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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
७९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करके जगत्‌की रक्षाके लिये ही ऐसा करता है (तात्पर्य यह है कि उस ब्रह्मभूत योगीकी प्रीतिके लिये ही धर्म किया जाता है और वही प्रसन्न होकर जगत्‌की रक्षा करता है) ॥

युगं द्वादशसाहस्रं सहस्रयुगसंहितम् ।
एतद् ब्रह्मयुगं नाम युगानां प्रथमं युगम् ॥ ३४ ॥

बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग होता है। सहस्र चतुर्युगका जो समय है, इसीका नाम ब्रह्मयुग है, जो युगोंमें प्रधान युग (कल्प) कहा गया है ॥ ३४ ॥

सहस्रयुगयोरन्ते संहारः प्रलयान्तकृत् ।
सूक्ष्मं भवति लोकानां निर्विकारमचेतनम् ॥ ३५ ॥

एक सहस्रयुगके अन्तमें ब्रह्माके दिनकी समाप्ति होती है, जिसमें संहार (कल्पका अन्त) होता है और दूसरे सहस्र युगके अन्तमें उनकी रात्रिका अवसान होता है, जो प्रलयका अन्त अर्थात् कल्पका आरम्भ करनेवाला है। संहारकालमें लोकोंका स्वरूप सूक्ष्म, निर्विकार एवं अचेतन होता है ॥

तथा प्रलयमापन्नं जगत् सर्वं सनातनम् ।
ब्रह्म सम्पद्यते सूक्ष्मं निर्मितं कारणैर्गुणैः ॥ ३६ ॥

कारणभूत सत्त्वादि गुणोंसे निर्मित हुआ यह जगत् प्रलयको प्राप्त होनेपर सूक्ष्मरूप होकर ब्रह्ममें स्थित हो जाता है ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥


एकोनविंशोऽध्यायः

योगीकी स्थिति तथा उसके समक्ष आनेवाले विघ्नरूप ऐश्वर्योंका वर्णन

जनमेजय उवाच
प्राग्वंशं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण महामुने।
आद्ययोर्युगयोर्ब्रह्मन् ब्रह्मप्राप्तस्य सर्वशः ॥ १ ॥

**जनमेजयन‍े कहा—**ब्रह्मन्! महामुने! दोनों आदि युगोंमें ब्रह्मभावको प्राप्त हुए योगी ब्रह्माकी पहले जो कार्य-संतति रही है, उसका मैं पूर्णतः विस्तारके साथ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
शृणु विस्तरशः सर्वं यन्मां पृच्छसि मेधया ।
उपपन्नेन मनसा दैवप्रत्ययसाधिना ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! तुम बुद्धिके द्वारा मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब दिव्य ज्ञानकी प्राप्तिके साधनमें लगे हुए अपने योगयुक्त मनके द्वारा विस्तारपूर्वक सुनो ॥ २ ॥

ऋद्धिं प्राप्तस्तु भगवान् योगात्मा ब्रह्मसम्भवः ।
भूतानां बहुलत्वं च चकारेहेश्वरः प्रभुः ॥ ३ ॥
स्थितो ब्रह्मासने ब्रह्मा विक्षिप्तः सहसा प्रभुः ।
अचलेनैव भावेन स्थाणुभूतेन भारत ॥ ४ ॥

भारत! जिनका मन योगमें लगा हुआ था, जो साक्षात् परब्रह्म परमात्मासे उत्पन्न हुए थे, जिनमें करने, न करने और अन्यथा करनेकी शक्ति है तथा जो अत्यन्त प्रभावशाली हैं, वे भगवान् ब्रह्मा जब समृद्धिको प्राप्त होकर ठूंठकी भाँति अविचल भावसे ब्रह्मासनपर विराजमान हुए, उस समय सहसा रजोगुणने उन्हें विक्षिप्त कर दिया। अतः उन्होंने सृष्टि-रचनाद्वारा यहाँ भूतोंका बाहुल्य (विस्तार) किया ॥ ३-४ ॥

रक्तश्च मोक्षविषये स च ज्ञानमये पदे ।
यस्मात् पदसहस्राणि प्रभवन्ति भवन्ति च ॥ ५ ॥

वे मोक्ष ही जिसका लक्ष्य है, उस ज्ञानमय पदमें अनुरक्त थे, जिससे सहस्रों सामर्थ्यशाली पद प्रकट होते हैं (जैसे सौभरि अथवा कर्दम ऋषिने अपनी योगशक्ति-के प्रभावसे अनेकानेक वस्तुओंकी रचना की थी।) ॥ ५ ॥

ब्रह्मयज्ञं तु यजते योगाद् वेदात्मकं सदा ।
ब्रह्मणो विपुलं ज्ञानमैश्वर्यं च प्रवर्तते ॥ ६ ॥

ब्रह्माजी योगयुक्त हो सदा वेदात्मक ब्रह्मयज्ञका अनुष्ठान करते हैं (अथवा वेदप्रतिपाद्य ब्रह्मरूप यज्ञ-विष्णुका यजन करते हैं), इसलिये उस योग एवं यजनके प्रभावसे उन्हें विपुल ज्ञान और ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥

ततः प्रथममैश्वर्यं युञ्जानस्य प्रवर्तितम् ।
ब्रह्मणा ब्रह्मभूतेन भूतानां हितमिच्छता ॥ ७ ॥

फिर योगयुक्त एवं ब्रह्मभूत हुए ब्रह्माने समस्त प्राणियोंके हितकी इच्छा रखकर उस प्रथम प्राप्त हुए ऐश्वर्यका उन्हींकी भलाईके लिये उपयोग किया ॥ ७ ॥

तदा त्वाकाशमैश्वर्यं युञ्जानस्य प्रवर्तते ।
ब्रह्मणो ब्रह्मभूतस्य निर्विकारेण कर्मणा ॥ ८ ॥

उस निर्विकार (परम शुद्ध) कर्मद्वारा योगपरायण ब्रह्मभूत ब्रह्माको उस समय आकाशस्वरूप (अव्याकृत) ऐश्वर्य प्राप्त हुआ ॥ ८ ॥

तदान्तरिक्षं सम्प्राप्तं निर्मलं ब्रह्म चाव्ययम् ।
संहारः सर्वभूतानां नराणां ब्रह्मवादिनाम् ।
ध्रुवमैश्वर्ययोगानां प्रतिपद्यन्ति देहिनः ॥ ९ ॥

भविष्यपर्व ]एकोनविंशोऽध्यायः७९९

उस समय उनकी दृष्टिमें सारा आकाश निर्मल एवं अविनाशी ब्रह्मभावको प्राप्त हो गया। उस अवस्थामें समस्त ज्ञानवान् मनुष्य यह जान लेते हैं कि समस्त प्राणियों, मनुष्यों तथा ऐश्वर्ययुक्त ब्रह्मवादी योगियोंका भी लयस्थान कूटस्थ ब्रह्म ही है ॥ ९ ॥

आकाशैश्वर्यभूतेन संयुगे ब्रह्मवादिना ।
प्रवर्तमानमैश्वर्यं वायुभूतं करोति च ।
विकारैर्बहुभिः प्राप्तैः सम्पतद्भिर्महाबलैः ॥ १० ॥

उस योगयज्ञमें संलग्न हो आकाशरूप अथवा अव्याकृत ऐश्वर्यको प्राप्त हुए ब्रह्मवादी ब्रह्माके रूपमें प्रवृत्तिपरायण हुआ ब्रह्म सब ओरसे आकर प्राप्त होनेवाले बहुसंख्यक महाबली विकारोंके साथ वायुरूप अथवा व्याकृत ऐश्वर्यको प्रकट करता है ॥ १० ॥

एतैर्विकारैः संवृत्तैर्निरुद्धैश्च समन्ततः ।
ध्रुवमैश्वर्यमापन्नः सिद्धो भवति ब्राह्मणः ॥ ११ ॥

इन प्राप्त होनेवाले समस्त विकारोंके सब ओरसे अवरुद्ध हो जानेपर सिद्ध हुआ ब्रह्मवेत्ता योगी ध्रुव ऐश्वर्य (कूटस्थ-ब्रह्म) को प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥

शरीरादभिनिष्क्रम्य आकाशेन प्रधावति ।
निरालम्बो निरालम्बान्नालम्ब्य मनसा ततः ॥ १२ ॥
ऐश्वर्यभूतो भूतात्मा चरन् दिवि न दृश्यते ।
चक्षुर्भिर्बहुभिर्लोकैः पुरंदरसमैरपि ॥ १३ ॥

वह सिद्ध योगी शरीरसे निकलकर बिना किसी अवलम्बके आकाशमें दौड़ता है, स्वप्नसदृश मनःकल्पित निरालम्ब भावोंका आश्रय लेकर वहाँ विचरता है। ब्रह्मैश्वर्यसे सम्पन्न हुए उस भूतात्मा योगीको आकाशमें विचरते समय इन्द्र-जैसे लोग भी अपने बहुसंख्यक नेत्रोंद्वारा भी नहीं देख पाते हैं ॥ १२-१३ ॥

ओंकारं ये त्वधीयन्ते मनसा ब्रह्मसत्तमाः ।
विमुक्ताः सर्वकर्मभ्यस्ते तं पश्यन्ति साधवः ॥ १४ ॥

जो ब्राह्मणशिरोमणि साधु मनके द्वारा ॐकारका चिन्तन करते हैं, वे ही समस्त कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो उस (ब्रह्मीभूत आकाशचारी) योगीका दर्शन कर पाते हैं ॥

एतद्धि परमं ब्रह्म ब्राह्मणानां मनीषिणाम् ।
अन्तश्चरति भूतानां विद्धि चेतनया सह ॥ १५ ॥

राजन् ! यह ॐकार प्रणवसंज्ञक परब्रह्म है, जो मनीषी ब्राह्मणोंके चिन्तनका विषय है । वह प्रणववाच्य परब्रह्म परमात्मा समस्त प्राणियोंके भीतर उनकी चेतनाके साथ विचरता है, ऐसा जानो ॥ १५ ॥

एष शब्दो महानादः पुराणो ब्रह्मसम्भवः ।
वायुभूतोऽक्षरं प्राप्तो वदन्त्येवं द्विजातयः ॥ १६ ॥

यह ॐकार समस्त वर्णोंका अभिव्यञ्जक होनेसे महानाद है, पुराण अर्थात् नित्य है, इसका अवलम्बन करनेसे साधककी ब्रह्मके साथ एकता हो जाती है । यह वायुभूत होकर अक्षरभावको प्राप्त हुआ है—ऐसा द्विजाति (ब्राह्मण) कहते हैं ॥ १६ ॥

अरूपी रूपसम्पन्नो धातुभिः सह संगतः ।
अन्तश्चरति भूतेषु कामकारकरो वशी ॥ १७ ॥

यह प्रणव रूपरहित होकर भी तेज, जल और अन्न—इन तीन धातुओंसे संयुक्त हो* रूपसे सम्पन्न (अर्थात् वैखरी वाणीके रूपमें प्रकट) होता है। यही जीवात्मारूपसे समस्त प्राणियोंके भीतर विचरता, इच्छानुसार काम करता और समस्त इन्द्रियोंको अपने वशमें रखता है ॥ १७ ॥

एतत् पूर्वमनुध्याय मनसाऽऽपूरयन्निव ।
वेदात्मकं तदा यज्ञं चिन्तयन्तो मनीषिणः ॥ १८ ॥

पूर्वकालमें इस प्रणवका शास्त्र और आचार्यसे उपदेश पाकर इसके निरन्तर चिन्तनपूर्वक वेदात्मक यश (योग) की भावना करते हुए मनीषी पुरुषोंने अपने मनके द्वारा सबको व्याप्त कर लिया था ॥ १८ ॥

ब्राह्मणाः शुचयो दान्ता यशोयुक्तास्तदन्वयाः ।
ब्रह्मलोकं काङ्क्षमाणा वैष्णवं पदमुत्तमम् ॥ १९ ॥
पदहेतोः क्रियाः सर्वाः कुर्वन्ति विगतज्वराः ।
न ह्येते प्रसवस्थाने भवमिच्छन्ति भारत ॥ २० ॥

यशःस्वरूप ब्रह्मसे युक्त तथा उस ब्रह्मसे ही प्रकट हुए पवित्र जितेन्द्रिय ब्राह्मण ब्रह्मलोक एवं उत्तम वैष्णवपदकी इच्छा रखकर उस पदकी प्राप्तिके लिये ही निश्चिन्तभावसे सारी क्रियाएँ करते हैं । भारत ! ये पुनर्जन्म ग्रहण करनेके लिये नहीं संसारमें आना चाहते हैं, अपितु ज्ञानकी प्राप्तिके लिये ही यहाँ जन्म पानेकी इच्छा करते हैं ॥ १९-२० ॥

त्रिभिर्मात्योपहारैश्च प्रतिभावेन वै द्विजाः ।
यजन्ति परमात्मानं विष्णुं सत्यपराक्रमम् ॥ २१ ॥

वे द्विजगण (प्रातः, मध्याह्न और सायंकालमें) तीन बार माल्योपहार समर्पण तथा प्रतिभाव (ध्यान) के द्वारा उन सत्यपराक्रमी परमात्मा श्रीविष्णुका यजन करते हैं ॥२१॥

यजनं विक्रमं चैव ब्रह्मपूर्वाः प्रचक्रिरे ।
ब्रह्मापि वैष्णवं तेजो वेदोक्तैर्वचनैर्नृप ॥ २२ ॥


* श्रुति कहती है—अन्नमयं हि सोम्य मनः, आपोमयः प्राणः, तेजोमयी वाक् (मन अन्नमय, प्राण जलमय तथा वाक् तेजोमयी है)। इसके सिवा 'मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम्' इत्यादि शिक्षाके वचनसे शब्दकी उत्पत्तिमें मन और प्राणका भी सहयोग अपेक्षित है। अतः तेज, जल और अन्न-इन तीन धातुओंके सहयोगसे ही शब्द प्रकट होता है।

८०० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


नरेश्वर ! वेदको ही प्रमुख प्रमाण मानते हुए उन ब्रह्मवेत्ता योगियोंने यजन (योगाभ्यास) और विक्रम (योगैश्वर्यलाभ) किया। वेदोक्त वचनोंके अनुसार ब्रह्मवेत्ता योगी भी वैष्णवतेज (ब्रह्म) ही है॥ २२॥

ब्राह्मणैर्ब्रह्मविद्भिश्च ब्रह्मज्ञैर्ब्रह्मवादिभिः।
शुचिभिः कर्मनिर्मुक्तैः सत्यव्रतपरायणैः॥ २३॥
धातुभिर्मोक्षकाले च महात्मा सम्प्रदृश्यते।

जो ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मज्ञ, ब्रह्मवादी, कर्मोंके बन्धनसे मुक्त, पवित्र एवं सत्यव्रतपरायण ब्राह्मण हैं, वे ही तेज, जल और अन्नरूप धातुओंसे मोक्षकालमें उस परमात्मस्वरूप महात्माका दर्शन करते हैं॥ २३½॥

तदेव परमं ब्रह्म वैष्णवं परमाद्भुतम्॥ २४॥
रसात्मकं तदैश्वर्यं विकारान्ते प्रदृश्यते।

वह परमात्मा ही परब्रह्म है, वही परम अद्भुत वैष्णव तेज है तथा वही रसात्मक (परमानन्दस्वरूप) ऐश्वर्य है। पूर्वोक्त विकारोंका विलय हो जानेपर ही उसका दर्शन होता है॥ २४½॥

घोररूपा विकारास्ते व्यथयन्ति महात्मनः॥ २५॥
संछाद्यातीव तोयेन क्षुभ्यमाणो विचेतनः।
ऊर्मिभिश्चाद्यते चैव शीतोष्णाभिर्विकारतः॥ २६॥

भयंकर रूपवाले जो तामस विकार हैं, वे उस महात्मा योगीको व्यथित करते हैं। वे विकार उसे अत्यन्त जलसे आच्छादित करके घबराहटमें डाल देते हैं। वह क्षुब्ध एवं अचेत हो जाता है। बहुत-सी लहरें उसे आच्छादित कर लेती हैं, उनमेंसे कुछ तो शीतल होती हैं और कुछ उष्ण; इस प्रकार वह विकारग्रस्त हो जाता है॥ २५-२६॥

महार्णवगतश्चैव दह्यते न च मज्जते।
मग्नश्चैव महानद्याः सलिले नैव सीदति॥ २७॥
सीदमानश्च सलिले स शीते पात्यते बलात्।
आसनाच्छादनाच्चैव मुच्यमानो विचेतनः॥ २८॥

वह महासागरमें पड़कर दग्ध होने लगता है, किंतु उसमें डूबता नहीं है। कभी-कभी महानदीके जलमें डूब जाता है, परंतु जलके भीतर वह अधिक कष्ट नहीं पाता है और कभी-कभी जब वह जलमें कष्ट पाता है, तब उसे बलपूर्वक अधिक शीतल जलमें गिरा दिया जाता है। आसन और आच्छादनसे भी वञ्चित होकर वह अचेत-सा हो जाता है॥ २७-२८॥


श्वभ्रे प्रपद्यमानश्च तोयेन परिषिच्यते।
शुक्लवर्णेन बहुना स्रोतसा मूर्ध्नि सर्वशः॥ २९॥

कभी गड्ढेमें गिरकर जलसे भीग जाता है। उसके मस्तकपर चारों ओरसे जलके बहुत-से श्वेत प्रवाह गिरने लगते हैं॥ २९॥

