भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 816

भविष्यपर्व ] सप्तदशोऽध्यायः ७९३

नोपलभ्यति मूढात्मा प्रत्यक्षं ब्रह्म शाश्वतम् । ललाटमध्ये तिष्ठन्तं द्विधाभूतं क्रियां प्रति ॥ ३९ ॥

मूढ़चित्त पुरुष प्रत्येक क्रियाके प्रति नियम्य और नियामक रूपसे दो स्वरूपोंमें स्थित हुए और ललाट के मध्यभाग ( भौंहों और नासिकाके संधिस्यान ) में विराजमान सनातन ब्रह्म ( विष्णु ) का साक्षात्कार नहीं कर पाता है ॥ ३९ ॥

ज्योतिश्चक्षुषि सम्बद्धं विम्बं भास्करसोमयोः । बुद्ध्या पूर्वं तु पश्यन्ति अध्यात्मविषये रताः ॥ ४० ॥ ब्राह्मणा वेदविद्वांसः सत्यव्रतपरायणाः । नेतरे जातु पश्यन्ति अध्यात्मं नावबुध्यते ॥ ४१ ॥

सूर्य और चन्द्रमा जिनके देवता हैं, उन इड़ा और पिङ्गला नामक नाड़ियोंमें बिम्बभूत जो चैतन्य ज्योति है, उसी की धारणा करनी चाहिये। वह नेत्रेन्द्रियमें प्रतिबिम्बित होती है ( उसीके द्वारा नेत्रमें रूपको प्रकाशित करनेकी शक्ति प्राप्त हुई है ) । पहलेसे अध्यात्मविषयके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले सत्यव्रतपरायण वेदवेत्ता ब्राह्मण विशुद्ध बुद्धिके द्वारा उसका साक्षात्कार करते हैं । दूसरे लोग कदापि उसका दर्शन नहीं कर पाते हैं। दूसरोंको तो अध्यात्मशास्त्रका भी ज्ञान नहीं होता, स्वरूपबोध तो दूरकी बात है ॥ ४०-४१ ॥

हिंसायौगैरयोगात्मा सर्वप्राणचरैर्नृप । भूतयो भुवि भूतेश्रो मोहप्राप्तेन चेतसा ॥ ४२ ॥

नरेश्वर ! जो भूतलपर योगजनित ऐश्वर्यसे समस्त प्राणियोंका निग्रह और अनुग्रह करनेमें समर्थ है, वह योगी यदि अपने चित्तको मोहवश योगमें लगाये न रहे तो वे ऐश्वर्य उसे समस्त प्राणियोंका संहार करनेवाले हिंसायौगमे लगाकर उसका पराभव कर देते हैं ॥ ४२ ॥

कर्मभिः कुत्सितैरन्यैः सर्वप्राणिवधैषिणाम् । नराणां योगमाधाय स्वेषु मात्रेषु भारत ॥ ४३ ॥

भरतनन्दन ! वे विभूतियाँ समस्त प्राणियोंके वधकी इच्छावाले मनुष्योंको अपने भोग्य विषयोंके लिये अन्य कुत्सित कर्मोंमें लगाकर उन्हें विनाशके गर्तमें गिरा देती हैं ॥ ४३ ॥

समाहितमना ब्रह्मन् मोक्षप्राप्तेन हेतुना । चन्द्रमण्डलसंस्थानाज्ज्योतिश्चान्द्रं महत् तदा ॥ ४४ ॥ प्रविश्य हृदयं क्षिप्रं गायत्र्या नयनान्तरे । गर्भस्य सम्भवो यश्च चतुर्धा पुरुषात्मकः ॥ ४५ ॥

इसलिये मोक्षकी प्राप्तिके हेतु परब्रह्म परमात्माके चिन्तनमें चित्तको पूर्णरूपसे लगा दे। चन्द्रमण्डल अर्थात् मनके संस्थान ( ईशादिरूप ) का परित्याग करके महान् चान्द्र-ज्योति ( चैतन्यमय तेज ) में, जिसका स्थान हृदय है, प्रवेश करे । शीघ्र विघ्न आनेकी आशङ्कासे गायत्री अर्थात् सगुण ब्रह्मके नेत्रकी भाँति प्रकाशक विशुद्ध तेजके भीतर स्थित हो जाय, जो कि अव्यक्तकी उत्पत्तिका स्थान है। वह अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रारूपसे अथवा विश्व, तैजस, प्राज्ञ एवं तुरीयरूपसे चार भेदोंमें विभक्त पुरुषरूप है ॥

