भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 819
७९६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

शुद्ध वैदूर्यमणिकी-सी प्रभाववाले, पद्मराग मणिके समान आभावाले, स्फटिकमणिके तुल्य उज्ज्वल, गजराजके सदृश काले, वीरबहूटियोंके समान लाल, चन्द्रमाकी किरणों और जलके समान श्वेतवर्णवाले, बहुरंगे धूमसमूह, जो इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होते हैं, एक ही समय बादलोंके समान एकत्र होकर सब ओर उड़ने लगते हैं, उस समय सारा आकाश पङ्खधारी पर्वतोंके समान उन धूमसमूहोंसे अवरुद्ध-सा हो जाता है॥ ६-९॥

ते धूमवर्णाः संघाता घनाः सलिलधारिणः ।
निर्वैमुश्चैव तोयौघान् विविशुर्वसुधातले ॥ १०॥

तदनन्तर वे धुएँके समान वर्णवाले समुदाय जल धारण करनेवाले मेघोंके रूपमें परिणत हो जलकी धाराएँ बरसाने लगते हैं और वसुधातल (योगीके शरीर) में ही विलीन हो जाते हैं॥ १०॥

मूर्ध्नि चैव महानग्निर्मानसो धूयते प्रभुः ।
युक्तः परमयोगेन शतशोऽर्चिर्भिरावृतः ॥ ११॥

उसके मस्तकपर भी मनसे प्रकट हुई बड़ी भारी आग धू-धू करके जलने लगती है, वह जलानेमें समर्थ, उत्तम योगशक्तिसे सम्पन्न तथा सैकड़ों लपटोंसे घिरी हुई होती है॥ ११॥

तस्यार्चेर्विस्फुलिङ्गानां सहस्राणि शतानि च ।
विसस्रुः सर्वगात्रेभ्यो ज्वलन्निव युगान्तयः ॥ १२॥

उसकी लपटसे सैकड़ों, हजारों चिनगारियाँ निकलती रहती हैं। उस योगीके सभी अङ्गोंसे प्रलयाग्नियोंके समान जलती हुई-सी अग्नियाँ प्रकट होती हैं॥ १२॥

यावत्यो वर्षधारास्तु तावत्योऽर्च्योऽनलस्य च ।
समेयुर्वारिधाराभिर्विपुले वसुधातले ॥ १३॥

वर्षा होते समय जलकी जितनी धाराएँ गिरती प्रतीत होती हैं, उस आगकी लपटें भी उतनी ही होती हैं। वे विस्तृत भूतलपर उन जलकी धाराओंके साथ मिल जाती हैं॥ १३॥

वर्णाभ्यां युज्यमानस्य वायुर्दोर्धूयते महान् ।
दिव्यसिद्धगुणोद्भूतः सूक्ष्मप्राणविवर्धनः ॥ १४॥

जल और अग्निके वर्ण श्वेत और लोहित रंगोंसे संयुक्त हुए चित्तमें जब सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, तब उसमें रूपरहित वायुरूप आकाश प्रकट होता है। वह दिव्य एवं अनादि गुणों—शब्दतन्मात्रा आदिसे उत्पन्न हुई विशाल वायु (जो स्थूल वायुसे भिन्न है) बहने लगती है, वह सूक्ष्म प्राण (सूत्रात्मा) को प्रकाशित करनेवाली है॥ १४॥

वेगवान् भीमनिर्घोषो बलवान् प्राणगोचरः ।
तैरेव चाग्निसंघातैर्धातुभिः सह संगतः ॥ १५॥

अग्निसे मिले हुए उन पृथ्वी और जल नामक धातुओंसे संयुक्त होकर वह वायु प्राणगोचर (प्राणशब्दवाच्य) सूत्रात्मा हो जाती है। वह प्राण या सूत्रात्मा बड़ा ही वेगवान् है; क्योंकि वह मन को भी उत्पन्न करनेवाला है। उससे बड़ी भयंकर ध्वनि प्रकट होती है; क्योंकि वह स्थूल आकाशका भी जनक है तथा वह अत्यन्त बलवान् है; क्योंकि उसमें ब्रह्माण्डका भी भेदन करनेकी शक्ति है॥ १५॥

सहस्रशोऽथ शतशो मूर्तिं कृत्वा पृथग्विधाम् ।
अग्निर्वायुर्जलं भूमिर्धातवो ब्रह्मचोदिताः ॥ १६॥

तदनन्तर ब्रह्म (योगी) से प्रेरित हो अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी नामक धातु पृथक्-पृथक् सैकड़ों और हजारों मूर्तियोंका निर्माण करके स्थित होते हैं॥ १६॥

समवायत्वमापन्ना बीजभूता महीपते ।
संघातं ब्रह्मवेगेन धातवो गमिता नृप ॥ १७॥

पृथिवीनाथ ! नरेश्वर ! ब्रह्मके वेगसे अर्थात् चैतन्यशक्तिके अनुप्रवेशसे संघात (मूर्तिभाव) को प्राप्त हुए पृथ्वी-जल आदि धातु एक दूसरेसे मिलकर बीजभूत हो जाते हैं अर्थात् भावी सृष्टिरूप कार्यके कारण बनते हैं॥ १७॥

यद् ब्रह्म चक्षुषोर्मध्ये स सूक्ष्मः पुरुषो विराट् ।
तयोरन्यान बहून सूक्ष्मान् ससृजे पुरुषोत्तमः॥ १८॥

दोनों नेत्रोंके मध्यभागमें धारणाका विषयभूत जो ब्रह्म है, वही सूक्ष्म और वही विराट् पुरुष है। वह ब्रह्मीभूत हुआ पुरुषोत्तम योगी उन सूक्ष्म और विराट्से भिन्न एवं उन्हींके समान बहुत-से सूक्ष्म पुरुषोंकी सृष्टि करता है॥ १८॥

स एव भगवान विष्णुर्व्यक्ताव्यक्तः सनातनः ।
आधारः सर्वविद्यानां प्रलये प्रलयान्तकृत् ॥ १९॥

वही ब्रह्मीभूत हुआ योगी भगवान् विष्णुके रूपमें प्रतिष्ठित होता है। वे विष्णु ही व्यक्ताव्यक्तरूप सनातन पुरुष हैं। वे ही समस्त विद्याओंके आधार हैं। प्रलयकालमें उन्हींके द्वारा सबका प्रलय एव विनाशकार्य सम्पन्न होता है॥ १९॥

तं मूर्ध्नि धातुभिर्नद्धं विशन्ति ब्रह्मचोदिताः ।
तेऽन्तराः पुरुषाः सर्वे ज्ञातारः सुखदुःखयोः ॥ २०॥

मस्तक अर्थात् भौंहों और नासिकाके मध्यभागमें सूत्रात्मारूपसे स्थित हुए उस योगीमें परमेश्वरकी प्रेरणासे सुख और दुःखका अनुभव करनेवाले अन्य सब जीव प्रवेश करते हैं॥ २०॥

अथ चेष्टितुमारब्धा मूर्तयो ब्रह्मसम्मिताः ।
भित्त्वा च धरणीं देवीं प्रापद्यन्त दिशो दश ॥ २१॥

तदनन्तर स्थूल देहका त्याग करके परमेश्वरकी समताको