ऊर्ध्वं ज्योतिरवेक्षंश्च शुक्लैः पीतैश्च बाध्यते।
वारिपूर्णैः सुगम्भीरैर्विद्युद्भिरेव भासितैः॥ ३०॥

वह ऊपर ज्योतिका दर्शन करता है और जलसे भरे हुए अत्यन्त गम्भीर श्वेत और पीत रंगके बादल जो बिजलियोंसे उद्भासितसे होते रहते हैं, उसे पग-पगपर बाधा देने लगते हैं॥ ३०॥

एतैर्विकारैः संवृत्तैर्निरुद्धैश्चैव सर्वशः।
ध्रुवमैश्वर्यमासाद्य सिद्धो भवति ब्राह्मणः॥ ३१॥

इन विकारोंके प्राप्त होने और सब प्रकारसे इनका निरोध हो जानेपर अटल ब्रह्मैश्वर्यको पाकर वह ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता योगी) सिद्ध हो जाता है॥ ३१॥

रसात्मकं तदैश्वर्यं जिह्वाग्रादभिनिःसृतम्।
सहस्रधारं विततं मेघत्वं समुपागतम्॥ ३२॥

उसके रसास्वादसे अनेक प्रकारका रसात्मक ऐश्वर्य प्रकट होता है, जो सहस्र धाराओंमें फैलकर मेघरूपमें परिणत हो जाता है॥ ३२॥

रसांश्च विविधान् योगात् संसिद्धः सृजते प्रभुः।
धात्वर्थं सर्वभूतानां योगप्राप्तेन हेतुना॥ ३३॥

वह सामर्थ्यशाली सिद्ध योगी योगसे नाना प्रकारके रसोंकी सृष्टि करता है तथा योगप्राप्त हेतुसे समस्त प्राणियोंके शरीरके उपयोगके लिये विविध ऐश्वर्यको प्रकट करता है॥

तेजसो रूपमैश्वर्यं विकारैः सह वर्धते।
आत्मनो विघ्नजननं स्वस्थो ब्राह्मणकारणे॥ ३४॥

ब्रह्मवेत्ता योगीके मोक्षसाधन योगमें उसके स्वस्थ आत्माके समक्ष विघ्न उपस्थित करनेके लिये तैजस रूपैश्वर्य प्रकट होकर अपने विकारोंके साथ वृद्धिको प्राप्त होता है॥ ३४॥

उग्ररूपैर्विरूपैश्च हन्यते दण्डपाणिभिः।
घोररूपैः सुगम्भीरैः पिङ्गाक्षैर्नरविग्रहैः॥ ३५॥

उग्र, घोर एवं विकराल रूपवाले, गम्भीर एवं पिङ्गल-नेत्रोंसे युक्त नराकार प्राणी हाथमें डंडे लेकर उस योगीको पीटने लगते हैं॥ ३५॥

नेत्रं समुद्धरन् भीमो जिह्वाग्रं चास्य विन्दति।
नदन्ति युगपन्नादं जृम्भमाणाः पुनः पुनः॥ ३६॥

कोई भयानक पुरुष उसके नेत्र उखाड़ने लगता है, कोई उसकी जिह्वाके टुकड़े-टुकड़े कर डालता है तथा बहुत-


१. 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति (ब्रह्मवेत्ता योगी ब्रह्म होता हुआ ही ब्रह्मको प्राप्त होता है ।)' इत्यादि वचन ही ब्रह्मवेत्ताके ब्रह्मरूप होनेमें प्रमाण हैं।

भविष्यपर्व ] एकोनविंशोऽध्यायः ८०१

से विघ्नकारी पुरुष बारं-बार जँभाई लेते हुए एक साथ जोर-जोरसे कोलाहल करने लगते हैं ॥ ३६ ॥

पुनरेव तदा भूत्वा बहुरूपास्तदाभवन् । नृत्यमानाः प्रगायन्ति तर्पयन्तो विशेषतः ॥ ३७ ॥

फिर वे तत्काल ही बहुत-से रूप धारण कर लेते हैं और उस योगी पुरुषको विशेष संतुष्ट करनेके लिये नाचने-गाने लगते हैं ॥ ३७ ॥

स्त्रीभूताश्च ततः सर्वे युञ्जानाश्चावलम्बिरे । कण्ठेऽस्य बहुरूपत्वाद् विघ्नैश्चैव प्रलोभयन् ॥ ३८ ॥

तदनन्तर वे सब-के-सब स्त्रियोंके रूप धारणकर योगीसे संयुक्त हो जाते और उसके गलेमें लिपटने या लटकने लगते हैं। वे अनेक रूप धारण करनेके कारण उसे नाना विघ्नोंद्वारा ही प्रलोभनमें डालते हैं ॥ ३८ ॥

मधुरैरभिधानैश्च व्याहरन्ति न भीतवत् । पतन्ति युगपत् सर्वे पादयोर्मूर्धभिर्युताः ॥ ३९ ॥

वे स्त्रीरूपधारी विघ्न निडर-से होकर मधुरवाणीमें नाम ले-लेकर उसे पुकारते हैं और सभी एक साथ योगीके चरणोंमें मस्तक रखकर उसे प्रणाम करते हैं ॥ ३९ ॥

प्रसादं काङ्क्षमाणाश्च योगस्यान्तरविघ्नतः । बहुप्रकारं कथयन् नृत्यन्ति च तरन्ति च ॥ ४० ॥

वे योगमें विघ्न उपस्थित करनेके लिये ही उस योगीका कृपाप्रसाद चाहते हैं। उससे अनेक प्रकारकी बातें करते और नाचते हैं। ऐसा करके वे कभी-कभी योगीको जीत भी लेते हैं ॥ ४० ॥

एतैर्विकारैः संवृत्तैर्निरुद्धैश्चैव सर्वशः । ध्रुवमैश्वर्यमासाद्य सिद्धो भवति ब्राह्मणः ॥ ४१ ॥

इन विकारोंके प्राप्त होने और इन सबका पूर्णरूपसे निरोध हो जानेपर अटल ऐश्वर्यको पाकर वह ब्रह्मवेत्ता योगी सिद्ध हो जाता है ॥ ४१ ॥

तदर्चिष इवाग्नेया आदित्यस्येव रश्मयः । तेजोरूपकमैश्वर्यं जनितास्तेजविन्दवः ॥ ४२ ॥

तदनन्तर अग्निकी लपटों और सूर्यकी किरणोंके समान उसे तेजोरूप ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। फिर तो उसके शरीरसे तेजोबिन्दु प्रकट होने लगती हैं ॥ ४२ ॥

ज्योतींषि चैव संवृत्ता आकाशे गुणसंवृताः । चरन्ति लोके सततं सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम् ॥ ४३ ॥

सत्त्वादि गुणोंसे घिरे हुए वे योगी आकाशमें ज्योतिःस्वरूप होकर लोकमें सदा ही चन्द्रमा और सूर्यके मार्गपर विचरते हैं ॥ ४३ ॥

चन्द्रसूर्यात्मकं दिव्यं ज्योतिः सघनमुत्तमम् । एतद् विभाजते लोके कालचक्रं ध्रुवं वरम् ॥ ४४ ॥

चन्द्रसूर्य-स्वरूप होकर मेघमण्डलसहित उत्तम दिव्य ज्योति कालचक्र एवं श्रेष्ठ ध्रुवस्थानमें विचरता हुआ वह वही-वही रूप धारण करके इस लोकमें प्रकाशित होता है ॥ ४४ ॥

अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतुसंवत्सराण्यता । क्षणा लवा मुहूर्ताश्च कलाः काष्ठास्तथैव च ॥ ४५ ॥ अहोरात्रप्रमाणं च निमिषोन्मेषणं तथा । ताराणां गतयश्चैव ग्रहाणां च विशेषतः ॥ ४६ ॥

यह योगी ही पक्ष, मास, ऋतु, संवत्सर, क्षण, लव, मुहूर्त, कला, काष्ठा, दिन-रात्रिका प्रमाण, निमेष, उन्मेष, ताराओं तथा विशेषतः ग्रहोंकी गति इत्यादि सब कुछ हो जाता है ॥ ४५-४६ ॥

अथ पार्थिवमैश्वर्यं विकारग्रहसम्भवम् । योगयुक्तास्त्वभिग्रस्ताः पात्यन्ते ह्यचलासनात् ॥ ४७ ॥

तदनन्तर विकारोंको स्वीकार करनेके कारण योगीको पार्थिव ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है, उससे ग्रस्त हुए योगी सिद्धिके अविचल सिंहासनसे नीचे गिरा दिये जाते हैं ॥ ४७ ॥

अलोभाच्छिद्यते सद्यो वेपमानोऽनुकीर्त्यते । सीदते वसुधामध्ये भिद्यमानः पुनः पुनः ॥ ४८ ॥

लोभका त्याग करनेसे वह विघ्नस्वरूप ऐश्वर्य तत्काल छिन्न-भिन्न हो जाता है; विघ्नसे काँपने और डरनेवाला योगी जगत्‌में निन्दनीय होता है। वह भूमण्डलमें बारंबार विघ्नोंसे आहत होकर कष्ट पाता रहता है ॥ ४८ ॥

भूतानां बहुरूपैश्च अन्यैश्च तलवासिभिः । विषयैर्युज्यते क्षिप्रं संक्षेपात् समवरुध्यते ॥ ४९ ॥

प्राणियोंके बहुत-से रूपों तथा भूतलवासी अन्य विषयोंसे वह शीघ्र ही सम्बन्ध स्थापित कर लेता है तथा उनके द्वारा विक्षेपमें पड़कर उसकी प्रगति रुक जाती है ॥ ४९ ॥

ततः पार्थिवमैश्वर्यं सेवमानश्च सर्वतः । मूर्तिमद्भिborder-width:0;श्च बहुधा धातुभिः स च हन्यते ॥ ५० ॥

तदनन्तर पार्थिव ऐश्वर्यका सेवन करता हुआ वह योगी पुरुष सब ओरसे मूर्तिमान् पार्थिव धातुओं‌द्वारा बारंबार मारा जाता है ॥ ५० ॥

शक्तितोमरनिख्रिंशैर्गदाभिश्चाप्यनेकधा । असिभिः पात्यते चैव क्षुरधारैः सहस्रशः ॥ ५१ ॥

शक्ति, तोमर, तलवार, गदा तथा छुरेकी-सी धारवाले सहस्रों खड्गोंद्वारा वह अनेकों बार धराशायी किया जाता है ॥ ५१ ॥

म० ह० २६-

८०२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

भिद्यते चैव बाणाग्रैः सुतीक्ष्णैर्मर्मभेदिभिः।
षड्भिर्विकारैर्निर्वृत्तैर्निरुद्धैश्चैव सर्वशः ॥ ५२ ॥
ध्रुवमैश्वर्यमापन्नः सिद्धो भवति ब्राह्मणः।

अत्यन्त तीखे मर्मभेदी बाणोंके अग्रभागसे विदीर्ण होने-का भी उसे अवसर प्राप्त होता है। इन विकारोंके प्राप्त होने तथा उनका पूर्णतः निरोध हो जानेपर अटल ऐश्वर्य (ब्रह्म-भाव) को प्राप्त हुआ योगी सिद्ध हो जाता है ॥ ५२।।

ततः पार्थिवमैश्वर्यं निर्मुक्तस्य विकारतः ॥ ५३ ॥
प्रादुर्भवति संजाते समाधौ प्रलयं गते ।
दिव्यं गन्धं समाघ्राय दिव्यांश्चांस्त्वाञ्छृणोति च ॥ ५४ ॥

तत्पश्चात् विकारसे मुक्त हुए योगीके समक्ष पार्थिव ऐश्वर्य प्रकट होता है, जब समाधि लग जाती है और विकार लीन हो जाते हैं, तब वह दिव्य गन्धको सूँघकर दिव्य लोकोंकी बातें भी सुनता है ॥ ५३-५४ ॥

दिव्यरूपैश्च पुरुषैश्छिद्यते न च भिद्यते ।
गच्छन् सुकृतिनां चान्तः प्रधानात्मा क्षरन्निव ॥ ५५ ॥

वह शरीर रहनेतक दिव्य पुरुषोंसे भिन्न रहता है और देहपात होनेपर सर्वात्मभावको प्राप्त हो जानेसे वह उन सबसे अभिन्न हो जाता है। अन्तर्जगत्में जाता हुआ वह योगी परिणामको प्राप्त होनेवाले प्रधानकी भाँति पुण्यात्माओंके अन्तःकरणमें भी प्रवेश करता है ॥ ५५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥


विंशोऽध्यायः

ब्रह्माजीके द्वारा योगधारणपूर्वक की गयी मानसिक सृष्टिका वर्णन

वैशम्पायन उवाच,
ततोऽन्यां धारणां गत्वा मनसा स पितामहः ।
ब्रह्मकर्मसमारम्भं निर्मुक्तेनान्तरात्मना ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर योगयुक्त पितामह ब्रह्माने मनके द्वारा दूसरी धारणाको प्राप्त होकर विकारमुक्त अन्तःकरणके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मका आरम्भ किया ॥ १ ॥

सर्वाङ्गधारणां कृत्वा मनसा प्रहसन्निव ।
ब्रह्मयोगेन च ब्रह्मा सृजते मनसा प्रजाः ॥ २ ॥

ब्रह्माजीने मनसे सर्वाङ्ग-धारणा करके हँसते हुए-से ब्रह्मयोगसे युक्त हो मानसिक संकल्पके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि की ॥

चक्षुषो रूपसम्पन्ना ह्यप्सराः सृजते प्रभुः।
नासिकाग्राच्च गन्धर्वान् सुचित्राम्बरवाससः ॥ ३ ॥

उन भगवान्ने नेत्रसे रूपवती अप्सराओंको उत्पन्न किया और नासिकाके अग्रभागसे विचित्र वस्त्रधारी गन्धर्वोंकी सृष्टि की ॥ ३ ॥

तुम्बुरुप्रमुखान् सर्वाञ्छतशोऽथ सहस्रशः ।
नृत्यवादित्रकुशलान् कुशलान् सामगीतिषु ॥ ४ ॥

वे सैकड़ों और सहस्रों गन्धर्व, जिनमें तुम्बुरु आदि प्रधान थे, सब-के सब नृत्य और वाद्यमें निपुण तथा सामगानमें कुशल थे ॥ ४ ॥

ब्रह्मयोगेन योगज्ञः स्वयम्भूर्भगवान् प्रभुः ।
चारुनेत्रां सुकेशान्तां सुभ्रू चारुनिभाननाम् ॥ ५ ॥
पद्मेन शतपत्रेण चारुणा सुविराजिताम् ।
स्वक्षां शुचिगिरं सेव्यां ब्राह्मीं मूर्तिमतीं श्रियम् ॥ ६ ॥

तदनन्तर योगके ज्ञाता एवं सर्वसमर्थ स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माने ब्रह्मयोगके द्वारा दिव्य नेत्रवाली, पवित्र, (द्विजोंके द्वारा) सेवनीय, मूर्तिमती, वेदवाणीस्वरूपा लक्ष्मीको प्रकट किया, जिनके नेत्र बड़े मनोहर थे, केशान्त भाग बहुत ही सुन्दर था, भौंहें भी मनोहर थीं, मुखकी प्रभा कमनीय कान्ति-से प्रकाशित हो रही थी और वे हाथमें परम सुन्दर शतदल कमल लेकर उससे बड़ी शोभा पा रही थीं ॥ ५-६ ॥

ससृजे मनसा ब्रह्मा सम्यक्प्रोक्तेन चेतसा ।
भावयोगेन भूतात्मा सर्वप्राणभृतां नृप ॥ ७ ॥

नरेश्वर ! भूतात्मा ब्रह्माने समस्त प्राणियोंके भावयोग (अन्तःकरणकी वासना) के अनुसार ईश्वरप्रेरित चित्तके द्वारा मानसिक संकल्पसे ही उनकी रचना की ॥ ७ ॥

चक्षुषो रूपसम्पन्नाः सृजन् सोऽप्सरसः प्रभुः।
नासिकाग्राच्च गन्धर्वान् सुवासः सुप्रवादितान् ॥ ८ ॥

उन प्रभुने नेत्रसे सौन्दर्यशालिनी अप्सराओंकी तथा नासिकाके अग्रभागसे सुन्दर वस्त्रधारी एवं वाद्यकुशल गन्धर्वोंकी सृष्टि की ॥ ८ ॥

गानप्रभानं संचक्रे गन्धर्वाणामशेषतः ।
अन्येषां चैव विप्राणां गानं ब्रह्मप्रभाषितम् ॥ ९ ॥

उन्होंने समस्त गन्धर्वोंके लिये गान्धर्वशास्त्र और अन्यान्य ब्राह्मणोंके लिये सामगानके विधानकी रचना की ॥ ९ ॥

पद्भ्यां सृजति भूतानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च ।
नरकिन्नरयक्षांश्च पिशाचोरगराक्षसान् ॥ १० ॥
गजान् सिंहांश्च व्याघ्रांश्च मृगांश्चैव सहस्रशः ।
तृणजातींश्च बहुधा भावहेतोश्चतुष्पदान् ॥ ११ ॥

