विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 820, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः [ ७९७
प्राप्त हुई वे मूर्तियाँ जब चेष्टा करना आरम्भ करती हैं, तब वे दसों दिशाओंको प्राप्त होती हैं ॥ २१ ॥
इत्येते पार्थिवाः सर्वे ऋषयो ब्रह्मनिर्मिताः ।
तत्रैव प्रलयं याता भूमित्वमुपयान्ति च ॥ २२ ॥
इस प्रकार स्थूल भूतोंसे उत्पन्न हुए समस्त ऋषि (व्यावहारिक पदार्थ) जिनका निर्माण उस योगीके द्वारा ही हुआ होता है, उसीमें लीन होकर अपने उपादान-कारणमें स्थित हो जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे मिट्टीका घड़ा फूटनेपर अपने उपादानकारण मिट्टीमें ही मिल जाता है ॥
कर्मक्षयाद् विमुच्यन्ते धातुभिः कर्मबन्धनैः ।
कर्मक्षयाद् विमुक्तत्वादिन्द्रियाणां च बन्धनात् ॥ २३ ॥
कर्मोंका क्षय होनेसे जीव कर्मबन्धनरूप धातुओंसे मुक्त हो जाते हैं। कर्मोंके क्षयसे धातुबन्धनसे मुक्ति मिल जानेके कारण वे इन्द्रियोंके बन्धनसे भी छूट जाते हैं ॥ २३ ॥
तामेव प्रकृतिं यान्ति अज्ञातां कर्मगोचरैः ।
क्षराद् धूमक्षयं चैव अग्निगर्भास्तपोमयाः ॥ २४ ॥
कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हुए जीव अपनी उसी प्रकृति (मूलस्थान परब्रह्मभाव) को प्राप्त होते हैं, जो कर्मबन्धनमें बँधे पुरुषोंके अनुभवसे परेकी वस्तु है। जो सकाम कर्मोंमें तत्पर रहते हैं, वे नाशवान् कर्म करनेके कारण धूमादि मार्गसे गन्तव्यस्थानको प्राप्त होते हैं (जहाँसे पुनरावृत्ति अवश्यम्भावी है)। उन सकामकर्मीयोंमें भी वे ही उस धूममार्गको प्राप्त होते हैं, जिन्होंने प्रधानतः अग्निहोत्र तथा कृच्छ्रचान्द्रायण आदि तपका अनुष्ठान किया है ॥ २४ ॥
येन तन्तुरिवाच्छिन्नो भावाभावः प्रवर्तते ।
धूमादभ्रास्तु सम्भूता अभ्रात् तोयं सुनिर्मलम् ॥ २५ ॥
जिस कर्मसे अविच्छिन्न तन्तुकी भाँति सदसद्रूप संसारकी प्राप्ति होती है, उस सकाम कर्मका अनुष्ठान करनेवाले लोग धूममार्गको ही प्राप्त होते हैं। धूमादिमार्गसे पितृलोकको गये हुए जीव कर्मक्षयके पश्चात् वहाँसे भ्रष्ट होनेपर आकाश आदि-के क्रमसे धूमभावको प्राप्त होकर, धूमसे मेघ होते हैं और मेघसे अत्यन्त निर्मल जलधाराके रूपमे पृथ्वीपर आकर अन्न एवं वीर्यके रूपमें परिणत हो पुनर्जन्म धारण करते हैं ॥ २५ ॥
जगती जलात् तु सम्भूता जगत्येव च यत्फलम्।
फलाद् रसस्तु संजज्ञे रसात् प्राणस्तु देहिनाम्॥ २६ ॥
पृथ्वी जलको पाकर फलसे संयुक्त होती है, उसका व्रीहि आदि फल पृथ्वीरूप ही है। फलसे रस उत्पन्न होता है और रससे देहधारियोंके प्राणकी पुष्टि होती है ॥ २६ ॥
रसश्च तन्मयो जज्ञे यत् तद् ब्रह्म सनातनम् ।
