह्माने जलकी सृष्टि की ॥ १६ ॥

वायुं पूर्वमथो दृष्ट्वा यो धातुर्धातुसत्तमः ।
धारणाद् धातृशब्दं च लभते लोकसंज्ञितम् ॥ १७ ॥
जलकी सृष्टिसे पहले वायुको स्थित देख जगद्विधाता परमेश्वरके अधीन रहनेवाले जो मरीचि आदि धाता हैं, उनमें सबसे श्रेष्ठ ब्रह्माने सबको धारण करनेके कारण लोक-प्रसिद्ध धाता नाम प्राप्त किया ॥ १७ ॥

तदेतद् वायुसम्भूतं कृत्स्नं जगदभूत् पुरा ।
एतद् देवैरतिक्रान्तं पूर्वमेव सरस्वति ॥ १८ ॥
इस प्रकार यह सारा जगत् पहले वायुसे ही प्रकट हुआ और पहलेसे ही समुद्रमें स्थित है, देवता इसे लाँघकर ऊपरको उठ चुके हैं ॥ १८ ॥

पृथक्त्वं गमितं तोयं पृथिवीशब्दमिच्छता ।
घनत्वाच्च द्रवत्वाच्च निखिलेनोपलभ्यते ॥ १९ ॥
पृथिवी शब्दके वाच्यार्थ भूमिकी (उसपर सम्पूर्ण जगत्‌की स्थितिके लिये) अभिलाषा करनेवाले ब्रह्माजीने जलको उससे भिन्न अवस्थामें पहुँचा दिया। एक (जल) के द्रव-पदार्थ होनेसे और दूसरी (पृथ्वी) के घनीभूत होनेसे दोनोंका भेद स्पष्ट है। पृथ्वी और जलके इस अन्तरको प्रत्यक्ष देखते हैं ॥ १९ ॥

फलत्वात् सीदमाना च सलिले सलिलोद्भवा ।
व्याजहार शुभां वाणीं समन्तात् पूरयन्निव ॥ २० ॥
जलसे प्रकट हुई पृथ्वी उसका फल या कार्यरूप होनेके कारण अपने कारणभूत जलमें जब डूबने और गलने लगी, तब उसकी अधिष्ठात्रीदेवीने सब ओरके आकाशको गुँजाते हुए-से यह शुभ वाणी कही—॥ २० ॥

ऊर्ध्वेऽहं स्थातुमिच्छामि संसीदाम्युद्धरस्व माम् ।
गम्भीरे तोयविवरे मूर्तिविक्षोभितान्तरम् ॥ २१ ॥
'अहो ! जलकी इस गहरी गुफामें मैं डूबती और गलती जा रही हूँ। अपने शरीरकी कठोरता या घनीभूततासे मेरा अन्तःकरण अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा है, अतः मैं जलके ऊपर स्थित होना चाहती हूँ, कोई आकर मेरा उद्धार करो' ॥२१॥

ततो मूर्तिधरा देवी सर्वभूतप्ररोहिणी ।
यथायोगेन सम्भूता सर्वत्र विषयैषिणी ॥ २२ ॥
तदनन्तर समस्त भूतोंको अङ्कुरित करनेवाली पृथ्वीदेवी मूर्तिमती होकर प्रकट हुई और अपने ठहरनेके लिये स्थान चाहती हुई पूर्वोक्त कारणसे सब ओर मुँह करके अपनी रक्षाके लिये पुकारने लगी ॥ २२ ॥

श्रुत्वा च गदितं तस्या गिरं तां च सुभाषिताम् ।
वराहरूपमास्थाय निपपात महार्णवे ॥ २३ ॥
उसके मुखसे निकली हुई उस सुभाषित वाणीको सुनकर भगवान् श्रीहरि वाराहरूप धारण करके उस महासागरमें कूद पड़े ॥ २३ ॥

उद्धृत्य सोऽवनिं तोयात्कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
समाधौ प्रलयं गत्वा प्रलीनो न च दृश्यते ॥ २४ ॥
जलसे पृथ्वीको ऊपर उठाकर वह अत्यन्त दुष्कर कर्म करके वे भगवान् समाधिमें लयको प्राप्त अथवा लीन हो अदृश्य हो गये, अपने मूलस्वरूपमें प्रतिष्ठित हो गये ॥ २४ ॥

यत्तद् ब्रह्ममयं ज्योतिराकाशमिति संज्ञितम् ।
तत्र ब्रह्मा समुद्भूतः सर्वभूतपितामहः ॥ २५ ॥
श्रीहरिका वह स्वरूप परब्रह्म एवं चिन्मय प्रकाशरूप है, श्रुतिमें उसे आकाश नाम दिया गया है, उसीसे सम्पूर्ण भूतोंके पितामह ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ २५ ॥

अद्यापि मनसा धात्रा धार्यते सर्वयोनिना ।
ज्ञानयोगेन सूक्ष्मेण प्रजानां हितकाम्यया ॥ २६ ॥

७८८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आज भी सबकी उत्पत्तिके स्थानभूत वे जगदाधार परमेश्वर प्रजाजनोंके हितकी कामनासे सूक्ष्म ज्ञानयोगद्वारा मनसे (शेष, कूर्म आदि रूपसे) इस पृथ्वीको धारण करते हैं॥ २६ ॥

भित्त्वा तु पृथिवीमध्यमुपयाति समुद्रवम्।
तपनस्तूर्ध्वमतिष्ठन् रश्मिभिः स हसन्निव॥ २७॥

ऊपर रहकर सबको ताप देनेवाले सूर्यदेव अपनी सब ओर फैली हुई किरणोंद्वारा हँसते हुए-से पृथ्वीके मध्यभाग-का भेदन करके उसके उत्पादक जलके पासतक पहुँच जाते हैं॥ २७॥

तस्य मण्डलमध्यात्तु निःसृतं सोममण्डलम्।
स सनातनजो ब्रह्मा सौम्यं सोमत्वमन्वगात् ॥ २८॥

इस प्रकार अत्यन्त तापके कारण सूर्यमण्डलके मध्य-भागसे सोममण्डलका प्रादुर्भाव हुआ। सनातन परमात्मासे प्रकट हुआ वह सोममण्डलका अभिमानी चेतन ब्राह्मण है और सौम्यभाव एवं सोमत्वको प्राप्त है ॥ २८ ॥

सोममण्डलपर्यन्तात् पवनः समजायत ।
तदक्षरमयं ज्योतिस्तेजोभिरभिवर्द्धयन् ॥ २९॥

उक्त सोममण्डलके मुखसे जो निःश्वास वायु प्रकट हुई वही अक्षरमय वेदरूप ज्योति है, जो अपने ज्ञानमय प्रकाशसे समस्त जगत्की वृद्धि अथवा विस्तार करता हुआ सब अर्थों-का प्रकाशक है॥ २९॥

स तु योगमयाज्ज्ञानात् स्वभावाद् ब्रह्मसम्भवात् ।
सृजते पुरुषं दिव्यं ब्रह्मयोनिं सनातनम्॥ ३०॥

वह ब्रह्मा पुरुष योगमय ज्ञान एवं ब्रह्मजनित स्वभावसे सनातन ब्रह्मयोनिरूप दिव्य पुरुषकी सृष्टि करता है॥ ३० ॥

द्रवं यत् सलिलं तस्य घनं यत् पृथिवी भवत् ।
छिद्रं यच्च तदाकाशं ज्योतिर्यच्चक्षुरेव तत् ॥ ३१ ॥

उस पुरुषका जो द्रव है, वही जल है। उसका घनीभाव ही पृथ्वोरूपमें परिणत होता है। उसका जो छिद्र है, वही आकाश है तथा जो नेत्र है; वही तेज है ॥ ३१ ॥

वायुना स्पन्दते चैनं संघाताज्ज्योतिसम्भवः ।
पुरुषात् पुरुषो भावः पञ्चभूतमयो महान् ॥ ३२ ॥
भूतात्मा वै समे तस्मिंस्तस्मिन् देहे सनातनः ।
गुहायां निहितं ज्ञानं योगाद् यज्ञज्ञः सनातनः ॥ ३३ ॥

पुरुष अर्थात् ईश्वरसे प्राप्त हुआ जो पुरुषभाव (चैतन्य) है, वही वायुके सहयोगसे इस शरीरको चेष्टाशील बनाता है। इस प्रकार पाँच भूतोंके संघात रूप शरीरको प्राप्त होकर जब चेतन उसमें निवास करता है, तब वहाँ इन्द्रिय-रूपी ज्योतियों और जठरानलका प्राकट्य होता है। पाँचों भूतोंसे निर्मित जो विराट् शरीर है, उसमें भी वही अन्तर्यामी भूतात्मा निवास करता है। विभिन्न प्रकारके जो शरीर हैं, वे सभी उसके लिये सम हैं, अतः वह सनातन परमात्मा उन सबमें अनादि कालसे विराजमान है। वह ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सबकी बुद्धिरूप गुहामें स्थित है तथा वह सनातन परमेश्वर ही योगबलसे अपने स्वरूपभूत उस ज्ञानका साक्षात्कार करने-वाला है ॥ ३२-३३ ॥

तपनस्यैव तद्रूपं योऽग्निर्वसति देहिनाम्।
शरीरे नित्यशो युक्तं धातुभिः सह संगतः ॥ ३४ ॥

देहधारियोंके शरीरमें जो अग्निका वास है, वह अग्नि सूर्यका ही स्वरूप है। इसी प्रकार पाँचों भूतोंसे सदा संयुक्त रहनेवाले शरीरमें उन भूतोंसे मिला हुआ जो जीवात्मा है, वह उस सनातन परमात्माका ही अंश है ॥ ३४ ॥

स्वभावात् क्षयमायाति स्वभावाद् भयमेति च।
स्वभावाद्विन्दते शान्तिं स्वभावाच्च न विन्दति ॥ ३५॥

वह जीवात्मा क्षयशील धातुओंके साथ संगत है, अतः अपने स्वरूपको भूलकर उस मोहयुक्त स्वभावसे ही क्षयको प्राप्त होता है (वह नित्य अक्षय होनेपर भी अज्ञानवश देहके क्षयसे अपनेको क्षयशील मानता है)। उस स्वभावसे ही उसे अपने स्वरूप और ऐश्वर्यके नाशका भय प्राप्त होता है। स्वभावसे ही वह शरीरकी स्वस्थतासे शान्तिका अनुभव करता है और उसके अस्वस्थ हो जानेपर स्वभावतः उसे शान्ति नहीं मिलती है॥ ३५ ॥

इन्द्रियैरतिमूढात्मा मोहितो ब्रह्मणः पदे ।
सम्भवं निधनं चैव कर्मभिः प्रतिपद्यते ॥ ३६॥

इन्द्रियोंके वेगसे अत्यन्त मूढचित्त हुआ मानव ब्रह्मपद (परमात्माके स्वरूप) की ओरसे मोहित (ज्ञानशून्य) हो जाता है और कर्मोंसे बँधा रहकर जन्म-मरणको प्राप्त होता रहता है ॥ ३६ ॥

यावत् तद् ब्रह्मविषयं नोपयाति ह तत्त्वतः ।
तावत् संसारमाप्नोति सम्भवांश्च पुनः पुनः ॥ ३७॥

जवतक तत्त्वज्ञानके द्वारा वह ब्रह्मानन्दके साम्राज्यमें नहीं पहुँच जाता, तबतक उसे संसार तथा उसमें बारंबार जन्म-मरणकी प्राप्ति होती रहती है ॥ ३७ ॥

इन्द्रियैर्व्यतिरिक्तो वै यदा भवति योगवित् ।
तदा ब्रह्मत्वमापन्नः प्रलयाग्रे प्रतिष्ठति ॥ ३८ ॥

जब योगवेत्ता पुरुष योगबलसे अपनेको इन्द्रियोंसे पृथक् उनका नियन्ता समझ लेता है, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त होकर अपने स्वरूपभूत आनन्दमें प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ३८ ॥

प्रतिषिद्धममुं लोकं ब्रह्मवान् स भवत्युत ।
न च रागव्ययैर्याति न च सज्जति कर्हिचित् ॥ ३९॥

भविष्यपर्व ] सप्तदशोऽध्यायः [ ७८९

वह पुरुष परलोकके भी सुखका परित्याग करके ब्रह्मानन्दसे सम्पन्न होता है, फिर तो वह राग-द्वेषादिके कारण हीनावस्थाको नहीं प्राप्त होता और न कहीं उसकी आसक्ति ही होती है ॥ ३९ ॥

आगतिं च गतिं चैव निधनं सम्भवं तथा ।
भूतेभ्यो वेत्ति सर्वज्ञः परां सिद्धिमूपागतः ॥ ४० ॥

वह सर्वज्ञ एवं परम सिद्धिको प्राप्त होकर समस्त प्राणियोंको प्राप्त होनेवाले आवागमन और जन्म-मरणको जानता है, परंतु स्वयं उनके चक्करमें नहीं पड़ता है ॥ ४० ॥

आत्मनो गतयश्चैव तथा विषयगोचरम् ।
पुरस्तात् कर्मनिर्वृत्तेः पदे ब्रह्मा प्रतिष्ठितः ॥ ४१ ॥

ब्रह्मवेत्ता पुरुष अपनी गतियों (मुक्तिके उपायों) को तथा भूत, वर्तमान और भविष्यके विषयोंको भी जानता है और कर्मोंके भावी फलभोगोंकी निवृत्ति हो जानेसे परमपदमें प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ४१ ॥

चित्तग्रन्थींश्च मनसा रुन्ध्यात् पूर्वाश्च यातनाः ।
भिद्यमानाः प्रलोभेन वायुभिन्नमिवार्णवम् ॥ ४२ ॥

अतः विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह चित्तको बाँधनेवाले काम आदि दोषों तथा प्रबल लोभसे अनेक शाखाओंमें विभक्त होनेवाली उन पूर्ववासनाओंका भी निरोध करे, जो वायुसे विक्षुब्ध होनेवाले समुद्रकी भाँति मनुष्यको क्षोभमें डाल देती हैं ॥ ४२ ॥

