विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 803, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७८० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
जानीवस्त्वां विश्वयोनिमेकं पुरुषसत्तमम्। तवोपानहेत्वर्थमिदं नौ विद्धि कारणम्॥ २२॥ 'प्रभो! हम आपको जानते हैं, आप समस्त विश्वकी उत्पत्तिके एकमात्र स्थान और पुरुषोत्तम हैं। हम दोनोंकी जो यह सृष्टि हुई है, इसे आप अपनी उपासनाके लिये ही समझें॥ २२॥
अमोघदर्शनं सत्यं यतस्त्वां विदुरीश्वरम्। ततस्त्वामभितो देव काङ्क्षावः प्रतिवीक्षितुम्॥ २३॥ 'देव! ज्ञानी पुरुष आपका दर्शन अमोघ बताते हैं, आपको सत्यस्वरूप ईश्वर समझते हैं, इसलिये हम दोनों समीप आकर आपका दर्शन करना चाहते हैं॥ २३॥
तदिच्छावो वरं दत्तं त्वया ह्यावामरिंदम। अमोघं दर्शनं देव नमस्तेऽस्त्वजितंजय॥ २४॥ 'शत्रुदमन! हम दोनों आपके दिये हुए वरकी अभिलाषा रखते हैं। जो किसीसे भी हारा नहीं है, उसपर भी विजय पानेवाले देव! आपका दर्शन अमोघ है, आपको नमस्कार है'॥ २४॥
श्रीभगवानुवाच तानिच्छथो द्रुतं ब्रूतं वरानसुरसत्तमौ। दत्तायुषौ मया भूयस्त्वहो जीवितुमिच्छथः॥ २५॥ श्रीभगवान् बोले--असुरशिरोमणियो! जल्दी बोलो, तुम कौन-कौनसे वर लेना चाहते हो? अहो! मैंने तुम्हें जितनी आयु दी थी, उससे भी अधिक कालतक जीवित रहना चाहते हो? आश्चर्य है!॥ २५॥
तस्माद् यदेष वां यत्नस्तत् प्राप्नुतं महाबलौ। वध्यौ भवन्तौ तु स्यातां तावित्येवाग्रवीद्धरिः। उभावपि महात्ानावूर्जितौ क्षतवर्जितौ॥ २६॥ महाबली असुर इसका फल प्राप्त करो। तुम दोनों मेरे वध्य हो जाओ। इस प्रकार श्रीहरिने उन दोनोंसे कहा। तब वे दोनों आघातरहित महान् बलशाली महाकाय असुर उनसे यों बोले॥ २६॥
मधुकैटभावूचतुः यस्मिन् न कश्चिन्मृतवांस्तस्मिन् देशे विभो वधम्। इच्छावः पुत्रतां यातुं तव चैव सुराधिप॥ २७॥ मधु और कैटभने कहा-प्रभो! सुरेश्वर! जिस देशमें अबतक कोई मरा न हो, उसीमें आप हमारा वध करें, यह हम दोनोंकी इच्छा है। साथ ही हम आपका पुत्र होना चाहते हैं॥ २७॥
श्रीभगवानुवाच वाढं सुतौ मे प्रवरौ भविष्ये कल्पसम्भवे। भविष्यथो न सन्देहः सत्यमेतद् ब्रवीमि वाम्॥ २८॥ श्रीभगवान् बोले-बहुत अच्छा, तुम दोनों भविष्य कल्पमें मेरे श्रेष्ठ पुत्र होओगे, इसमें संदेह नहीं है। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ॥ २८॥
वैशम्पायन उवाच वरं प्रदायाथ महासुराभ्यां सनातनॊ विश्ववरोत्तमो विभुः। रजस्तमोभ्यां भवभावनोभौ ममन्थ तावूरुतले सुरारिहा॥ २९॥ वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! देव-द्रोहियोंका दमन करनेवाले एवं विश्वमें सबसे श्रेष्ठ सर्वव्यापी सनातन पुरुष नारायणदेवने रजोगुण और तमोगुणके मूर्तिमान् स्वरूप उन दोनों महान् असुरोंको ऐसा वर देनेके अनन्तर उन्हें अपनी जाँघोंपर रखकर मथ डाला। वे दोनों विश्वविधाता ब्रह्माजीके समान ही शक्तिशाली थे॥ २९॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि मधुकैटभवप्रदाने त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें मधु और कैटभको वरदानविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥
चतुर्दशोऽध्यायः
ब्रह्माजीके तीन पुत्रोंको परम पदकी प्राप्ति, फिर उनके द्वारा मैथुनी सृष्टिका विस्तार, दक्ष-कन्याओंकी संततिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
स्थित्वा तस्मिंस्तु कमले ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।
ऊर्ध्वबाहुर्महाबाहुस्तपो घोरं समाश्रितः॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं-उस समय ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु ब्रह्माजी उस कमलपर खड़े हो दोनों बाँहें ऊपर उठाकर घोर तपस्यामें लग गये॥ १॥
ज्वलन्निव च तेजस्त्री भाभिः स्वाभिस्तमोनुदः। बभासे सर्वधर्मज्ञः सहस्रांशुरिवांग्शुमान्॥ २॥