भविष्यपर्व] एकविंशोऽध्यायः ८०३


स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंको उन्होंने अपने पैरोंसे उत्पन्न किया, जिनके नाम इस प्रकार हैं—मनुष्य, किन्नर, यक्ष, पिशाच, नाग, राक्षस, हाथी, सिंह, व्याघ्र, सहस्रों प्रकारके मृग (पशु), नाना प्रकारकी तृण-जाति तथा बहुत-से चौपाये—इन सबको उन्होंने उनके पूर्वजन्मकी आन्तरिक वासनाओंके अनुसार उत्पन्न किया ॥ १०-११ ॥

ये तु हस्तान्नि खादन्ति कर्मप्राप्तेन हेतुना ।
हस्तेभ्यः कर्म ससृजे मन्तव्यं मनसा तथा ॥ १२ ॥

प्राणियोंके पूर्वजन्मके कर्मानुसार प्राप्त हुए कारण (अदृष्ट) को विचार करके ब्रह्माने पूर्वोक्त चराचर जीवोंकी सृष्टि की तथा ऐसे जीवोंको भी उत्पन्न किया, जो हाथमें लेकर खाते हैं; विधाताने हाथोंसे कर्मकी और मनसे मन्तव्यकी सृष्टि की ॥ १२ ॥

वायुना स विसर्गं च भूतानां सुखमिच्छता ।
उपतस्थे तदानन्दं पञ्चेन्द्रियसमाधिना ॥ १३ ॥

प्राणियोंका सुख चाहते हुए ब्रह्माजीने प्राण आदि रूपसे उनके लिये प्राणन आदि विविध कार्यकी सृष्टि की तथा पाँचों इन्द्रियोंके निरोधद्वारा परमानन्दमय परमेश्वरका साक्षात्कार करके उनका सामीप्य प्राप्त किया ॥ १३ ॥

हृदयादसृजद् गावो बाहुभ्यां पक्षिणस्तथा ।
अन्यानि चैव सत्त्वानि तैस्तैर्वेषैः पृथग्विधैः ॥ १४ ॥

उन्होंने हृदयसे गौओंकी, भुजाओंसे पक्षियोंकी तथा भिन्न-भिन्न वेशोंसे दूसरे-दूसरे जन्तुओंकी रचना की ॥ १४ ॥

ऋषिं त्वङ्गिरसं चैव मुनिं ज्वलिततेजसम् ।
ब्रह्मवंशकरं दिव्यं व्यतिषिक्तेष्विन्द्रियम् ॥ १५ ॥
ध्रुवोरन्तरादजनयद् योगाद् योगेश्वरः प्रभुः ।

प्रज्वलित तेजवाले, मनसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको अपने अधीन रखनेवाले, ब्रह्मवंशप्रवर्तक, दिव्य ऋषि-मुनिवर अङ्गिराको योगेश्वर भगवान् ब्रह्माने योगबलके द्वारा अपनी दोनों भौंहोंके बीचसे प्रकट किया ॥ १५ १/२ ॥

ब्रह्मवंशकरं दिव्यं भृगुं परमधार्मिकम् ॥ १६ ॥
ललाटमध्यादसृजन्नारदं प्रियविग्रहम् ।
सनत्कुमारं मूर्ध्नश्च महायोगी पितामहः ॥ १७ ॥

ब्राह्मणवंशको चलानेवाले परम धर्मात्मा दिव्य-ऋषि भृगुको ललाटके मध्यभागसे प्रकट किया तथा उन महायोगी पितामहने कलहप्रिय नारद एवं सुन्दर शरीरवाले सनत्कुमारको अपने मस्तकसे प्रकट किया ॥ १६-१७ ॥

अभिषिक्तं तु सोमं च यौवराज्ये पितामहः ।
ब्राह्मणानां च राजानं शाश्वतं रजनीश्वरम् ॥ १८ ॥

पितामहने उस सोमकी भी सृष्टि की, जो युवराज-पदपर अभिषिक्त हुए। वे रजनीपति चन्द्रमा ब्राह्मणोंके सनातन राजा हैं ॥ १८ ॥

तपसा महता युक्तो ग्रहैः सह निशाकरः ।
चचार नभसो मध्ये प्रभाभिर्भासयन् जगत् ॥ १९ ॥

महान् तपसे युक्त चन्द्रमा अपनी प्रभाओंसे जगत्को प्रकाशित करते हुए दूसरे ग्रहोंके साथ आकाशमण्डलमें विचरते हैं ॥ १९ ॥

स गात्रैर्भगवान् योगान्मन्सा सिद्धिमागतः ।
ससृजे सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ २० ॥

योगसे सिद्धिको प्राप्त हुए भगवान् ब्रह्माने मानसिक संकल्पपूर्वक अपने भिन्न-भिन्न अङ्गोंद्वारा समस्त चराचर प्राणियोंकी सृष्टि की ॥ २० ॥

तत्र स्थानानि भूतानां योगांश्चैव पृथग्विधान् ।
व्यधत्त शतशो ब्रह्मा सर्वभूतपितामहः ॥ २१ ॥

समस्त भूतोंके पितामह ब्रह्माजीने उन भूतोंके लिये बहुत-से स्थानों तथा उनके योगक्षेमके लिये विभिन्न प्रकारके सैकड़ों उपायोंका निर्माण किया है ॥ २१ ॥

एष ब्रह्ममयो यज्ञो योगः सांख्यश्च तत्त्वतः ।
विज्ञानं च स्वभावश्च क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ २२ ॥
एकत्वं च पृथक्त्वं च सम्भवो निधनं तथा ।
कालः कालक्षयश्चैव ज्ञेयो विज्ञानमेव च ॥ २३ ॥

यह ब्रह्ममय यज्ञ (ज्ञानयज्ञ) कहा गया; यही योग और वास्तविक सांख्य है। विज्ञान, स्वभाव, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, एकत्व, नानात्व, जन्म और मृत्यु, काल, जहाँ कालका भी क्षय हो जाता है वह ज्ञान तथा विज्ञान (आत्मानुभव) भी यही जानने योग्य है ॥ २२-२३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥


एकविंशोऽध्यायः

क्षत्रयुगके प्रसंगमें ज्ञानसिद्ध ब्राह्मणोंका वर्णन, प्रजापति दक्षद्वारा प्राणियों एवं चारों वर्णोंकी सृष्टि तथा उनका अपने पुत्रोंको धात्रीका अन्त जाननेके लिये आदेश

जनमेजय उवाच

श्रुतं ब्रह्मयुगं ब्रह्मन् युगानां प्रथमं युगम् ।ससंक्षेपं सविस्तारं नियमैर्बहुभिश्चितम् ।
क्षत्रस्यापि युगं ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ १ ॥उपायैश्च कथितं ऋतुभिश्चैव शोभितम् ॥ २ ॥

जनमेजयने कहा—ब्रह्मन् ! मैंने युगोंमें प्रथम युगका,

८०४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

जिसे ब्रह्मयुग (या ब्राह्मणयुग) कहते हैं, वर्णन सुन लिया। प्रभो! अब मैं उपाय जाननेवाले पुरुषोंद्वारा कथित, यज्ञोंसे सुशोभित तथा बहुसंख्यक नियमोंसे सम्पन्न क्षत्रयुगका वर्णन संक्षेप और विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ॥ १-२ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतत् ते कथयिष्यामि यज्ञकर्मभिरर्चितम् ।
दानधर्मैश्च विविधैः प्रजाभिरुपशोभितम् ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! इस क्षत्रिय-युगका मैं तुमसे वर्णन करूँगा। यह युग यज्ञकर्मोंसे पूजित, भाँति-भाँतिके दानधर्मोंसे सम्मानित तथा बहुसंख्यक प्रजाओंसे सुशोभित होता है ॥ ३ ॥

तेऽङ्गुष्ठमात्रा मुनय आदत्ताः सूर्यरश्मिभिः ।
मोक्षप्राप्तेन विधिना निराबाधेन कर्मणा ॥ ४ ॥
प्रवृत्ते चाप्रवृत्ते च नित्यं ब्रह्मपरायणाः ।
परायणस्य संगम्य ग्रहणस्तु महीपते ॥ ५ ॥
श्रीवृताः पावनाश्चैव ब्राह्मणाश्च महीपते ।
चरितब्रह्मचर्याश्च ब्रह्मज्ञानावबोधिताः ॥ ६ ॥
पूर्णे युगसहस्रान्ते प्रभावे प्रलयं गताः ।
ब्राह्मणा वृत्तसम्पन्ना ज्ञानसिद्धाः समाहिताः ॥ ७ ॥

जो अङ्गुष्ठमात्र मुनि हैं अर्थात् जिनका कद बहुत छोटा है, जो मोक्षके निकट पहुँचानेवाली विधि एवं निर्विघ्न कर्मके प्रभावसे सूर्यकी किरणोंद्वारा गृहीत हुए हैं अर्थात् सूर्यमण्डलका भेदन करके ब्रह्मलोकमें पहुँच गये हैं। यज्ञ आदि प्रवृत्ति एवं शम आदि निवृत्ति कर्ममें तत्पर रहते हुए नित्य ब्रह्मपरायण रहे हैं तथा पृथ्वीनाथ ! जो सबके परम आश्रयभूत ब्रह्मासे मिलकर—परमात्माकी प्रसन्नताका उद्देश्य लेकर वेदोक्त कर्ममें सदा तत्पर रहते आये हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्यका पालन किया है, जो ब्रह्मज्ञानमयी ज्योतिसे प्रकाशित हो श्रीसम्पन्न और पवित्र हो गये हैं तथा जो पूर्वकल्पमें सहस्र चतुर्युग पूर्ण होनेतक ब्रह्मलोकमें रहकर उसके अन्तमें वहाँ प्रलयको प्राप्त हुए होते हैं, वे ही भावी कल्पमें एकाग्रचित्त, सदाचारसम्पन्न तथा ज्ञानसिद्ध ब्राह्मण होते हैं॥

व्यतिरिक्तेन्द्रियो विष्णुर्योगात्मा ब्रह्मसम्भवः ।
दक्षः प्रजापतिर्भूत्वा सृजते विपुलाः प्रजाः ॥ ८ ॥

उन्हीं ब्राह्मणोंमेंसे एक ब्रह्मपुत्र प्रजापति दक्ष हुए, जो इन्द्रियों और उनके विषयोंसे असङ्ग रहकर योगयुक्त चित्तसे बहुसंख्यक प्रजाओंकी सृष्टि करने लगे । भगवान् विष्णुको अपना आत्मा माननेके कारण वे विष्णुस्वरूप कहे गये हैं ॥

अक्षराद् ब्राह्मणाः सौम्याः क्षरात् क्षत्रियबान्धवाः ।
वैश्या विकारतश्चैव शूद्रा धूमविकारतः ॥ ९ ॥

अक्षर (शुद्ध सत्त्वमय निष्काम धर्म, जिसका वर्ण सुधाके समान श्वेत है) से सौम्य स्वभाववाले ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति हुई। क्षर (सत्त्व-रजोगय-मिश्र धर्म, जिसका वर्ण लाल है) से क्षत्रिय बन्धु प्रकट हुए। विकार (रजोगमय सकाम धर्म, जिसका वर्ण हल्दीके समान पीला है) से वैश्य उत्पन्न हुए तथा धूम-विकार (तमोमय धर्म, जो धूमके समान काला है) से शूद्रोंका जन्म हुआ ॥ ९ ॥

श्वेतलोहितकैर्वर्णैः पीतैर्नीलैश्च ब्राह्मणाः ।
अभिनिर्वर्तिता वर्णाश्चिन्तयानेन विष्णुना ॥ १० ॥

इस प्रकार सृष्टिके विषयोंमें विचार करनेवाले विष्णुस्वरूप प्रजापतिने श्वेत, लाल, पीले और नील वर्णवाले विभिन्न धर्मोंसे ब्राह्मण आदि वर्णोंकी सृष्टि की ॥ १० ॥

ततो वर्णत्वमापन्नाः प्रजा लोके चतुर्विधाः ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव महीपते ॥ ११ ॥

इस तरह विभिन्न वर्णको प्राप्त हुई प्रजा इस लोकमें चार भागोंमें विभक्त हो गयी। पृथ्वीनाथ ! वे चार वर्णोंके लोग क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कहलाये ॥ ११ ॥

एकलिङ्गाः पृथग्धर्मा द्विपदाः परमाद्भुताः ।
यातनायाभिसम्पन्ना गतिज्ञाः सर्वकर्मसु ॥ १२ ॥

इन सबकी आकृति तो एक-सी है, परंतु धर्म पृथक्-पृथक् हैं। ये दो पैरवाले जीव (मनुष्य) बड़े ही अद्भुत हैं। कर्मफलके भोगके लिये ये पृथक्-पृथक् वर्णसे सम्पन्न हुए हैं। इन्हें समस्त कर्मोंकी गतिका ज्ञान (उनके शुभाशुभ फलोंपर विश्वास) होता है ॥ १२ ॥

त्रयाणां वर्णजातानां वेदोक्ताः क्रियाः स्मृताः ।
तेन वो ब्रह्मयोगेन वैष्णवेन महीपते ॥ १३ ॥

राजन् ! ब्राह्मण आदि तीन वर्णोंमें उत्पन्न हुए लोगोंकी ही सारी क्रियाएँ वेदोक्त विधिसे सम्पन्न होने योग्य बतायी गयी हैं। इस कारण तुम्हारे जो तीन वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं, उन्हींको भगवान् विष्णुकी कृपासे वेदाध्ययनका अधिकार सुलभ है ॥ १३ ॥

प्रज्ञया तेजसा योगात् तस्मात् प्राचेतसः प्रभुः ।
विष्णुरेव महायोगी कर्मणामन्तरं गतः ॥ १४ ॥

प्रज्ञा और तेजके योगसे युक्त हुए वे सामर्थ्यशाली महायोगी प्राचेतस दक्ष नामक विष्णु ही 'प्रजापति' का अधिकार देनेवाले कर्मों (सृष्टि आदि) में तत्पर रहते हैं ॥

ततो निर्माणसम्भूताः शूद्राः कर्मविवर्जिताः ।
तस्मान्नार्हन्ति संस्कारं न ह्यत्र ब्रह्म विद्यते ॥ १५ ॥

अतः शिल्पकर्म एवं त्रैवर्णिकोंकी सेवाके लिये उत्पन्न शूद्र वैदिक कर्मके अधिकारसे रहित हैं। इसीलिये वे उपनयन आदिके संस्कारोंके योग्य नहीं हैं; क्योंकि उन्हें वेदाध्ययनका अधिकार नहीं है ॥ १५ ॥

यथाग्नौ धूमसंघातो ह्यरण्या मध्यमानया ।
प्रादुर्भूतो विसर्पंश्च वै नोपयुञ्जन्ति कर्मणि ॥ १६ ॥

भविष्यपर्व ] द्वाविंशोऽध्यायः [ ८०५

एवं शूद्रा विसर्पन्तो भुवि कात्स्न्येन जन्मना ।
नासंस्कृतेन धर्मेण वेदप्रोक्तेन कर्मणा ॥ १७ ॥
जैसे अरणीका मन्थन करनेसे प्रकट हुई अग्निमें धूमका समुदाय उत्पन्न होकर बहुत दूरतक फैल जाता है तो भी अग्निहोत्री (यज्ञ करनेवाले) द्विज यज्ञकर्ममें उस धूमका उपयोग नहीं करते हैं, इसी प्रकार पृथ्वीपर जन्म लेकर पूर्णतः सब ओर फैले हुए शूद्र संस्कारहीन होनेके कारण वेदोक्त धर्म-कर्मके उपयोगमें आने योग्य नहीं हैं ॥ १६-१७ ॥

ततोऽन्ये दक्षपुत्राश्च सम्भूता ब्रह्मयोनयः ।
बलवन्तो महोत्साहा महावीर्या महौजसः ॥ १८ ॥
तदनन्तर दक्षके और भी बहुत-से पुत्र, जो वेदके स्थानभूत ब्राह्मण थे, वे बलवान्, महान् उत्साहसे सम्पन्न, महान् पराक्रमी तथा महान् तेजस्वी थे ॥ १८ ॥

पित्रा प्रोक्ता महात्मानो दक्षिणा यज्ञकर्मणा ।
अन्तमिच्छाम्यहं श्रोतुं धात्र्याः पुत्रा बलो ह्यहम् ॥ १९ ॥
उन सामर्थ्यशाली महात्मा पुत्रोंसे यज्ञकर्मपरायण पिता दक्षने कहा—'पुत्रो ! मैं तुम्हारे मुखसे धात्री (पृथ्वी) का अन्त सुनना चाहता हूँ; क्योंकि मैं बलवान् हूँ (अतः धात्रीका अन्त जानता हूँ) ॥ १९ ॥

ततो विधास्ये तत्त्वज्ञाः प्रजानां विपुलं बलम् ।
विपुलत्वाद्धि क्षेत्राणां ममापि विपुलाः प्रजाः ॥ २० ॥
'तत्त्वज्ञ पुत्रो ! तुमसे धात्रीका अन्त सुनकर तुम्हारे बलका ज्ञान हो जानेके पश्चात् मैं प्रजाओंके लिये विपुल बलकी सृष्टि करूँगा, क्योंकि क्षेत्रों (शरीरों) की विशालतासे ही मेरी प्रजा भी अधिक बलशालिनी हो सकती है' ॥ २० ॥

न तेषां दर्शयाद् देवी चक्षुषा रूपमात्मनः ।
प्रजापतिसुतानां वै विपुलासारमिच्छताम् ॥ २१ ॥
विशाल पृथ्वीका अन्त जाननेकी इच्छावाले उन प्रजापति-पुत्रोंको पृथ्वीदेवीने अपने आधिदैविक रूपका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कराया ॥ २१ ॥