पच्यते हृदयं नीतं परेभ्यो ज्ञानचक्षुषा ।
ब्रह्मप्रोक्तमिवात्मा वै विमुक्तो देहबन्धनात् ॥ ४३ ॥

इस प्रकार वासनाओंका निरोध करनेवाले पुरुषकी काम आदि दोषोंसे मलिन हुई बुद्धि ज्ञानाग्निसे तपकर शुद्ध हो जाती है । वह ज्ञान वेदोंमें बताया गया है । जिससे जीवात्मा इस शरीरमें रहते हुए ही उसके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ४३ ॥

सृजेदपि परं लोकं संहरेदपि विद्यया ।
तेजोमूर्तिरिवाविद्वन्मिह लोकं च संसृजेत् ॥ ४४ ॥

तेजोमूर्ति योगी स्वाभिमानी पुरुषकी भाँति योगविद्याके प्रभावसे दूसरे लोककी सृष्टि और संहार भी कर सकता है । वह विश्वामित्र आदिकी भाँति इस लोकका भी पूर्णरूपसे निर्माण कर सकता है ॥ ४४ ॥

तिर्यग्योनीं गतांश्चैव कर्मभिर्नियमोपमैः ।
तान्यपि प्रतिमुच्येत ब्रह्मयुक्तेन चेतसा ॥ ४५ ॥

वह योगी बेड़ीके समान बाँधनेवाले कर्मोंके कारण पशु-पक्षी आदिकी योनियोंमें पड़े हुए जीवोंको भी ब्रह्ममें लगाये हुए अपने चित्तके संकल्पमात्रसे मुक्त कर सकता है तथा उन कर्मोंका बन्धन भी खोल सकता है ॥ ४५ ॥

अक्षरं च क्षरं चैव योगकर्माभिविद्यते ।
न क्षरं विद्यते तत्र यद् ब्रह्म कर्मभिर्ध्रुवम् ॥ ४६ ॥

योगनामक साधना क्षर और अक्षर (भोग और मोक्ष) दोनोंको व्याप्त करके स्थित होती है, अर्थात् योगीको भोग और मोक्ष दोनों सुलभ होते हैं । परंतु जो अविनाशी ब्रह्म है, उसमें कर्मोंद्वारा उपलक्षित क्षर (क्षणभंगुर जगत् एवं उसके भोग) की सत्ता नहीं है ॥ ४६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥


सप्तदशोऽध्यायः

मैनाककी स्थिति, मेरुपृष्ठपर परमात्मासे ब्रह्माजीका प्राकट्य, मेरुकी विशालता, ब्रह्माजीके द्वारा सृष्टि, ब्रह्म और ब्रह्माके स्वरूपका वर्णन, गङ्गाका प्रादुर्भाव, सोमकी उत्पत्ति, धर्मके पाद, योग-साधना, ऐश्वर्यसे हानि, वेदोंका प्राकट्य, यज्ञपुरुषका वर्णन, योगवेत्ताकी महिमा, चित्तकी उपलब्धिमें कारण, मोक्षसम्बन्धी कर्म करनेका विधान और कर्मफलके त्यागसे मुक्ति

वैशम्पायन उवाच
पृथिव्यां यत् कृतं छिद्रं तपतेन विवर्धता ।
तस्मिन्न्यस्तोऽथ मैनाकः स्वभावविहितोऽचलः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बढ़ते हुए सूर्यने पृथ्वीमें जो छिद्र कर दिया था, उसमें स्वभावतः रचे गये मैनाकपर्वतको स्थापित किया गया ॥ १ ॥

पर्वभिः पर्वतत्वं च लभते नाम संज्ञितम् ।
अचलादचलत्वं च स्वभावान्मेरुरेव सः ॥ २ ॥

उसपर बहुत-से पर्व (कामनापूरक चिन्तामणि, कल्पवृक्ष और कामधेनु आदि) हैं, इसलिये उसे 'पर्वत' संज्ञा प्राप्त हुई है। वह अविचल होनेके कारण 'अचल' कहलाता है तथा स्वभावसे ही मेरुके समान स्थित है ॥ २ ॥

७९०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तस्य पृष्ठे सुविस्तीर्णे नगस्य सुमहर्द्धिमान् ।
तस्मिंस्तु पुरुषो व्यक्तो वसति ज्योतिसम्भवः ।
विहितश्च स्वभावेन तेनैव परमात्मना ॥ ३ ॥

उस पर्वतके सुविस्तृत पृष्ठभागपर एक महान् समृद्धिशाली, व्यक्तरूपधारी पुरुष निवास करता है, जो ज्योतिर्मय परमेश्वरसे प्रकट हुआ है। उस परमात्माने स्वभावसे ही इस पुरुषकी सृष्टि की है ॥ ३ ॥

यत् तद् ब्रह्ममयं तेजो निहितं शिरसोऽन्तरे ।
तस्य ज्योतिर्मयं रूपं दीप्तं पुरुषविग्रहम् ॥ ४ ॥

मस्तकवर्ती सहस्रारचक्रमें जो ब्रह्ममय तेज विराजमान है अथवा वेदान्तमें जिस ब्रह्ममय तेजका प्रतिपादन हुआ है, उसीका ज्योतिर्मय स्वरूप इस पुरुषके रूपमें प्रकट होकर प्रकाशित होता है ॥ ४ ॥

वदनादभिनिष्क्रान्तं ज्वलन्तमिव तेजसा ।
चतुर्भिर्वदनैर्युक्तं चतुर्भिंश्च द्विजोत्तमैः ॥ ५ ॥

उसी पुरुषके मुखसे चार मुखों और चार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ ब्रह्माजीका प्राकट्य हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-से हो रहे थे ॥ ५ ॥

वक्त्रं ब्रह्म समुद्भूतं ब्रह्मा ब्राह्मणपुङ्गवः ।
तदेवं तन्महद्भूतं पुनर्भावत्वमागतम् ॥ ६ ॥

उनका मुख वेद है, जो परमात्माके निःश्वासरूपसे प्रकट हुआ है। ब्रह्माजी उस वेदके धारण करनेवाले ब्राह्मणशिरोमणि हैं। इस प्रकार वह महान् भूत पुनः पूज्यतमभावको प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥

उद्धता पृथिवी देवी पुरस्तात् सलिलाशयात् ।
ब्रह्मत्वं ब्रह्मणः स्थानादलोको लोकतां गतः ॥ ७ ॥

जिसने पहले महासागरके भीतरसे पृथ्वीदेवीका उद्धार किया था, वही वह महान् भूत है, वही ब्रह्माजीके स्थान मेरुपृष्ठपर जाकर चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ, जो वाराहरूपसे पृथ्वीका उद्धार करके अदृश्य हो गये थे, वे ही भगवान् फिर ब्रह्माजीके रूपमें दृष्टिगोचर होने लगे ॥ ७ ॥

पदसंधौ ब्रह्मलोकं शृङ्गं मेरोस्तदाभवत् ।
उच्छ्रितं योजनशतं सहस्रशतमेव च ॥ ८ ॥
एवमेव च विस्तारं चतुर्भिर्गुणितं गुणैः ।

उस समय उन भगवान्‌के दोनों चरणोंकी संधिमें जो मेरुपर्वतका शिखर था, वही ब्रह्मलोक हुआ। उसकी ऊँचाई एक लाख एक सौ योजनकी है। इसी प्रकार उसका विस्तार भी इससे चौगुना है ॥ ८ १/२ ॥

अथवा नैव संख्यातुं शक्यं भूतेन केनचित् ।
समाः सहस्रैर्बहुभिरपि दिव्येन तेजसा ॥ ९ ॥

अथवा कोई भी प्राणी कई सहस्र वर्षोंमें दिव्य ज्ञानके द्वारा भी उसके विस्तारकी गणना नहीं कर सकता ॥ ९ ॥

चतुर्भिः पार्श्वविस्तारैः शिलाभिरभिसंवृतैः ।
नगस्य यस्य राजेन्द्र विस्तारैः शतयोजनैः ॥ १० ॥
कोटिकोटीशतगुणैर्गुणितं ब्रह्मवादिभिः ।
योगयुक्तैः सदा सिद्धैर्नित्यं ब्रह्मपरायणैः ॥ ११ ॥

राजेन्द्र ! उसके चारों किनारोंमें चार बड़ी-बड़ी शिलाएँ हैं, जिनसे उसके विस्तृत पार्श्वभाग घिरे हुए हैं। उन सबके विस्तार सौ-सौ योजन हैं। मेरुपर्वतका विस्तार उन सबसे कोटि-कोटि शतगुना अधिक है—ऐसा नित्यसिद्ध, नित्यब्रह्मपरायण, योगयुक्त ब्रह्मवादी पुरुषोंने निश्चय किया है ॥ १०-११ ॥

मरुद्भिः सह देवेन्द्रै रुद्रैर्वसुभिरेव च ।
आदित्यैर्विश्वसहितै रक्ष रक्ष वसुधाधिपान् ॥ १२ ॥
ररक्ष पृथिवीं चैव भगवान् विष्णुना सह ।
विवस्वद्वरुणाभ्यां च संघातं गमितं नृप ॥ १३ ॥
तेन ब्राह्मेण वपुषा ब्रह्मप्राप्तेन भारत ।

नरेश्वर ! भरतनन्दन ! श्रीविष्णु तथा मरुद्गणों, देवेन्द्रों, रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, विश्वेदेवों एवं विवस्वान् और वरुणके साथ रहकर भगवान् ब्रह्मा उसी ब्रह्म-प्राप्त ब्राह्म शरीरसे भूमि और भूमिपालोंकी रक्षा करते हैं ॥ १२-१३ १/२ ॥

यत् तद् विष्णुमयं तेजः सर्वत्र समतां गतम् ॥ १४ ॥
यत्तद् ब्रह्मेति वै प्रोक्तं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
नियमैर्बहुभिः प्राप्तैः सत्यव्रतपरायणैः ॥ १५ ॥

ब्रह्माजी जिस ब्रह्मको प्राप्त थे, वह ब्रह्म सर्वत्र समभावसे स्थित है, विष्णुमय तेजके रूपमें प्रकाशमान है। बहुत-से नियमोंने जिन्हें अपना अनुगत बना लिया है तथा जो सत्यभाषण एवं ब्रह्मचर्य-व्रतके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन वेदके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणोंने जिसे ब्रह्मके नामसे बताया और जाना है, वही वह ब्रह्म है ॥ १४-१५ ॥

एवमेते त्रयो लोका ब्राह्मेऽहनि समाहिताः ।
अहनि ब्रह्म चाव्यक्तं व्यक्तं प्राणे प्रतिष्ठितम् ॥ १६ ॥

इस प्रकार ये तीनों लोक ब्रह्माके दिनमें स्थित रहते हैं। अव्यक्त ब्रह्म भी ब्रह्माके उस दिनमें प्राणयुक्त शरीरके भीतर जीवात्मारूपसे व्यक्त एवं प्रतिष्ठित होता है ॥ १६ ॥

ब्रह्मणो नियतं कर्म प्रभावेण प्रचोदितम् ।
प्रवर्तमानं भावेन शश्वदच्छलवादिनाम् ॥ १७ ॥

परब्रह्म परमात्माके प्रभाव (निःश्वासरूप वेद) से प्रतिपादित जो नियत (नित्य) कर्म है, वह जिनकी वाणीमें भी कपट नहीं है, ऐसे पुरुषोंद्वारा यदि निरन्तर शुद्धभावसे किया जाय तो हितकारक होता है ॥ १७ ॥

. भविष्यपर्व ] सप्तदशोऽध्यायः ७९१


एतद्धितमिति प्रोक्तं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
यदेकं ब्रह्मणः पादं दिष्टत्वं गमितं पदम् ॥ १८॥

वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणोंने इस तरह निष्काम-भावसे किये गये कर्मको ही हितकारक बताया है। जिस पदंको दिष्ट—प्रारब्ध या पूर्वकृत कर्मका फल बताया गया है, वह विश्व ब्रह्म ( परमात्मा ) का एक पाद ( लेशमात्र अंश ) है* ॥ १८ ॥

बहुत्वाद् विप्रभावानां विश्वशब्दः प्रयुज्यते ।
ब्राह्मणैर्ब्रह्म भूतात्मा सत्यव्रतपरायणैः ॥ १९ ॥

विश्वको जिसका एक पाद बताया गया है, वह ब्रह्म सम्पूर्ण भूतोंका नित्यसिद्ध आत्मा है ( उसे सकाम कर्मोंद्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता ) तो भी वेदाम्यासी विप्रोंके भावोंकी विविधताके कारण सत्यव्रतमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मण इन्द्र, मित्र, वरुण आदि सारे शब्द जिसमें वाचकरूपसे प्रतिष्ठित हैं, उस विश्व शब्दका यज्ञोंमें विनियोग करते हैं। ( उन सकाम यज्ञोंद्वारा इन्द्रादि देवोंके ही लोकोंकी प्राप्ति होती है, जो मोक्ष या भगवत्प्राप्तिके सामने नितान्त तुच्छ है। अतः मुमुक्षु पुरुषोंको निष्काम कर्मोंद्वारा ही परमात्माकी आराधना करनी चाहिये ) ॥ १९ ॥

विश्वरूपं मनोरूपं बुद्धिरूपं च मानयन् ।
एवं द्वन्द्वं स भगवान् प्रथमं मिथुनं सृजत् ॥ २० ॥

विश्वरूप ( स्थूल ) और मनोरूप ( सूक्ष्म )—ये दोनों केवल बुद्धिमात्ररूप हैं । ऐसा जानते हुए उन भगवान् ब्रह्माने पहले स्त्री-पुरुषरूप जोड़ेकी सृष्टि की ॥ २०॥

