विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 824, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकोनविंशोऽध्यायः ८०१
से विघ्नकारी पुरुष बारं-बार जँभाई लेते हुए एक साथ जोर-जोरसे कोलाहल करने लगते हैं ॥ ३६ ॥
पुनरेव तदा भूत्वा बहुरूपास्तदाभवन् । नृत्यमानाः प्रगायन्ति तर्पयन्तो विशेषतः ॥ ३७ ॥
फिर वे तत्काल ही बहुत-से रूप धारण कर लेते हैं और उस योगी पुरुषको विशेष संतुष्ट करनेके लिये नाचने-गाने लगते हैं ॥ ३७ ॥
स्त्रीभूताश्च ततः सर्वे युञ्जानाश्चावलम्बिरे । कण्ठेऽस्य बहुरूपत्वाद् विघ्नैश्चैव प्रलोभयन् ॥ ३८ ॥
तदनन्तर वे सब-के-सब स्त्रियोंके रूप धारणकर योगीसे संयुक्त हो जाते और उसके गलेमें लिपटने या लटकने लगते हैं। वे अनेक रूप धारण करनेके कारण उसे नाना विघ्नोंद्वारा ही प्रलोभनमें डालते हैं ॥ ३८ ॥
मधुरैरभिधानैश्च व्याहरन्ति न भीतवत् । पतन्ति युगपत् सर्वे पादयोर्मूर्धभिर्युताः ॥ ३९ ॥
वे स्त्रीरूपधारी विघ्न निडर-से होकर मधुरवाणीमें नाम ले-लेकर उसे पुकारते हैं और सभी एक साथ योगीके चरणोंमें मस्तक रखकर उसे प्रणाम करते हैं ॥ ३९ ॥
प्रसादं काङ्क्षमाणाश्च योगस्यान्तरविघ्नतः । बहुप्रकारं कथयन् नृत्यन्ति च तरन्ति च ॥ ४० ॥
वे योगमें विघ्न उपस्थित करनेके लिये ही उस योगीका कृपाप्रसाद चाहते हैं। उससे अनेक प्रकारकी बातें करते और नाचते हैं। ऐसा करके वे कभी-कभी योगीको जीत भी लेते हैं ॥ ४० ॥
एतैर्विकारैः संवृत्तैर्निरुद्धैश्चैव सर्वशः । ध्रुवमैश्वर्यमासाद्य सिद्धो भवति ब्राह्मणः ॥ ४१ ॥
इन विकारोंके प्राप्त होने और इन सबका पूर्णरूपसे निरोध हो जानेपर अटल ऐश्वर्यको पाकर वह ब्रह्मवेत्ता योगी सिद्ध हो जाता है ॥ ४१ ॥
तदर्चिष इवाग्नेया आदित्यस्येव रश्मयः । तेजोरूपकमैश्वर्यं जनितास्तेजविन्दवः ॥ ४२ ॥
तदनन्तर अग्निकी लपटों और सूर्यकी किरणोंके समान उसे तेजोरूप ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। फिर तो उसके शरीरसे तेजोबिन्दु प्रकट होने लगती हैं ॥ ४२ ॥
ज्योतींषि चैव संवृत्ता आकाशे गुणसंवृताः । चरन्ति लोके सततं सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम् ॥ ४३ ॥
सत्त्वादि गुणोंसे घिरे हुए वे योगी आकाशमें ज्योतिःस्वरूप होकर लोकमें सदा ही चन्द्रमा और सूर्यके मार्गपर विचरते हैं ॥ ४३ ॥
चन्द्रसूर्यात्मकं दिव्यं ज्योतिः सघनमुत्तमम् । एतद् विभाजते लोके कालचक्रं ध्रुवं वरम् ॥ ४४ ॥
चन्द्रसूर्य-स्वरूप होकर मेघमण्डलसहित उत्तम दिव्य ज्योति कालचक्र एवं श्रेष्ठ ध्रुवस्थानमें विचरता हुआ वह वही-वही रूप धारण करके इस लोकमें प्रकाशित होता है ॥ ४४ ॥
अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतुसंवत्सराण्यता । क्षणा लवा मुहूर्ताश्च कलाः काष्ठास्तथैव च ॥ ४५ ॥ अहोरात्रप्रमाणं च निमिषोन्मेषणं तथा । ताराणां गतयश्चैव ग्रहाणां च विशेषतः ॥ ४६ ॥
यह योगी ही पक्ष, मास, ऋतु, संवत्सर, क्षण, लव, मुहूर्त, कला, काष्ठा, दिन-रात्रिका प्रमाण, निमेष, उन्मेष, ताराओं तथा विशेषतः ग्रहोंकी गति इत्यादि सब कुछ हो जाता है ॥ ४५-४६ ॥
अथ पार्थिवमैश्वर्यं विकारग्रहसम्भवम् । योगयुक्तास्त्वभिग्रस्ताः पात्यन्ते ह्यचलासनात् ॥ ४७ ॥
तदनन्तर विकारोंको स्वीकार करनेके कारण योगीको पार्थिव ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है, उससे ग्रस्त हुए योगी सिद्धिके अविचल सिंहासनसे नीचे गिरा दिये जाते हैं ॥ ४७ ॥
अलोभाच्छिद्यते सद्यो वेपमानोऽनुकीर्त्यते । सीदते वसुधामध्ये भिद्यमानः पुनः पुनः ॥ ४८ ॥
लोभका त्याग करनेसे वह विघ्नस्वरूप ऐश्वर्य तत्काल छिन्न-भिन्न हो जाता है; विघ्नसे काँपने और डरनेवाला योगी जगत्में निन्दनीय होता है। वह भूमण्डलमें बारंबार विघ्नोंसे आहत होकर कष्ट पाता रहता है ॥ ४८ ॥
भूतानां बहुरूपैश्च अन्यैश्च तलवासिभिः । विषयैर्युज्यते क्षिप्रं संक्षेपात् समवरुध्यते ॥ ४९ ॥
प्राणियोंके बहुत-से रूपों तथा भूतलवासी अन्य विषयोंसे वह शीघ्र ही सम्बन्ध स्थापित कर लेता है तथा उनके द्वारा विक्षेपमें पड़कर उसकी प्रगति रुक जाती है ॥ ४९ ॥
ततः पार्थिवमैश्वर्यं सेवमानश्च सर्वतः । मूर्तिमद्भिborder-width:0;श्च बहुधा धातुभिः स च हन्यते ॥ ५० ॥
तदनन्तर पार्थिव ऐश्वर्यका सेवन करता हुआ वह योगी पुरुष सब ओरसे मूर्तिमान् पार्थिव धातुओंद्वारा बारंबार मारा जाता है ॥ ५० ॥
शक्तितोमरनिख्रिंशैर्गदाभिश्चाप्यनेकधा । असिभिः पात्यते चैव क्षुरधारैः सहस्रशः ॥ ५१ ॥
शक्ति, तोमर, तलवार, गदा तथा छुरेकी-सी धारवाले सहस्रों खड्गोंद्वारा वह अनेकों बार धराशायी किया जाता है ॥ ५१ ॥
म० ह० २६-