आत्मनो भावनिर्वृत्ते भावे कृतयुगे तदा ।
जनित्री सर्वभूतानामण्डजानुद्भिज्जांस्तथा ॥ २२ ॥
संवेदजननी धात्री चेति मात्रा प्रचोदिता ।
अणुतां तनुतां चैव जन्तूनां कर्मभोगिनाम् ॥ २३ ॥
तदनन्तर जब स्वभावसिद्ध कृतयुग (विशुद्ध सत्त्वमय भाव) आया, तब (उन प्रजापति पुत्रोंके अपने अभिप्रायकी सिद्धि हो जानेपर) प्रमाता चेतन (परमात्मा विष्णु) से प्रेरित हो धात्री, जो अपने सच्चिदानन्दस्वरूपसे सम्यग् ज्ञानकी जननी है, समस्त प्राणियोंकी जन्मदायिनी हुई । उसीने अण्डजों और स्वेदजोंको भी उत्पन्न किया तथा उसीने कर्मफल-भोग करनेवाले प्राणियोंके शरीरोंको लघु, सूक्ष्म एवं विशाल रूप प्रदान किया ॥ २२-२३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥


द्वाविंशोऽध्यायः

दक्षका अपने आधे अङ्गसे स्त्रीरूप होकर बहुत-सी कन्याओंको उत्पन्न करना और उनका धर्म, कश्यप एवं सोमको दान कर देना, कश्यप और दक्षकन्याओंकी संतानोंका वर्णन तथा देवलोकमें उत्पन्न होनेवालोंकी योग्यता

जनमेजय उवाच
साध्वहं श्रोतुमिच्छामि त्रेतायां ब्राह्मणोत्तम ।
यज्ज्ञात्वा सर्वविद्यानां परं पश्येयमव्ययम् ॥ १ ॥
जनमेजय बोले—ब्राह्मणशिरोमणे ! त्रेतायुगके प्रवृत्तिरूप (यज्ञादि) धर्ममें जो समीचीन तत्त्व है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ, जिसे जानकर (आचरणमें लाकर) मैं समस्त विद्याओंके परम लक्ष्य अविनाशी ब्रह्मका साक्षात्कार कर सकूँ ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
दक्षस्तु पुनरालम्ब्य स्त्रीभावं पुरुषोत्तमः ।
योगाद् योगेश्वररात्मानं निषण्णो गिरिमूर्धनि ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! पुरुषोत्तम दक्ष योगबलसे स्त्रीशरीरको प्राप्त हो गये । वह स्त्रीशरीर उन योगेश्वर दक्षका अपना ही स्वरूप था। उस स्वरूपका अवलम्बन करके वे एक पर्वतके शिखरपर बैठे थे ॥ २ ॥

सुजानुः पीनजघना सुभ्रूः पद्मनिभानना ।
रक्तान्तनयना कान्ता सर्वभूतमनोरमा ॥ ३ ॥
उस स्त्रीके घुटने सुन्दर, जघनप्रदेश स्थूल, भौंहें मनोहर, मुख प्रफुल्ल कमलके समान कान्तिमान् तथा दोनों नेत्रोंके कोये लाल थे । वह समस्त भूतोंके मनको मोहनेवाली नारी कमनीय कान्तिसे युक्त थी ॥ ३ ॥

८०६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

दक्षः प्राचेतसस्तस्यां कन्यायां जनयत् प्रभुः ।
देहार्धयोगविधिना कन्याः पद्मनिभाननाः ॥ ४ ॥
भगवान् प्राचेतस दक्षने देहार्ध-संयोगकी विधिसे उस अर्धाङ्गजजनित नारीके गर्भसे प्रफुल्ल कमलके समान मनोहर मुखवाली बहुत-सी कन्याओंको उत्पन्न किया ॥ ४ ॥

दक्षः पुरुषरूपेण स्त्रीरूपमपहाय वै।
दर्शने सर्वभूतानां कान्तः कान्ततरोऽभवत् ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् उस स्त्रीरूपका परित्याग करके दक्ष पुनः पुरुष-रूपसे स्थित हो गये। उस समय वे समस्त प्राणियोंकी दृष्टिमें परम कान्तिमान् एवं कमनीय प्रतीत होते थे ॥ ५ ॥

ताः कन्याः प्रददौ दक्षः स्वयं प्राचेतसः प्रभुः ।
ब्रह्मदेयेन विधिना ब्रह्मप्राप्तेन भारत ॥ ६ ॥
भारत ! इसके बाद स्वयं प्राचेतस भगवान् दक्षने उन कन्याओंका वेदोक्त ब्राह्मविधिसे विवाह कर दिया ॥ ६ ॥

प्रददौ दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
सप्तविंशति सोमाय पत्नीहेतोः समाहितः ॥ ७ ॥
उन्होंने एकाग्रचित्त होकर धर्मको दस, कश्यपको तेरह और सोमको सत्ताईस कन्याएँ इसलिये दीं कि वे इन्हें अपनी धर्मपत्नी बना लें ॥ ७ ॥

दक्षो दत्त्वाथ ताः कन्या ब्रह्मक्षेत्रं प्रपद्य च ।
ब्रह्मणाध्युषितं पुण्यं समाहितमना मुनिः ॥ ८ ॥
उन कन्याओंका दान करनेके पश्चात् दक्ष मुनि ब्रह्माजी-के क्षेत्र प्रयागमें आये, जहाँ ब्रह्माजी पहले निवास करते थे और इसीलिये जो परम पुण्यदायक तीर्थ हो गया था। वहाँ आकर वे मनको एकाग्र करके परमात्माका चिन्तन करने लगे ॥ ८ ॥

तप्यमानो मृगैः सार्धं चचार वसुधां नृप ।
तृणमूलफलैर्वृद्धो वृद्धश्च तपसासकृत् ॥ ९ ॥
नरेश्वर ! तदनन्तर दक्ष तपस्यामें संलग्न हो मृगोंके साथ इस वसुधापर विचरने लगे। वे तृण और फल-मूलसे ही अपने शरीरका पोषण करते थे। उनके तपकी निरन्तर वृद्धि हो रही थी ॥ ९ ॥

मृगास्तु तस्य मोदन्ति फलं मोदन्ति ब्राह्मणाः ।
दीक्षिताः पुण्यकर्माणस्तपसा दग्धकिल्बिषाः ॥ १० ॥
उनकी तपस्याके प्रभावसे मृग बड़े प्रसन्न थे (क्योंकि उस तपसे सर्वत्र अहिंसा-भावका प्रसार हो रहा था)। यज्ञमें दीक्षित हो पुण्य कर्म करनेवाले तथा तपस्यासे अपने पापोंको दग्ध कर देनेवाले ब्राह्मण दक्षके उस अहिंसाप्रधान तपका वैर-त्यागरूप फल प्रत्यक्ष देखकर आनन्दमग्न रहते थे ॥

संग्रामकाले कालज्ञः शरीरादिपतिर्मुनिः ।
कर्मयज्ञकृतां तात सिद्धिं पश्यति लक्षणात् ॥ ११ ॥
योगीको अपने चित्तपर विजय प्राप्त करनेके लिये जो संग्राम (तत्परतापूर्ण साधन) करना पड़ता है, उसका अवसर आनेपर कालगतिके ज्ञाता तथा शरीर, इन्द्रिय आदिपर शासन करनेवाले मुनिवर दक्षको कर्मयज्ञजनित सिद्धि निकट दिखायी देने लगी; क्योंकि उस सिद्धिका सूचक लक्षण प्रकट हो रहा था ॥ ११ ॥

दानमानप्रवीराश्च निरुद्वेगा निरामियाः ।
मृगैः सह जरां यान्ति सपत्नीकाः सुपुत्रिणः ॥ १२ ॥
जो दूसरोंको दान और मान देनेमें प्रमुख वीर हैं, जिनका उद्वेग सर्वथा शान्त हो गया है, जो आमिष आदि भोगोंका परित्याग कर चुके हैं तथा जो श्रेष्ठ पुत्रोंके पिता हैं, ऐसे गृहस्थ द्विज अपनी पत्नीके साथ उस वनमें जाकर मृगोंके साथ वृद्धावस्थाको प्राप्त होते थे ॥ १२ ॥

ब्राह्मणाः स्तोत्रसंसिद्धा जनित्रे प्रथमे पदे ।
ब्रह्मणाध्युषितत्वाच्च ब्रह्मक्षेत्रमिहोच्यते ॥ १३ ॥
वेदाध्ययनसे सिद्ध हुए ब्राह्मण वहाँ सबके उत्पादक प्रथम पद—परब्रह्म परमात्मामें प्रतिष्ठित होते थे और ब्रह्माजी भी उस स्थानमें निवास कर चुके थे; इसीलिये यहाँ प्रयागको ब्रह्मक्षेत्र कहते हैं (आध्यात्मिक दृष्टिसे ब्रह्मकी उपलब्धिक स्थान होनेके कारण यह शरीर ही ब्रह्मक्षेत्र है) ॥ १३ ॥

यतिभिः कर्मभिर्मुक्तैर्जितक्रोधैर्जितेन्द्रियैः ।
चरद्भिर्वसुधां विप्रैरकिंचनपथैषिभिः ॥ १४ ॥
जो कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हैं, क्रोधपर विजय पा चुके हैं और इन्द्रियोंको वशमें कर चुके हैं, वे अकिंचन (परिग्रहशून्य) पथपर चलनेकी इच्छावाले और भूतलपर विचरते रहनेवाले संन्यासी ब्राह्मण इस क्षेत्र (प्रयाग अथवा शरीर) को ब्रह्मक्षेत्र कहते हैं ॥ १४ ॥

या प्रजा सर्वमारूढा मानसी ब्रह्मचारिणी ।
सैवैया व्यक्तिमापन्ना स्वभावदुरतिक्रमा ॥ १५ ॥
जो प्रजा हृदयाकाशमें स्थित सर्वस्वरूप ब्रह्ममें आरूढ थी, ब्रह्ममें ही विचरनेके कारण ब्रह्मचारिणी कहलाती थी और मानसिक संकल्पमें स्थित होनेसे मानसी कही जाती थी, वही यह स्वभाव (संस्कार या प्रारब्ध) से दुर्लङ्घ्य होकर अव्यक्तावस्थासे व्यक्तावस्थाको प्राप्त हुई है ॥ १५ ॥

अव्यक्ता व्यक्तमापन्ना स्वभावादुरतिक्रमा ।
व्यक्ताव्यक्तगतिश्चैषा कालधर्मान्महीपते ॥ १६ ॥
जो अव्यक्त थी, वही स्वभावसे दुर्लङ्घ्य होकर व्यक्ता-वस्थाको प्राप्त हो गयी। राजन् ! कालधर्मसे यह सारी प्रजा व्यक्त और अव्यक्त रूपमें परिणत होती रहती है ॥ १६ ॥

स्थावरा जङ्गमाश्चैव स्थूलसूक्ष्माश्च भारत ।
कालयोगेन योगज्ञा भवन्ति न भवन्ति च ॥ १७ ॥
भारत ! कालयोंगसे स्थावर-जंगम, स्थूल और सूक्ष्म सभी प्राणी योगज्ञ होते हैं और नहीं भी होते हैं ॥ १७ ॥

भविष्यपर्व ]त्रयोविंशोऽध्यायः८०७

एताश्चैताः प्रजाः सर्वा दक्षकन्यासु जज्ञिरे ।
कश्यपेनाव्ययेनेह संयुक्ताः कालधर्मणा ॥ १८ ॥
ये सारी प्रजाएँ महर्षि कश्यपके द्वारा दक्षकन्याओंके गर्भसे उत्पन्न हुई हैं। ये सब-की-सब कालरूप धर्मवाले अक्षय स्वभावसे संयुक्त हैं ॥ १८ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः ।
नागाश्चानेकशिरसः साध्या वै पन्नगास्तथा ॥ १९ ॥
गन्धर्वाः किन्नरा यक्षाः सुपर्णाश्च तथापरे ।
गरुत्मन् सह यक्षैश्च किन्नराश्च सुवाससः ॥ २० ॥
गावः पशुगणैः सार्धं नराश्च वसुधाधिप ।
चराचराश्च वसुधाधातारश्च धराधराः ॥ २१ ॥
गजाः सिंहाश्च व्याघ्राश्च हयाः पक्षधरास्तथा ।
खङ्गा विषाणिनश्चैव वृषभाश्च मृगास्तथा ॥ २२ ॥
चतुर्विषाणा नागेन्द्राः पद्माभा वर्णतः शुभाः ।
सर्वलक्षणसम्पन्नाः प्राणिनः कामरूपिणः ॥ २३ ॥
राजन् ! आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, अनेक सिरवाले नाग, साध्य, सर्प, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, सुपर्ण, गरुड़, सुन्दर वस्त्रधारी किन्नर, अन्यान्य पशुगणोंके साथ गौएँ, मनुष्य, चराचर प्राणी, पृथ्वीको धारण करनेवाले पर्वत, हाथी, सिंह, व्याघ्र, पंखधारी घोड़े, गैंडे, सींगवाले बैल और मृग, चार दाँतवाले तथा कमलकी-सी कान्तिवाले शुभलक्षण गजराज, समस्त लक्षणोंसे सम्पन्न और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले अन्यान्य प्राणी—इन सबकी उत्पत्ति महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दक्षकन्याओंसे हुई है ॥ १९–२३ ॥

तेषां रूपैस्तथा गात्रैस्तैः शीलैस्तैः पराक्रमैः ।
मुनयः पुनरुद्भूता धर्मक्षेत्रे सनातने ॥ २४ ॥
धर्मकी सनातन प्रसवभूमि भारतवर्षमें जो मुनि पुनः उत्पन्न हुए, वे पूर्व-कल्पके ऋषि-मुनियोंके रूप, शरीर, शील और पराक्रमसे सम्पन्न हुए ॥ २४ ॥

क्षेत्रज्ञा मानसे लोके धर्मिणो वेदगोचराः ।
यत्रोद्भूताः सुराः सर्वे दिवि लोके प्रतिष्ठिताः ॥ २५ ॥
वेदोक्त मार्गपर चलनेवाले धर्मात्मा क्षेत्रज्ञ (आत्मनिष्ठ) पुरुष मानस लोक (मनःकल्पित, बाह्य या आभ्यन्तर जगत्) में देवरूपसे प्रकट हुए होते हैं और वे सब-के-सब दिव्य-लोकमें प्रतिष्ठित हो जाते हैं ॥ २५ ॥

ये चान्ये तपसा सिद्धा गृहस्था मनुजाधिप ।
ब्रह्मचर्येण संसिद्धाः परिचर्या गता गुरोः ॥ २६ ॥
ये च योगगतिं प्राप्ताः सिद्धिहेतोर्महीपते ।
क्लेशाधिकैः कर्मजन्यैर्वृत्तिं लप्स्यन्ति वै द्विजाः ॥ २७ ॥
शिलोञ्छवृत्तयः ख्याताः सपत्नीका दृढव्रताः ।
सर्वे त्वेते दिविचरा भवन्ति चरितव्रताः ॥ २८ ॥
नरेश्वर ! जो दूसरे गृहस्थ तपस्यासे सिद्ध होते हैं अथवा जो ब्रह्मचारी गुरुकी सेवा करके ब्रह्मचर्य-पालनके द्वारा सिद्धिलाभ करते हैं और पृथ्वीनाथ ! जो सिद्धिके लिये योग-मार्गको अपनाये हुए हैं, जो द्विज सत्कर्मके लिये अधिक क्लेश सहन करके जीविका पाते हैं, जो खेतोंमें बाल बीनकर या बाजार उठ जानेपर वहाँ गिरे हुए अन्नके दाने चुनकर जीवन-निर्वाह करनेके लिये विख्यात हैं और पत्नीके साथ रहकर दृढ़तापूर्वक धर्मके पालनमें लगे रहते हैं; इन सबने उत्तम व्रतका पालन किया है; अतः ये सब-के-सब आकाशचारी देवता होते हैं ॥ २६–२८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥


त्रयोविंशोऽध्यायः

ब्रह्माजीके महायज्ञका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

पितामहं पुरस्कृत्य मेरुपृष्ठे समाहिताः ।
जटाजिनधरा विप्रास्त्यक्तक्रोधा जितेन्द्रियाः ॥ १ ॥
पर्वतान्तरसंसिद्धे बहुपादपसंवृते ।
धातुसंरञ्जितशिले समे निस्तृणकण्टके ॥ २ ॥
त्रयाणां ब्रह्मवेदानां पञ्चस्वरविराजिते ।
मन्त्रयज्ञपरा नित्यं नित्यं व्रतहिते रताः ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! मेरुपर्वतकी घाटीपर पितामह ब्रह्माजीको आगे करके कुछ एकाग्रचित्त ब्राह्मण विराजमान हुए, जो जटा और मृगचर्म धारण किये हुए थे । उन्होंने क्रोधको त्याग दिया था और इन्द्रियोंपर विजय पा ली थी ॥ १ ॥

पर्वतकी वह घाटी दूसरे पर्वतोंसे घिरी हुई थी । वहाँ बहुत से वृक्ष शोभा दे रहे थे । वहाँकी शिलाएँ अनेक प्रकारकी धातुओंसे रँगी हुई थीं । उस समतल प्रदेशमें तृण और कण्टकोंका सर्वथा अभाव था । ब्रह्मका ज्ञान करानेवाले