स एव भगवान् विश्वो देव्या सह सनातनः।
विधाय विपुलान् भोगान् ब्रह्मा चरति सानुगः ॥ २१ ॥

वे ही विश्वरूप सनातन भगवान् ब्रह्मा अपनी शक्ति-स्वरूपा देवीके साथ विपुल भोगोंकी रचना करके अपने अनुगामी कश्यप आदिके साथ उन्हें आचरण ( उपयोग ) में लाते हैं ॥ २१ ॥

स एष भगवान् ब्रह्मा नित्यं ब्रह्मविदां वरः ।
निर्वाणपदगन्तृणामकिंचनपथैषिणाम् ॥ २२ ॥

अकिंचनपथ ( संन्यासमार्ग ) पर जानेकी इच्छावाले जो मोक्षरूपी गन्तव्यपदके यात्री हैं, उन ब्रह्मवेत्ताओंके लिये जो सदा वरणीय परमात्मा हैं, वे यह भगवान् ब्रह्मा ही हैं ॥ २२ ॥

सोमात् सोमः समुत्पन्नो धारासलिलविग्रहात् ।
ययाभिषिक्तो भूतानामाधिपत्ये महेश्वरः ॥ २३ ॥

अद्भुत ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न परमेश्वरसे ओषधियोंके स्वामी सोम उत्पन्न हुए । उस समय इस सोमके उत्पादक उस परमेश्वरका स्वरूप ऊर्ध्वलोकसे गिरती हुई जलधारा ही थी, जिसने भगवान् महेश्वरको भूतनाथके पदपर अभिषिक्त किया ॥ २३ ॥

अभिषिच्य च भूतेशं कृत्वा कर्म स्वभावतः।
नदति स्म तदा नादं तेन सा ह्युच्यते नदी ॥ २४ ॥

वह जलधारा उस समय स्वाभाविकरूपसे भूतनाथ महेश्वरका अभिषेक करके इस महान् कर्मका सम्पादन करनेके पश्चात् कलकलनाद करने लगी। उसके कारण वह नदी कहलाती है ॥ २४ ॥

सा ब्रह्मलोकं सम्भाव्य अभिभूय सहस्रधा ।
गां गता गगनाद् देवी सप्तधा प्रससार च ॥ २५ ॥

ब्रह्मलोकका महत्त्व बढ़ाकर मार्ग रोकनेवाले पर्वतोंके सहस्रों टुकड़े करके वह देवी गगनसे भूतळपर अवतीर्ण हुई । अतः 'गां गता' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका नाम गङ्गा हुआ । वह सात धाराओंमें विभक्त होकर सब ओर फैली ॥ २५ ॥

सहस्रधा च राजेन्द्र बहुधा च पुनः पुनः ।
इमं लोकममुं चैव भावयन् क्षरसम्भवम् ॥ २६ ॥

राजेन्द्र ! वह भगवती गङ्गा अनेकानेक नदियों और तीर्थोंके रूपमें सहस्रोंकी संख्यामें विभक्त हुई हैं और बारंबार विभूतिभेदसे अनेकानेक रूप धारण करती हैं । उन गङ्गासे प्रकट हुए सोमदेव अन्न आदिके पौधोंको बढ़ाकर इस भौतिक लोककी और अपनी सुधामयी किरणोंसे परलोककी भी पुष्टि एवं रक्षा करते हैं ॥ २६ ॥

ततो भूतानि रोहन्ति महाभूतफलानि च ।
ततः सर्वे क्रियारम्भाः प्रवर्तन्ते मनीषिणाम् ॥ २७ ॥

इस लोककी वृद्धि होनेसे जरायुज आदि प्राणी बढ़ते हैं । पृथ्वी, जल और तेज—इन तीनों महाभूतोंके जो व्रीहि आदि फल हैं, उनकी भी वृद्धि होती है । फिर उन व्रीहि आदि फलों और मनुष्य आदि प्राणियोंसे मनीषी पुरुषोंकी समस्त क्रियाओंका यथायोग्य आरम्भ होता है ॥ २७ ॥

चतुर्भिर्वदनैस्तस्य मुखपद्माद् विनिःसृता ।
तदाक्षरमयी सिद्धिर्दिष्टत्वं समुपागता ॥ २८ ॥

उन परमेश्वरके मुखारविन्दसे जो चारों वेदोंके रूपोंमें अक्षर ब्रह्ममयी सिद्धि प्रकट हुई, वही उपदेश-भावको प्राप्त हुई है ॥ २८ ॥


* श्रुति भी कहती है कि 'पादोऽस्य विश्वाभूतानि' इत्यादि । अर्थात् सम्पूर्ण भूत या समस्त भौतिक जगत् इस परमात्माका एक पाद ( लघुतम अंश ) है ।
१. गङ्गा, यमुना, सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गण्डकी-ये ही उसकी सात धाराएँ हैं । ( वन० ८५ । ८८ )

७९२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


तस्य ज्ञानमयं पुण्यं चतुष्पादं सनातनम्।
पतित्वेनाभवद् देवो ब्रह्मा चात्र पितामहः॥ २९॥
उन परमात्माका जो चिन्मय, पुण्यजनक, (ब्रह्मा, उद्गाता, होता और अध्वर्यु—इन) चार पादोंसे युक्त तथा सनातन (अनादि) रूप यज्ञ है, उसके अधिपतिरूपसे यहाँ पितामह ब्रह्माजी ही प्रतिष्ठित हुए हैं॥ २९॥

पादा धर्मस्य चत्वारो यैरिदं धार्यते जगत्।
ब्रह्मचर्येण व्यक्तेन गृहस्थेन च पावने॥ ३०॥
चारों आश्रम धर्मके चार पाद हैं, जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है। स्वाध्यायरूपसे व्यक्त हुए ब्रह्मचर्य आश्रमके द्वारा धर्मका एक पैर पुष्ट होता है। पवित्र गृहका आश्रय लेकर पालित होनेवाले गृहस्थाश्रमके द्वारा धर्मका दूसरा चरण परिपुष्ट होता है॥ ३०॥

गुरुभावेन वाक्येन शुद्ध्यगामिनगामिना।
इत्येते धर्मपादाः स्युः स्वर्गहेतोः प्रबोदिताः॥ ३१॥
तपस्याके भारसे गौरवान्वित हुए वानप्रस्थाश्रमके द्वारा धर्मके तीसरे चरणकी पुष्टि होती है तथा आत्मतत्त्वके प्रतिपादक और कूटस्थ ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यके विचारसे युक्त संन्यास आश्रमके द्वारा धर्मका चौथा पाद सुदृढ़ होता है। ये ही धर्मके चार चरण हैं, जो स्वर्ग (दिव्य सुख एवं मोक्ष) की प्राप्तिके लिये शास्त्रोंद्वारा प्रतिपादित हुए हैं॥ ३१॥

न्यायाद् धर्मेण गुप्तेन सोमो वर्धति मण्डले।
ब्रह्मणो ब्रह्मचरणाद् वेदा वर्तन्ति शाश्वताः॥ ३२॥
न्यायपूर्वक गृह्यधर्मके पालनसे सोम (सोमाधिष्ठित मन) ब्रह्माण्डमण्डलमें वृद्धिको प्राप्त होता है (अर्थात् व्यष्टिके अभिमानको छोड़कर समष्टिके अभिमानसे सम्पन्न होता है)। वेदके अनुसार ब्रह्मचर्य-व्रतके पालन और स्वाध्यायसे सनातन वेद सदा बने रहते हैं॥ ३२॥

गृहस्थानभि वाक्येन तृप्यन्ति पितरस्तथा।
ऋषयोऽपि च धर्मेण नगस्य शिरसि स्थिताः॥ ३३॥
वेदोक्त धर्मसे युक्त गृहस्थोंको भी देखकर मेरु पर्वतके शिखरपर स्थित हुए पितर तथा ऋषि भी उनके धर्मसे तृप्त होते हैं॥ ३३॥

नगस्य तस्य सम्पश्य मेरोः शिखरमुत्तमम्।
पद्भ्यां सम्पीड्य वृषणावृषिभिस्तैर्विचार्यते ॥ ३४॥
उस मेरु पर्वतके उत्तम शिखरको (जिसे ब्रह्मलोक कहा गया है) देखो—उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करो। (किस तरह सो बताते हैं) ऋषिगण दोनों पैरोंसे अण्डकोषोंको दबाकर सिद्धासनसे स्थित हो उसका विचार (चिन्तन) करते हैं॥ ३४॥

ग्रीवां निगृह्य पृष्ठं च विनाम्य प्रहसन्निव।
नाभिदेशे करौ न्यस्य सर्वशोऽङ्गानि संक्षिपन् ॥ ३५॥
ग्रीवाको मोड़कर दोनों हँसलियोंकी सन्धिमें अपनी ठोढ़ीको सटा दे और पीठको इस तरह भीतरकी ओर झुका दे कि छातीका भाग कुछ ऊँचा हो जाय। फिर हँसते हुए पुरुषके समान मुद्रामें स्थित हो दाँतोंको परस्पर सटने न दे। दोनों हाथोंको नाभिदेशमें रखकर अञ्जलिकी मुद्रामें कर दे अर्थात् बायें हाथके ऊपर दाहिना हाथ रख ले। फिर सब ओरसे अपने अङ्गोंको काबूमें रखता हुआ ध्यान लगावे॥ ३५॥

मूर्ध्नि ब्रह्म समुत्क्षिप्य मनसापि पितामहः।
असृजन्मनसा विष्णुं योगाद् योगेश्वरस्य च ॥ ३६॥
इस प्रकार ध्यान लगाते हुए अधिकारी पितामहने मनः-प्रधान प्राणके द्वारा ब्रह्म अर्थात् अपने जीवात्माको मूर्धा (भौंहों और नासिकाके मध्यभाग) में ले जाकर मानसिक संकल्पके द्वारा विष्णु-अर्थात् विश्वरूपकी सृष्टि की। ऐसा उन्होंने योगेश्वरके योगसे किया (चित्तवृत्तियोंके निरोधको योग कहते हैं। वह प्राणरोध या प्राणायामके अधीन है। अतः वही योगेश्वर है) उसी प्राणायामके योग अर्थात् अभ्याससे उन्होंने पूर्वोक्त रीतिसे जीवको मूर्धामें स्थापित करके ऐश्वर्य प्राप्त किया। जिससे वे सम्पूर्ण जगत्की रचनामें सफल हुए॥ ३६॥

व्यतिरिक्तेन्द्रियो विष्णुर्विम्बाद् बिम्बमिवोद्धतः।
तेजोमूर्तिधरो देवो नभसीन्दुरिवोदितः॥ ३७॥
प्रत्याहारकी साधनासे जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंसे पृथक् हो गयी थीं, वे योगी पितामह परिच्छिन्नताके घेरेसे मुक्त एवं व्यापक विष्णुरूप हो बिम्बसे प्रकट हुए बिम्बकी भाँति अपने स्वरूपसे ही तेजोमूर्तिधारी नारायणदेवके रूपमें प्रकट हो गये और आकाशमें उदित हुए चन्द्रमाकी भाँति प्रकाशित होने लगे॥ ३७॥

रराज ब्रह्मयोगेन सहस्रांशुरिवापरः।
विराजन्नभसो मध्ये प्रभाभिरतुलं प्रभुः॥ ३८॥
वे आकाशके मध्यभागमें अपनी प्रभाओंसे अनुपम शोभा पानेवाले दूसरे भगवान् सूर्यकी भाँति ब्रह्मयोग (चैतन्यज्योति-के संयोग) से उद्भासित होने लगे॥ ३८॥


१. अन्यत्र सिद्धासनका लक्षण इस प्रकार मिलता है—
मेढ्रादुपरि विन्यस्य सव्यं गुल्फं तथोपरि।
गुल्फान्तरं च विन्यस्य सिद्धासनमिदं भवेत् ॥
अर्थात् बायें गुल्फको लिङ्गके ऊपरी भागमें रखकर उसके ऊपर दूसरा गुल्फ रखकर बैठे। यह सिद्धासन है।

भविष्यपर्व ] सप्तदशोऽध्यायः ७९३

नोपलभ्यति मूढात्मा प्रत्यक्षं ब्रह्म शाश्वतम् । ललाटमध्ये तिष्ठन्तं द्विधाभूतं क्रियां प्रति ॥ ३९ ॥

मूढ़चित्त पुरुष प्रत्येक क्रियाके प्रति नियम्य और नियामक रूपसे दो स्वरूपोंमें स्थित हुए और ललाट के मध्यभाग ( भौंहों और नासिकाके संधिस्यान ) में विराजमान सनातन ब्रह्म ( विष्णु ) का साक्षात्कार नहीं कर पाता है ॥ ३९ ॥

ज्योतिश्चक्षुषि सम्बद्धं विम्बं भास्करसोमयोः । बुद्ध्या पूर्वं तु पश्यन्ति अध्यात्मविषये रताः ॥ ४० ॥ ब्राह्मणा वेदविद्वांसः सत्यव्रतपरायणाः । नेतरे जातु पश्यन्ति अध्यात्मं नावबुध्यते ॥ ४१ ॥

सूर्य और चन्द्रमा जिनके देवता हैं, उन इड़ा और पिङ्गला नामक नाड़ियोंमें बिम्बभूत जो चैतन्य ज्योति है, उसी की धारणा करनी चाहिये। वह नेत्रेन्द्रियमें प्रतिबिम्बित होती है ( उसीके द्वारा नेत्रमें रूपको प्रकाशित करनेकी शक्ति प्राप्त हुई है ) । पहलेसे अध्यात्मविषयके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले सत्यव्रतपरायण वेदवेत्ता ब्राह्मण विशुद्ध बुद्धिके द्वारा उसका साक्षात्कार करते हैं । दूसरे लोग कदापि उसका दर्शन नहीं कर पाते हैं। दूसरोंको तो अध्यात्मशास्त्रका भी ज्ञान नहीं होता, स्वरूपबोध तो दूरकी बात है ॥ ४०-४१ ॥