प्रधानं ब्रह्म चोद्दिष्टं बहुभिः कारणान्तरैः ।
ब्राह्मणैस्तपसि श्रान्तैः सत्यव्रतपरायणैः ॥ २७ ॥
रस रेत:स्वरूप है, जो चैतन्ययुक्त प्रकट हुआ है, जिसे सनातन ब्रह्म कहते हैं, वही वह चैतन्य है। तपस्यामें संलग्न होकर कष्ट सहन करनेवाले सत्यव्रतपरायण ब्राह्मणोंने बहुतेरे अन्य कारणों (युक्तियों) से एकमात्र ब्रह्मको ही प्रधान बताया है (ब्रह्मद्वारा ही देहादिमें चैतन्यभाव आता है) ॥
अव्यक्ताद् व्यक्तिमापन्नं स्वेन भावेन भारत ।
अन्तःस्थं सर्वभूतेषु चरन्तं विद्यया सह ॥ २८ ॥
भारत ! वह ब्रह्म अपने सस्वरूपसे ही अव्यक्तसे व्यक्त भावको प्राप्त होता है। वही समस्त प्राणियोंके भीतर अन्तर्यामी-रूपसे विद्यमान है और विद्याके द्वारा प्रकाशित होता है, ऐसा जाने ॥ २८ ॥
कर्म कर्तेति राजेन्द्र विषयस्थमनेकधा ।
नोपलभ्येत चक्षुर्भ्यां तपसा दग्धकिल्विषैः ॥ २९ ॥
उपलभ्येत चक्षुर्भ्यां ज्ञानभिर्ब्रह्मवादिभिः ।
निःसृतस्तु भ्रुवोर्मध्यान्मेघमुक्त इवांशुमान् ॥ ३० ॥
राजेन्द्र ! कर्म (दृश्य) और कर्ता (साभास अहङ्कार)-ये दोनों विषयकोटिमें ही हैं (विषयातीत चिदात्मामें नहीं)। दृश्य अनेक रूपोंमें भासमान होनेपर भी मायानगरकी भाँति वास्तवमें नेत्रोंद्वारा उपलब्ध नहीं होता, तपस्याद्वारा जिनके पाप दग्ध हो गये हैं, उन ब्रह्मवादी ज्ञानी पुरुषोंको उसके वास्तविक स्वरूपकी उपलब्धि होती है (वे यह जान लेते हैं, कि जैसे सुवर्ण ही कुण्डल आदिके रूपमें प्रतीत होता है, उसी प्रकार ब्रह्म ही कर्ता-कर्म आदि विविध रूपोंमें प्रकाशित होता है), जैसे मेघोंके आवरणसे मुक्त हुआ सूर्य प्रकाशित होता है, उसी प्रकार नेत्रोंको भौंहोंके मध्यभागमें संयोजित करके ध्यान लगानेपर वह ब्रह्म वहाँ आविर्भूत हुआ दिखायी देता है ॥ २९-३० ॥
चरद्भिः पक्षिवल्लोके निर्द्वन्द्वैर्निष्परिग्रहैः ।
योगधर्मेण कौरव्य ध्रुवमासाद्यते फलम् ॥ ३१ ॥
कुरुनन्दन ! जो लोग जगत्में पक्षीकी भाँति असङ्ग, निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य होकर विचरते हैं, वे ही योगधर्मके द्वारा (ब्रह्मदर्शनरूप) अविनाशी फलको प्राप्त करते हैं ॥
प्रादुर्भावं क्षयं चैव भूतस्य निधनं तथा ।
विधत्ते शतशो ब्रह्मा संक्षये च भवेत् तदा ॥ ३२ ॥
वह ब्रह्मवेत्ता पुरुष सृष्टि और संहारके समय सैकड़ों बार समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, उन्हें ऐश्वर्य प्रदान तथा उनका संहार करता है ॥ ३२ ॥
कर्मणः कर्म योगज्ञो भूतेभ्यो नात्र संशयः ।
अविनाशाय लोकस्य धर्मस्याप्यायनेन च ॥ ३३ ॥
योगवेत्ता पुरुष प्राणियोंको योगादि कर्मका फल (सुख) वितरण करता है, इसमें संदेह नहीं है। वह धर्मका पोषण