८०८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तीनों वेदोंके पाँच स्वरोंसे उस पर्वतशिखरकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँ बैठे हुए वे ब्राह्मण मन्त्रजपरूपी यज्ञमें सदा तत्पर रहनेवाले थे। व्रतके पालन और परहितके साधनमें उनकी सदा ही प्रवृत्ति थी ॥ २-३ ॥

एकमेवाग्निमाधाय सर्वे ब्राह्मणपुङ्गवाः ।
बिभिदुर्मन्त्रविषयैः सुसमाहितमानसाः ॥ ४ ॥
वे समस्त ब्राह्मणशिरोमणि वहाँ एक ही अग्निकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी उपासना करते थे। उन्होंने मन्त्रप्रतिपाद्य विषयोंकी दृष्टिसे उस अग्निके अनेक भेद किये ॥ ४ ॥

त्रिधा प्रणीतो ज्वलनो मुनिभिर्वेदपारगैः ।
अतस्ते तत्त्वमापन्ना यदेकस्त्रिविधः कृतः ॥ ५ ॥
वेदोंके पारङ्गत विद्वान् मुनियोंने उस अग्निको तीन भागोंमें विभक्त करके स्थापित किया (उन तीनों अग्नियोंके नाम ये हैं—आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि)। उनके द्वारा एक ही अग्निकी तीन स्वरूपोंमें अभिव्यक्ति हुई, इसलिये उन्हें तत्त्वका बोध प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥

एक एव महानग्निर्हविषा सम्प्रवर्तते ।
स्वधाकारेण धर्मज्ञ मन्त्राणां कार्यसिद्धये ॥ ६ ॥
धर्मज्ञ जनमेजय ! एक ही अग्नि मन्त्रोक्त कार्योंकी सिद्धिके लिये स्वधारूप हविष्यके सेवनसे महान् होकर सम्यक्-रूपसे प्रज्वलित होता है ॥ ६ ॥

स्वयं च दक्षः सम्प्राप्तो भगवान् भूतसत्कृतः ।
ब्रह्मा ब्राह्मणनिर्माता सर्वभूतपितामहः ॥ ७ ॥
वहाँ समस्त प्राणियोंद्वारा सम्मानित स्वयं भगवान् दक्ष पधारे, जो ब्रह्मा अर्थात् ब्राह्मण हैं। उन्होंने ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है तथा वे सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं ॥ ७ ॥

दण्डी चर्मी शरी खड्गी शिखी पद्मनिभाननः ।
अभवन्न्यस्तसंतापो जितक्रोधो जितेन्द्रियः ॥ ८ ॥
उनके हाथोंमें दण्ड, बाण, ढाल और तलवार—ये आयुध शोभा पाते थे। उन्होंने शिखा धारण कर रखी थी। उनका मुख कमलके समान कान्तिमान् था। वे संतापरहित, क्रोधको जीतनेवाले तथा जितेन्द्रिय थे ॥ ८ ॥

यजते पुष्करे ब्रह्मा मेधया सह संगतः ।
इन्द्रप्रोक्तानि सामानि गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥ ९ ॥
वहाँ पुष्करतीर्थमें ब्रह्माजी मेधाके साथ बैठकर यज्ञ करने लगे और बहुत-से ब्रह्मवादी मुनि इन्द्रकथित साममन्त्रोंका गान करने लगे ॥ ९ ॥


१. वेदमन्त्रोंके उच्चारणकी विधिमें स्वरप्रदर्शनके पाँच प्रकार ही यहाँ पाँच स्वर कहे गये हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, एकश्रुति और प्रचय ।


घृतं क्षीरं यवा व्रीहिः सर्वं परमकं हविः ।
वेदप्रोक्तं मखे न्यस्तं कल्पितं ब्रह्मणः पदे ॥ १० ॥
उस यज्ञमें घृत, खीर, जौ, चावल आदि सब उत्तमोत्तम हविष्य, जिसका वेदमें वर्णन किया गया है, ब्रह्माजीके निकट सजाकर रखा गया था ॥ १० ॥

निर्मथ्यारणिमाग्नेयीं शमीगर्भसमुत्थिताम् ।
स ब्रह्मा प्रथमं तस्मिन्नग्निमग्र्यं प्रवर्तयत् ॥ ११ ॥
शमीके गर्भसे उत्पन्न हुई अग्निसम्बन्धिनी अरणीका मन्थन करके ब्रह्माजीने उस यज्ञमें एक दूसरे ही प्रधान अग्निको प्रकट किया ॥ ११ ॥

न ह्यल्पं विहितं द्रव्यं यथानिर्यक्षकर्मणि ।
प्रवर्तयेद् विभागैर्वा हुतद्रव्यमयं बलम् ॥ १२ ॥
जैसे यक्षकर्ममें मन्थनसे प्रकट हुए अग्निदेवको स्थापित करके उन्हें ही हवनीय पदार्थकी आहुति देनेका विधान है, उसी प्रकार वहाँ अल्प द्रव्य देनेकी विधि नहीं है । यज्ञ करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह हुत द्रव्यमय बलको विभागपूर्वक प्रकट करे ॥ १२ ॥

फलानि तैः प्रयुक्तानि हवींषि विततेऽध्वरे ।
प्रयुञ्जते प्रयोगज्ञा मुनयो ब्रह्मवादिनः ॥ १३ ॥
उस विशाल यज्ञमें जिन-जिन विहित हविष्योंका उपयोग किया गया उनके द्वारा उनके यथायोग्य फल भी प्रकट हुए। प्रयोगके ज्ञाता ब्रह्मवादी मुनि ही उन हविष्योंका प्रयोग करते थे ॥ १३ ॥

षण्मासांश्चतुरो वेदान् सम्बभाषे बृहस्पतिः ।
ब्रह्मणो वितते यज्ञे परया ब्रह्मसम्पदा ॥ १४ ॥
उत्तम ब्रह्म-सम्पत्तिसे युक्त ब्रह्माजीके उस विस्तृत यज्ञमें देवगुरु बृहस्पतिने छः मासतक चारों वेदोंका प्रवचन किया ॥

शिक्षाक्षरसमेताया मधुरायाः समन्ततः ।
सानुखरितरामायाः सरस्वत्याः प्रभाषते ॥ १५ ॥
वे उपनिषद् और कर्मकाण्डके द्वारा अत्यन्त रमणीय तथा शिक्षाके अक्षरोंसे युक्त मधुर वेदवाणीका सब ओर प्रवचन करते थे ॥ १५ ॥

तेन ब्राह्मणशब्देन ब्रह्मप्रोक्तेन भारत ।
विभाति स मखो व्यक्तं ब्रह्मलोक इवापरः ॥ १६ ॥
भारत ! ब्राह्मण-मन्त्रोंके पाठ और वेदोंके उस प्रवचनसे वह विशाल यज्ञमण्डप निश्चय ही दूसरे ब्रह्मलोकके समान शोभा पाता था ॥ १६ ॥

मखो ब्रह्ममुखोत्तीर्णो ब्रह्मशब्दैरनामयैः ।
प्रयोगैः सम्प्रयुक्तः स जहपन्निव विवर्धते ॥ १७ ॥
ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट (अथवा ब्रह्माजीकी प्रधानतामें सम्पादित) हुआ वह यज्ञ अनामय (अप्रामाणिकताकी

भविष्यपर्व ] त्रयोविंशोऽध्यायः ८०९


आशङ्कासे रहित) वेदके शब्दों और श्रुतिके अनुसार विनि-युक्त (प्रयुक्त) हुए मन्त्रोंद्वारा सम्यक्रूपसे अनुष्ठानमें लाया जाकर बोलता हुआ-सा उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त हो रहा था ॥ १७ ॥

समिद्भिः सोमकलशैः पात्रैश्चैव वहिश्चरैः।
यवैव्रीहिभिराज्यैश्च पूर्णैश्च जलभाजनैः ॥ १८ ॥

उस यज्ञमे समिधाएँ, सोमरस रखनेके लिये कलश, स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञपात्र, बाह्यपात्र, जौ, व्रीहि, घृत तथा जलसे भरे हुए पात्र रखे हुए थे, जिनसे उस यज्ञकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १८ ॥

कर्म प्राप्तैश्च वसुभिः कर्मभिश्च परान्वितैः।
गोभिः पयस्विनीभिश्च परिवत्सैश्च कोमलैः ॥ १९ ॥

सब ओरसे प्राप्त हुए सुवर्ण आदि रत्नों, परमात्माको समर्पित करके किये गये इष्टि आदि कर्मों, दूधके लिये लायी गयी दुधारू गोओं और उनके कोमल बछड़ोंसे सुशोभित हुए उस यज्ञकी उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही थी ॥ १९ ॥

ब्रह्मवृद्धो वयोवृद्धस्तपोवृद्धश्च भारत।
ब्रह्मज्ञानमयो देवो विद्यया सह संगतः ॥ २० ॥

भारत ! वेदमन्त्रोंकी ध्वनिसे, दक्षिणारूपी वयसे तथा तपस्या (ज्ञान) से बढ़े हुए वे ब्रह्मज्ञानमय यज्ञदेव विद्या (यज्ञकर्मकी अङ्गभूत उद्गीथ आदिकी उपासना) से संयुक्त हो उत्तरोत्तर बढ़ रहे थे ॥ २० ॥

मानसैश्च क्रियामूर्त्तिर्यै च भूताः स्वयं नृप।
ग्रहा जुहोति तांस्तत्सान्मरुद्भिः सहितस्तदा ॥ २१ ॥

नरेश्वर ! उस समय यज्ञात्मा ब्रह्मा मरुद्गणोंके साथ रहकर मनःकल्पित समिधा आदि उपकरणोंसे युक्त जो स्वयं उनसे प्रकट हुए घृत आदि हवनीय पदार्थ थे, उनकी अग्निमें आहुति देने लगे ॥ २१ ॥

तेजोमूर्तिधरै रूपैर्न च तत्कर्मणास्पृशत्।
वेदप्रोक्तेन विधिना सर्वप्राणभृतां नृप ॥ २२ ॥

जनमेजय ! वेदोक्त विधिसे किया गया और तेजोमय (चिन्मय) मूर्ति धारण करनेवाले द्रव्य-देवता आदि याग-सम्बन्धी रूपोंसे युक्त हुआ ब्रह्माजीका वह यज्ञ समस्त प्राणियोंके कर्मसे अछूता रह गया (अर्थात् उनका यज्ञकर्म सबसे उत्कृष्ट था) ॥ २२ ॥

निर्मथ्यारणिमाग्नेयीं शमीगर्भसमुत्थिताम्।
ऋतुना यजते पूर्णमग्निष्टोमेन स प्रभुः ॥ २३ ॥

वे भगवान् ब्रह्मा शमीगर्भ (अश्वत्थ) से उत्पन्न हुई अग्निसम्बन्धिनी अरणीका मन्थन करके (प्रकट की हुई अग्निमें ही) अग्निष्टोम यागद्वारा पूर्ण विधिके साथ यजन कर रहे थे ॥ २३ ॥


सदस्यैस्तत्सदो व्यक्तं शुशुभे यज्ञकर्मणि।
जल्पन्ति मधुरा वाचः सानुसाराः क्रियास्तथा ॥ २४ ॥

उस यज्ञकर्मके सम्पादनकालमें सदस्योंसे भरा हुआ वह यज्ञसभाका मण्डप बड़ी शोभा पा रहा था। वहाँ सब लोग बड़ी मधुर वाणी बोलते थे तथा सहायकोंसहित सारी क्रियाएँ सम्पन्न हो रही थीं ॥ २४ ॥

कर्मभिश्च तपोयुक्तैर्वेदवेदाङ्गपारगैः।
सूर्येन्दुसदृशै राजन् विरराज महाक्रतुः ॥ २५ ॥

राजन् ! वह महायज्ञ वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् तथा सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी ब्राह्मणोंद्वारा किये गये तपोयुक्त कर्मोंद्वारा बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २५ ॥

ब्रह्मघोषेण महता ब्रह्मावास इवापरः।
वसुधामिव सम्प्राप्तैः सर्वैरेव दिवौकसैः ॥ २६ ॥

वेदोंके महान् घोषसे वह यज्ञशाला दूसरे ब्रह्मलोककी भाँति जान पड़ती थी। उस समय सारे देवता भूतलपर आये प्रतीत होते थे ॥ २६ ॥

वेदवेदाङ्गविद्विद्भिस्त्रिनीतैर्ब्रह्मवादिभिः।
गतागतैस्तपःश्रान्तैः स्वर्गलोके महीयते ॥ २७ ॥

वेदवेदाङ्गोंके ज्ञाता, विनयशील एवं ब्रह्मवादी ऋषि, जो तपस्या करते-करते दुर्बल हो गये थे, उस यज्ञमें आते-जाते दिखायी देते थे। उनके कारण वह यज्ञ ऐसी शोभा पाता था मानो स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हुआ हो ॥ २७ ॥

ज्वलद्भिरिव विप्रैस्तैस्त्रिभिरेवाध्वरेऽग्निभिः।
ब्रह्मलोक इवाभाति ब्रह्मणः स महाक्रतुः ॥ २८ ॥

ब्रह्माका वह महान् यज्ञ तेजस्वी ब्राह्मणों और यज्ञस्थलमें प्रज्वलित होनेवाली त्रिविध अग्नियोंसे ब्रह्मलोककी भाँति प्रकाशित हो रहा था ॥ २८ ॥

इन्द्रप्रोक्तानि सामानि गायन्ति ब्रह्मवादिनः।
वचनानि प्रयुक्तानि यजूंषि विततेऽध्वरे ॥ २९ ॥

उस विस्तृत यज्ञमें ब्रह्मवादी मुनि इन्द्रकथित साममन्त्रोंका गान और यजुर्वेदके वाक्योंका पाठ कर रहे थे ॥ २९ ॥

तपःशान्ता ब्रह्मपराः सत्यव्रतसमाहिताः।
आययुर्मुनयः सर्वे मनोभिः श्रोत्रवादिभिः ॥ ३० ॥

वहाँ तपस्यासे शान्त, ब्रह्मपरायण तथा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर रहनेवाले समस्त मुनि सुनी हुई बातोंका अनुसरण करनेवाले मानसिक संकल्पके द्वारा आ पहुँचे थे ॥ ३० ॥

होता चैवाभवद्राजन् ब्रह्मत्वे च बृहस्पतिः।
सर्वधर्मविदां श्रेष्ठः पुराणो ब्रह्मसम्भवः ॥ ३१ ॥

राजन् ! उस यज्ञमें सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ तथा ब्रह्मपुत्र अङ्गिराके आत्मज पुरातन ऋषि बृहस्पति होता थे और वे ही ब्रह्माके पदपर भी प्रतिष्ठित थे ॥ ३१ ॥

८१० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


यजमानश्च यज्ञान्ते विष्णोः पूजां प्रयुज्य च।
अदित्याः पश्चिमे गर्भे तपसा सम्भृते नृप ॥ ३२ ॥
नरेश्वर ! यज्ञके अन्तमें भगवान् विष्णुकी पूजा करके यजमान ब्रह्मा तपस्यासे पुष्ट हुए अदिति देवीके पिछले गर्भमें अवतीर्ण हुए ॥ ३२ ॥

पदं विष्णुरजो ब्रह्मा निर्द्वन्द्वं निष्परिग्रहम्।
यतः पदसहस्राणि भविष्यन्त्युद्भवन्ति च ॥ ३३ ॥
परम पद विष्णु हैं। अजन्मा ब्रह्मा उस विष्णुसंज्ञक निर्द्वन्द्व एवं परिग्रहशून्य पदको प्राप्त होते हैं, जहाँसे सहस्रों इन्द्रादि पद प्रकट होते हैं और होते रहेंगे ॥ ३३ ॥

अवन्ध्यं चाप्रमेयं च व्यतिरिक्तं च कर्मभिः।
आत्मापि यस्य मुनयो भवन्ति निष्परिग्रहाः ॥ ३४ ॥
वह विष्णुपद अवन्ध्य है, अर्थात् उसकी प्राप्तिसे समस्त कर्मोंका फल मिल जाता है। वह अप्रमेय (अनन्त) तथा कर्मोंसे असङ्ग है। परिग्रहशून्य मुनि उस विष्णुपदके आत्मा ही होते हैं ॥ ३४ ॥

परिग्रहाश्च विषया दोषप्राप्ता महीपते।
दोषाश्च युगपत् सर्वे छादयन्ति मनो बलात् ॥ ३५ ॥
पृथ्वीनाथ ! सब ओरसे बाँधनेवाले रूप आदि विषय राग आदि दोषोंसे ही प्राप्त होते हैं। समस्त दोष पूर्व संस्कारके बलसे मनको आच्छादित कर लेते हैं ॥ ३५ ॥

इन्द्रियग्रामविषये चरन्तो निष्परिग्रहाः।
परिग्रहं शुभं धर्ममविद्यालक्षणं विदुः ॥ ३६ ॥
मुनिगण इन्द्रिय-समूहोंके विषयोंमें विचरते हुए भी परिग्रहशून्य ही होते हैं (वे उनमें कभी आसक्त नहीं होते)। ज्ञानी पुरुष वेदबोधित धर्मको शुभ मानते हैं, किंतु परिग्रह को अविद्या (अज्ञान) का लक्षण समझते हैं ॥ ३६ ॥