हिंसायौगैरयोगात्मा सर्वप्राणचरैर्नृप । भूतयो भुवि भूतेश्रो मोहप्राप्तेन चेतसा ॥ ४२ ॥

नरेश्वर ! जो भूतलपर योगजनित ऐश्वर्यसे समस्त प्राणियोंका निग्रह और अनुग्रह करनेमें समर्थ है, वह योगी यदि अपने चित्तको मोहवश योगमें लगाये न रहे तो वे ऐश्वर्य उसे समस्त प्राणियोंका संहार करनेवाले हिंसायौगमे लगाकर उसका पराभव कर देते हैं ॥ ४२ ॥

कर्मभिः कुत्सितैरन्यैः सर्वप्राणिवधैषिणाम् । नराणां योगमाधाय स्वेषु मात्रेषु भारत ॥ ४३ ॥

भरतनन्दन ! वे विभूतियाँ समस्त प्राणियोंके वधकी इच्छावाले मनुष्योंको अपने भोग्य विषयोंके लिये अन्य कुत्सित कर्मोंमें लगाकर उन्हें विनाशके गर्तमें गिरा देती हैं ॥ ४३ ॥

समाहितमना ब्रह्मन् मोक्षप्राप्तेन हेतुना । चन्द्रमण्डलसंस्थानाज्ज्योतिश्चान्द्रं महत् तदा ॥ ४४ ॥ प्रविश्य हृदयं क्षिप्रं गायत्र्या नयनान्तरे । गर्भस्य सम्भवो यश्च चतुर्धा पुरुषात्मकः ॥ ४५ ॥

इसलिये मोक्षकी प्राप्तिके हेतु परब्रह्म परमात्माके चिन्तनमें चित्तको पूर्णरूपसे लगा दे। चन्द्रमण्डल अर्थात् मनके संस्थान ( ईशादिरूप ) का परित्याग करके महान् चान्द्र-ज्योति ( चैतन्यमय तेज ) में, जिसका स्थान हृदय है, प्रवेश करे । शीघ्र विघ्न आनेकी आशङ्कासे गायत्री अर्थात् सगुण ब्रह्मके नेत्रकी भाँति प्रकाशक विशुद्ध तेजके भीतर स्थित हो जाय, जो कि अव्यक्तकी उत्पत्तिका स्थान है। वह अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रारूपसे अथवा विश्व, तैजस, प्राज्ञ एवं तुरीयरूपसे चार भेदोंमें विभक्त पुरुषरूप है ॥

ब्रह्मतेजोमयोऽव्यक्तः शाश्वतोऽथ ध्रुवोऽव्ययः। न चेन्द्रियगुणैर्युक्तो युक्तस्तेजोगुणेन च ॥ ४६ ॥ चन्द्रांशुविमलप्रख्यो भ्राजिष्णुर्वर्णसंस्थितः ।

वह पुरुष ब्रह्मचैतन्यमय है । अव्यक्त अर्थात् इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिका अविषय है। नित्य, कूटस्थ और अव्यय ( विकाररहित ) है । इन्द्रियोंद्वारा गृहीत होनेवाले रूप आदि गुणोंसे रहित तथा तेजोगुणसे युक्त है । उसकी कान्ति चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल है। वह सदा सत्त्वरूपसे प्रकाशमान है तथा शरीरके आकारमें परिणत हुए लोहित शुक्ल आदि वर्णोंमें आविर्भूत होकर स्थित है ॥ ४६३ ॥

नेत्राभ्यां जनयद् देवो ऋग्वेदं यजुषा सह ॥ ४७ ॥ सामवेदं च जिह्वाग्रादथर्वाणं च मूर्धतः ।

उस प्रकाशमान देवताने अपने नेत्रोंसे ऋग्वेद और यजुर्वेदको प्रकट किया । जिह्वाके अग्रभागसे सामवेदको और मूर्धा ( ललाटप्रान्त ) से अथर्ववेदको प्रकट किया है ॥४७३॥

जातमात्रांस्तु ते वेदाः क्षेत्रं विन्दन्ति तत्त्वतः॥ ४८ ॥ तेन वेदत्वमापन्ना यस्माद् विन्दन्ति तत्पदम् ।

वे वेद प्रकट होते ही अपने-अपने क्षेत्रका तत्त्वतः वेदन ( उपलब्धि ) करते हैं, इसलिये उन्हे 'वेद' संज्ञा प्राप्त हुई है। वे उस ब्रह्मपदका वेदन ( लाभ ) करते हैं, इसलिये भी 'वेद' कहलाते हैं ॥ ४८३ ॥

ते सृजन्ति तदा वेदा ब्रह्म पूर्वं सनातनम् ॥ ४९ ॥ पुरुषं दिव्यरूपामं स्वैः स्वैर्भावैर्मनोभवैः ।

उस समय वे वेद पहले उस सनातन ब्रह्मको ही अपने-अपने मानसिक भावोंके अनुसार दिव्य रूप और आभासे युक्त विश्व, तैजस, प्राज्ञ एवं तुरीय पुरुष अथवा यज्ञपुरुषके रूपमें प्रकट करते हैं ॥ ४९३ ॥

अथर्वणस्तु यो योगः शीर्षं यज्ञस्य तत् स्मृतम् ॥ ५० ॥ ग्रीवायाहन्तरं चैव ऋग्भागः स भवेत् ततः । हृदयं चैव पार्श्वे च सामभागस्तु निर्मितः ॥ ५१ ॥ बस्तिशीर्षं कटीदेशं जङ्घोरुचरणैः सह । एवमेष यजुर्भागः संघातौ यक्षकल्पितः । पुरुषो दिव्यरूपामः सम्भूतो ह्यमरात् पदात् ॥ ५२ ॥

अथर्ववेदका जो योग है, वह यज्ञपुरुषका सिर माना गया है। जो ऋग्वेदका भाग है, वह उसकी ग्रीवा और भुजाओंके बीचका अङ्ग है । सामवेदके भागसे उस यज्ञपुरुषके हृदय और पार्श्वभागका निर्माण हुआ है। इसी तरह जो यह यजुर्वेदका भाग है, उसके द्वारा यज्ञपुरुषके पेडू और उसके ऊपरके

७९४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


भाग, कटिप्रदेश, ऊरु, जंघा और चरणोंके साथ शेष शरीरकी कल्पना हुई है। वह दिव्य रूप और मायासे युक्त पुरुष अमर—अविनाशी तुरीय पदसे प्रकट हुआ है ॥ ५०-५२॥

स हि वेदमयो यज्ञः सर्वभूतसुखावहः ।
उभयोर्लोकयोस्तात हिंसार्वज्यः सनातनः ॥ ५३ ॥

तात ! वह हिंसारहित सनातन वेदमय यज्ञ इहलोक और परलोकमें समस्त प्राणियोंके लिये सुखदायक होता है ॥ ५३ ॥

योगारम्भं कर्मसाध्यं ब्रह्मचर्यं सनातनम् ।
प्रभवः सर्वभूतानां यो विन्दति स वेदवित् ॥ ५४ ॥

योगका आरम्भ मनःसंयमरूपी कर्मसे सिद्ध होनेवाला है। यही सनातन ब्रह्मचर्य है। जो इसे जानता है, वह समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका कारण एवं वेदवेत्ता है ॥ ५४ ॥

स सिद्धः प्रोच्यते लोके सिद्धिरेव न संशयः ।
निर्मुक्तैः सर्वकर्मभ्यो मुनिभिर्वेदपारगैः ॥ ५५ ॥

समस्त कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हुए वेदपारङ्गत मुनियोंने लोकमें उसे सिद्ध बताया है। उसको सिद्धि ही प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥

वैष्णवं यज्ञमित्येवं ब्रुवते वेदपारगाः ।
ब्राह्मणा नियमश्रान्ता वेदोपनिषदे पदे ॥ ५६ ॥

वेदोंके पारङ्गत ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण, जो मनोनियमका अभ्यास करते-करते थक गये हैं, वेदोपनिषद् (ब्रह्मविद्या) द्वारा अधिगत होनेवाले स्वाराज्य पदकी प्राप्तिके लिये इस प्रकार वैष्णव यज्ञ (योग) की आवश्यकता बताते हैं ॥ ५६ ॥

जनमेजय उवाच

चेतसस्तूपलम्भे हि मनोग्राहास्य कामतः ।
कारणं श्रोतुमिच्छामि यथा त्वं मन्यसे मुने ॥ ५७ ॥

जनमेजयने कहा—मुने ! जो इच्छानुसार मनके द्वारा ग्राह्य है अर्थात् ईंधन जल जानेपर आगकी तरह जो स्वयं अपने-आप ही शान्त हो जानेके योग्य है, उस चित्तकी उपलब्धिमें क्या कारण है, यह मैं सुनना चाहता हूँ; इस विषयमें आपकी जैसी मान्यता हो, वैसा बताइये ॥ ५७ ॥

वैशम्पायन उवाच

न ह्यस्य कारणं किंचिद् बाह्यं भवति भारत ।
अन्तर्गतं कारणं तु शारीरं मानसं नृप ॥ ५८ ॥

वैशम्पायनजीने कहा—भारत ! नरेश्वर ! इसका कोई बाह्य कारण नहीं है। अपने भीतर ही इसका कारण मौजूद है। शरीरके द्वारा किया गया जो कर्म है, वही मनमें संस्कार-रूपसे स्थित हो उसका उद्बोधक होता है (उस चित्तकी उपलब्धिमें कारण बनता है) ॥ ५८ ॥

येन वेद्यं विदुर्मर्त्या ब्राह्मणाः संशितव्रताः ।
अवेद्यमपि वेद्यं च शक्यं वेत्तुं न कर्मणा ॥ ५९ ॥

कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मवेत्ता मनुष्य जिस चैतन्यसे समस्त ज्ञेय वस्तुओंको जानते हैं, वह आत्मा होनेके कारण अवेद्य है तो भी शास्त्र और आचार्यके उपदेशके पश्चात् लक्षणाद्वारा उसका ज्ञान होता है; परंतु कर्मसे तो उसको किसी तरह नहीं जाना जा सकता ॥ ५९ ॥

ब्राह्मणेन विनीतेन सदा ब्रह्मनिषेविणा ।
सदा विदिततत्त्वेन सिद्धिर्हेतोर्महीपते ॥ ६० ॥

पृथ्वीनाथ ! वेदोंका अध्ययन करनेवाले ब्राह्मण आदिको चाहिये कि वह मोक्षकी प्राप्तिके लिये विद्याके अहङ्कारका त्याग करके विनीतभावसे रहे, सदा ब्रह्मयज्ञ (स्वाध्याय) का सेवन करे, प्रतिदिन शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे आत्मा और अनात्माके तत्त्वको जाननेका प्रयत्न करे ॥ ६० ॥

सदा चैव शुचिर्भूत्वा नियतो ब्रह्मकर्मणा ।
उपनिष्ठेत स गुरुं बद्धाञ्जलिपुटो द्विजः ॥ ६१ ॥

सदा पवित्र रहकर ब्रह्मार्पणभावसे कर्म करते हुए नियमपूर्वक शम आदिके साधनमें लगा रहे। इस प्रकार द्विज दोनों हाथ जोड़कर गुरुकी सेवामें उपस्थित होवे ॥ ६१ ॥

सायं प्रातश्च तत्त्वज्ञो मोक्षकमाणि कारयेत् ।
विनीतो ब्रह्मभावेन समाहितमतिर्मुनिः ॥ ६२ ॥

गुरुतत्त्वका ज्ञाता होकर प्रतिदिन सायं और प्रातःकाल मोक्षसम्बन्धी कर्म (आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान और धारणा) करे, मनमें योगप्राप्तिके कारण गर्व न आने देकर विनयशील रहे, निरंतर ब्रह्मकी भावना करते हुए मनको एकाग्र रखे और मौन रहे ॥ ६२ ॥

सम्पश्येत मनसा वैष्णवं पदमुत्तमम् ।
ध्यायन्नेव प्रसीदेत समाहितमतिर्द्विजः ॥ ६३ ॥

वह मनसे उत्तम वैष्णवपद (शुद्ध ब्रह्म) का चिन्तन करे। इस तरह एकाग्रचित्त हुआ द्विज ध्यानपरायण होकर ही प्रसन्न रहे ॥ ६३ ॥

गच्छते परमं ब्रह्म निर्विकारेण चेतसा ।
अपुनर्भवभावज्ञो निर्ममो भावबन्धनात् ॥ ६४ ॥

मोक्षके स्वरूपको जाननेवाला ममतारहित वह पुरुष चित्तवृत्तियोंका निरोध करके विकाररहित चित्तसे परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ ६४ ॥

तदेवाक्षरमित्याहुर्यत् तद् ब्रह्म सनातनम् ।
तर्हि तत्कर्मयोगेन विद्यायोगेन दर्शितम् ॥ ६५ ॥

वह जो सनातन ब्रह्म है, उसीको अक्षर कहते हैं। उसीका शास्त्रोंमें निष्काम कर्मयोग और ज्ञानयोगके द्वारा साक्षात्कार कराया गया है ॥ ६५ ॥

भविष्यपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः ७९५

ब्राह्मणानां विनीतानां वैष्णवे पदसंचये । सर्वद्रव्यातिरिक्तानां कामयोगविगर्हिणाम् ॥ ६६ ॥

जो वैष्णव-पदकी प्राप्तिके लिये सर्वस्वका परित्याग करके कामयोग (स्त्री-पुत्र आदिके सङ्ग) की निन्दा करते हैं, उन विनयशील ब्राह्मणोंको उस अक्षर ब्रह्मका ज्ञान होता है॥ ६६ ॥

अपुनर्भाविनां लोकाः कर्मयोगप्रतिष्ठिताः । अनादानेन मनसा राजन् कर्मणि कर्मणि ॥ ६७ ॥

