विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 817, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७९४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
भाग, कटिप्रदेश, ऊरु, जंघा और चरणोंके साथ शेष शरीरकी कल्पना हुई है। वह दिव्य रूप और मायासे युक्त पुरुष अमर—अविनाशी तुरीय पदसे प्रकट हुआ है ॥ ५०-५२॥
स हि वेदमयो यज्ञः सर्वभूतसुखावहः ।
उभयोर्लोकयोस्तात हिंसार्वज्यः सनातनः ॥ ५३ ॥
तात ! वह हिंसारहित सनातन वेदमय यज्ञ इहलोक और परलोकमें समस्त प्राणियोंके लिये सुखदायक होता है ॥ ५३ ॥
योगारम्भं कर्मसाध्यं ब्रह्मचर्यं सनातनम् ।
प्रभवः सर्वभूतानां यो विन्दति स वेदवित् ॥ ५४ ॥
योगका आरम्भ मनःसंयमरूपी कर्मसे सिद्ध होनेवाला है। यही सनातन ब्रह्मचर्य है। जो इसे जानता है, वह समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका कारण एवं वेदवेत्ता है ॥ ५४ ॥
स सिद्धः प्रोच्यते लोके सिद्धिरेव न संशयः ।
निर्मुक्तैः सर्वकर्मभ्यो मुनिभिर्वेदपारगैः ॥ ५५ ॥
समस्त कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हुए वेदपारङ्गत मुनियोंने लोकमें उसे सिद्ध बताया है। उसको सिद्धि ही प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥
वैष्णवं यज्ञमित्येवं ब्रुवते वेदपारगाः ।
ब्राह्मणा नियमश्रान्ता वेदोपनिषदे पदे ॥ ५६ ॥
वेदोंके पारङ्गत ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण, जो मनोनियमका अभ्यास करते-करते थक गये हैं, वेदोपनिषद् (ब्रह्मविद्या) द्वारा अधिगत होनेवाले स्वाराज्य पदकी प्राप्तिके लिये इस प्रकार वैष्णव यज्ञ (योग) की आवश्यकता बताते हैं ॥ ५६ ॥
जनमेजय उवाच
चेतसस्तूपलम्भे हि मनोग्राहास्य कामतः ।
कारणं श्रोतुमिच्छामि यथा त्वं मन्यसे मुने ॥ ५७ ॥
जनमेजयने कहा—मुने ! जो इच्छानुसार मनके द्वारा ग्राह्य है अर्थात् ईंधन जल जानेपर आगकी तरह जो स्वयं अपने-आप ही शान्त हो जानेके योग्य है, उस चित्तकी उपलब्धिमें क्या कारण है, यह मैं सुनना चाहता हूँ; इस विषयमें आपकी जैसी मान्यता हो, वैसा बताइये ॥ ५७ ॥
वैशम्पायन उवाच
न ह्यस्य कारणं किंचिद् बाह्यं भवति भारत ।
अन्तर्गतं कारणं तु शारीरं मानसं नृप ॥ ५८ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—भारत ! नरेश्वर ! इसका कोई बाह्य कारण नहीं है। अपने भीतर ही इसका कारण मौजूद है। शरीरके द्वारा किया गया जो कर्म है, वही मनमें संस्कार-रूपसे स्थित हो उसका उद्बोधक होता है (उस चित्तकी उपलब्धिमें कारण बनता है) ॥ ५८ ॥
येन वेद्यं विदुर्मर्त्या ब्राह्मणाः संशितव्रताः ।
अवेद्यमपि वेद्यं च शक्यं वेत्तुं न कर्मणा ॥ ५९ ॥
कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मवेत्ता मनुष्य जिस चैतन्यसे समस्त ज्ञेय वस्तुओंको जानते हैं, वह आत्मा होनेके कारण अवेद्य है तो भी शास्त्र और आचार्यके उपदेशके पश्चात् लक्षणाद्वारा उसका ज्ञान होता है; परंतु कर्मसे तो उसको किसी तरह नहीं जाना जा सकता ॥ ५९ ॥
ब्राह्मणेन विनीतेन सदा ब्रह्मनिषेविणा ।
सदा विदिततत्त्वेन सिद्धिर्हेतोर्महीपते ॥ ६० ॥
पृथ्वीनाथ ! वेदोंका अध्ययन करनेवाले ब्राह्मण आदिको चाहिये कि वह मोक्षकी प्राप्तिके लिये विद्याके अहङ्कारका त्याग करके विनीतभावसे रहे, सदा ब्रह्मयज्ञ (स्वाध्याय) का सेवन करे, प्रतिदिन शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे आत्मा और अनात्माके तत्त्वको जाननेका प्रयत्न करे ॥ ६० ॥
सदा चैव शुचिर्भूत्वा नियतो ब्रह्मकर्मणा ।
उपनिष्ठेत स गुरुं बद्धाञ्जलिपुटो द्विजः ॥ ६१ ॥
सदा पवित्र रहकर ब्रह्मार्पणभावसे कर्म करते हुए नियमपूर्वक शम आदिके साधनमें लगा रहे। इस प्रकार द्विज दोनों हाथ जोड़कर गुरुकी सेवामें उपस्थित होवे ॥ ६१ ॥
सायं प्रातश्च तत्त्वज्ञो मोक्षकमाणि कारयेत् ।
विनीतो ब्रह्मभावेन समाहितमतिर्मुनिः ॥ ६२ ॥
गुरुतत्त्वका ज्ञाता होकर प्रतिदिन सायं और प्रातःकाल मोक्षसम्बन्धी कर्म (आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान और धारणा) करे, मनमें योगप्राप्तिके कारण गर्व न आने देकर विनयशील रहे, निरंतर ब्रह्मकी भावना करते हुए मनको एकाग्र रखे और मौन रहे ॥ ६२ ॥
सम्पश्येत मनसा वैष्णवं पदमुत्तमम् ।
ध्यायन्नेव प्रसीदेत समाहितमतिर्द्विजः ॥ ६३ ॥
वह मनसे उत्तम वैष्णवपद (शुद्ध ब्रह्म) का चिन्तन करे। इस तरह एकाग्रचित्त हुआ द्विज ध्यानपरायण होकर ही प्रसन्न रहे ॥ ६३ ॥
गच्छते परमं ब्रह्म निर्विकारेण चेतसा ।
अपुनर्भवभावज्ञो निर्ममो भावबन्धनात् ॥ ६४ ॥
मोक्षके स्वरूपको जाननेवाला ममतारहित वह पुरुष चित्तवृत्तियोंका निरोध करके विकाररहित चित्तसे परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ ६४ ॥
तदेवाक्षरमित्याहुर्यत् तद् ब्रह्म सनातनम् ।
तर्हि तत्कर्मयोगेन विद्यायोगेन दर्शितम् ॥ ६५ ॥
वह जो सनातन ब्रह्म है, उसीको अक्षर कहते हैं। उसीका शास्त्रोंमें निष्काम कर्मयोग और ज्ञानयोगके द्वारा साक्षात्कार कराया गया है ॥ ६५ ॥