विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 805, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७८२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तत्र महामनस्वी भगवान् ब्रह्माने पुनः मनसे ही संकल्प करके भुवर् नामक दूसरे पुत्रकी सृष्टि की ॥ १५ ॥
ततः सोऽप्यब्रवीद् वाक्यं किं कुर्मोति पितामहम्।
पितामहसमाज्ञातो ब्रह्माणौ समुपस्थितः ॥ १६॥
तब उसने भी पितामह ब्रह्माजीसे वही बात कही कि 'मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?' फिर ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर वह पूर्वोक्त दोनों ब्रह्माओं (कपिल और नारायण) की सेवामें उपस्थित हुआ ॥ १६ ॥
ब्रह्माभ्यां सहितः सोऽथ भूयो भागवतीं गतः।
प्राप्तश्च परमं स्थानं स तयोः पार्श्वमागतः ॥ १७॥
उन दोनोंके पास आकर वह पुनः उनके साथ ही भागवती गति परम पदको प्राप्त हो गया ॥ १७॥
तस्मिन्नपि गते पुत्रं तृतीयमसृजत् प्रभुः।
मोक्षोपायेति कुशलं भूर्भुवर्नाम तं विभुः ॥ १८ ॥
उसके भी चले जानेपर वैभवशाली भगवान् ब्रह्माने 'भूर्भुवर्' नामक तीसरे पुत्रको उत्पन्न किया, जो मोक्षसाधनमें अत्यन्त कुशल था ॥ १८ ॥
आससाद स तद्धर्मं तयोरेवागमद् गतिम्।
एवं पुत्रांस्त्रयोऽप्येते उक्ताः शम्भौर्महात्मनः ॥ १९॥
वह भी अपने पूर्वजोंके ही धर्मको प्राप्त हुआ और उसने भी उन्हींकी गति प्राप्त की। इस प्रकार ब्रह्माजीके इन तीनों पुत्रोंको उन कल्याणकारी महात्मा कपिल एवं नारायणने उपदेश दिया (और मुक्त किया ) था ॥ १९ ॥
तान् गृहीत्वा सुतांस्तस्य प्रययौ स्वां गतिं तथा।
नारायणोऽथ भगवान् कपिलश्च यतीश्वरः ॥ २०॥
ब्रह्माजीके उन तीनों मानस पुत्रोंको साथ लेकर वे भगवान् नारायण और यतीश्वर कपिल अपने स्वरूपको प्राप्त हुए ॥ २०॥
यं कालं तौ गतौ मुक्तौ ब्रह्मा तत्कालमेव तु।
तेपे घोरतरं भूयः स तपः संशितव्रतः ॥ २१ ॥
जिस समय वे कपिल और नारायण अपने स्वरूपको प्राप्त एवं मुक्त हुए, उसी समय कठोर व्रतका पालन करने-वाले ब्रह्माजीने पुनः घोरतर तपस्या प्रारम्भ की ॥ २१ ॥
न रराम ततो ब्रह्मा प्रभुरेकस्तपश्चरन् ।
शरीरार्द्धमथो भार्यां समुत्पादितवाञ्छुभाम् ॥ २२॥
उस समय अकेले तपस्या करते हुए भगवान् ब्रह्माजी जब उसमें रम न सके, तब उन्होंने एक शुभलक्षणा भार्या उत्पन्न की, जो उनके शरीरका आधा भाग थी ॥ २२॥
तपसा तेजसा चैव वर्चसा नियमेन च।
सदृशीमात्मनो भार्यां समर्थां लोकसर्जने ॥ २३ ॥
तप, तेज, कान्ति और नियमकी दृष्टिसे उन्होंने सर्वथा अपने अनुरूप भार्याकी सृष्टि की थी, जो लोकोंकी सृष्टि करनेमें समर्थ थी ॥ २३॥
तया सह ततस्तत्र रेमे ब्रह्मा तपोमयः।
सृजन् प्रजापतीन् सर्वान् सागरान् सरितस्तथा ॥ २४॥
तत्र तपोमय जीवन व्यतीत करनेवाले ब्रह्माजी वहाँ उसके साथ रमण करने लगे। उस समय उन्होंने समस्त प्रजापतियों, सागरों और सरिताओंकी सृष्टि की थी ॥ २४॥
ततोऽसृजद् वै त्रिपदां गायत्रीं वेदमातरम्।
अकरोश्चैव चत्वारो वेदान् गायत्रिसम्भवान् ॥२५॥
तत्पश्चात् ब्रह्माजीने वेदमाता त्रिपदा गायत्रीकी सृष्टि की, फिर गायत्रीसे प्रकट हुए चारों वेदोंका संकलन किया ॥
आत्मार्थे चासृजत् पुत्राँल्लोककर्तॄन् पितामहः।
विश्वे प्रजानां पतयो येभ्यो लोका विनिःसृताः ॥ २६ ॥
इसके बाद पितामह ब्रह्माने अपने लिये भी अनेक लोक-स्रष्टा पुत्र उत्पन्न किये। वे सब-के-सब प्रजापति थे, जिनसे समस्त लोकोंका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ २६ ॥
विश्वेशं प्रथमं नाम महातपसमात्मजम् ।
सर्वाश्रमसमं पुण्यं नाम्ना धर्मं स सृष्टवान् ॥ २७ ॥
उनके प्रथम पुत्रका नाम विश्वेश था, वह महातपस्वी हुआ। फिर उन्होंने धर्म नामक दूसरे पुत्रकी सृष्टि की, जो सभी आश्रमोंमें श्रेष्ठ और पवित्र माना गया है ॥ २७ ॥
दक्षं मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।
वसिष्ठं गौतमं चैव भृगुमङ्गिरसं मनुम् ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् ब्रह्माजीने दक्ष, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, गौतम, भृगु, अङ्गिरा और मनुको उत्पन्न किया ॥ २८ ॥
अथर्वभूता इत्येते ख्याता ब्रह्ममहर्षयः।
त्रयोदशसुतानां तु ये वंशा वै महर्षिणाम् ॥ २९ ॥
ये विख्यात ब्रह्मर्षि अथर्वस्वरूप कहे गये हैं। ब्रह्माजी-के ये तेरह पुत्र महर्षि हैं। इनके जो वंश हैं (उनका वर्णन किया जाता है) ॥ २९ ॥
अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका मुनिः।
प्रबोधा सुरसा क्रोधा विनता कद्रुरेव च ॥ ३० ॥
दक्षस्यैता दुहितरः कन्या द्वादश भारत।
नक्षत्राणि च भद्रं ते सप्तविंशतिरुर्जिताः ॥ ३१ ॥
भारत ! तुम्हारा कल्याण हो। अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, मुनि, प्रबोधा, सुरसा, क्रोधा, विनता और कद्रू -ये दक्षप्रजापतिकी बारह कन्याएँ हैं। जो सत्ताईस तेजस्वी नक्षत्र हैं।' वे भी दक्षकी ही कन्याएँ हैं ॥ ३०-३१ ॥