विद्यालक्षणसंयोगान्न मनश्छाद्यते नृप।
यदि चेन्मुनिशब्देन गृह्यते ब्रह्मवादिभिः ॥ ३७ ॥
नरेश्वर ! यदि ब्रह्मवादी पुरुष मुनित्वकी प्राप्ति करानेवाले शब्द (तत्त्वमसि आदि वाक्य अथवा प्रणवके उपदेश) से साधकको अनुगृहीत कर लेते हैं तो (वह उसके मननसे तत्त्वज्ञानी हो जाता है, उस दशामे) विद्याके लक्षणसे संयुक्त होनेके कारण उसके मनको राग आदि दोष नहीं आच्छादित करते हैं ॥ ३७॥

वेदविद्याव्रतस्नातैर्नियतैः कुरुसत्तम।
दिवि लोकाः सतां स्थानं लोकानां लोक उच्यते ॥ ३८ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! जो वेदविद्या एवं ब्रह्मचर्य-व्रतको पूर्ण करके उसमें निष्णात हो चुके हैं तथा शौच-संतोष आदि नियमोंके पालनमें तत्पर रहते हैं, वे कर्मठ पुरुष स्वर्गमें सत्पुरुषोंके रहनेके लिये जो लोक या स्थान हैं, उन्हींको-लोक कहते हैं ॥

यत्र देवा हव्यपुष्टा न क्षयं यान्ति भारत।
यजमानश्च भोगैः स्वैः कर्मप्राप्तोदिते पदे।
मोदते सह पत्नीभिर्निर्ज्वरो वसुधाधिप ॥ ३९ ॥
भारत ! उनकी दृष्टिमें लोक वही है, जहाँ हविष्यसे पुष्ट हुए देवता कभी नष्ट नहीं होते हैं। पृथ्वीनाथ ! यज्ञ करनेवाला यजमान भी वहाँ कर्मानुसार प्राप्त और वहाँके अधिकारियोंद्वारा अनुमोदित पदपर प्रतिष्ठित हो अपने लिये नियत भोगों एवं पत्नियोंके साथ निश्चिन्त होकर सुख भोगता एवं आनन्दमग्न रहता है ॥ ३९ ॥

यज्ञावसाने शैलेन्द्रं द्विजेभ्यः प्रददौ प्रभुः।
दयया सर्वभूतानां निर्मलेनान्तरात्मना ॥ ४० ॥
यज्ञके अन्तमें सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्माने अपने निर्मल अन्तःकरणसे समस्त प्राणियोंपर दया करके वह श्रेष्ठ पर्वत द्विजोंको दे दिया ॥ ४० ॥

तं शैलं सर्वगात्राणि परस्परविशेषिणः।
न शेकुः प्रविभागार्थं भेत्तुं सर्वोद्यमैरपि ॥ ४१ ॥
एक-दूसरेकी अपेक्षा विशिष्ट योग्यतावाले वे ब्राह्मण आपसमें बाँटनेके लिये उस पर्वतके सभी अङ्गोंका भेदन करनेको उद्यत हुए; परंतु सब प्रकारसे उद्योग करके भी उसे तोड़नेमें समर्थ न हो सके ॥ ४१ ॥

ततस्ते ब्राह्मणगणा निषेदुर्वसुधातले।
श्रमेणाभिहताः सर्वे विवर्णवदना नृप ॥ ४२ ॥
नरेश्वर ! तब परिश्रमके मारे हुए वे समस्त ब्राह्मण थककर पृथ्वीपर बैठ गये। उस समय उनके मुख कान्तिहीन (उदास) हो गये थे ॥ ४२ ॥

सुपार्श्वो गिरिमुख्यस्तु वाग्भिर्मधुरभाण्डता।
अब्रवीत् प्रणतः सर्वाञ्छिरसा तान् द्विजोत्तमान् ॥ ४३ ॥
तब पर्वतोंमें श्रेष्ठ सुपार्श्व, जो मीठे वचन बोलनेवाला था, उन समस्त ब्राह्मणशिरोमणियोंको मस्तक नवाकर प्रणाम करके बोला—॥ ४३ ॥

न हि शक्यो बलाद् भेत्तुं युष्माभिरसुसङ्गिभिः।
अपि वर्षशतैर्दिव्यैः परस्परविरोधिभिः ॥ ४४ ॥
'ब्राह्मणो ! आपलोग प्राणों (इन्द्रियों) में आसक्त हैं, अतएव एक दूसरेके विरोधी हो रहे हैं। आप-जैसे लोग सौ दिव्य वर्षोंतक प्रयत्न करते रहें तो भी इस पर्वतका बलपूर्वक भेदन नहीं कर सकते ॥ ४४ ॥

एकीभूता यदा सर्वे भविष्यथ समाहिताः।
अविरोधेन युगपद् विभजिष्यथ निर्वृताः ॥ ४५ ॥
'जब सब लोग एकीभूत एवं एकाग्रचित्त हो जायेंगे और पारस्परिक विरोधको हटाकर एक साथ प्रयत्न करेंगे, तब सुखपूर्वक इस पर्वतका विभाजन कर सकेंगे ॥ ४५ ॥

भविष्यपर्व ] चतुर्विंशोऽध्यायः ८११

बलं हि रागद्वेषाभ्यां वर्धते ब्रह्मसत्तमाः।
विमुक्तं रागदोषाभ्यां ब्रह्म वर्धति शाश्वतम् ॥ ४६ ॥

'ब्राह्मणशिरोमणियो ! राग और द्वेषसे बलका नाश होता है, परंतु यदि अपना चित्त राग और द्वेषसे मुक्त हो तो सनातन ब्रह्मके प्रति साधककी निष्ठा बढ़ती है ॥ ४६ ॥

यदाहं भेदयिष्यामि खर्गभिन्नैः शिलाशतैः।
धातुभिश्च विसर्पद्भिः शिखरैश्चानुपातिभिः ॥ ४७ ॥
विशीर्णैः पार्श्वविवरैर्नागैश्च गलितैर्भुवि।
बहुभिर्व्यालरूपैश्च चोद्यमानो गुहाशयैः ॥ ४८ ॥

'जब मैं इस पर्वतकी गुफामें शयन करनेवाले बहुसंख्यक हिंसक जन्तुओं—व्याघ्र, सिंह और सर्प आदिसे प्रेरित होकर आपलोगोंको इस पर्वतके भेदनमें लगाऊँगा, तभी आपलोग इसके भेदनमें समर्थ हो सकेंगे। उस समय स्वर्गसे भिन्न इसकी सैकड़ों शिलाएँ बिखर जायँगी। लगातार गिरते हुए शिखरोंके साथ सरकती हुई धातुएँ भी छिन्न-भिन्न हो जायँगी। जीर्ण-शीर्ण हुए पार्श्ववर्ती विवरोंके साथ उनमें रहनेवाले नाग भी पृथ्वीपर गिरते दिखायी देंगे। (आध्यात्मिक दृष्टिसे यहाँ सुपार्श्व पर्वत सद्गुरु है; जिसका भेदन करना है, वह पर्वत अभिमान है। वे ब्राह्मण ज्ञानयोगी साधक हैं तथा पर्वतकी गुफामें शयन करनेवाले हिंसक जन्तु अन्तःकरणमें संचित हुए नाना प्रकारके संस्कार हैं) ॥ ४७-४८ ॥

प्रतिगृह्य च तद् वाक्यं शैलेन्द्रस्य सुभाषितम्।
तूष्णीं बभूवुस्ते सर्वे तदा ब्राह्मणसत्तमाः ॥ ४९ ॥

शैलराज सुपार्श्वका कहा हुआ वह उत्तम वचन ग्रहण करके वे समस्त ब्राह्मणशिरोमणि उस समय चुप हो गये ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥


चतुर्विंशोऽध्यायः

चारों आश्रमोंमें स्थित हुए ब्राह्मणोंकी ब्रह्माजीके यज्ञस्थलके पुण्य-प्रदेशमें निवासकी इच्छा

वैशम्पायन उवाच
बलिहोमाश्च वर्धन्ते अह्न्यहनि भारत।
द्विजानां तपसाढ्यानां गृहधर्मेषु तिष्ठताम् ॥ १ ॥
देवतार्थाश्च पूज्यन्ते तदा प्रभृति भारत।
तेषां ब्रह्मविदां राजन् पृथिव्यां ब्रह्मवादिभिः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन ! तभीसे वे तपोधन ब्रह्मवेत्ता द्विज गृहस्थ-धर्ममे स्थित हो गये। उनके घरमे प्रतिदिन बलिवैश्वदेव और होम आदि कर्मोंका विस्तार होने लगा। राजन्! तभीसे उन ब्रह्मवादियोंद्वारा भूतलपर देव-प्रतिमाओंकी पूजा भी की जाने लगी ॥ १-२ ॥

तत्रैव ब्रह्मसदने समे निस्तृणकण्टके।
प्राज्येन्धनतृणे देशे पुण्ये पर्वतरोधसि ॥ ३ ॥
वासं तत्र प्रकुर्वन्ति दृष्ट्वा भगवतः क्रियाम्।
तपोऽर्थिनो महाभागा ब्रह्मचर्यव्रते स्थिताः ॥ ४ ॥
गृहस्थधर्मनिरता दानप्राप्तेन चेतसा।
यतयश्चापि काङ्क्षन्ति धर्मेणेह विकाङ्क्षिणः ॥ ५ ॥

ब्रह्माजीके निवासस्थानभूत उस पुण्य प्रदेशमें ही पूर्वोक्त पर्वतके समतल तटपर, जहाँ काँटेदार तृणोंका अभाव है तथा ईंधन और घास आदि प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते हैं; भगवान् ब्रह्माका वह यज्ञकर्म देखकर वे तपस्याकी कामनावाले महाभाग ब्राह्मण ब्रह्मचर्य-व्रतके पालनमें तत्पर रहकर निवास करने लगे। कुछ ब्राह्मण शुद्ध चित्तसे गृहस्थ-धर्मके अनुष्ठानमें संलग्न हो वहाँ वास करने लगे तथा आकाङ्क्षाका परित्याग करनेवाले यतियोंके मनमें भी वहाँ धर्मपूर्वक निवास करनेकी अभिलाषा जाग्रत् हो गयी ॥ ३-५ ॥

वन्यैः कर्मफलैश्चैव रता ब्राह्मणपुङ्गवाः।
अग्निहोत्रव्रतस्नाता जितक्रोधाः समाहिताः ॥ ६ ॥

जो जंगली फल-मूलोंसे जीवन-निर्वाह करते हुए वानप्रस्थोचित कर्म करते थे, अग्निहोत्रके नियममें निष्णात थे, क्रोधको जीतकर चित्तको एकाग्र रखनेवाले थे, वे ब्राह्मण-शिरोमणि भी वहीं रहनेकी इच्छा करने लगे ॥ ६ ॥

दैवयुक्तेन वा युक्ताः कर्मणा ब्रह्मसत्तमाः।
चीरवल्कलसंवीता नियता नियतेन्द्रियाः ॥ ७ ॥
चरन्तो ब्रह्मचर्यं च व्रतमास्थाय दारुणम्।

जो दैवात् प्राप्त हुए (बिना माँगे मिले हुए) अथवा याचनाकर्मसे उपलब्ध हुए अन्नसे जीवन-निर्वाह करते थे, चीर और वल्कल पहनते थे तथा नियमपरायण होकर इन्द्रियोंको संयममें रखते थे, वे श्रेष्ठ ब्राह्मण भी वहीं रहनेकी इच्छा करने लगे। जो कठोर व्रतका आश्रय ले ब्रह्मचर्यका पालन करते थे, उन्हे भी वहीं रहनेकी इच्छा हुई ॥

अनेन विधिना राजन् कर्मप्राप्तेन सर्वशः ॥ ८ ॥
क्रमाद् वेदसंस्कारं पुण्यं प्राप्ताः सनातनम्।
पूर्वैराचरितं राजन् मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ ९ ॥

राजन् ! इस विधिसे क्रमशः प्राप्त आश्रमधर्मका पूर्णतः पालन करते हुए जिन लोगोंने प्राचीन ब्रह्मवादी मुनियोंद्वारा

८१२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आचरणमें लाये हुए पवित्र सनातन वेद-संस्कारको क्रमसे उपलब्ध किया था, वे भी वहीं रहनेकी इच्छा करने लगे ॥

नावेदविद्वानागच्छेन्नापि रौद्रं व्रतं चरेत्।
न च त्यागेन गच्छेत गृहधर्मं न च त्यजेत् ॥ १० ॥

सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त किये बिना मनुष्यको ( ब्रह्मचर्याश्रमसे ) गृहस्थाश्रममें नहीं आना चाहिये। वह कठोर व्रत ( वानप्रस्थोचित तप ) भी न करे। संन्यास-मार्गका भी अवलम्बन न करे और न गृहस्थधर्मका परित्याग ही करे ( वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके विवेकपूर्वक ही उसे एक आश्रमका त्याग और दूसरेका ग्रहण करना चाहिये ) ॥ १० ॥

नैव गच्छेत दुःस्थानमप्राप्तो वेदसंचयम्।
ऋचश्च संचयः पूर्वः सामगानां च भारत ॥ ११ ॥

भारत ! वैदिक ज्ञानराशिको उपलब्ध किये बिना किसीको, जिसमें स्थिर रहना कठिन है, उस चतुर्थ आश्रममें भी नहीं जाना चाहिये। बह्वृचों, सामगों और यजुर्वेदियोंको भी पहले ऋचाओंके ही ज्ञानका संचय करना चाहिये ॥ ११ ॥

ये चापि पुत्रिणो न स्युः श्रुत्वापि प्राप्नुयुः फलम्।
ब्राह्मणास्तपसा श्रान्ता गुरोश्च परिचर्यया ॥ १२ ॥

जो लोग पुत्रवान् नहीं हुए हैं अर्थात् जिन्होंने गृहस्थाश्रममें प्रवेश नहीं किया है, वे लोग वेदान्त श्रवण करके भी उसके फलस्वरूप ज्ञानको प्राप्त कर सकते हैं। तपस्या तथा गुरुकी सेवाका श्रम स्वीकार करनेवाले ब्राह्मण भी वेदान्त श्रवण करके उसके फलस्वरूप ज्ञानको पा सकते हैं ॥ १२ ॥

यस्य नैव श्रुतं ब्रह्म न गृहीतं विशाम्पते।
कामं तं धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारयेत् ॥ १३ ॥

प्रजानाथ ! जिसने गुरुके मुखसे वेदका श्रवण और उसके ज्ञानको श्रवण नहीं किया, उस ब्राह्मणसे धर्मात्मा राजा अपनी इच्छाके अनुसार शूद्रोचित कर्म करावे ॥ १३ ॥

अथवा नैव विद्येत यद् ब्रह्म नाद्रियेद् द्विजः।
द्वाभ्यां तु श्रोत्रविषये मनः पूर्वं समाहितम् ॥ १४ ॥

अथवा यदि द्विज ब्राह्मण होकर भी वेदका आदर न करे तो उसमें ब्राह्मणत्व है ही नहीं। जिसने ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य दोनों अवस्थाओंमें श्रवण करने योग्य धर्म एवं ब्रह्ममें पहलेसे ही ( अध्ययनाध्यापनके समयसे ही ) मन एकाग्र किया है, वही ब्राह्मण है ( अतः राजाको उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये ) ॥ १४ ॥

एवं सर्वेन्द्रियारम्भान् वेदपूर्वान् समाचरेत्।
ब्राह्मणो भूतिसम्पन्नो य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ १५ ॥

अतः जो वैभवसम्पन्न ब्राह्मण अपना कल्याण चाहता हो, वह इस प्रकार सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे आरम्भ होनेवाले कार्योंको वेदाध्ययनपूर्वक ही करे ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥


पञ्चविंशोऽध्यायः

नारद आदिके द्वारा ब्राह्मणों तथा ब्रह्माजीका सत्कार, ब्रह्माजीके द्वारा कश्यपको यज्ञका आदेश, देवता-दानव-युद्ध तथा विष्णुके द्वारा मधुकी पराजय

वैशम्पायन उवाच

ते तु गोब्राह्मणा नागाश्चन्द्रादित्यपुरस्कृताः।
ब्राह्मणान् पूजयन् देवान् वसुभिर्ब्रह्मसम्भवैः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! चन्द्रमा और सूर्यको आगे करके उपस्थित हुए नागों, गौओं और ब्राह्मणोंने ब्रह्मसम्पत्तिके द्वारा देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥

नारदप्रमुखाश्चैव गन्धर्वा ऋषयो नृप।
कुर्वन्ति सततं यज्ञे क्रमप्राप्तं पितामहम् ॥ २ ॥

नरेश्वर ! उस यज्ञमें नारद आदि गन्धर्व एवं ऋषि सदा ब्राह्मणपूजाके क्रममें आये हुए ब्रह्माजीकी भी पूजा करते थे ॥

वचोभिर्मधुराभाषैः पञ्चेन्द्रियनिवासिभिः।
सर्वभूतप्रियकरैः सर्वभूतहितैषिभिः ॥ ३ ॥
स्तूयमानश्च यज्ञान्ते पञ्चेन्द्रियसमाहितैः।
प्रोवाच भगवान् ब्रह्मा दिष्ट्या दिष्ट्येति भारत ॥ ४ ॥