राजन् ! जो प्रत्येक कर्ममें मनसे उसके फलको ग्रहण न करके पुनर्जन्मके बन्धनसे ऊपर उठ गये हैं, उनके लोक निष्काम कर्मयोगमें प्रतिष्ठित हैं ॥ ६७ ॥

आदानाद् बध्यते जन्तुर्निरादानात् प्रमुच्यते । ब्राह्मणेभ्यः क्रियावासिर्जन्तोः पूर्वोजनाधिप ॥ ६८ ॥

नरेश्वर ! फलको ग्रहण करनेसे जीव बँधता है और उसका त्याग करनेसे मुक्त होता है। जीवको पूर्वजन्मके संस्कारवश ब्राह्मणादि श्रेष्ठ पुरुषोंसे क्रियाओंकी प्राप्ति होती है ॥ ६८ ॥

मुक्तश्चेन्द्रियबन्धेन प्राप्तश्च परमं पदम् । न भूयः पुनरायाति मानुषं देहविग्रहम् ॥ ६९ ॥

फलका परित्याग करनेवाला पुरुष इन्द्रियोंके बन्धनसे मुक्त हो परमपदको प्राप्त होता है। वह पुनः इस मानव-शरीरमें नहीं आता है ॥ ६९ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥


अष्टादशोऽध्यायः

योगके उपसर्ग (विघ्न), योगीकी विष्णुरूपसे स्थिति, कर्मलयसे मुक्ति, सकाम कर्मियोंकी धूममार्गसे गति और पुनरावृत्ति, ज्ञानी एवं योगीको तत्त्वका साक्षात्कार तथा ब्रह्मयुगका वर्णन

जनमेजय उवाच

उपसर्गे च योगं च ध्यातव्यं चैव यत्पदम् । न भूयः पुनरायाति मानुषं देहविग्रहम् । सिद्धिं सिद्धिगुणांश्चैव श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा-ब्रह्मन् ! योगके विघ्न कौन-कौनसे हैं ? योगका स्वरूप क्या है ? उसमें ध्येय वस्तु क्या है ? किस तरह योग साधन करनेसे मनुष्यको फिर शरीर धारण करना नहीं पड़ता ? सिद्धि क्या है ? और उसके गुण कौन-कौनसे हैं ? मैं इन सब बातोंको यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु विस्तरतः सर्वे यथा पृच्छसि मेधया । उपपन्नेन मनसा ब्रह्मादीनामनेकधा ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा-राजन् ! ब्रह्मा आदि योगियोंको अनेक बार जिनका सामना करना पड़ता है, योगके उन विघ्नों तथा स्वरूप आदिके विषयमें तुम जैसा पूछते हो, वह सब बुद्धियुक्त मनसे विस्तारपूर्वक सुनो ॥ २ ॥

पञ्चसिद्धिगुणांस्त्यक्त्वा पश्यतो ब्रह्मणो नृप । योगयुक्तेन मनसा पञ्चेन्द्रियनिवासिनः ॥ ३ ॥ ब्रह्मणाश्चिन्तयानस्य ब्रह्मणशं सनातनम् । बहुरूपमनैश्वर्यात् प्रवर्तते निरोधनम् ॥ ४ ॥

नरेश्वर ! दूरश्रवण आदि जो पाँच सिद्धियाँ हैं, उनके जो पाँचों इन्द्रियोंमें निवास करनेवाले शब्द आदि विषय हैं, उनका परित्याग करके ब्रह्मदर्शी ब्राह्मण जब योगयुक्त मनसे सनातन ब्रह्मरूप यशका चिन्तन करने लगता है, उस समय उसके भीतर पर-वैराग्यके बलका अभाव होनेसे उसके समक्ष अनेक रूपोंमें विघ्न उपस्थित होने लगते हैं ॥ ३-४ ॥

पञ्चेन्द्रियस्य ग्रामस्य नवद्वारस्य भारत । कामक्रोधस्य लोभस्य संनिरुद्ध्य मेधया ॥ ५ ॥ तेजसा मूर्ध्नि चाधाय धूमो दोधूयते महान् ।

भरतनन्दन ! जिसमें पाँचों इन्द्रियोंकी प्रधानता है, उस नौ द्वारवाले देहेन्द्रियप्राण-सङ्घातरूपी ग्रामका तथा काम, क्रोध और लोभका बुद्धिके द्वारा निरोध हो जानेपर भी जब योगी भौंहों और नासिकाके मध्य भागमें स्थापित हुए तेज अर्थात् नेत्र-प्रणिधानके द्वारा चित्तको किसी आधारसे संयुक्त करके स्थित होता है, उस समय उसके समक्ष बड़ा भारी धुआँ उठने लगता है ॥ ५॥

नीललोहितवर्णामैः पीतैः श्वेतैश्च धातुभिः ॥ ६ ॥ माञ्जिष्ठरागवर्णामैः कपोतसदृशैस्तथा । शुद्धवैडूर्यवर्णाभैः पद्मरागसमप्रभैः ॥ ७ ॥ स्फाटिकैमणिवर्णाभैर्नागेन्द्रसदृशैस्तथा । इन्द्रगोपकवर्णाभैश्चन्द्रांशुसलिलप्रभैः ॥ ८ ॥ बहुवर्णैः सुधूमैर्धैरिन्द्रायुधसमप्रभैः । सम्पतद्भिश्च युगपन्मेघैरिव समागतः । निरुध्यत इवाकाशं पक्षवद्भिरिवाद्रिभिः ॥ ९ ॥

नीले, लाल, पीले, सफेद धातुओंके समान रंगवाले, मजीठके रंगकी-सी कान्तिवाले, कबूतरोंके समान वर्णवाले,

७९६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

शुद्ध वैदूर्यमणिकी-सी प्रभाववाले, पद्मराग मणिके समान आभावाले, स्फटिकमणिके तुल्य उज्ज्वल, गजराजके सदृश काले, वीरबहूटियोंके समान लाल, चन्द्रमाकी किरणों और जलके समान श्वेतवर्णवाले, बहुरंगे धूमसमूह, जो इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होते हैं, एक ही समय बादलोंके समान एकत्र होकर सब ओर उड़ने लगते हैं, उस समय सारा आकाश पङ्खधारी पर्वतोंके समान उन धूमसमूहोंसे अवरुद्ध-सा हो जाता है॥ ६-९॥

ते धूमवर्णाः संघाता घनाः सलिलधारिणः ।
निर्वैमुश्चैव तोयौघान् विविशुर्वसुधातले ॥ १०॥

तदनन्तर वे धुएँके समान वर्णवाले समुदाय जल धारण करनेवाले मेघोंके रूपमें परिणत हो जलकी धाराएँ बरसाने लगते हैं और वसुधातल (योगीके शरीर) में ही विलीन हो जाते हैं॥ १०॥

मूर्ध्नि चैव महानग्निर्मानसो धूयते प्रभुः ।
युक्तः परमयोगेन शतशोऽर्चिर्भिरावृतः ॥ ११॥

उसके मस्तकपर भी मनसे प्रकट हुई बड़ी भारी आग धू-धू करके जलने लगती है, वह जलानेमें समर्थ, उत्तम योगशक्तिसे सम्पन्न तथा सैकड़ों लपटोंसे घिरी हुई होती है॥ ११॥

तस्यार्चेर्विस्फुलिङ्गानां सहस्राणि शतानि च ।
विसस्रुः सर्वगात्रेभ्यो ज्वलन्निव युगान्तयः ॥ १२॥

उसकी लपटसे सैकड़ों, हजारों चिनगारियाँ निकलती रहती हैं। उस योगीके सभी अङ्गोंसे प्रलयाग्नियोंके समान जलती हुई-सी अग्नियाँ प्रकट होती हैं॥ १२॥

यावत्यो वर्षधारास्तु तावत्योऽर्च्योऽनलस्य च ।
समेयुर्वारिधाराभिर्विपुले वसुधातले ॥ १३॥

वर्षा होते समय जलकी जितनी धाराएँ गिरती प्रतीत होती हैं, उस आगकी लपटें भी उतनी ही होती हैं। वे विस्तृत भूतलपर उन जलकी धाराओंके साथ मिल जाती हैं॥ १३॥

वर्णाभ्यां युज्यमानस्य वायुर्दोर्धूयते महान् ।
दिव्यसिद्धगुणोद्भूतः सूक्ष्मप्राणविवर्धनः ॥ १४॥

जल और अग्निके वर्ण श्वेत और लोहित रंगोंसे संयुक्त हुए चित्तमें जब सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, तब उसमें रूपरहित वायुरूप आकाश प्रकट होता है। वह दिव्य एवं अनादि गुणों—शब्दतन्मात्रा आदिसे उत्पन्न हुई विशाल वायु (जो स्थूल वायुसे भिन्न है) बहने लगती है, वह सूक्ष्म प्राण (सूत्रात्मा) को प्रकाशित करनेवाली है॥ १४॥

वेगवान् भीमनिर्घोषो बलवान् प्राणगोचरः ।
तैरेव चाग्निसंघातैर्धातुभिः सह संगतः ॥ १५॥

अग्निसे मिले हुए उन पृथ्वी और जल नामक धातुओंसे संयुक्त होकर वह वायु प्राणगोचर (प्राणशब्दवाच्य) सूत्रात्मा हो जाती है। वह प्राण या सूत्रात्मा बड़ा ही वेगवान् है; क्योंकि वह मन को भी उत्पन्न करनेवाला है। उससे बड़ी भयंकर ध्वनि प्रकट होती है; क्योंकि वह स्थूल आकाशका भी जनक है तथा वह अत्यन्त बलवान् है; क्योंकि उसमें ब्रह्माण्डका भी भेदन करनेकी शक्ति है॥ १५॥

सहस्रशोऽथ शतशो मूर्तिं कृत्वा पृथग्विधाम् ।
अग्निर्वायुर्जलं भूमिर्धातवो ब्रह्मचोदिताः ॥ १६॥

तदनन्तर ब्रह्म (योगी) से प्रेरित हो अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी नामक धातु पृथक्-पृथक् सैकड़ों और हजारों मूर्तियोंका निर्माण करके स्थित होते हैं॥ १६॥

समवायत्वमापन्ना बीजभूता महीपते ।
संघातं ब्रह्मवेगेन धातवो गमिता नृप ॥ १७॥

पृथिवीनाथ ! नरेश्वर ! ब्रह्मके वेगसे अर्थात् चैतन्यशक्तिके अनुप्रवेशसे संघात (मूर्तिभाव) को प्राप्त हुए पृथ्वी-जल आदि धातु एक दूसरेसे मिलकर बीजभूत हो जाते हैं अर्थात् भावी सृष्टिरूप कार्यके कारण बनते हैं॥ १७॥

यद् ब्रह्म चक्षुषोर्मध्ये स सूक्ष्मः पुरुषो विराट् ।
तयोरन्यान बहून सूक्ष्मान् ससृजे पुरुषोत्तमः॥ १८॥

दोनों नेत्रोंके मध्यभागमें धारणाका विषयभूत जो ब्रह्म है, वही सूक्ष्म और वही विराट् पुरुष है। वह ब्रह्मीभूत हुआ पुरुषोत्तम योगी उन सूक्ष्म और विराट्से भिन्न एवं उन्हींके समान बहुत-से सूक्ष्म पुरुषोंकी सृष्टि करता है॥ १८॥

स एव भगवान विष्णुर्व्यक्ताव्यक्तः सनातनः ।
आधारः सर्वविद्यानां प्रलये प्रलयान्तकृत् ॥ १९॥

वही ब्रह्मीभूत हुआ योगी भगवान् विष्णुके रूपमें प्रतिष्ठित होता है। वे विष्णु ही व्यक्ताव्यक्तरूप सनातन पुरुष हैं। वे ही समस्त विद्याओंके आधार हैं। प्रलयकालमें उन्हींके द्वारा सबका प्रलय एव विनाशकार्य सम्पन्न होता है॥ १९॥

तं मूर्ध्नि धातुभिर्नद्धं विशन्ति ब्रह्मचोदिताः ।
तेऽन्तराः पुरुषाः सर्वे ज्ञातारः सुखदुःखयोः ॥ २०॥

मस्तक अर्थात् भौंहों और नासिकाके मध्यभागमें सूत्रात्मारूपसे स्थित हुए उस योगीमें परमेश्वरकी प्रेरणासे सुख और दुःखका अनुभव करनेवाले अन्य सब जीव प्रवेश करते हैं॥ २०॥

अथ चेष्टितुमारब्धा मूर्तयो ब्रह्मसम्मिताः ।
भित्त्वा च धरणीं देवीं प्रापद्यन्त दिशो दश ॥ २१॥

तदनन्तर स्थूल देहका त्याग करके परमेश्वरकी समताको

भविष्यपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः [ ७९७

प्राप्त हुई वे मूर्तियाँ जब चेष्टा करना आरम्भ करती हैं, तब वे दसों दिशाओंको प्राप्त होती हैं ॥ २१ ॥

इत्येते पार्थिवाः सर्वे ऋषयो ब्रह्मनिर्मिताः ।
तत्रैव प्रलयं याता भूमित्वमुपयान्ति च ॥ २२ ॥

इस प्रकार स्थूल भूतोंसे उत्पन्न हुए समस्त ऋषि (व्यावहारिक पदार्थ) जिनका निर्माण उस योगीके द्वारा ही हुआ होता है, उसीमें लीन होकर अपने उपादान-कारणमें स्थित हो जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे मिट्टीका घड़ा फूटनेपर अपने उपादानकारण मिट्टीमें ही मिल जाता है ॥

कर्मक्षयाद् विमुच्यन्ते धातुभिः कर्मबन्धनैः ।
कर्मक्षयाद् विमुक्तत्वादिन्द्रियाणां च बन्धनात् ॥ २३ ॥

