विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 825, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८०२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भिद्यते चैव बाणाग्रैः सुतीक्ष्णैर्मर्मभेदिभिः।
षड्भिर्विकारैर्निर्वृत्तैर्निरुद्धैश्चैव सर्वशः ॥ ५२ ॥
ध्रुवमैश्वर्यमापन्नः सिद्धो भवति ब्राह्मणः।
अत्यन्त तीखे मर्मभेदी बाणोंके अग्रभागसे विदीर्ण होने-का भी उसे अवसर प्राप्त होता है। इन विकारोंके प्राप्त होने तथा उनका पूर्णतः निरोध हो जानेपर अटल ऐश्वर्य (ब्रह्म-भाव) को प्राप्त हुआ योगी सिद्ध हो जाता है ॥ ५२।।
ततः पार्थिवमैश्वर्यं निर्मुक्तस्य विकारतः ॥ ५३ ॥
प्रादुर्भवति संजाते समाधौ प्रलयं गते ।
दिव्यं गन्धं समाघ्राय दिव्यांश्चांस्त्वाञ्छृणोति च ॥ ५४ ॥
तत्पश्चात् विकारसे मुक्त हुए योगीके समक्ष पार्थिव ऐश्वर्य प्रकट होता है, जब समाधि लग जाती है और विकार लीन हो जाते हैं, तब वह दिव्य गन्धको सूँघकर दिव्य लोकोंकी बातें भी सुनता है ॥ ५३-५४ ॥
दिव्यरूपैश्च पुरुषैश्छिद्यते न च भिद्यते ।
गच्छन् सुकृतिनां चान्तः प्रधानात्मा क्षरन्निव ॥ ५५ ॥
वह शरीर रहनेतक दिव्य पुरुषोंसे भिन्न रहता है और देहपात होनेपर सर्वात्मभावको प्राप्त हो जानेसे वह उन सबसे अभिन्न हो जाता है। अन्तर्जगत्में जाता हुआ वह योगी परिणामको प्राप्त होनेवाले प्रधानकी भाँति पुण्यात्माओंके अन्तःकरणमें भी प्रवेश करता है ॥ ५५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
विंशोऽध्यायः
ब्रह्माजीके द्वारा योगधारणपूर्वक की गयी मानसिक सृष्टिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच,
ततोऽन्यां धारणां गत्वा मनसा स पितामहः ।
ब्रह्मकर्मसमारम्भं निर्मुक्तेनान्तरात्मना ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर योगयुक्त पितामह ब्रह्माने मनके द्वारा दूसरी धारणाको प्राप्त होकर विकारमुक्त अन्तःकरणके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मका आरम्भ किया ॥ १ ॥
सर्वाङ्गधारणां कृत्वा मनसा प्रहसन्निव ।
ब्रह्मयोगेन च ब्रह्मा सृजते मनसा प्रजाः ॥ २ ॥
ब्रह्माजीने मनसे सर्वाङ्ग-धारणा करके हँसते हुए-से ब्रह्मयोगसे युक्त हो मानसिक संकल्पके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि की ॥
चक्षुषो रूपसम्पन्ना ह्यप्सराः सृजते प्रभुः।
नासिकाग्राच्च गन्धर्वान् सुचित्राम्बरवाससः ॥ ३ ॥
उन भगवान्ने नेत्रसे रूपवती अप्सराओंको उत्पन्न किया और नासिकाके अग्रभागसे विचित्र वस्त्रधारी गन्धर्वोंकी सृष्टि की ॥ ३ ॥
तुम्बुरुप्रमुखान् सर्वाञ्छतशोऽथ सहस्रशः ।
नृत्यवादित्रकुशलान् कुशलान् सामगीतिषु ॥ ४ ॥
वे सैकड़ों और सहस्रों गन्धर्व, जिनमें तुम्बुरु आदि प्रधान थे, सब-के सब नृत्य और वाद्यमें निपुण तथा सामगानमें कुशल थे ॥ ४ ॥
ब्रह्मयोगेन योगज्ञः स्वयम्भूर्भगवान् प्रभुः ।
चारुनेत्रां सुकेशान्तां सुभ्रू चारुनिभाननाम् ॥ ५ ॥
पद्मेन शतपत्रेण चारुणा सुविराजिताम् ।
स्वक्षां शुचिगिरं सेव्यां ब्राह्मीं मूर्तिमतीं श्रियम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर योगके ज्ञाता एवं सर्वसमर्थ स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माने ब्रह्मयोगके द्वारा दिव्य नेत्रवाली, पवित्र, (द्विजोंके द्वारा) सेवनीय, मूर्तिमती, वेदवाणीस्वरूपा लक्ष्मीको प्रकट किया, जिनके नेत्र बड़े मनोहर थे, केशान्त भाग बहुत ही सुन्दर था, भौंहें भी मनोहर थीं, मुखकी प्रभा कमनीय कान्ति-से प्रकाशित हो रही थी और वे हाथमें परम सुन्दर शतदल कमल लेकर उससे बड़ी शोभा पा रही थीं ॥ ५-६ ॥
ससृजे मनसा ब्रह्मा सम्यक्प्रोक्तेन चेतसा ।
भावयोगेन भूतात्मा सर्वप्राणभृतां नृप ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! भूतात्मा ब्रह्माने समस्त प्राणियोंके भावयोग (अन्तःकरणकी वासना) के अनुसार ईश्वरप्रेरित चित्तके द्वारा मानसिक संकल्पसे ही उनकी रचना की ॥ ७ ॥
चक्षुषो रूपसम्पन्नाः सृजन् सोऽप्सरसः प्रभुः।
नासिकाग्राच्च गन्धर्वान् सुवासः सुप्रवादितान् ॥ ८ ॥
उन प्रभुने नेत्रसे सौन्दर्यशालिनी अप्सराओंकी तथा नासिकाके अग्रभागसे सुन्दर वस्त्रधारी एवं वाद्यकुशल गन्धर्वोंकी सृष्टि की ॥ ८ ॥
गानप्रभानं संचक्रे गन्धर्वाणामशेषतः ।
अन्येषां चैव विप्राणां गानं ब्रह्मप्रभाषितम् ॥ ९ ॥
उन्होंने समस्त गन्धर्वोंके लिये गान्धर्वशास्त्र और अन्यान्य ब्राह्मणोंके लिये सामगानके विधानकी रचना की ॥ ९ ॥
पद्भ्यां सृजति भूतानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च ।
नरकिन्नरयक्षांश्च पिशाचोरगराक्षसान् ॥ १० ॥
गजान् सिंहांश्च व्याघ्रांश्च मृगांश्चैव सहस्रशः ।
तृणजातींश्च बहुधा भावहेतोश्चतुष्पदान् ॥ ११ ॥