भारत ! यज्ञके अन्तमें पाँचों इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले, समस्त प्राणियोंका प्रिय करनेवाले, सब भूतोंका हित चाहनेवाले तथा पाँचों इन्द्रियोंको एकाग्र करके योगयुक्त होनेवाले मधुरभाषी ब्राह्मणोंके वचनोंसे प्रशंसित हुए भगवान् ब्रह्मा कहने लगे--'अहो भाग्य ! अहो भाग्य !' ॥ ३-४ ॥

ततः कश्यपमाभाष्य प्रोवाच भगवान् प्रभुः।
भवानपि सुतैः सार्धं यक्ष्यते वसुधातले ॥ ५ ॥
क्रतुभिः परमप्राप्तैः सम्पूर्णवरदक्षिणैः।

तदनन्तर सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्माने कश्यपजीको सम्बोधित करके कहा--'तुम भी अपने पुत्रोंके साथ भूतलपर पूर्ण एवं उत्तम दक्षिणावाले श्रेष्ठ यज्ञोंका अनुष्ठान करोगे' ॥

भविष्यपर्व ] पञ्चविंशोऽध्यायः ८१३

यक्षाः सुराश्च ते सर्वे यथा प्रतिगुणैः प्रभो ॥ ६ ॥
वयं यक्ष्यामहे पूर्वं पूर्वं यक्ष्यामहे वयम् ।
एवमन्योन्यसंरम्भाद् विद्यन्ते बलदर्पिताः ॥ ७ ॥

प्रभो ! उस समय यक्ष और समस्त देवता परस्पर विरोधी गुणोंद्वारा प्रेरित हो इस प्रकार कहने लगे, ‘पहले हम यज्ञ करेंगे, पहले हम यज्ञ करेंगे।’ इस तरह एक दूसरेके प्रति रोषमें भरकर वे बलके घमंडसे उन्मत्त हो गये थे ॥

दैतेयाश्चाप्यदैतेयाः परस्परजयैषिणः ।
युद्धायैव प्रतिष्ठन्ति प्रगृह्य विपुलौ भुजौ ॥ ८ ॥

दैत्य और देवता एक दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अपनी विशाल भुजाओंको उठाकर युद्धके लिये ही प्रस्थान करने लगे ॥ ८ ॥

निवार्यमाणा ऋषिभिस्तपसा दग्धकिल्बिषैः ।
अन्यैश्च विविधैर्विप्रैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ९ ॥
निवार्यमाणा युध्यन्ते वृषभा इव गोकुले ।
प्रयुद्धा युद्धसंक्रान्ताः सर्वे प्राणजयैषिणः ॥ १० ॥

तपस्यासे जिनके पाप दग्ध हो गये थे, उन ऋषियों तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी विद्वान् अन्यान्य अनेकों ब्राह्मणोंके मना करनेपर भी वे गोशालामें परस्पर भिड़नेवाले साँड़ोंके समान एक-दूसरेसे युद्ध करने लगे। धीरे-धीरे उनके युद्धने जोर पकड़ लिया। वे सब-के-सब युद्धकी ज्वालासे आक्रान्त हो परस्पर प्राण लेनेके लिये उतारू हो गये ॥ ९-१० ॥

पश्यतां सर्वभूतानां मृत्योर्विषयमागताः ।
ततः शब्देन महता परं कृत्वा महाबलाः ॥ ११ ॥
रुन्धन्ति बाहुभिः क्रुद्धाः सपक्षा इव पक्षिणः ।

सब प्राणियोंके देखते-देखते वे मृत्युके राज्यमें आ गये। फिर तो महान् सिंहनाद करके वे महाबली देवता, दानव परस्पर कुपित हो पंखधारी पक्षियोंके समान अपनी भुजाओं-द्वारा एक दूसरेको रोकने लगे ॥ ११३ ॥

चचाल वसुधा चैव पादाक्रान्ता च रोषिभिः ॥ १२ ॥
नौर्यथा पुरुषाक्रान्ता निषीदति महाजले ।

रोषमें भरे हुए उन योद्धाओंके पैरोंसे आक्रान्त हो सारी पृथ्वी विचलित हो उठी। जैसे बहुसंख्यक पुरुषोंके भारसे दबी हुई नौका गहरे जलमें डगमगाने लगती है, वही दशा पृथ्वीकी हुई ॥ १२३ ॥

पर्वताश्च विशीर्यन्ते नर्दमाना गजा इव ॥ १३ ॥
चुक्षुभुश्च महानद्यस्ताडिता मातरिश्वना ।

चिंघाड़ते हुए हाथियोंके समान भारी आवाजके साथ बड़े-बड़े पर्वत विदीर्ण होकर ढहने लगे। वायुके झोंके खाकर बड़ी-बड़ी नदियां विक्षुब्ध हो उठीं ॥ १३३ ॥

ततः समभवद् युद्धं मधोर्विष्णोश्च भारत ॥ १४ ॥
युगान्तकरणं घोरं सर्वप्राणिभयंकरम् ।

भारत ! तब मधु और विष्णुका युगान्तकारी घोर युद्ध होने लगा, जो समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर था ॥ १४३ ॥

प्रममाथ मधोर्विष्णुः समग्रं बलपौरुषम् ॥ १५ ॥
वह्नेरिव बलं दीप्तं शमयत्यम्बुना यथा ।
तथा प्रशमितं तेन प्रभुणा ह्युपकारिणा ॥ १६ ॥

भगवान् विष्णुने मधुके समस्त बल-पौरुषको मथ डाला। जैसे अग्निका प्रज्वलित हुआ तेजरूपी बल जलसे बुझ जाता है, उसी प्रकार सबका उपकार करनेवाले भगवान् विष्णुने मधुके बल-पराक्रमको शान्त कर दिया ॥ १५ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥


षड्विंशोऽध्यायः

मधु और विष्णुका घोर युद्ध, देवताओं और ऋषियोंद्वारा श्रीविष्णुकी स्तुति, हयग्रीवरूपधारी विष्णुद्वारा मधुका वध और पृथ्वीको मेदिनी नामकी प्राप्ति

वैशम्पायन उवाच
बलवान् स तु दैतेयो मधुर्भीमपराक्रमः ।
बबन्ध पाशैर्निशितैर्महेन्द्रं पर्वतान्तरे ॥ १ ॥
तं वै प्रह्लादवचनाल्लक्षणज्ञश्च भारत ।
ऐश्वर्यमैन्द्रमाकाङ्क्षन् भविष्यं बुद्धिसंक्षयात् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भयंकर पराक्रमी बलवान् मधु दैत्यने प्रह्लादके कहनेसे देवराज इन्द्रको पर्वतके भीतर तीखे पाशोंसे बाँध लिया। भारत ! वह लक्षणोंका ज्ञाता था, परंतु उसकी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये उसने भविष्यमें इन्द्रके ऐश्वर्यकी अभिलाषा रखकर उन्हें बाँधा था ॥ १-२ ॥

बद्ध्वेन्द्रं सहसा मध्ये पाशैर्मर्मविर्जितैः ।
आयसैर्बहुभिश्चित्रैर्बलवद्भिर्विदारणैः ॥ ३ ॥
विष्णुमेवाग्रणी रुद्रमाह्वयद् युद्धकोविदः ।
मध्ये गणानां सर्वेषां कालस्य वशमागतः ॥ ४ ॥

लोहेके बने हुए बहुसंख्यक विचित्र प्रबल और विदीर्ण

८१४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करनेवाले मर्मरहित पाशोंमें इन्द्रकी कमरको सहसा बाँधकर दैत्योंके अगुआ युद्धकुशल मधुने, जो कालके वशीभूत हो गया था, समस्त गणोंके बीच रुद्रस्वरूप भगवान् विष्णुको ही ललकारा ॥ ३-४ ॥

द्वैधीभूताः काश्यपेया मधोर्वशमुपागताः ।
युद्धार्थमभ्यधावन्त प्रगृह्य विपुला गदाः ॥ ५ ॥

कश्यपके पुत्र दो भागोंमें विभक्त हो मधुके वशमें आकर बड़ी-बड़ी गदाएँ हाथमें लिये देवताओंके साथ युद्ध करनेके लिये दौड़े ॥ ५ ॥

गन्धर्वाः किन्नराश्चैव वाद्ये गीते च कोविदाः ।
प्रनृत्यन्ति प्रगायन्ति प्रहसन्ति च सर्वशः ॥ ६ ॥

वाद्य और गीतमें कुशल गन्धर्व और किन्नर सब प्रकारसे नाचते, गाते तथा हँसते थे ॥ ६ ॥

तन्त्रीभिः सुप्रयुक्ताभिर्मधुराभिः स्वभावतः ।
मनो मधोर्विधुन्वन्ति युध्यमानस्य रागिणः ॥ ७ ॥

स्वभावतः मधुर एवं सुन्दर ढंगसे बजायी गयी वीणाके तारोंसे मोहक ध्वनि उत्पन्न करके वे युद्धमें लगे हुए रागी मधुके मनको विचलित कर देते थे ॥ ७ ॥

मधोर्बलार्थे मधूनो नियोगात् पद्मयोनिनः ।
एतान् विकारान् कुर्वन्ति गन्धर्वाः सत्यवादिनः ॥ ८ ॥

तमःप्रधान मधुका बल क्षीण करनेके लिये पद्मयोनि ब्रह्माजीकी आज्ञासे सत्यवादी गन्धर्व ये विकार प्रकट करते थे ॥ ८ ॥

तत्र शक्तो हि गान्धर्वे तस्मिञ्छब्दे मधुर्मनः ।
दानवाश्चासुराश्चैव प्रत्यक्षं यान्ति प्राणदन् ॥ ९ ॥

शक्तिशाली मधुने उस संगीतके शब्दमें मन लगाया । दानव और असुर उसके सामने जाते और गर्जना करते थे ॥

मधोश्च मन आक्षिप्य पश्यन् योगेन चक्षुषा ।
मन्दरं प्रयते विष्णुर्गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ १० ॥

इस प्रकार मधुके मनको विषयोंमें विक्षिप्त करके योग-दृष्टिसे देखनेवाले भगवान् विष्णु सहसा मन्दराचलकी ओर चल दिये, मानो अग्नि काष्ठोंमें छिप गयी हो ॥ १० ॥

ऋषयो दीप्तमनसं किंचिद् व्यथितमानसाः ।
पितामहं पुरस्कृत्य क्षणेनान्तरधीयत ॥ ११ ॥

उस समय ऋषियोंके मनमें कुछ व्यथा हुई । वे संतत-चित्त पितामहको आगे करके क्षणभरमें वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ११ ॥

विष्णुं सोऽभ्यहनत् क्रुद्धो मधुर्मधुनिभेक्षणः ।
भुजेन शङ्खदेशान्ते न चकम्पे पदान्पदम् ॥ १२ ॥

इधर क्रोधमें भरे हुए मधु जैसे पिङ्गल नेत्रवाले मधुने भगवान् विष्णुके पास पहुँचकर अपने हाथसे उनकी कनपटी-पर प्रहार किया; परंतु वे एक पग भी विचलित नहीं हुए ॥

विष्णुश्चाप्यहनद् दैत्यं कराग्रेण स्तनान्तरे ।
स पपात महीं तूर्णं जानुभ्यां रुधिरं वमन् ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने भी अपने हाथके अग्रभागसे उस दैत्यकी छातीमें चोट की; फिर तो वह रक्त वमन करता हुआ घुटनोंके बल तुरंत पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १३ ॥

न चैनं पतितं हन्ति विष्णुर्युद्धविशारदः ।
बाहुयुद्धे हि समयं मत्वाचिन्त्यपराक्रमः ॥ १४ ॥

अचिन्त्यपराक्रमी युद्धविशारद भगवान् विष्णुने बाहु-युद्धका अवसर उपस्थित जानकर पृथ्वीपर गिरे हुए उस दैत्यको नहीं मारा ॥ १४ ॥

इन्द्रध्वज इवोत्क्षिप्तो जानुभ्यां स महीतलात् ।
मधू रोषपरीतात्मा निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ १५ ॥

तदनन्तर मधुका हृदय रोषसे भर गया । वह घुटनोंके सहारे पृथ्वीतलसे उठकर खड़ा हो गया, मानो किसीने इन्द्रध्वज फहरा दिया हो । उस समय वह विष्णुकी ओर इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रसे उन्हें जला देगा ॥

परुषाभिस्ततो वाग्भिरन्योन्यमभिगर्जतुः ।
समीयतुर्बाहुयुद्धे परस्परवधैषिणौ ॥ १६ ॥
उभौ तौ बाहुबलिनावुभौ युद्धविशारदौ ।
उभौ च तपसा शान्तावूभौ सत्यपराक्रमौ ॥ १७ ॥

तत्पश्चात् वे दोनों कठोर बातें कहते हुए एक-दूसरेके सामने गर्जने लगे; फिर दोनों दोनोंके वधकी इच्छासे बाहु-युद्धमें परस्पर गूँथ गये । वे दोनों ही बाहुबलसे युक्त और युद्धकला-के विशेषज्ञ थे । दोनों तपस्याके प्रभावसे शान्तचित्त हो गये थे और दोनों ही यथार्थरूपमे पराक्रम प्रकट कर रहे थे ॥

दृढप्रहारिणौ वीरावन्योन्यं विचकर्षतुः ।
शैलेन्द्राविव युद्ध्यन्तौ पक्षैः पाषाणसंनिभैः ॥ १८ ॥

दृढ़तापूर्वक प्रहार करनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेको खींचने लगे, मानो पाषाण-सदृश पंखोंसे युक्त दो पर्वतराज परस्पर युद्ध कर रहे हों ॥ १८ ॥

विकर्षन्तौ वमन्तौ च अन्योन्यं बहुधाहवे ।
गजाविव विषाणाग्रैर्नखाग्रैश्च विचेरतुः ॥ १९ ॥

जैसे दो हाथी अपने दाँतों और नखोंके अग्रभागसे परस्पर प्रहार करते हुए युद्ध-स्थलमें विचरते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर मधु और श्रीविष्णु एक-दूसरेको खींचते और रक्त-वमन करते हुए भूतलपर विचर रहे थे ॥ १९ ॥

ततो व्रणमुखैश्चैव सुस्राव रुधिरं बहु ।
ग्रीष्मान्ते धातुसंसृष्टं शैलेभ्य इव काञ्चनम् ॥ २० ॥

भविष्यपर्व ] पञ्चविंशोऽध्यायः ८१५


तदनन्तर एक-दूसरेके प्रहारसे जो घाव हो गये थे, उनके छिद्रोंसे बहुत रक्त बहने लगा। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षाऋतुमे पर्वतोंसे गैरिक धातुमिश्रित काञ्चन-रस झरता हो ॥ २० ॥

संसिक्तौ रुधिरौघैश्च स्रवद्भिः समरंजितौ ।
अथायतैः पदाग्रैश्च तौ व्यदारयतां महीम् ॥ २१ ॥

वे दोनों झरते हुए रक्तके प्रवाहोंसे भीगकर समानरूपसे रक्तरंजित हो गये। फिर उठते-गिरते हुए पैरोंके अग्रभागोंसे उन दोनोंने वहाँकी भूमि विदीर्ण कर डाली ॥ २१ ॥

अभिहत्य तु तौ वीरौ परस्परमनेकधा ।
पतङ्गाविव युध्येतां पक्षाभ्यां मांसगृद्धिनौ ॥ २२ ॥

एक दूसरेपर बारंबार चोट करके वे दोनों वीर पंखोंसे लड़नेवाले दो मांसलोलुप पक्षियोंकी भाँति युद्ध करने लगे ॥

शुश्रुवुश्चान्तरिक्षेऽथ सर्वभूतानि पुष्करे ।
सिद्धानां वदनोन्मुक्ताः परया वर्णसम्पदा ॥ २३ ॥
स्तुतयो विष्णुसंयुक्ताः सत्याः सत्यपराक्रमे ।

इसी समय पुष्करके आकाशमें सम्पूर्ण भूतोंने भगवान् विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाली स्तुतियाँ सुनीं, जो उन सत्यपराक्रमी भगवान्‌मे यथार्थ रूपसे घटित हो रही थीं। वे स्तुतियाँ सिद्धोंके मुखोंसे निकली थीं और उत्तमोत्तम वर्ण-सम्पत्तिसे सुशोभित थीं ॥ २३३ ॥

शरीरं धातुसंयुक्तं संयुक्तं चेतनेन च ॥ २४ ॥
तद् ब्रह्म इन्द्रियैर्युक्तं तेजोभूतं सनातनम् ।

यह शरीर तेज, जल और अन्न—इन तीन धातुओंका अथवा रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र—इन सात धातुओंका संयोगरूप है। यह चेतनसे संयुक्त है। वह चेतन तेजोभूत सनातन ब्रह्म ही है। जो इन्द्रियोंसे युक्त होकर जीव कहलाता है ॥ २४३ ॥

ध्रुवं तिष्ठन्ति भूतास्ते सूक्ष्मे प्रलयतां गते ॥ २५ ॥
पुनश्चोद्भवते सूक्ष्मं बहुरूपमनेकधा ।

शरीरका आरम्भ करनेवाले वे स्थूलभूत प्रलयके अधिष्ठानभावको प्राप्त हुए सूक्ष्म-कारणमें निश्चय ही स्थित होते हैं। फिर सूक्ष्म ही अनेक रूप धारण करके वारंवार प्रकट होता है ॥ २५३ ॥

प्रबोध्य भावं भूतानां त्रिषु लोकेषु कामदः ॥ २६ ॥
सुरूपो बहुरूपांस्तांल्लोकान् संचरते वशी ।