ब्रह्मतेजोमयोऽव्यक्तः शाश्वतोऽथ ध्रुवोऽव्ययः। न चेन्द्रियगुणैर्युक्तो युक्तस्तेजोगुणेन च ॥ ४६ ॥ चन्द्रांशुविमलप्रख्यो भ्राजिष्णुर्वर्णसंस्थितः ।

वह पुरुष ब्रह्मचैतन्यमय है । अव्यक्त अर्थात् इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिका अविषय है। नित्य, कूटस्थ और अव्यय ( विकाररहित ) है । इन्द्रियोंद्वारा गृहीत होनेवाले रूप आदि गुणोंसे रहित तथा तेजोगुणसे युक्त है । उसकी कान्ति चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल है। वह सदा सत्त्वरूपसे प्रकाशमान है तथा शरीरके आकारमें परिणत हुए लोहित शुक्ल आदि वर्णोंमें आविर्भूत होकर स्थित है ॥ ४६३ ॥

नेत्राभ्यां जनयद् देवो ऋग्वेदं यजुषा सह ॥ ४७ ॥ सामवेदं च जिह्वाग्रादथर्वाणं च मूर्धतः ।

उस प्रकाशमान देवताने अपने नेत्रोंसे ऋग्वेद और यजुर्वेदको प्रकट किया । जिह्वाके अग्रभागसे सामवेदको और मूर्धा ( ललाटप्रान्त ) से अथर्ववेदको प्रकट किया है ॥४७३॥

जातमात्रांस्तु ते वेदाः क्षेत्रं विन्दन्ति तत्त्वतः॥ ४८ ॥ तेन वेदत्वमापन्ना यस्माद् विन्दन्ति तत्पदम् ।

वे वेद प्रकट होते ही अपने-अपने क्षेत्रका तत्त्वतः वेदन ( उपलब्धि ) करते हैं, इसलिये उन्हे 'वेद' संज्ञा प्राप्त हुई है। वे उस ब्रह्मपदका वेदन ( लाभ ) करते हैं, इसलिये भी 'वेद' कहलाते हैं ॥ ४८३ ॥

ते सृजन्ति तदा वेदा ब्रह्म पूर्वं सनातनम् ॥ ४९ ॥ पुरुषं दिव्यरूपामं स्वैः स्वैर्भावैर्मनोभवैः ।

उस समय वे वेद पहले उस सनातन ब्रह्मको ही अपने-अपने मानसिक भावोंके अनुसार दिव्य रूप और आभासे युक्त विश्व, तैजस, प्राज्ञ एवं तुरीय पुरुष अथवा यज्ञपुरुषके रूपमें प्रकट करते हैं ॥ ४९३ ॥

अथर्वणस्तु यो योगः शीर्षं यज्ञस्य तत् स्मृतम् ॥ ५० ॥ ग्रीवायाहन्तरं चैव ऋग्भागः स भवेत् ततः । हृदयं चैव पार्श्वे च सामभागस्तु निर्मितः ॥ ५१ ॥ बस्तिशीर्षं कटीदेशं जङ्घोरुचरणैः सह । एवमेष यजुर्भागः संघातौ यक्षकल्पितः । पुरुषो दिव्यरूपामः सम्भूतो ह्यमरात् पदात् ॥ ५२ ॥

अथर्ववेदका जो योग है, वह यज्ञपुरुषका सिर माना गया है। जो ऋग्वेदका भाग है, वह उसकी ग्रीवा और भुजाओंके बीचका अङ्ग है । सामवेदके भागसे उस यज्ञपुरुषके हृदय और पार्श्वभागका निर्माण हुआ है। इसी तरह जो यह यजुर्वेदका भाग है, उसके द्वारा यज्ञपुरुषके पेडू और उसके ऊपरके