कर्मोंका क्षय होनेसे जीव कर्मबन्धनरूप धातुओंसे मुक्त हो जाते हैं। कर्मोंके क्षयसे धातुबन्धनसे मुक्ति मिल जानेके कारण वे इन्द्रियोंके बन्धनसे भी छूट जाते हैं ॥ २३ ॥

तामेव प्रकृतिं यान्ति अज्ञातां कर्मगोचरैः ।
क्षराद् धूमक्षयं चैव अग्निगर्भास्तपोमयाः ॥ २४ ॥

कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हुए जीव अपनी उसी प्रकृति (मूलस्थान परब्रह्मभाव) को प्राप्त होते हैं, जो कर्मबन्धनमें बँधे पुरुषोंके अनुभवसे परेकी वस्तु है। जो सकाम कर्मोंमें तत्पर रहते हैं, वे नाशवान् कर्म करनेके कारण धूमादि मार्गसे गन्तव्यस्थानको प्राप्त होते हैं (जहाँसे पुनरावृत्ति अवश्यम्भावी है)। उन सकामकर्मीयोंमें भी वे ही उस धूममार्गको प्राप्त होते हैं, जिन्होंने प्रधानतः अग्निहोत्र तथा कृच्छ्रचान्द्रायण आदि तपका अनुष्ठान किया है ॥ २४ ॥

येन तन्तुरिवाच्छिन्नो भावाभावः प्रवर्तते ।
धूमादभ्रास्तु सम्भूता अभ्रात् तोयं सुनिर्मलम् ॥ २५ ॥

जिस कर्मसे अविच्छिन्न तन्तुकी भाँति सदसद्रूप संसारकी प्राप्ति होती है, उस सकाम कर्मका अनुष्ठान करनेवाले लोग धूममार्गको ही प्राप्त होते हैं। धूमादिमार्गसे पितृलोकको गये हुए जीव कर्मक्षयके पश्चात् वहाँसे भ्रष्ट होनेपर आकाश आदि-के क्रमसे धूमभावको प्राप्त होकर, धूमसे मेघ होते हैं और मेघसे अत्यन्त निर्मल जलधाराके रूपमे पृथ्वीपर आकर अन्न एवं वीर्यके रूपमें परिणत हो पुनर्जन्म धारण करते हैं ॥ २५ ॥

जगती जलात् तु सम्भूता जगत्येव च यत्फलम्।
फलाद् रसस्तु संजज्ञे रसात् प्राणस्तु देहिनाम्॥ २६ ॥

पृथ्वी जलको पाकर फलसे संयुक्त होती है, उसका व्रीहि आदि फल पृथ्वीरूप ही है। फलसे रस उत्पन्न होता है और रससे देहधारियोंके प्राणकी पुष्टि होती है ॥ २६ ॥

रसश्च तन्मयो जज्ञे यत् तद् ब्रह्म सनातनम् ।
प्रधानं ब्रह्म चोद्दिष्टं बहुभिः कारणान्तरैः ।
ब्राह्मणैस्तपसि श्रान्तैः सत्यव्रतपरायणैः ॥ २७ ॥

रस रेत:स्वरूप है, जो चैतन्ययुक्त प्रकट हुआ है, जिसे सनातन ब्रह्म कहते हैं, वही वह चैतन्य है। तपस्यामें संलग्न होकर कष्ट सहन करनेवाले सत्यव्रतपरायण ब्राह्मणोंने बहुतेरे अन्य कारणों (युक्तियों) से एकमात्र ब्रह्मको ही प्रधान बताया है (ब्रह्मद्वारा ही देहादिमें चैतन्यभाव आता है) ॥

अव्यक्ताद् व्यक्तिमापन्नं स्वेन भावेन भारत ।
अन्तःस्थं सर्वभूतेषु चरन्तं विद्यया सह ॥ २८ ॥

भारत ! वह ब्रह्म अपने सस्वरूपसे ही अव्यक्तसे व्यक्त भावको प्राप्त होता है। वही समस्त प्राणियोंके भीतर अन्तर्यामी-रूपसे विद्यमान है और विद्याके द्वारा प्रकाशित होता है, ऐसा जाने ॥ २८ ॥

कर्म कर्तेति राजेन्द्र विषयस्थमनेकधा ।
नोपलभ्येत चक्षुर्भ्यां तपसा दग्धकिल्विषैः ॥ २९ ॥
उपलभ्येत चक्षुर्भ्यां ज्ञानभिर्ब्रह्मवादिभिः ।
निःसृतस्तु भ्रुवोर्मध्यान्मेघमुक्त इवांशुमान् ॥ ३० ॥

राजेन्द्र ! कर्म (दृश्य) और कर्ता (साभास अहङ्कार)-ये दोनों विषयकोटिमें ही हैं (विषयातीत चिदात्मामें नहीं)। दृश्य अनेक रूपोंमें भासमान होनेपर भी मायानगरकी भाँति वास्तवमें नेत्रोंद्वारा उपलब्ध नहीं होता, तपस्याद्वारा जिनके पाप दग्ध हो गये हैं, उन ब्रह्मवादी ज्ञानी पुरुषोंको उसके वास्तविक स्वरूपकी उपलब्धि होती है (वे यह जान लेते हैं, कि जैसे सुवर्ण ही कुण्डल आदिके रूपमें प्रतीत होता है, उसी प्रकार ब्रह्म ही कर्ता-कर्म आदि विविध रूपोंमें प्रकाशित होता है), जैसे मेघोंके आवरणसे मुक्त हुआ सूर्य प्रकाशित होता है, उसी प्रकार नेत्रोंको भौंहोंके मध्यभागमें संयोजित करके ध्यान लगानेपर वह ब्रह्म वहाँ आविर्भूत हुआ दिखायी देता है ॥ २९-३० ॥

चरद्भिः पक्षिवल्लोके निर्द्वन्द्वैर्निष्परिग्रहैः ।
योगधर्मेण कौरव्य ध्रुवमासाद्यते फलम् ॥ ३१ ॥

कुरुनन्दन ! जो लोग जगत्में पक्षीकी भाँति असङ्ग, निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य होकर विचरते हैं, वे ही योगधर्मके द्वारा (ब्रह्मदर्शनरूप) अविनाशी फलको प्राप्त करते हैं ॥

प्रादुर्भावं क्षयं चैव भूतस्य निधनं तथा ।
विधत्ते शतशो ब्रह्मा संक्षये च भवेत् तदा ॥ ३२ ॥

वह ब्रह्मवेत्ता पुरुष सृष्टि और संहारके समय सैकड़ों बार समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, उन्हें ऐश्वर्य प्रदान तथा उनका संहार करता है ॥ ३२ ॥

कर्मणः कर्म योगज्ञो भूतेभ्यो नात्र संशयः ।
अविनाशाय लोकस्य धर्मस्याप्यायनेन च ॥ ३३ ॥

योगवेत्ता पुरुष प्राणियोंको योगादि कर्मका फल (सुख) वितरण करता है, इसमें संदेह नहीं है। वह धर्मका पोषण

७९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करके जगत्‌की रक्षाके लिये ही ऐसा करता है (तात्पर्य यह है कि उस ब्रह्मभूत योगीकी प्रीतिके लिये ही धर्म किया जाता है और वही प्रसन्न होकर जगत्‌की रक्षा करता है) ॥

युगं द्वादशसाहस्रं सहस्रयुगसंहितम् ।
एतद् ब्रह्मयुगं नाम युगानां प्रथमं युगम् ॥ ३४ ॥

बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग होता है। सहस्र चतुर्युगका जो समय है, इसीका नाम ब्रह्मयुग है, जो युगोंमें प्रधान युग (कल्प) कहा गया है ॥ ३४ ॥

सहस्रयुगयोरन्ते संहारः प्रलयान्तकृत् ।
सूक्ष्मं भवति लोकानां निर्विकारमचेतनम् ॥ ३५ ॥

एक सहस्रयुगके अन्तमें ब्रह्माके दिनकी समाप्ति होती है, जिसमें संहार (कल्पका अन्त) होता है और दूसरे सहस्र युगके अन्तमें उनकी रात्रिका अवसान होता है, जो प्रलयका अन्त अर्थात् कल्पका आरम्भ करनेवाला है। संहारकालमें लोकोंका स्वरूप सूक्ष्म, निर्विकार एवं अचेतन होता है ॥

तथा प्रलयमापन्नं जगत् सर्वं सनातनम् ।
ब्रह्म सम्पद्यते सूक्ष्मं निर्मितं कारणैर्गुणैः ॥ ३६ ॥

कारणभूत सत्त्वादि गुणोंसे निर्मित हुआ यह जगत् प्रलयको प्राप्त होनेपर सूक्ष्मरूप होकर ब्रह्ममें स्थित हो जाता है ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥


एकोनविंशोऽध्यायः

योगीकी स्थिति तथा उसके समक्ष आनेवाले विघ्नरूप ऐश्वर्योंका वर्णन

जनमेजय उवाच
प्राग्वंशं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण महामुने।
आद्ययोर्युगयोर्ब्रह्मन् ब्रह्मप्राप्तस्य सर्वशः ॥ १ ॥

**जनमेजयन‍े कहा—**ब्रह्मन्! महामुने! दोनों आदि युगोंमें ब्रह्मभावको प्राप्त हुए योगी ब्रह्माकी पहले जो कार्य-संतति रही है, उसका मैं पूर्णतः विस्तारके साथ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
शृणु विस्तरशः सर्वं यन्मां पृच्छसि मेधया ।
उपपन्नेन मनसा दैवप्रत्ययसाधिना ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! तुम बुद्धिके द्वारा मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब दिव्य ज्ञानकी प्राप्तिके साधनमें लगे हुए अपने योगयुक्त मनके द्वारा विस्तारपूर्वक सुनो ॥ २ ॥

ऋद्धिं प्राप्तस्तु भगवान् योगात्मा ब्रह्मसम्भवः ।
भूतानां बहुलत्वं च चकारेहेश्वरः प्रभुः ॥ ३ ॥
स्थितो ब्रह्मासने ब्रह्मा विक्षिप्तः सहसा प्रभुः ।
अचलेनैव भावेन स्थाणुभूतेन भारत ॥ ४ ॥

भारत! जिनका मन योगमें लगा हुआ था, जो साक्षात् परब्रह्म परमात्मासे उत्पन्न हुए थे, जिनमें करने, न करने और अन्यथा करनेकी शक्ति है तथा जो अत्यन्त प्रभावशाली हैं, वे भगवान् ब्रह्मा जब समृद्धिको प्राप्त होकर ठूंठकी भाँति अविचल भावसे ब्रह्मासनपर विराजमान हुए, उस समय सहसा रजोगुणने उन्हें विक्षिप्त कर दिया। अतः उन्होंने सृष्टि-रचनाद्वारा यहाँ भूतोंका बाहुल्य (विस्तार) किया ॥ ३-४ ॥

रक्तश्च मोक्षविषये स च ज्ञानमये पदे ।
यस्मात् पदसहस्राणि प्रभवन्ति भवन्ति च ॥ ५ ॥

वे मोक्ष ही जिसका लक्ष्य है, उस ज्ञानमय पदमें अनुरक्त थे, जिससे सहस्रों सामर्थ्यशाली पद प्रकट होते हैं (जैसे सौभरि अथवा कर्दम ऋषिने अपनी योगशक्ति-के प्रभावसे अनेकानेक वस्तुओंकी रचना की थी।) ॥ ५ ॥

ब्रह्मयज्ञं तु यजते योगाद् वेदात्मकं सदा ।
ब्रह्मणो विपुलं ज्ञानमैश्वर्यं च प्रवर्तते ॥ ६ ॥

ब्रह्माजी योगयुक्त हो सदा वेदात्मक ब्रह्मयज्ञका अनुष्ठान करते हैं (अथवा वेदप्रतिपाद्य ब्रह्मरूप यज्ञ-विष्णुका यजन करते हैं), इसलिये उस योग एवं यजनके प्रभावसे उन्हें विपुल ज्ञान और ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥

ततः प्रथममैश्वर्यं युञ्जानस्य प्रवर्तितम् ।
ब्रह्मणा ब्रह्मभूतेन भूतानां हितमिच्छता ॥ ७ ॥

फिर योगयुक्त एवं ब्रह्मभूत हुए ब्रह्माने समस्त प्राणियोंके हितकी इच्छा रखकर उस प्रथम प्राप्त हुए ऐश्वर्यका उन्हींकी भलाईके लिये उपयोग किया ॥ ७ ॥

तदा त्वाकाशमैश्वर्यं युञ्जानस्य प्रवर्तते ।
ब्रह्मणो ब्रह्मभूतस्य निर्विकारेण कर्मणा ॥ ८ ॥

उस निर्विकार (परम शुद्ध) कर्मद्वारा योगपरायण ब्रह्मभूत ब्रह्माको उस समय आकाशस्वरूप (अव्याकृत) ऐश्वर्य प्राप्त हुआ ॥ ८ ॥

तदान्तरिक्षं सम्प्राप्तं निर्मलं ब्रह्म चाव्ययम् ।
संहारः सर्वभूतानां नराणां ब्रह्मवादिनाम् ।
ध्रुवमैश्वर्ययोगानां प्रतिपद्यन्ति देहिनः ॥ ९ ॥

भविष्यपर्व ]एकोनविंशोऽध्यायः७९९

उस समय उनकी दृष्टिमें सारा आकाश निर्मल एवं अविनाशी ब्रह्मभावको प्राप्त हो गया। उस अवस्थामें समस्त ज्ञानवान् मनुष्य यह जान लेते हैं कि समस्त प्राणियों, मनुष्यों तथा ऐश्वर्ययुक्त ब्रह्मवादी योगियोंका भी लयस्थान कूटस्थ ब्रह्म ही है ॥ ९ ॥

आकाशैश्वर्यभूतेन संयुगे ब्रह्मवादिना ।
प्रवर्तमानमैश्वर्यं वायुभूतं करोति च ।
विकारैर्बहुभिः प्राप्तैः सम्पतद्भिर्महाबलैः ॥ १० ॥

