विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 835, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८१२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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आचरणमें लाये हुए पवित्र सनातन वेद-संस्कारको क्रमसे उपलब्ध किया था, वे भी वहीं रहनेकी इच्छा करने लगे ॥
नावेदविद्वानागच्छेन्नापि रौद्रं व्रतं चरेत्।
न च त्यागेन गच्छेत गृहधर्मं न च त्यजेत् ॥ १० ॥
सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त किये बिना मनुष्यको ( ब्रह्मचर्याश्रमसे ) गृहस्थाश्रममें नहीं आना चाहिये। वह कठोर व्रत ( वानप्रस्थोचित तप ) भी न करे। संन्यास-मार्गका भी अवलम्बन न करे और न गृहस्थधर्मका परित्याग ही करे ( वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके विवेकपूर्वक ही उसे एक आश्रमका त्याग और दूसरेका ग्रहण करना चाहिये ) ॥ १० ॥
नैव गच्छेत दुःस्थानमप्राप्तो वेदसंचयम्।
ऋचश्च संचयः पूर्वः सामगानां च भारत ॥ ११ ॥
भारत ! वैदिक ज्ञानराशिको उपलब्ध किये बिना किसीको, जिसमें स्थिर रहना कठिन है, उस चतुर्थ आश्रममें भी नहीं जाना चाहिये। बह्वृचों, सामगों और यजुर्वेदियोंको भी पहले ऋचाओंके ही ज्ञानका संचय करना चाहिये ॥ ११ ॥
ये चापि पुत्रिणो न स्युः श्रुत्वापि प्राप्नुयुः फलम्।
ब्राह्मणास्तपसा श्रान्ता गुरोश्च परिचर्यया ॥ १२ ॥
जो लोग पुत्रवान् नहीं हुए हैं अर्थात् जिन्होंने गृहस्थाश्रममें प्रवेश नहीं किया है, वे लोग वेदान्त श्रवण करके भी उसके फलस्वरूप ज्ञानको प्राप्त कर सकते हैं। तपस्या तथा गुरुकी सेवाका श्रम स्वीकार करनेवाले ब्राह्मण भी वेदान्त श्रवण करके उसके फलस्वरूप ज्ञानको पा सकते हैं ॥ १२ ॥
यस्य नैव श्रुतं ब्रह्म न गृहीतं विशाम्पते।
कामं तं धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारयेत् ॥ १३ ॥
प्रजानाथ ! जिसने गुरुके मुखसे वेदका श्रवण और उसके ज्ञानको श्रवण नहीं किया, उस ब्राह्मणसे धर्मात्मा राजा अपनी इच्छाके अनुसार शूद्रोचित कर्म करावे ॥ १३ ॥
अथवा नैव विद्येत यद् ब्रह्म नाद्रियेद् द्विजः।
द्वाभ्यां तु श्रोत्रविषये मनः पूर्वं समाहितम् ॥ १४ ॥
अथवा यदि द्विज ब्राह्मण होकर भी वेदका आदर न करे तो उसमें ब्राह्मणत्व है ही नहीं। जिसने ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य दोनों अवस्थाओंमें श्रवण करने योग्य धर्म एवं ब्रह्ममें पहलेसे ही ( अध्ययनाध्यापनके समयसे ही ) मन एकाग्र किया है, वही ब्राह्मण है ( अतः राजाको उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये ) ॥ १४ ॥
एवं सर्वेन्द्रियारम्भान् वेदपूर्वान् समाचरेत्।
ब्राह्मणो भूतिसम्पन्नो य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ १५ ॥
अतः जो वैभवसम्पन्न ब्राह्मण अपना कल्याण चाहता हो, वह इस प्रकार सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे आरम्भ होनेवाले कार्योंको वेदाध्ययनपूर्वक ही करे ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
पञ्चविंशोऽध्यायः
नारद आदिके द्वारा ब्राह्मणों तथा ब्रह्माजीका सत्कार, ब्रह्माजीके द्वारा कश्यपको यज्ञका आदेश, देवता-दानव-युद्ध तथा विष्णुके द्वारा मधुकी पराजय
वैशम्पायन उवाच
ते तु गोब्राह्मणा नागाश्चन्द्रादित्यपुरस्कृताः।
ब्राह्मणान् पूजयन् देवान् वसुभिर्ब्रह्मसम्भवैः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! चन्द्रमा और सूर्यको आगे करके उपस्थित हुए नागों, गौओं और ब्राह्मणोंने ब्रह्मसम्पत्तिके द्वारा देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥
नारदप्रमुखाश्चैव गन्धर्वा ऋषयो नृप।
कुर्वन्ति सततं यज्ञे क्रमप्राप्तं पितामहम् ॥ २ ॥
नरेश्वर ! उस यज्ञमें नारद आदि गन्धर्व एवं ऋषि सदा ब्राह्मणपूजाके क्रममें आये हुए ब्रह्माजीकी भी पूजा करते थे ॥
वचोभिर्मधुराभाषैः पञ्चेन्द्रियनिवासिभिः।
सर्वभूतप्रियकरैः सर्वभूतहितैषिभिः ॥ ३ ॥
स्तूयमानश्च यज्ञान्ते पञ्चेन्द्रियसमाहितैः।
प्रोवाच भगवान् ब्रह्मा दिष्ट्या दिष्ट्येति भारत ॥ ४ ॥
भारत ! यज्ञके अन्तमें पाँचों इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले, समस्त प्राणियोंका प्रिय करनेवाले, सब भूतोंका हित चाहनेवाले तथा पाँचों इन्द्रियोंको एकाग्र करके योगयुक्त होनेवाले मधुरभाषी ब्राह्मणोंके वचनोंसे प्रशंसित हुए भगवान् ब्रह्मा कहने लगे--'अहो भाग्य ! अहो भाग्य !' ॥ ३-४ ॥
ततः कश्यपमाभाष्य प्रोवाच भगवान् प्रभुः।
भवानपि सुतैः सार्धं यक्ष्यते वसुधातले ॥ ५ ॥
क्रतुभिः परमप्राप्तैः सम्पूर्णवरदक्षिणैः।
तदनन्तर सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्माने कश्यपजीको सम्बोधित करके कहा--'तुम भी अपने पुत्रोंके साथ भूतलपर पूर्ण एवं उत्तम दक्षिणावाले श्रेष्ठ यज्ञोंका अनुष्ठान करोगे' ॥