भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 837, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 837
८१४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करनेवाले मर्मरहित पाशोंमें इन्द्रकी कमरको सहसा बाँधकर दैत्योंके अगुआ युद्धकुशल मधुने, जो कालके वशीभूत हो गया था, समस्त गणोंके बीच रुद्रस्वरूप भगवान् विष्णुको ही ललकारा ॥ ३-४ ॥

द्वैधीभूताः काश्यपेया मधोर्वशमुपागताः ।
युद्धार्थमभ्यधावन्त प्रगृह्य विपुला गदाः ॥ ५ ॥

कश्यपके पुत्र दो भागोंमें विभक्त हो मधुके वशमें आकर बड़ी-बड़ी गदाएँ हाथमें लिये देवताओंके साथ युद्ध करनेके लिये दौड़े ॥ ५ ॥

गन्धर्वाः किन्नराश्चैव वाद्ये गीते च कोविदाः ।
प्रनृत्यन्ति प्रगायन्ति प्रहसन्ति च सर्वशः ॥ ६ ॥

वाद्य और गीतमें कुशल गन्धर्व और किन्नर सब प्रकारसे नाचते, गाते तथा हँसते थे ॥ ६ ॥

तन्त्रीभिः सुप्रयुक्ताभिर्मधुराभिः स्वभावतः ।
मनो मधोर्विधुन्वन्ति युध्यमानस्य रागिणः ॥ ७ ॥

स्वभावतः मधुर एवं सुन्दर ढंगसे बजायी गयी वीणाके तारोंसे मोहक ध्वनि उत्पन्न करके वे युद्धमें लगे हुए रागी मधुके मनको विचलित कर देते थे ॥ ७ ॥

मधोर्बलार्थे मधूनो नियोगात् पद्मयोनिनः ।
एतान् विकारान् कुर्वन्ति गन्धर्वाः सत्यवादिनः ॥ ८ ॥

तमःप्रधान मधुका बल क्षीण करनेके लिये पद्मयोनि ब्रह्माजीकी आज्ञासे सत्यवादी गन्धर्व ये विकार प्रकट करते थे ॥ ८ ॥

तत्र शक्तो हि गान्धर्वे तस्मिञ्छब्दे मधुर्मनः ।
दानवाश्चासुराश्चैव प्रत्यक्षं यान्ति प्राणदन् ॥ ९ ॥

शक्तिशाली मधुने उस संगीतके शब्दमें मन लगाया । दानव और असुर उसके सामने जाते और गर्जना करते थे ॥

मधोश्च मन आक्षिप्य पश्यन् योगेन चक्षुषा ।
मन्दरं प्रयते विष्णुर्गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ १० ॥

इस प्रकार मधुके मनको विषयोंमें विक्षिप्त करके योग-दृष्टिसे देखनेवाले भगवान् विष्णु सहसा मन्दराचलकी ओर चल दिये, मानो अग्नि काष्ठोंमें छिप गयी हो ॥ १० ॥

ऋषयो दीप्तमनसं किंचिद् व्यथितमानसाः ।
पितामहं पुरस्कृत्य क्षणेनान्तरधीयत ॥ ११ ॥

उस समय ऋषियोंके मनमें कुछ व्यथा हुई । वे संतत-चित्त पितामहको आगे करके क्षणभरमें वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ११ ॥

विष्णुं सोऽभ्यहनत् क्रुद्धो मधुर्मधुनिभेक्षणः ।
भुजेन शङ्खदेशान्ते न चकम्पे पदान्पदम् ॥ १२ ॥

इधर क्रोधमें भरे हुए मधु जैसे पिङ्गल नेत्रवाले मधुने भगवान् विष्णुके पास पहुँचकर अपने हाथसे उनकी कनपटी-पर प्रहार किया; परंतु वे एक पग भी विचलित नहीं हुए ॥

विष्णुश्चाप्यहनद् दैत्यं कराग्रेण स्तनान्तरे ।
स पपात महीं तूर्णं जानुभ्यां रुधिरं वमन् ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने भी अपने हाथके अग्रभागसे उस दैत्यकी छातीमें चोट की; फिर तो वह रक्त वमन करता हुआ घुटनोंके बल तुरंत पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १३ ॥

न चैनं पतितं हन्ति विष्णुर्युद्धविशारदः ।
बाहुयुद्धे हि समयं मत्वाचिन्त्यपराक्रमः ॥ १४ ॥

अचिन्त्यपराक्रमी युद्धविशारद भगवान् विष्णुने बाहु-युद्धका अवसर उपस्थित जानकर पृथ्वीपर गिरे हुए उस दैत्यको नहीं मारा ॥ १४ ॥

इन्द्रध्वज इवोत्क्षिप्तो जानुभ्यां स महीतलात् ।
मधू रोषपरीतात्मा निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ १५ ॥

तदनन्तर मधुका हृदय रोषसे भर गया । वह घुटनोंके सहारे पृथ्वीतलसे उठकर खड़ा हो गया, मानो किसीने इन्द्रध्वज फहरा दिया हो । उस समय वह विष्णुकी ओर इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रसे उन्हें जला देगा ॥

परुषाभिस्ततो वाग्भिरन्योन्यमभिगर्जतुः ।
समीयतुर्बाहुयुद्धे परस्परवधैषिणौ ॥ १६ ॥
उभौ तौ बाहुबलिनावुभौ युद्धविशारदौ ।
उभौ च तपसा शान्तावूभौ सत्यपराक्रमौ ॥ १७ ॥

तत्पश्चात् वे दोनों कठोर बातें कहते हुए एक-दूसरेके सामने गर्जने लगे; फिर दोनों दोनोंके वधकी इच्छासे बाहु-युद्धमें परस्पर गूँथ गये । वे दोनों ही बाहुबलसे युक्त और युद्धकला-के विशेषज्ञ थे । दोनों तपस्याके प्रभावसे शान्तचित्त हो गये थे और दोनों ही यथार्थरूपमे पराक्रम प्रकट कर रहे थे ॥

दृढप्रहारिणौ वीरावन्योन्यं विचकर्षतुः ।
शैलेन्द्राविव युद्ध्यन्तौ पक्षैः पाषाणसंनिभैः ॥ १८ ॥

दृढ़तापूर्वक प्रहार करनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेको खींचने लगे, मानो पाषाण-सदृश पंखोंसे युक्त दो पर्वतराज परस्पर युद्ध कर रहे हों ॥ १८ ॥

विकर्षन्तौ वमन्तौ च अन्योन्यं बहुधाहवे ।
गजाविव विषाणाग्रैर्नखाग्रैश्च विचेरतुः ॥ १९ ॥

जैसे दो हाथी अपने दाँतों और नखोंके अग्रभागसे परस्पर प्रहार करते हुए युद्ध-स्थलमें विचरते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर मधु और श्रीविष्णु एक-दूसरेको खींचते और रक्त-वमन करते हुए भूतलपर विचर रहे थे ॥ १९ ॥

ततो व्रणमुखैश्चैव सुस्राव रुधिरं बहु ।
ग्रीष्मान्ते धातुसंसृष्टं शैलेभ्य इव काञ्चनम् ॥ २० ॥