उस योगयज्ञमें संलग्न हो आकाशरूप अथवा अव्याकृत ऐश्वर्यको प्राप्त हुए ब्रह्मवादी ब्रह्माके रूपमें प्रवृत्तिपरायण हुआ ब्रह्म सब ओरसे आकर प्राप्त होनेवाले बहुसंख्यक महाबली विकारोंके साथ वायुरूप अथवा व्याकृत ऐश्वर्यको प्रकट करता है ॥ १० ॥

एतैर्विकारैः संवृत्तैर्निरुद्धैश्च समन्ततः ।
ध्रुवमैश्वर्यमापन्नः सिद्धो भवति ब्राह्मणः ॥ ११ ॥

इन प्राप्त होनेवाले समस्त विकारोंके सब ओरसे अवरुद्ध हो जानेपर सिद्ध हुआ ब्रह्मवेत्ता योगी ध्रुव ऐश्वर्य (कूटस्थ-ब्रह्म) को प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥

शरीरादभिनिष्क्रम्य आकाशेन प्रधावति ।
निरालम्बो निरालम्बान्नालम्ब्य मनसा ततः ॥ १२ ॥
ऐश्वर्यभूतो भूतात्मा चरन् दिवि न दृश्यते ।
चक्षुर्भिर्बहुभिर्लोकैः पुरंदरसमैरपि ॥ १३ ॥

वह सिद्ध योगी शरीरसे निकलकर बिना किसी अवलम्बके आकाशमें दौड़ता है, स्वप्नसदृश मनःकल्पित निरालम्ब भावोंका आश्रय लेकर वहाँ विचरता है। ब्रह्मैश्वर्यसे सम्पन्न हुए उस भूतात्मा योगीको आकाशमें विचरते समय इन्द्र-जैसे लोग भी अपने बहुसंख्यक नेत्रोंद्वारा भी नहीं देख पाते हैं ॥ १२-१३ ॥

ओंकारं ये त्वधीयन्ते मनसा ब्रह्मसत्तमाः ।
विमुक्ताः सर्वकर्मभ्यस्ते तं पश्यन्ति साधवः ॥ १४ ॥

जो ब्राह्मणशिरोमणि साधु मनके द्वारा ॐकारका चिन्तन करते हैं, वे ही समस्त कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो उस (ब्रह्मीभूत आकाशचारी) योगीका दर्शन कर पाते हैं ॥

एतद्धि परमं ब्रह्म ब्राह्मणानां मनीषिणाम् ।
अन्तश्चरति भूतानां विद्धि चेतनया सह ॥ १५ ॥

राजन् ! यह ॐकार प्रणवसंज्ञक परब्रह्म है, जो मनीषी ब्राह्मणोंके चिन्तनका विषय है । वह प्रणववाच्य परब्रह्म परमात्मा समस्त प्राणियोंके भीतर उनकी चेतनाके साथ विचरता है, ऐसा जानो ॥ १५ ॥

एष शब्दो महानादः पुराणो ब्रह्मसम्भवः ।
वायुभूतोऽक्षरं प्राप्तो वदन्त्येवं द्विजातयः ॥ १६ ॥

यह ॐकार समस्त वर्णोंका अभिव्यञ्जक होनेसे महानाद है, पुराण अर्थात् नित्य है, इसका अवलम्बन करनेसे साधककी ब्रह्मके साथ एकता हो जाती है । यह वायुभूत होकर अक्षरभावको प्राप्त हुआ है—ऐसा द्विजाति (ब्राह्मण) कहते हैं ॥ १६ ॥

अरूपी रूपसम्पन्नो धातुभिः सह संगतः ।
अन्तश्चरति भूतेषु कामकारकरो वशी ॥ १७ ॥

यह प्रणव रूपरहित होकर भी तेज, जल और अन्न—इन तीन धातुओंसे संयुक्त हो* रूपसे सम्पन्न (अर्थात् वैखरी वाणीके रूपमें प्रकट) होता है। यही जीवात्मारूपसे समस्त प्राणियोंके भीतर विचरता, इच्छानुसार काम करता और समस्त इन्द्रियोंको अपने वशमें रखता है ॥ १७ ॥

एतत् पूर्वमनुध्याय मनसाऽऽपूरयन्निव ।
वेदात्मकं तदा यज्ञं चिन्तयन्तो मनीषिणः ॥ १८ ॥

पूर्वकालमें इस प्रणवका शास्त्र और आचार्यसे उपदेश पाकर इसके निरन्तर चिन्तनपूर्वक वेदात्मक यश (योग) की भावना करते हुए मनीषी पुरुषोंने अपने मनके द्वारा सबको व्याप्त कर लिया था ॥ १८ ॥

ब्राह्मणाः शुचयो दान्ता यशोयुक्तास्तदन्वयाः ।
ब्रह्मलोकं काङ्क्षमाणा वैष्णवं पदमुत्तमम् ॥ १९ ॥
पदहेतोः क्रियाः सर्वाः कुर्वन्ति विगतज्वराः ।
न ह्येते प्रसवस्थाने भवमिच्छन्ति भारत ॥ २० ॥

यशःस्वरूप ब्रह्मसे युक्त तथा उस ब्रह्मसे ही प्रकट हुए पवित्र जितेन्द्रिय ब्राह्मण ब्रह्मलोक एवं उत्तम वैष्णवपदकी इच्छा रखकर उस पदकी प्राप्तिके लिये ही निश्चिन्तभावसे सारी क्रियाएँ करते हैं । भारत ! ये पुनर्जन्म ग्रहण करनेके लिये नहीं संसारमें आना चाहते हैं, अपितु ज्ञानकी प्राप्तिके लिये ही यहाँ जन्म पानेकी इच्छा करते हैं ॥ १९-२० ॥

त्रिभिर्मात्योपहारैश्च प्रतिभावेन वै द्विजाः ।
यजन्ति परमात्मानं विष्णुं सत्यपराक्रमम् ॥ २१ ॥

वे द्विजगण (प्रातः, मध्याह्न और सायंकालमें) तीन बार माल्योपहार समर्पण तथा प्रतिभाव (ध्यान) के द्वारा उन सत्यपराक्रमी परमात्मा श्रीविष्णुका यजन करते हैं ॥२१॥

यजनं विक्रमं चैव ब्रह्मपूर्वाः प्रचक्रिरे ।
ब्रह्मापि वैष्णवं तेजो वेदोक्तैर्वचनैर्नृप ॥ २२ ॥


* श्रुति कहती है—अन्नमयं हि सोम्य मनः, आपोमयः प्राणः, तेजोमयी वाक् (मन अन्नमय, प्राण जलमय तथा वाक् तेजोमयी है)। इसके सिवा 'मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम्' इत्यादि शिक्षाके वचनसे शब्दकी उत्पत्तिमें मन और प्राणका भी सहयोग अपेक्षित है। अतः तेज, जल और अन्न-इन तीन धातुओंके सहयोगसे ही शब्द प्रकट होता है।

८०० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


नरेश्वर ! वेदको ही प्रमुख प्रमाण मानते हुए उन ब्रह्मवेत्ता योगियोंने यजन (योगाभ्यास) और विक्रम (योगैश्वर्यलाभ) किया। वेदोक्त वचनोंके अनुसार ब्रह्मवेत्ता योगी भी वैष्णवतेज (ब्रह्म) ही है॥ २२॥

ब्राह्मणैर्ब्रह्मविद्भिश्च ब्रह्मज्ञैर्ब्रह्मवादिभिः।
शुचिभिः कर्मनिर्मुक्तैः सत्यव्रतपरायणैः॥ २३॥
धातुभिर्मोक्षकाले च महात्मा सम्प्रदृश्यते।

जो ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मज्ञ, ब्रह्मवादी, कर्मोंके बन्धनसे मुक्त, पवित्र एवं सत्यव्रतपरायण ब्राह्मण हैं, वे ही तेज, जल और अन्नरूप धातुओंसे मोक्षकालमें उस परमात्मस्वरूप महात्माका दर्शन करते हैं॥ २३½॥

तदेव परमं ब्रह्म वैष्णवं परमाद्भुतम्॥ २४॥
रसात्मकं तदैश्वर्यं विकारान्ते प्रदृश्यते।

वह परमात्मा ही परब्रह्म है, वही परम अद्भुत वैष्णव तेज है तथा वही रसात्मक (परमानन्दस्वरूप) ऐश्वर्य है। पूर्वोक्त विकारोंका विलय हो जानेपर ही उसका दर्शन होता है॥ २४½॥

घोररूपा विकारास्ते व्यथयन्ति महात्मनः॥ २५॥
संछाद्यातीव तोयेन क्षुभ्यमाणो विचेतनः।
ऊर्मिभिश्चाद्यते चैव शीतोष्णाभिर्विकारतः॥ २६॥

भयंकर रूपवाले जो तामस विकार हैं, वे उस महात्मा योगीको व्यथित करते हैं। वे विकार उसे अत्यन्त जलसे आच्छादित करके घबराहटमें डाल देते हैं। वह क्षुब्ध एवं अचेत हो जाता है। बहुत-सी लहरें उसे आच्छादित कर लेती हैं, उनमेंसे कुछ तो शीतल होती हैं और कुछ उष्ण; इस प्रकार वह विकारग्रस्त हो जाता है॥ २५-२६॥

महार्णवगतश्चैव दह्यते न च मज्जते।
मग्नश्चैव महानद्याः सलिले नैव सीदति॥ २७॥
सीदमानश्च सलिले स शीते पात्यते बलात्।
आसनाच्छादनाच्चैव मुच्यमानो विचेतनः॥ २८॥

वह महासागरमें पड़कर दग्ध होने लगता है, किंतु उसमें डूबता नहीं है। कभी-कभी महानदीके जलमें डूब जाता है, परंतु जलके भीतर वह अधिक कष्ट नहीं पाता है और कभी-कभी जब वह जलमें कष्ट पाता है, तब उसे बलपूर्वक अधिक शीतल जलमें गिरा दिया जाता है। आसन और आच्छादनसे भी वञ्चित होकर वह अचेत-सा हो जाता है॥ २७-२८॥


श्वभ्रे प्रपद्यमानश्च तोयेन परिषिच्यते।
शुक्लवर्णेन बहुना स्रोतसा मूर्ध्नि सर्वशः॥ २९॥

कभी गड्ढेमें गिरकर जलसे भीग जाता है। उसके मस्तकपर चारों ओरसे जलके बहुत-से श्वेत प्रवाह गिरने लगते हैं॥ २९॥

ऊर्ध्वं ज्योतिरवेक्षंश्च शुक्लैः पीतैश्च बाध्यते।
वारिपूर्णैः सुगम्भीरैर्विद्युद्भिरेव भासितैः॥ ३०॥

वह ऊपर ज्योतिका दर्शन करता है और जलसे भरे हुए अत्यन्त गम्भीर श्वेत और पीत रंगके बादल जो बिजलियोंसे उद्भासितसे होते रहते हैं, उसे पग-पगपर बाधा देने लगते हैं॥ ३०॥

एतैर्विकारैः संवृत्तैर्निरुद्धैश्चैव सर्वशः।
ध्रुवमैश्वर्यमासाद्य सिद्धो भवति ब्राह्मणः॥ ३१॥

इन विकारोंके प्राप्त होने और सब प्रकारसे इनका निरोध हो जानेपर अटल ब्रह्मैश्वर्यको पाकर वह ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता योगी) सिद्ध हो जाता है॥ ३१॥

रसात्मकं तदैश्वर्यं जिह्वाग्रादभिनिःसृतम्।
सहस्रधारं विततं मेघत्वं समुपागतम्॥ ३२॥

उसके रसास्वादसे अनेक प्रकारका रसात्मक ऐश्वर्य प्रकट होता है, जो सहस्र धाराओंमें फैलकर मेघरूपमें परिणत हो जाता है॥ ३२॥

रसांश्च विविधान् योगात् संसिद्धः सृजते प्रभुः।
धात्वर्थं सर्वभूतानां योगप्राप्तेन हेतुना॥ ३३॥

वह सामर्थ्यशाली सिद्ध योगी योगसे नाना प्रकारके रसोंकी सृष्टि करता है तथा योगप्राप्त हेतुसे समस्त प्राणियोंके शरीरके उपयोगके लिये विविध ऐश्वर्यको प्रकट करता है॥

तेजसो रूपमैश्वर्यं विकारैः सह वर्धते।
आत्मनो विघ्नजननं स्वस्थो ब्राह्मणकारणे॥ ३४॥

ब्रह्मवेत्ता योगीके मोक्षसाधन योगमें उसके स्वस्थ आत्माके समक्ष विघ्न उपस्थित करनेके लिये तैजस रूपैश्वर्य प्रकट होकर अपने विकारोंके साथ वृद्धिको प्राप्त होता है॥ ३४॥

उग्ररूपैर्विरूपैश्च हन्यते दण्डपाणिभिः।
घोररूपैः सुगम्भीरैः पिङ्गाक्षैर्नरविग्रहैः॥ ३५॥

उग्र, घोर एवं विकराल रूपवाले, गम्भीर एवं पिङ्गल-नेत्रोंसे युक्त नराकार प्राणी हाथमें डंडे लेकर उस योगीको पीटने लगते हैं॥ ३५॥

नेत्रं समुद्धरन् भीमो जिह्वाग्रं चास्य विन्दति।
नदन्ति युगपन्नादं जृम्भमाणाः पुनः पुनः॥ ३६॥

कोई भयानक पुरुष उसके नेत्र उखाड़ने लगता है, कोई उसकी जिह्वाके टुकड़े-टुकड़े कर डालता है तथा बहुत-


१. 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति (ब्रह्मवेत्ता योगी ब्रह्म होता हुआ ही ब्रह्मको प्राप्त होता है ।)' इत्यादि वचन ही ब्रह्मवेत्ताके ब्रह्मरूप होनेमें प्रमाण हैं।

