विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 818, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः ७९५
ब्राह्मणानां विनीतानां वैष्णवे पदसंचये । सर्वद्रव्यातिरिक्तानां कामयोगविगर्हिणाम् ॥ ६६ ॥
जो वैष्णव-पदकी प्राप्तिके लिये सर्वस्वका परित्याग करके कामयोग (स्त्री-पुत्र आदिके सङ्ग) की निन्दा करते हैं, उन विनयशील ब्राह्मणोंको उस अक्षर ब्रह्मका ज्ञान होता है॥ ६६ ॥
अपुनर्भाविनां लोकाः कर्मयोगप्रतिष्ठिताः । अनादानेन मनसा राजन् कर्मणि कर्मणि ॥ ६७ ॥
राजन् ! जो प्रत्येक कर्ममें मनसे उसके फलको ग्रहण न करके पुनर्जन्मके बन्धनसे ऊपर उठ गये हैं, उनके लोक निष्काम कर्मयोगमें प्रतिष्ठित हैं ॥ ६७ ॥
आदानाद् बध्यते जन्तुर्निरादानात् प्रमुच्यते । ब्राह्मणेभ्यः क्रियावासिर्जन्तोः पूर्वोजनाधिप ॥ ६८ ॥
नरेश्वर ! फलको ग्रहण करनेसे जीव बँधता है और उसका त्याग करनेसे मुक्त होता है। जीवको पूर्वजन्मके संस्कारवश ब्राह्मणादि श्रेष्ठ पुरुषोंसे क्रियाओंकी प्राप्ति होती है ॥ ६८ ॥
मुक्तश्चेन्द्रियबन्धेन प्राप्तश्च परमं पदम् । न भूयः पुनरायाति मानुषं देहविग्रहम् ॥ ६९ ॥
फलका परित्याग करनेवाला पुरुष इन्द्रियोंके बन्धनसे मुक्त हो परमपदको प्राप्त होता है। वह पुनः इस मानव-शरीरमें नहीं आता है ॥ ६९ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
अष्टादशोऽध्यायः
योगके उपसर्ग (विघ्न), योगीकी विष्णुरूपसे स्थिति, कर्मलयसे मुक्ति, सकाम कर्मियोंकी धूममार्गसे गति और पुनरावृत्ति, ज्ञानी एवं योगीको तत्त्वका साक्षात्कार तथा ब्रह्मयुगका वर्णन
जनमेजय उवाच
उपसर्गे च योगं च ध्यातव्यं चैव यत्पदम् । न भूयः पुनरायाति मानुषं देहविग्रहम् । सिद्धिं सिद्धिगुणांश्चैव श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा-ब्रह्मन् ! योगके विघ्न कौन-कौनसे हैं ? योगका स्वरूप क्या है ? उसमें ध्येय वस्तु क्या है ? किस तरह योग साधन करनेसे मनुष्यको फिर शरीर धारण करना नहीं पड़ता ? सिद्धि क्या है ? और उसके गुण कौन-कौनसे हैं ? मैं इन सब बातोंको यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु विस्तरतः सर्वे यथा पृच्छसि मेधया । उपपन्नेन मनसा ब्रह्मादीनामनेकधा ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा-राजन् ! ब्रह्मा आदि योगियोंको अनेक बार जिनका सामना करना पड़ता है, योगके उन विघ्नों तथा स्वरूप आदिके विषयमें तुम जैसा पूछते हो, वह सब बुद्धियुक्त मनसे विस्तारपूर्वक सुनो ॥ २ ॥
पञ्चसिद्धिगुणांस्त्यक्त्वा पश्यतो ब्रह्मणो नृप । योगयुक्तेन मनसा पञ्चेन्द्रियनिवासिनः ॥ ३ ॥ ब्रह्मणाश्चिन्तयानस्य ब्रह्मणशं सनातनम् । बहुरूपमनैश्वर्यात् प्रवर्तते निरोधनम् ॥ ४ ॥
नरेश्वर ! दूरश्रवण आदि जो पाँच सिद्धियाँ हैं, उनके जो पाँचों इन्द्रियोंमें निवास करनेवाले शब्द आदि विषय हैं, उनका परित्याग करके ब्रह्मदर्शी ब्राह्मण जब योगयुक्त मनसे सनातन ब्रह्मरूप यशका चिन्तन करने लगता है, उस समय उसके भीतर पर-वैराग्यके बलका अभाव होनेसे उसके समक्ष अनेक रूपोंमें विघ्न उपस्थित होने लगते हैं ॥ ३-४ ॥
पञ्चेन्द्रियस्य ग्रामस्य नवद्वारस्य भारत । कामक्रोधस्य लोभस्य संनिरुद्ध्य मेधया ॥ ५ ॥ तेजसा मूर्ध्नि चाधाय धूमो दोधूयते महान् ।
भरतनन्दन ! जिसमें पाँचों इन्द्रियोंकी प्रधानता है, उस नौ द्वारवाले देहेन्द्रियप्राण-सङ्घातरूपी ग्रामका तथा काम, क्रोध और लोभका बुद्धिके द्वारा निरोध हो जानेपर भी जब योगी भौंहों और नासिकाके मध्य भागमें स्थापित हुए तेज अर्थात् नेत्र-प्रणिधानके द्वारा चित्तको किसी आधारसे संयुक्त करके स्थित होता है, उस समय उसके समक्ष बड़ा भारी धुआँ उठने लगता है ॥ ५॥
नीललोहितवर्णामैः पीतैः श्वेतैश्च धातुभिः ॥ ६ ॥ माञ्जिष्ठरागवर्णामैः कपोतसदृशैस्तथा । शुद्धवैडूर्यवर्णाभैः पद्मरागसमप्रभैः ॥ ७ ॥ स्फाटिकैमणिवर्णाभैर्नागेन्द्रसदृशैस्तथा । इन्द्रगोपकवर्णाभैश्चन्द्रांशुसलिलप्रभैः ॥ ८ ॥ बहुवर्णैः सुधूमैर्धैरिन्द्रायुधसमप्रभैः । सम्पतद्भिश्च युगपन्मेघैरिव समागतः । निरुध्यत इवाकाशं पक्षवद्भिरिवाद्रिभिः ॥ ९ ॥
नीले, लाल, पीले, सफेद धातुओंके समान रंगवाले, मजीठके रंगकी-सी कान्तिवाले, कबूतरोंके समान वर्णवाले,