भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 821
७९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करके जगत्‌की रक्षाके लिये ही ऐसा करता है (तात्पर्य यह है कि उस ब्रह्मभूत योगीकी प्रीतिके लिये ही धर्म किया जाता है और वही प्रसन्न होकर जगत्‌की रक्षा करता है) ॥

युगं द्वादशसाहस्रं सहस्रयुगसंहितम् ।
एतद् ब्रह्मयुगं नाम युगानां प्रथमं युगम् ॥ ३४ ॥

बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग होता है। सहस्र चतुर्युगका जो समय है, इसीका नाम ब्रह्मयुग है, जो युगोंमें प्रधान युग (कल्प) कहा गया है ॥ ३४ ॥

सहस्रयुगयोरन्ते संहारः प्रलयान्तकृत् ।
सूक्ष्मं भवति लोकानां निर्विकारमचेतनम् ॥ ३५ ॥

एक सहस्रयुगके अन्तमें ब्रह्माके दिनकी समाप्ति होती है, जिसमें संहार (कल्पका अन्त) होता है और दूसरे सहस्र युगके अन्तमें उनकी रात्रिका अवसान होता है, जो प्रलयका अन्त अर्थात् कल्पका आरम्भ करनेवाला है। संहारकालमें लोकोंका स्वरूप सूक्ष्म, निर्विकार एवं अचेतन होता है ॥

तथा प्रलयमापन्नं जगत् सर्वं सनातनम् ।
ब्रह्म सम्पद्यते सूक्ष्मं निर्मितं कारणैर्गुणैः ॥ ३६ ॥

कारणभूत सत्त्वादि गुणोंसे निर्मित हुआ यह जगत् प्रलयको प्राप्त होनेपर सूक्ष्मरूप होकर ब्रह्ममें स्थित हो जाता है ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥


एकोनविंशोऽध्यायः

योगीकी स्थिति तथा उसके समक्ष आनेवाले विघ्नरूप ऐश्वर्योंका वर्णन

जनमेजय उवाच
प्राग्वंशं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण महामुने।
आद्ययोर्युगयोर्ब्रह्मन् ब्रह्मप्राप्तस्य सर्वशः ॥ १ ॥

**जनमेजयन‍े कहा—**ब्रह्मन्! महामुने! दोनों आदि युगोंमें ब्रह्मभावको प्राप्त हुए योगी ब्रह्माकी पहले जो कार्य-संतति रही है, उसका मैं पूर्णतः विस्तारके साथ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
शृणु विस्तरशः सर्वं यन्मां पृच्छसि मेधया ।
उपपन्नेन मनसा दैवप्रत्ययसाधिना ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! तुम बुद्धिके द्वारा मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब दिव्य ज्ञानकी प्राप्तिके साधनमें लगे हुए अपने योगयुक्त मनके द्वारा विस्तारपूर्वक सुनो ॥ २ ॥

ऋद्धिं प्राप्तस्तु भगवान् योगात्मा ब्रह्मसम्भवः ।
भूतानां बहुलत्वं च चकारेहेश्वरः प्रभुः ॥ ३ ॥
स्थितो ब्रह्मासने ब्रह्मा विक्षिप्तः सहसा प्रभुः ।
अचलेनैव भावेन स्थाणुभूतेन भारत ॥ ४ ॥

भारत! जिनका मन योगमें लगा हुआ था, जो साक्षात् परब्रह्म परमात्मासे उत्पन्न हुए थे, जिनमें करने, न करने और अन्यथा करनेकी शक्ति है तथा जो अत्यन्त प्रभावशाली हैं, वे भगवान् ब्रह्मा जब समृद्धिको प्राप्त होकर ठूंठकी भाँति अविचल भावसे ब्रह्मासनपर विराजमान हुए, उस समय सहसा रजोगुणने उन्हें विक्षिप्त कर दिया। अतः उन्होंने सृष्टि-रचनाद्वारा यहाँ भूतोंका बाहुल्य (विस्तार) किया ॥ ३-४ ॥

रक्तश्च मोक्षविषये स च ज्ञानमये पदे ।
यस्मात् पदसहस्राणि प्रभवन्ति भवन्ति च ॥ ५ ॥

वे मोक्ष ही जिसका लक्ष्य है, उस ज्ञानमय पदमें अनुरक्त थे, जिससे सहस्रों सामर्थ्यशाली पद प्रकट होते हैं (जैसे सौभरि अथवा कर्दम ऋषिने अपनी योगशक्ति-के प्रभावसे अनेकानेक वस्तुओंकी रचना की थी।) ॥ ५ ॥

ब्रह्मयज्ञं तु यजते योगाद् वेदात्मकं सदा ।
ब्रह्मणो विपुलं ज्ञानमैश्वर्यं च प्रवर्तते ॥ ६ ॥

ब्रह्माजी योगयुक्त हो सदा वेदात्मक ब्रह्मयज्ञका अनुष्ठान करते हैं (अथवा वेदप्रतिपाद्य ब्रह्मरूप यज्ञ-विष्णुका यजन करते हैं), इसलिये उस योग एवं यजनके प्रभावसे उन्हें विपुल ज्ञान और ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥

ततः प्रथममैश्वर्यं युञ्जानस्य प्रवर्तितम् ।
ब्रह्मणा ब्रह्मभूतेन भूतानां हितमिच्छता ॥ ७ ॥

फिर योगयुक्त एवं ब्रह्मभूत हुए ब्रह्माने समस्त प्राणियोंके हितकी इच्छा रखकर उस प्रथम प्राप्त हुए ऐश्वर्यका उन्हींकी भलाईके लिये उपयोग किया ॥ ७ ॥

तदा त्वाकाशमैश्वर्यं युञ्जानस्य प्रवर्तते ।
ब्रह्मणो ब्रह्मभूतस्य निर्विकारेण कर्मणा ॥ ८ ॥

उस निर्विकार (परम शुद्ध) कर्मद्वारा योगपरायण ब्रह्मभूत ब्रह्माको उस समय आकाशस्वरूप (अव्याकृत) ऐश्वर्य प्राप्त हुआ ॥ ८ ॥

तदान्तरिक्षं सम्प्राप्तं निर्मलं ब्रह्म चाव्ययम् ।
संहारः सर्वभूतानां नराणां ब्रह्मवादिनाम् ।
ध्रुवमैश्वर्ययोगानां प्रतिपद्यन्ति देहिनः ॥ ९ ॥