भविष्यपर्व ] एकोनविंशोऽध्यायः ८०१

से विघ्नकारी पुरुष बारं-बार जँभाई लेते हुए एक साथ जोर-जोरसे कोलाहल करने लगते हैं ॥ ३६ ॥

पुनरेव तदा भूत्वा बहुरूपास्तदाभवन् । नृत्यमानाः प्रगायन्ति तर्पयन्तो विशेषतः ॥ ३७ ॥

फिर वे तत्काल ही बहुत-से रूप धारण कर लेते हैं और उस योगी पुरुषको विशेष संतुष्ट करनेके लिये नाचने-गाने लगते हैं ॥ ३७ ॥

स्त्रीभूताश्च ततः सर्वे युञ्जानाश्चावलम्बिरे । कण्ठेऽस्य बहुरूपत्वाद् विघ्नैश्चैव प्रलोभयन् ॥ ३८ ॥

तदनन्तर वे सब-के-सब स्त्रियोंके रूप धारणकर योगीसे संयुक्त हो जाते और उसके गलेमें लिपटने या लटकने लगते हैं। वे अनेक रूप धारण करनेके कारण उसे नाना विघ्नोंद्वारा ही प्रलोभनमें डालते हैं ॥ ३८ ॥

मधुरैरभिधानैश्च व्याहरन्ति न भीतवत् । पतन्ति युगपत् सर्वे पादयोर्मूर्धभिर्युताः ॥ ३९ ॥

वे स्त्रीरूपधारी विघ्न निडर-से होकर मधुरवाणीमें नाम ले-लेकर उसे पुकारते हैं और सभी एक साथ योगीके चरणोंमें मस्तक रखकर उसे प्रणाम करते हैं ॥ ३९ ॥

प्रसादं काङ्क्षमाणाश्च योगस्यान्तरविघ्नतः । बहुप्रकारं कथयन् नृत्यन्ति च तरन्ति च ॥ ४० ॥

वे योगमें विघ्न उपस्थित करनेके लिये ही उस योगीका कृपाप्रसाद चाहते हैं। उससे अनेक प्रकारकी बातें करते और नाचते हैं। ऐसा करके वे कभी-कभी योगीको जीत भी लेते हैं ॥ ४० ॥

एतैर्विकारैः संवृत्तैर्निरुद्धैश्चैव सर्वशः । ध्रुवमैश्वर्यमासाद्य सिद्धो भवति ब्राह्मणः ॥ ४१ ॥

इन विकारोंके प्राप्त होने और इन सबका पूर्णरूपसे निरोध हो जानेपर अटल ऐश्वर्यको पाकर वह ब्रह्मवेत्ता योगी सिद्ध हो जाता है ॥ ४१ ॥

तदर्चिष इवाग्नेया आदित्यस्येव रश्मयः । तेजोरूपकमैश्वर्यं जनितास्तेजविन्दवः ॥ ४२ ॥

तदनन्तर अग्निकी लपटों और सूर्यकी किरणोंके समान उसे तेजोरूप ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। फिर तो उसके शरीरसे तेजोबिन्दु प्रकट होने लगती हैं ॥ ४२ ॥

ज्योतींषि चैव संवृत्ता आकाशे गुणसंवृताः । चरन्ति लोके सततं सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम् ॥ ४३ ॥

सत्त्वादि गुणोंसे घिरे हुए वे योगी आकाशमें ज्योतिःस्वरूप होकर लोकमें सदा ही चन्द्रमा और सूर्यके मार्गपर विचरते हैं ॥ ४३ ॥

चन्द्रसूर्यात्मकं दिव्यं ज्योतिः सघनमुत्तमम् । एतद् विभाजते लोके कालचक्रं ध्रुवं वरम् ॥ ४४ ॥

चन्द्रसूर्य-स्वरूप होकर मेघमण्डलसहित उत्तम दिव्य ज्योति कालचक्र एवं श्रेष्ठ ध्रुवस्थानमें विचरता हुआ वह वही-वही रूप धारण करके इस लोकमें प्रकाशित होता है ॥ ४४ ॥

अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतुसंवत्सराण्यता । क्षणा लवा मुहूर्ताश्च कलाः काष्ठास्तथैव च ॥ ४५ ॥ अहोरात्रप्रमाणं च निमिषोन्मेषणं तथा । ताराणां गतयश्चैव ग्रहाणां च विशेषतः ॥ ४६ ॥

यह योगी ही पक्ष, मास, ऋतु, संवत्सर, क्षण, लव, मुहूर्त, कला, काष्ठा, दिन-रात्रिका प्रमाण, निमेष, उन्मेष, ताराओं तथा विशेषतः ग्रहोंकी गति इत्यादि सब कुछ हो जाता है ॥ ४५-४६ ॥

अथ पार्थिवमैश्वर्यं विकारग्रहसम्भवम् । योगयुक्तास्त्वभिग्रस्ताः पात्यन्ते ह्यचलासनात् ॥ ४७ ॥

तदनन्तर विकारोंको स्वीकार करनेके कारण योगीको पार्थिव ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है, उससे ग्रस्त हुए योगी सिद्धिके अविचल सिंहासनसे नीचे गिरा दिये जाते हैं ॥ ४७ ॥

अलोभाच्छिद्यते सद्यो वेपमानोऽनुकीर्त्यते । सीदते वसुधामध्ये भिद्यमानः पुनः पुनः ॥ ४८ ॥

लोभका त्याग करनेसे वह विघ्नस्वरूप ऐश्वर्य तत्काल छिन्न-भिन्न हो जाता है; विघ्नसे काँपने और डरनेवाला योगी जगत्‌में निन्दनीय होता है। वह भूमण्डलमें बारंबार विघ्नोंसे आहत होकर कष्ट पाता रहता है ॥ ४८ ॥

भूतानां बहुरूपैश्च अन्यैश्च तलवासिभिः । विषयैर्युज्यते क्षिप्रं संक्षेपात् समवरुध्यते ॥ ४९ ॥

प्राणियोंके बहुत-से रूपों तथा भूतलवासी अन्य विषयोंसे वह शीघ्र ही सम्बन्ध स्थापित कर लेता है तथा उनके द्वारा विक्षेपमें पड़कर उसकी प्रगति रुक जाती है ॥ ४९ ॥

ततः पार्थिवमैश्वर्यं सेवमानश्च सर्वतः । मूर्तिमद्भिborder-width:0;श्च बहुधा धातुभिः स च हन्यते ॥ ५० ॥

तदनन्तर पार्थिव ऐश्वर्यका सेवन करता हुआ वह योगी पुरुष सब ओरसे मूर्तिमान् पार्थिव धातुओं‌द्वारा बारंबार मारा जाता है ॥ ५० ॥

शक्तितोमरनिख्रिंशैर्गदाभिश्चाप्यनेकधा । असिभिः पात्यते चैव क्षुरधारैः सहस्रशः ॥ ५१ ॥

शक्ति, तोमर, तलवार, गदा तथा छुरेकी-सी धारवाले सहस्रों खड्गोंद्वारा वह अनेकों बार धराशायी किया जाता है ॥ ५१ ॥

म० ह० २६-

८०२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

भिद्यते चैव बाणाग्रैः सुतीक्ष्णैर्मर्मभेदिभिः।
षड्भिर्विकारैर्निर्वृत्तैर्निरुद्धैश्चैव सर्वशः ॥ ५२ ॥
ध्रुवमैश्वर्यमापन्नः सिद्धो भवति ब्राह्मणः।

अत्यन्त तीखे मर्मभेदी बाणोंके अग्रभागसे विदीर्ण होने-का भी उसे अवसर प्राप्त होता है। इन विकारोंके प्राप्त होने तथा उनका पूर्णतः निरोध हो जानेपर अटल ऐश्वर्य (ब्रह्म-भाव) को प्राप्त हुआ योगी सिद्ध हो जाता है ॥ ५२।।

ततः पार्थिवमैश्वर्यं निर्मुक्तस्य विकारतः ॥ ५३ ॥
प्रादुर्भवति संजाते समाधौ प्रलयं गते ।
दिव्यं गन्धं समाघ्राय दिव्यांश्चांस्त्वाञ्छृणोति च ॥ ५४ ॥

तत्पश्चात् विकारसे मुक्त हुए योगीके समक्ष पार्थिव ऐश्वर्य प्रकट होता है, जब समाधि लग जाती है और विकार लीन हो जाते हैं, तब वह दिव्य गन्धको सूँघकर दिव्य लोकोंकी बातें भी सुनता है ॥ ५३-५४ ॥

दिव्यरूपैश्च पुरुषैश्छिद्यते न च भिद्यते ।
गच्छन् सुकृतिनां चान्तः प्रधानात्मा क्षरन्निव ॥ ५५ ॥

वह शरीर रहनेतक दिव्य पुरुषोंसे भिन्न रहता है और देहपात होनेपर सर्वात्मभावको प्राप्त हो जानेसे वह उन सबसे अभिन्न हो जाता है। अन्तर्जगत्में जाता हुआ वह योगी परिणामको प्राप्त होनेवाले प्रधानकी भाँति पुण्यात्माओंके अन्तःकरणमें भी प्रवेश करता है ॥ ५५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥


विंशोऽध्यायः

ब्रह्माजीके द्वारा योगधारणपूर्वक की गयी मानसिक सृष्टिका वर्णन

वैशम्पायन उवाच,
ततोऽन्यां धारणां गत्वा मनसा स पितामहः ।
ब्रह्मकर्मसमारम्भं निर्मुक्तेनान्तरात्मना ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर योगयुक्त पितामह ब्रह्माने मनके द्वारा दूसरी धारणाको प्राप्त होकर विकारमुक्त अन्तःकरणके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मका आरम्भ किया ॥ १ ॥

सर्वाङ्गधारणां कृत्वा मनसा प्रहसन्निव ।
ब्रह्मयोगेन च ब्रह्मा सृजते मनसा प्रजाः ॥ २ ॥

ब्रह्माजीने मनसे सर्वाङ्ग-धारणा करके हँसते हुए-से ब्रह्मयोगसे युक्त हो मानसिक संकल्पके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि की ॥

चक्षुषो रूपसम्पन्ना ह्यप्सराः सृजते प्रभुः।
नासिकाग्राच्च गन्धर्वान् सुचित्राम्बरवाससः ॥ ३ ॥

उन भगवान्ने नेत्रसे रूपवती अप्सराओंको उत्पन्न किया और नासिकाके अग्रभागसे विचित्र वस्त्रधारी गन्धर्वोंकी सृष्टि की ॥ ३ ॥

तुम्बुरुप्रमुखान् सर्वाञ्छतशोऽथ सहस्रशः ।
नृत्यवादित्रकुशलान् कुशलान् सामगीतिषु ॥ ४ ॥

वे सैकड़ों और सहस्रों गन्धर्व, जिनमें तुम्बुरु आदि प्रधान थे, सब-के सब नृत्य और वाद्यमें निपुण तथा सामगानमें कुशल थे ॥ ४ ॥

ब्रह्मयोगेन योगज्ञः स्वयम्भूर्भगवान् प्रभुः ।
चारुनेत्रां सुकेशान्तां सुभ्रू चारुनिभाननाम् ॥ ५ ॥
पद्मेन शतपत्रेण चारुणा सुविराजिताम् ।
स्वक्षां शुचिगिरं सेव्यां ब्राह्मीं मूर्तिमतीं श्रियम् ॥ ६ ॥

तदनन्तर योगके ज्ञाता एवं सर्वसमर्थ स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माने ब्रह्मयोगके द्वारा दिव्य नेत्रवाली, पवित्र, (द्विजोंके द्वारा) सेवनीय, मूर्तिमती, वेदवाणीस्वरूपा लक्ष्मीको प्रकट किया, जिनके नेत्र बड़े मनोहर थे, केशान्त भाग बहुत ही सुन्दर था, भौंहें भी मनोहर थीं, मुखकी प्रभा कमनीय कान्ति-से प्रकाशित हो रही थी और वे हाथमें परम सुन्दर शतदल कमल लेकर उससे बड़ी शोभा पा रही थीं ॥ ५-६ ॥

ससृजे मनसा ब्रह्मा सम्यक्प्रोक्तेन चेतसा ।
भावयोगेन भूतात्मा सर्वप्राणभृतां नृप ॥ ७ ॥

नरेश्वर ! भूतात्मा ब्रह्माने समस्त प्राणियोंके भावयोग (अन्तःकरणकी वासना) के अनुसार ईश्वरप्रेरित चित्तके द्वारा मानसिक संकल्पसे ही उनकी रचना की ॥ ७ ॥

चक्षुषो रूपसम्पन्नाः सृजन् सोऽप्सरसः प्रभुः।
नासिकाग्राच्च गन्धर्वान् सुवासः सुप्रवादितान् ॥ ८ ॥

उन प्रभुने नेत्रसे सौन्दर्यशालिनी अप्सराओंकी तथा नासिकाके अग्रभागसे सुन्दर वस्त्रधारी एवं वाद्यकुशल गन्धर्वोंकी सृष्टि की ॥ ८ ॥

गानप्रभानं संचक्रे गन्धर्वाणामशेषतः ।
अन्येषां चैव विप्राणां गानं ब्रह्मप्रभाषितम् ॥ ९ ॥

उन्होंने समस्त गन्धर्वोंके लिये गान्धर्वशास्त्र और अन्यान्य ब्राह्मणोंके लिये सामगानके विधानकी रचना की ॥ ९ ॥

पद्भ्यां सृजति भूतानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च ।
नरकिन्नरयक्षांश्च पिशाचोरगराक्षसान् ॥ १० ॥
गजान् सिंहांश्च व्याघ्रांश्च मृगांश्चैव सहस्रशः ।
तृणजातींश्च बहुधा भावहेतोश्चतुष्पदान् ॥ ११ ॥