भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 836, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 836

भविष्यपर्व ] पञ्चविंशोऽध्यायः ८१३

यक्षाः सुराश्च ते सर्वे यथा प्रतिगुणैः प्रभो ॥ ६ ॥
वयं यक्ष्यामहे पूर्वं पूर्वं यक्ष्यामहे वयम् ।
एवमन्योन्यसंरम्भाद् विद्यन्ते बलदर्पिताः ॥ ७ ॥

प्रभो ! उस समय यक्ष और समस्त देवता परस्पर विरोधी गुणोंद्वारा प्रेरित हो इस प्रकार कहने लगे, ‘पहले हम यज्ञ करेंगे, पहले हम यज्ञ करेंगे।’ इस तरह एक दूसरेके प्रति रोषमें भरकर वे बलके घमंडसे उन्मत्त हो गये थे ॥

दैतेयाश्चाप्यदैतेयाः परस्परजयैषिणः ।
युद्धायैव प्रतिष्ठन्ति प्रगृह्य विपुलौ भुजौ ॥ ८ ॥

दैत्य और देवता एक दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अपनी विशाल भुजाओंको उठाकर युद्धके लिये ही प्रस्थान करने लगे ॥ ८ ॥

निवार्यमाणा ऋषिभिस्तपसा दग्धकिल्बिषैः ।
अन्यैश्च विविधैर्विप्रैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ९ ॥
निवार्यमाणा युध्यन्ते वृषभा इव गोकुले ।
प्रयुद्धा युद्धसंक्रान्ताः सर्वे प्राणजयैषिणः ॥ १० ॥

तपस्यासे जिनके पाप दग्ध हो गये थे, उन ऋषियों तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी विद्वान् अन्यान्य अनेकों ब्राह्मणोंके मना करनेपर भी वे गोशालामें परस्पर भिड़नेवाले साँड़ोंके समान एक-दूसरेसे युद्ध करने लगे। धीरे-धीरे उनके युद्धने जोर पकड़ लिया। वे सब-के-सब युद्धकी ज्वालासे आक्रान्त हो परस्पर प्राण लेनेके लिये उतारू हो गये ॥ ९-१० ॥

पश्यतां सर्वभूतानां मृत्योर्विषयमागताः ।
ततः शब्देन महता परं कृत्वा महाबलाः ॥ ११ ॥
रुन्धन्ति बाहुभिः क्रुद्धाः सपक्षा इव पक्षिणः ।

सब प्राणियोंके देखते-देखते वे मृत्युके राज्यमें आ गये। फिर तो महान् सिंहनाद करके वे महाबली देवता, दानव परस्पर कुपित हो पंखधारी पक्षियोंके समान अपनी भुजाओं-द्वारा एक दूसरेको रोकने लगे ॥ ११३ ॥

चचाल वसुधा चैव पादाक्रान्ता च रोषिभिः ॥ १२ ॥
नौर्यथा पुरुषाक्रान्ता निषीदति महाजले ।

रोषमें भरे हुए उन योद्धाओंके पैरोंसे आक्रान्त हो सारी पृथ्वी विचलित हो उठी। जैसे बहुसंख्यक पुरुषोंके भारसे दबी हुई नौका गहरे जलमें डगमगाने लगती है, वही दशा पृथ्वीकी हुई ॥ १२३ ॥

पर्वताश्च विशीर्यन्ते नर्दमाना गजा इव ॥ १३ ॥
चुक्षुभुश्च महानद्यस्ताडिता मातरिश्वना ।

चिंघाड़ते हुए हाथियोंके समान भारी आवाजके साथ बड़े-बड़े पर्वत विदीर्ण होकर ढहने लगे। वायुके झोंके खाकर बड़ी-बड़ी नदियां विक्षुब्ध हो उठीं ॥ १३३ ॥

ततः समभवद् युद्धं मधोर्विष्णोश्च भारत ॥ १४ ॥
युगान्तकरणं घोरं सर्वप्राणिभयंकरम् ।

भारत ! तब मधु और विष्णुका युगान्तकारी घोर युद्ध होने लगा, जो समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर था ॥ १४३ ॥

प्रममाथ मधोर्विष्णुः समग्रं बलपौरुषम् ॥ १५ ॥
वह्नेरिव बलं दीप्तं शमयत्यम्बुना यथा ।
तथा प्रशमितं तेन प्रभुणा ह्युपकारिणा ॥ १६ ॥

भगवान् विष्णुने मधुके समस्त बल-पौरुषको मथ डाला। जैसे अग्निका प्रज्वलित हुआ तेजरूपी बल जलसे बुझ जाता है, उसी प्रकार सबका उपकार करनेवाले भगवान् विष्णुने मधुके बल-पराक्रमको शान्त कर दिया ॥ १५ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥


षड्विंशोऽध्यायः

मधु और विष्णुका घोर युद्ध, देवताओं और ऋषियोंद्वारा श्रीविष्णुकी स्तुति, हयग्रीवरूपधारी विष्णुद्वारा मधुका वध और पृथ्वीको मेदिनी नामकी प्राप्ति

वैशम्पायन उवाच
बलवान् स तु दैतेयो मधुर्भीमपराक्रमः ।
बबन्ध पाशैर्निशितैर्महेन्द्रं पर्वतान्तरे ॥ १ ॥
तं वै प्रह्लादवचनाल्लक्षणज्ञश्च भारत ।
ऐश्वर्यमैन्द्रमाकाङ्क्षन् भविष्यं बुद्धिसंक्षयात् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! भयंकर पराक्रमी बलवान् मधु दैत्यने प्रह्लादके कहनेसे देवराज इन्द्रको पर्वतके भीतर तीखे पाशोंसे बाँध लिया। भारत ! वह लक्षणोंका ज्ञाता था, परंतु उसकी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये उसने भविष्यमें इन्द्रके ऐश्वर्यकी अभिलाषा रखकर उन्हें बाँधा था ॥ १-२ ॥

बद्ध्वेन्द्रं सहसा मध्ये पाशैर्मर्मविर्जितैः ।
आयसैर्बहुभिश्चित्रैर्बलवद्भिर्विदारणैः ॥ ३ ॥
विष्णुमेवाग्रणी रुद्रमाह्वयद् युद्धकोविदः ।
मध्ये गणानां सर्वेषां कालस्य वशमागतः ॥ ४ ॥

लोहेके बने हुए बहुसंख्यक विचित्र प्रबल और विदीर्ण