भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 804

[ भविष्यपर्व ] चतुर्दशोऽध्यायः ७८१

वे तेजसे प्रज्वलित-से हो रहे थे और अपनी प्रभाओंसे अन्धकारका निवारण करते थे । सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता ब्रह्माजी उस समय सहस्र किरणोंवाले अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २ ॥

अथान्यद्रूपमास्थाय शम्भुर्नारायणोऽव्ययः। द्विधा कृत्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानमचिन्त्यात्मा सनातनः॥३। आजगाम महातेजा योगाचार्यो महायशाः। सांख्याचार्यश्च मतिमान् कपिलो ब्राह्मणो वरः ॥ ४ ॥ देवर्षिभिस्तु तावेतौ ब्रह्म ब्रह्मविदां वरौ। उभावपि महात्मानावूर्जितौ क्षेत्रतत्परौ ॥ ५ ॥ तौ प्राप्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणममितौजसम् । परापरविशेषज्ञौ पूजितौ परमर्षिभिः ॥ ६ ॥

तदनन्तर कल्याणकारी एवं अविनाशी अचिन्त्यस्वरूप सनातनदेव भगवान् नारायण दूसरा रूप धारण कर अपने आपको ही दो स्वरूपोंमें व्यक्त करके महातेजस्वी, महायशस्वी योगाचार्य नारायण तथा परम बुद्धिमान् श्रेष्ठ ब्राह्मण सांख्याचार्य कपिलके रूपमें वहाँ पधारे । ये दोनों महात्मा ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, शक्तिशाली तथा क्षेत्र ( शरीरं या अध्यात्मतत्त्व ) के चिन्तनमें तत्पर थे । देवर्षियोंद्वारा इनकी स्तुति की जा रही थी । वहाँ आकर उन दोनोंने अमिततेजस्वी ब्रह्माजीको ब्रह्मका उपदेश दिया । वे दोनों ही पर और अवर, पुरुष और प्रकृति अथवा कारण तथा कार्यकी विशेषता ( अन्तर ) को जाननेवाले थे । बड़े-बड़े ऋषियोंने उनका वहाँ पूजन किया ॥ ३-६ ॥

बहुत्वाद्दृढपादश्च विश्वात्मा जगतः स्थितिः । ग्रामणीः सर्वलोकानां ब्रह्मा लोकगुरुर्वरः ॥ ७ ॥

उन्होंने इस प्रकार कहा—लोक बहुत हैं, अतः उन समस्त लोकोंके नेता और गुरु ब्रह्माजी सबसे श्रेष्ठ हैं । वे ही सम्पूर्ण विश्वके आत्मा तथा जगत्‌की प्रतिष्ठा हैं । उनके विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय नामक पाद सुदृढ़ हैं ॥ ७ ॥

तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा तिस्रो व्याहृतयो जपन् । त्रीनिमान् कृतवाँल्लोकान् यथाह ब्राह्मणी श्रुतिः॥ ८ ॥

उन दोनोंकी यह बात सुनकर भूः भुवः स्वः—इन तीनों व्याहृतियोंका जप करते हुए ब्रह्माजीने इन तीनों लोकोंकी सृष्टि की, जैसा कि ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति कहती है ॥ ८ ॥

पुत्रं भूसंज्ञकं चैव समुत्पादितवान् प्रभुः। ततोऽग्रे तद्गतस्नेहो ब्रह्मा मानसमव्ययम् ॥ ९ ॥

तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने पहले भूनामक मानस पुत्रको उत्पन्न किया, जो अव्यय ( विकाररहित ) था । उनके मनमें उस पुत्रके प्रति बड़ा स्नेह था ॥ ९ ॥

सोत्पन्नस्त्वग्रे ब्रह्माणमुवाच मानसः सुतः। करोमि किं ते साहाय्यं ब्रवीतु भगवानिति ॥ १० ॥

पहले उत्पन्न हुए उस मानसिक पुत्रने ब्रह्माजीसे पूछा—‘भगवन् ! बताइये ! मैं आपकी क्या सहायता करूँ' ॥ १० ॥

ब्रह्मोवाच

य एष कपिलो नाम ब्रह्मा नारायणस्तथा । वदते वरदस्तां तु तत्कुरुष्व महामते ॥ ११ ॥

ब्रह्माजीने कहा—महामते ! ये जो कपिल नामक ब्रह्मा तथा वरदायक नारायण हैं, ये तुमसे जो कुछ कहें, वही करो ॥

वैशम्पायन उवाच

ब्रह्मणोक्तस्तदा भूयः संशयं समुपस्थितः । शुश्रूषुरस्मि युवयोः किं कुर्मीति कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर भूनामक पुत्रको यह संशय हुआ कि मेरे पिताजीसे भी बढ़कर कौन है ? तथापि उन दोनोंके पास गया और हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला, 'मैं आप दोनोंका सेवक हूँ, कहिये ! क्या सेवा करूँ ?' ॥ १२ ॥

परमेश्वरावूचतुः

यत् सत्यमक्षरं ब्रह्म ह्यष्टादशनिधं स्मृतम् । यत् सत्यममृतं चैव परं तत् समुपास्स्व ॥ १३ ॥

वे दोनों परमेश्वर बोले—जो सत्य एवं अविनाशी ब्रह्म है, उसके अठारह पाश माने गये हैं। (इन पाशोंसे मुक्त होनेके लिये ) जो सत् एवं अमृत परम तत्त्व है, उसका तुम निरन्तर चिन्तन करते रहो ॥ १३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतद् वचो निशम्यासौ स ययौ दिशमुत्तराम् । गत्वा च तत्र ब्रह्मत्वमगमज्ज्ञानचक्षुषा ॥ १४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उनकी यह बात सुनकर वह ब्रह्माजीका भूनामक मानस पुत्र उत्तर दिशाको चला गया, वहाँ जाकर वह ज्ञानदृष्टिसे विचार करके ब्रह्मभावको प्राप्त हो गया ॥ १४ ॥

ततो ब्रह्मा भुवनाम द्वितीयमसृजत् प्रभुः। संकल्पयित्वा च पुनर्मनसैव महामनाः ॥ १५ ॥


१. यहाँ सांख्य और योगमतके आचार्योंने अपने-अपने मतमें माने गये आठ और दस पाशोंको एकत्र करके उनकी अठारह संख्या बतायी है । सांख्यमतमें आठ प्रकारके पाश यों हैं, १-पाँच कर्मेन्द्रियाँ, २-पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, ३-अन्तःकरणचतुष्टय, ४-पञ्चविध प्राण, ५-आकाश आदि पञ्च महाभूत, ६-काम, ७-कर्म और ८ वीं अविद्या । ये पुर्यष्टक कहलाते हैं । इनमेंसे अविद्या-को छोड़कर और प्रकृति, पुरुष तथा ईश्वरको जोड़कर दस पाश योगमतमें स्वीकार किये गये हैं ।