सबकी कामनाओंको देनेवाले तथा सबको वशमें रखनेवाले असङ्ग परमात्मा तीनों लोकोंमें भूतोंको उनके स्वरूपका बोध कराकर स्वयं सुन्दर रूप धारण करके उन अनेक रूपवाले लोकोंमें विचरते रहते हैं ॥ २६३ ॥

मानसीं तनुमास्थाय बहुभिः कारणान्तरैः ॥ २७ ॥
योगात्मा धारयन्नुर्वी नागात्मानं दिवंधरः ।
ब्रह्म भूतं परं चैव सूक्ष्मेणात्मानमीश्वरः ॥ २८ ॥

योगात्मा ईश्वर, जो देवलोकको धारण करनेवाले हैं, सूक्ष्मरूपसे अपने आपको शेषनागके रूपसे प्रकट करके पृथ्वीको धारण करते हुए विचरते हैं। वे दुष्टनिग्रह और साधु-संरक्षण आदि अनेक कारणोंसे मानसशरीर—शेष, कूर्म आदि रूप धारण करके जगत्‌की रक्षा करते हैं। वे ही वेद, जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणिसमुदाय तथा दूसरे जडभूतोंको धारण करते हैं ॥ २७-२८ ॥

ब्राह्मेण विप्रान् वसति युद्धेनैव च क्षत्रियान् ।
प्रदानकर्मणा वैश्याञ्छूद्रान् परिचरेण च ॥ २९ ॥

वे भगवान् वेदमयरूपसे ब्राह्मणोंका आश्रय लेकर रहते हैं। युद्धरूपसे क्षत्रियोंमें स्थित होते हैं। दानकर्म अथवा वस्तु आदिके आदान प्रदानवाले वाणिज्य कर्मके रूपमें वैश्योंमें निवास करते हैं तथा त्रैवर्णिकोंकी सेवाके रूपमें वे शूद्रोंका आश्रय लेकर रहते हैं ॥ २९ ॥

गावः क्षीरप्रदानेन अश्वान् यज्ञेषु प्रोक्षणैः ।
पितरश्चोष्मपेनैव हविर्भागेन देवताः ॥ ३० ॥

वे गौओंका आश्रय लेकर दुग्ध प्रदानके द्वारा तुम सबकी रक्षा करते हैं । यज्ञोंमें अश्वों ( यज्ञसम्बन्धी उपकरणों ) का आश्रय लेकर प्रोक्षण ( फलरूप अमृतके अभिषेक ) द्वारा तुमलोगोंकी रक्षा करते हैं। पकाये जाने-वाले हविष्यके गर्म-गर्म भापसे पितरोंको तथा यज्ञोंमें हविष्यका भाग अर्पित करके देवताओंको तृप्त करते हैं॥३०॥

चतुर्भिर्व्यतिरिक्ताङ्गैस्त्रिभिरन्यैश्च धातुभिः ।
सप्तभिः पितृभिर्नित्यैर्युक्तैस्त्रैँल्लोकान् परिरक्षति ॥ ३१ ॥

पृथक्-पृथक् अङ्गवाले चार धातुओं ( दर्श, पौर्णमास, पितृयज्ञ तथा साधारण चार प्रकारके अन्नों ) से तथा दूसरे तीन धातुओं ( मन, वाक् और प्राण ) से—इस तरह सात प्रकारके नित्य अर्पण करने योग्य अन्नोंद्वारा वे भगवान् विष्णु पितरोंसहित तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं ( अथवा उक्त अन्नों तथा कव्यवाट्, अनल, यम, सोम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, सोमप तथा बर्हिषद्—इन सात प्रकारके नित्य तर्पणीय पितरोंद्वारा वे तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं ) ॥३१॥

चन्द्रसूर्यात्मकं नित्यं यथात्मनिहितात्मकम् ।
प्रकाशं चाप्रकाशं च निगूढं स्वेन तेजसा ॥ ३२ ॥

इन सातोंका समुदाय चन्द्रसूर्यात्मक है अर्थात् उनमेंसे तीन सूर्यस्वरूप और चार चन्द्रस्वरूप हैं। ये यथायोग्य प्रकाश ( शुक्ल मार्ग ) तथा अप्रकाश ( धूम या कृष्ण मार्ग) रूप हैं, ये कष्टसाध्य होनेके कारण शरीरको संकटमें डाले

८१६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

रहते हैं, ये सभी अपने तेज (चिन्मय प्रकाश) से व्याप्त हैं ॥ ३२ ॥

त्रयस्तु पितरो नित्यं वर्धयन्ति दिवाकरम् ।
चतुर्भिः पितृभिश्चैव चन्द्रो वर्धति मण्डले ॥ ३३ ॥

तीन पितर सदा सूर्यदेवकी वृद्धि करते हैं और चार पितरोंके साथ चन्द्रमा अपने मण्डलमें बढ़ते हैं ॥ ३३ ॥

त्रयः पितृगणा नित्यं पिण्डान् पश्चाददन्ति ते ।
चत्वारोऽन्ये पितृगणाः सिद्धाः पञ्च क आददे ॥ ३४ ॥

तीन पितृगण सदा फलभोगके पश्चात् पिण्डों (स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों) का संहार करते हैं और चार अन्य पितृगण सिद्धरूप हो पञ्चविषय आदि हो जाते हैं, जिन्हें यजमान प्रजापतिने स्वीकार किया है ॥ ३४ ॥

त्वमेव पञ्च तान् घर्मांस्त्वमेवापञ्च तान् विभो ।
सनातनमयो दिव्यः शाश्वतो ब्रह्मसम्भवः ॥ ३५ ॥

प्रभो ! आप ही उन पाँच धर्मों (पञ्चीकृत भूतों) को और आप ही अपञ्चीकृत भूतोंको प्रकट करते हैं। आप सनातनमय, दिव्य, शाश्वत एवं वेदोंके आविर्भावके स्थान हैं ॥ ३५ ॥

यस्मात्त्वत्तेज आदत्ते अग्निर्वायुश्च सर्वशः ।
अतस्त्वं कर्मणा तेन आदित्यः समपद्यत ॥ ३६ ॥

अग्नि और वायु भी सब प्रकारसे आपके ही तेजका आदान (ग्रहण) करते हैं। इसलिये उस आदानरूप कर्मसे आप 'आदित्य' कहलाते हैं (आप ही सबके प्रकाशक स्वयं प्रकाशरूप हैं) ॥ ३६ ॥

यदादत्सि जगत् सर्वं रश्मिभिः प्रदहन्निव ।
युगान्तकाले सम्प्राप्ते परां सिद्धिमुपागतः ॥ ३७ ॥

आप युगान्तकाल आनेपर अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्‌को दग्ध करते हुए-से उसका आदान (ग्रहण) करते हैं, इसलिये भी 'आदित्य' कहलाते हैं। आप सदा परम सिद्धिको प्राप्त हैं ॥ ३७ ॥

पक्षसंधावमावास्यां लोकं चरसि मानुषम् ।
ऋषिभिः सह गूढात्मा सूर्येन्दुवसुसम्भवैः ॥ ३८ ॥

आप अपने स्वरूपको छिपाकर सूर्य, चन्द्रमा और वसुओंसे उत्पन्न हुए ऋषियोंके साथ पूर्णिमा और अमावास्या-को (पूर्णमास और दर्श नामक यागोंको ग्रहण करनेके लिये) मनुष्यलोकमें विचरते हैं ॥ ३८ ॥

सफलं कर्म कर्तॄणां यजतां पुष्टिवर्धनः ।
हेतूनामविकाराय मा भूत् कर्मविपर्ययः ॥ ३९ ॥

आप सकल कर्म करनेवाले यजमानोंकी पुष्टि (सुख-समृद्धि) को बढ़ानेवाले हैं। स्वर्ग आदिके साधनभूत जो कर्म हैं। उनमें विकृति न हो—वे व्यर्थ न होने पावें और काललोपसे धर्म सम्बन्धी कृत्योंका लोप न हो जाय, इसकी देख-भालके लिये भी आप मनुष्यलोकमें विचरते हैं ॥ ३९ ॥

वनस्पत्योषधीश्चैव युगपत् प्रतिपद्यसे ।
बालभावाय वसुधां पक्षे पक्षे जनिस्तव ॥ ४० ॥

आप ही अमावास्याको चन्द्रमारूपसे एक ही साथ वनस्पतियों, ओषधियों और वसुधामें वास करते हैं। पुनः बालरूपसे उत्पन्न होनेके लिये ही आप ऐसा करते हैं। प्रत्येक शुक्लपक्षमें आपका नूतन जन्म होता है ॥ ४० ॥

भूतानां भुवि भूतेश भाव्यर्थे वसुधातले ।
वसु यद् भुवि किंचिच्च सर्वं तत्त्वन्मयं विभो ॥ ४१ ॥

भूतेश्वर ! विभो ! इस भूतलपर भूत और भविष्य प्राणियोंकी पुष्टिके लिये जो कुछ भी धन संचित है, वह सब आपका ही स्वरूप है ॥ ४१ ॥

त्वमेव विविधं धर्मं शाश्वतं वसुधातले ।
देवयज्ञं मन्त्रवाक्यमात्मयज्ञं समानुपम् ॥ ४२ ॥

आप ही भूतलपर नाना प्रकारके सनातनधर्म सम्बन्धी कर्म हैं और आप ही देवयज्ञ, मन्त्रवाक्य, आत्मयज्ञ तथा उसके अधिकारी मनुष्य हैं ॥ ४२ ॥

द्विविधः स्वर्गमार्गश्च सूर्यश्चन्द्रश्च निर्मलः ।
चन्द्रमाः पितृयानश्च देवयानश्च भास्करः ॥ ४३ ॥

आप ही स्वर्गलोकके द्विविध मार्ग निर्मल सूर्य और चन्द्रमा हैं। इनमें चन्द्रमा पितृयान (धूममार्ग) हैं और सूर्य देवयान (शुक्लमार्ग) हैं ॥ ४३ ॥

त्वमेव वसुधायुक्तो विश्वं चरसि सीमया ।
एकीकृत्य गणान् सर्वान् संक्षिप्यामुत्र सम्भवः ॥ ४४ ॥

आप ही इन्द्रिय आदि गणोंको एक करके-देहमात्ररूपसे संक्षिप्त करके भूमिवासी प्राणियोंके रूपमें वसुधासे संयुक्त होकर विश्वमें विचरते और मर्यादापूर्वक वहाँके विषयोंका सेवन करते हैं। परलोकमें भी आप ही विविध रूपोंमें प्रकट हैं ॥ ४४ ॥

एकस्त्वमसि सम्भूतः पुराणपुरुषो विराट् ।
अक्षयश्चाप्रमेयश्च कर्मकारकरो वशी ॥ ४५ ॥

एकमात्र आप पुराण-पुरुष ही विराट्रूपमें प्रकट हैं। आप अविनाशी, अप्रमेय, सबको वशमें रखनेवाले और नाना प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले हैं ॥ ४५ ॥

मूर्तस्तेजसि सम्भूतो वायुः पर्यति खेचरः ।
सप्तमी रूपसंस्थानैर्नित्यमावृत्य तिष्ठति ॥ ४६ ॥

आप ही तेजस्तत्त्वमें 'रूप' होकर प्रकट हुए हैं, (इसीलिये तैजस नेत्रके द्वारा रूपका ग्रहण होता है); आप

भविष्यपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ८१७


ही वायु बनकर आकाशमें सब ओर विचरण करते हैं। महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्च तन्मात्रा—इन सात रूपसंस्थानोंके द्वारा आप सदा सबको व्याप्त करके स्थित हैं॥ ४६॥

साधने चापि निर्वाणे संहारे प्रलये तथा। धाता धारणकाले च दिशश्चक्षुषि धारिणि ॥ ४७॥

साधनकालमें जीवरूपसे, निर्वाण (कैवल्य मोक्ष) की अवस्थामें शुद्धरूपसे, दैनिक और ब्राह्म प्रलयमें रुद्ररूपसे तथा धारण (पोषण) कालमें धाता (पालक) विष्णुरूपसे आप ही स्थित हैं। दिशाएँ—वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादाएँ, आप ही विषयोंको धारण करनेवाली नेत्र आदि इन्द्रियोंमें इनके अधिष्ठाता चेतनके रूपमें विराजमान हैं॥ ४७॥

सेव्यमानो मुनिगणैर्नित्यं विगतकल्मषैः। कर्मभिः सत्यमापन्नैः समरागैर्जितेन्द्रियैः ॥ ४८ ॥ स्तूयमानश्च विबुधैः सिद्धैर्मुनिवरैस्तथा। सस्मार विपुलं देहं हरिर्हयशिरो महान् ॥ ४९॥

इस प्रकार नित्य पापरहित, जितेन्द्रिय, शत्रु और मित्रमें समान भावसे स्नेह रखनेवाले तथा सत्कर्मोंद्वारा सत्यको प्राप्त हुए मुनिगण जब श्रीहरिकी सेवा कर रहे थे और देवता तथा सिद्ध महर्षि उनकी स्तुति कर रहे थे, उस समय महान् देव श्रीहरिने अपने हयग्रीव नामक विशाल शरीरका स्मरण किया॥ ४८-४९॥

कृत्वा वेदमयं रूपं सर्वदेवमयं वपुः। शिरोमध्ये महादेवो ब्रह्मा तु हृदये स्थितः ॥ ५०॥

सर्वदेवमय वेदमय रूप धारण करके भगवान् श्रीहरि वहाँ शोभा पाने लगे। उनके मस्तकमें महादेव शिव और हृदयमे ब्रह्मा विराजमान थे॥ ५०॥

आदित्यरश्मयो बालाश्चक्षुषी शशिभास्करौ। जङ्घे तु वसवः साध्याः सर्वसंधिषु देवताः ॥ ५१॥

सूर्यकी किरणें उनकी रोमावलियाँ थीं। चन्द्रमा और सूर्य उनके नेत्रके स्थानमें प्रकाशित हो रहे थे। उनकी दोनों पिण्डलियोंकी जगह वसु और साध्यगण विराज रहे थे तथा समस्त संधि-स्थानोंमें देवताओंका वास था॥ ५१॥

जिह्वा चैश्वानरो देवः सत्या देवी सरस्वती। मरुतो वरुणश्चैव जानुदेशे व्यवस्थिताः ॥ ५२ ॥

जिह्वाके स्थानमें अग्निदेव थे। सत्या (वेदवाणीस्वरूपा) देवी सरस्वती उनकी वाणी थी। मरुद्गण और वरुण देवता उनके जानुदेश (घुटनों) में स्थित थे॥ ५२॥

एवं कृत्वा तथा रूपं सुराणामद्भुतं महत्। असुरं पीडयामास क्रोधाद् रक्तान्तलोचनः ॥ ५३॥

इस प्रकार सर्वदेवमय महान् एवं अद्भुत रूप धारण करके, जिनके नेत्रोंके कोये लाल थे, उन भगवान् हयग्रीवने क्रोधपूर्वक उस असुरको दबाया (इससे मधुका मेदा बाहर निकल आया)॥ ५३॥

मधोर्मेदोऽम्बुपूर्णा च पृथिवी समदृश्यत। प्रमदेव घना चैव शुक्लांशुकनिवासिनी ॥ ५४॥

उस समय मधुके मेदरूपी जलसे आच्छादित हुई यह सारी पृथ्वी ऐसी दिखायी देती थी, मानो श्वेत रंगकी साड़ी पहने हुए कोई हृष्ट-पुष्ट युवती शोभा पा रही हो॥ ५४॥

मेदिनीत्येव शब्दश्च लब्धः पृथ्व्या नरोत्तम। नामासुरसहस्रेण धरण्यां सम्प्रतिष्ठितम् ॥ ५५ ॥

नरश्रेष्ठ! उस मेदके कारण ही पृथ्वीको 'मेदिनी' नाम प्राप्त हुआ। सहस्रों असुरोंके द्वारा यह नाम भूतलपर प्रतिष्ठित एवं प्रचारित हो गया॥ ५५॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६॥


सप्तविंशोऽध्यायः

मधुके पतनसे समस्त प्राणियोंको हर्ष, वहाँ एकत्र हुए पर्वतों और वसन्त ऋतुका वर्णन, मधुवाहिनी नदीका प्राकट्य और गौरीसिद्धाका माहात्म्य

वैशम्पायन उवाच मधोर्निपतनं दृष्ट्वा सर्वभूतानि पुष्करे। प्रहृष्टानि प्रगायन्ति प्रनृत्यन्ति च सर्वशः ॥ १॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मधुका पतन हुआ देख पुष्करमें समस्त प्राणी अत्यन्त प्रसन्न हो उच्चस्वरसे गाने और नृत्य करने लगे॥ १॥

सुपार्श्वो गिरिमुख्यस्तु काञ्चनैः शिखरोत्तमैः। बहुधातुविचित्रैश्च खं लिखन्निव चाबभौ ॥ २.॥

पर्वतोंमें प्रधान सुपार्श्व अपने सुवर्णमय श्रेष्ठ शिखरोंसे आकाशमें रेखा खींचता-सा प्रतीत होता था। उसके वे शिखर अनेक धातुओंके कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे॥ २॥

गिरयश्चाभिशोभन्ते धातुभिः समरञ्जिताः। प्रांशुभिः शिखराग्रैश्च सविद्युत इवाम्बुदाः ॥ ३ ॥

अन्य पर्वत भी नाना प्रकारकी धातुओंसे रञ्जित हो