विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 838, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] पञ्चविंशोऽध्यायः ८१५
तदनन्तर एक-दूसरेके प्रहारसे जो घाव हो गये थे, उनके छिद्रोंसे बहुत रक्त बहने लगा। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षाऋतुमे पर्वतोंसे गैरिक धातुमिश्रित काञ्चन-रस झरता हो ॥ २० ॥
संसिक्तौ रुधिरौघैश्च स्रवद्भिः समरंजितौ ।
अथायतैः पदाग्रैश्च तौ व्यदारयतां महीम् ॥ २१ ॥
वे दोनों झरते हुए रक्तके प्रवाहोंसे भीगकर समानरूपसे रक्तरंजित हो गये। फिर उठते-गिरते हुए पैरोंके अग्रभागोंसे उन दोनोंने वहाँकी भूमि विदीर्ण कर डाली ॥ २१ ॥
अभिहत्य तु तौ वीरौ परस्परमनेकधा ।
पतङ्गाविव युध्येतां पक्षाभ्यां मांसगृद्धिनौ ॥ २२ ॥
एक दूसरेपर बारंबार चोट करके वे दोनों वीर पंखोंसे लड़नेवाले दो मांसलोलुप पक्षियोंकी भाँति युद्ध करने लगे ॥
शुश्रुवुश्चान्तरिक्षेऽथ सर्वभूतानि पुष्करे ।
सिद्धानां वदनोन्मुक्ताः परया वर्णसम्पदा ॥ २३ ॥
स्तुतयो विष्णुसंयुक्ताः सत्याः सत्यपराक्रमे ।
इसी समय पुष्करके आकाशमें सम्पूर्ण भूतोंने भगवान् विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाली स्तुतियाँ सुनीं, जो उन सत्यपराक्रमी भगवान्मे यथार्थ रूपसे घटित हो रही थीं। वे स्तुतियाँ सिद्धोंके मुखोंसे निकली थीं और उत्तमोत्तम वर्ण-सम्पत्तिसे सुशोभित थीं ॥ २३३ ॥
शरीरं धातुसंयुक्तं संयुक्तं चेतनेन च ॥ २४ ॥
तद् ब्रह्म इन्द्रियैर्युक्तं तेजोभूतं सनातनम् ।
यह शरीर तेज, जल और अन्न—इन तीन धातुओंका अथवा रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र—इन सात धातुओंका संयोगरूप है। यह चेतनसे संयुक्त है। वह चेतन तेजोभूत सनातन ब्रह्म ही है। जो इन्द्रियोंसे युक्त होकर जीव कहलाता है ॥ २४३ ॥
ध्रुवं तिष्ठन्ति भूतास्ते सूक्ष्मे प्रलयतां गते ॥ २५ ॥
पुनश्चोद्भवते सूक्ष्मं बहुरूपमनेकधा ।
शरीरका आरम्भ करनेवाले वे स्थूलभूत प्रलयके अधिष्ठानभावको प्राप्त हुए सूक्ष्म-कारणमें निश्चय ही स्थित होते हैं। फिर सूक्ष्म ही अनेक रूप धारण करके वारंवार प्रकट होता है ॥ २५३ ॥
प्रबोध्य भावं भूतानां त्रिषु लोकेषु कामदः ॥ २६ ॥
सुरूपो बहुरूपांस्तांल्लोकान् संचरते वशी ।
सबकी कामनाओंको देनेवाले तथा सबको वशमें रखनेवाले असङ्ग परमात्मा तीनों लोकोंमें भूतोंको उनके स्वरूपका बोध कराकर स्वयं सुन्दर रूप धारण करके उन अनेक रूपवाले लोकोंमें विचरते रहते हैं ॥ २६३ ॥
मानसीं तनुमास्थाय बहुभिः कारणान्तरैः ॥ २७ ॥
योगात्मा धारयन्नुर्वी नागात्मानं दिवंधरः ।
ब्रह्म भूतं परं चैव सूक्ष्मेणात्मानमीश्वरः ॥ २८ ॥
योगात्मा ईश्वर, जो देवलोकको धारण करनेवाले हैं, सूक्ष्मरूपसे अपने आपको शेषनागके रूपसे प्रकट करके पृथ्वीको धारण करते हुए विचरते हैं। वे दुष्टनिग्रह और साधु-संरक्षण आदि अनेक कारणोंसे मानसशरीर—शेष, कूर्म आदि रूप धारण करके जगत्की रक्षा करते हैं। वे ही वेद, जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणिसमुदाय तथा दूसरे जडभूतोंको धारण करते हैं ॥ २७-२८ ॥
ब्राह्मेण विप्रान् वसति युद्धेनैव च क्षत्रियान् ।
प्रदानकर्मणा वैश्याञ्छूद्रान् परिचरेण च ॥ २९ ॥
वे भगवान् वेदमयरूपसे ब्राह्मणोंका आश्रय लेकर रहते हैं। युद्धरूपसे क्षत्रियोंमें स्थित होते हैं। दानकर्म अथवा वस्तु आदिके आदान प्रदानवाले वाणिज्य कर्मके रूपमें वैश्योंमें निवास करते हैं तथा त्रैवर्णिकोंकी सेवाके रूपमें वे शूद्रोंका आश्रय लेकर रहते हैं ॥ २९ ॥
गावः क्षीरप्रदानेन अश्वान् यज्ञेषु प्रोक्षणैः ।
पितरश्चोष्मपेनैव हविर्भागेन देवताः ॥ ३० ॥
वे गौओंका आश्रय लेकर दुग्ध प्रदानके द्वारा तुम सबकी रक्षा करते हैं । यज्ञोंमें अश्वों ( यज्ञसम्बन्धी उपकरणों ) का आश्रय लेकर प्रोक्षण ( फलरूप अमृतके अभिषेक ) द्वारा तुमलोगोंकी रक्षा करते हैं। पकाये जाने-वाले हविष्यके गर्म-गर्म भापसे पितरोंको तथा यज्ञोंमें हविष्यका भाग अर्पित करके देवताओंको तृप्त करते हैं॥३०॥
चतुर्भिर्व्यतिरिक्ताङ्गैस्त्रिभिरन्यैश्च धातुभिः ।
सप्तभिः पितृभिर्नित्यैर्युक्तैस्त्रैँल्लोकान् परिरक्षति ॥ ३१ ॥
पृथक्-पृथक् अङ्गवाले चार धातुओं ( दर्श, पौर्णमास, पितृयज्ञ तथा साधारण चार प्रकारके अन्नों ) से तथा दूसरे तीन धातुओं ( मन, वाक् और प्राण ) से—इस तरह सात प्रकारके नित्य अर्पण करने योग्य अन्नोंद्वारा वे भगवान् विष्णु पितरोंसहित तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं ( अथवा उक्त अन्नों तथा कव्यवाट्, अनल, यम, सोम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, सोमप तथा बर्हिषद्—इन सात प्रकारके नित्य तर्पणीय पितरोंद्वारा वे तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं ) ॥३१॥
चन्द्रसूर्यात्मकं नित्यं यथात्मनिहितात्मकम् ।
प्रकाशं चाप्रकाशं च निगूढं स्वेन तेजसा ॥ ३२ ॥
इन सातोंका समुदाय चन्द्रसूर्यात्मक है अर्थात् उनमेंसे तीन सूर्यस्वरूप और चार चन्द्रस्वरूप हैं। ये यथायोग्य प्रकाश ( शुक्ल मार्ग ) तथा अप्रकाश ( धूम या कृष्ण मार्ग) रूप हैं, ये कष्टसाध्य होनेके कारण शरीरको संकटमें डाले