विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 802, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[ भविष्यपर्व ] त्रयोदशोऽध्यायः ७७९
पश्यतां दीप्तवपुषं योगिनां श्रेष्ठमुत्तमम्। नारायणसमाज्ञप्तं सृजन्तमखिलाः प्रजाः। दैवतानि च विश्वानि मानसांश्च सुतानृषीन् ॥ ८ ॥
जलमें सोते हुए शत्रुसूदन श्रीहरिको कम्पित करते हुए-से वे दोनों असुर वहाँ विचर रहे थे। उन्होंने पूर्वोक्त कमलपर सब ओर मुखवाले, तेजस्वी शरीरसे युक्त और योगियोंमें श्रेष्ठ सर्वोत्तम ब्रह्माजीको देखा, जो भगवान् नारायणकी आज्ञासे समस्त प्रजाओंकी, सम्पूर्ण देवताओंकी तथा अपने मानस पुत्र महर्षियोंकी सृष्टि कर रहे थे ॥ ७-८ ॥
ततस्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणमसुरोत्तमौ। दृप्तौ युयुत्सुकौ क्रुद्धौ रोषसंरक्तलोचनौ ॥ ९ ॥
तदनन्तर वे दोनों असुरशिरोमणि बलके घमंडमें भरकर युद्धके लिये उत्सुक हो रोषसे लाल आँखें किये वहाँ ब्रह्माजीसे क्रोधपूर्वक बोले- ॥ ९ ॥
कस्त्वं पुष्करमध्यस्थः सितोष्णीषश्चतुर्मुखः। आवामगणयन् मोहादास्से त्वं विगतज्वरः ॥ १० ॥
'अरे ! तू कौन है, जो मोहवश हम दोनोंको कुछ भी न गिनता हुआ श्वेत पगड़ी और चार मुँह धारण किये इस कमलके मध्यभागमें निश्चिन्त होकर बैठा है ? ॥ १० ॥
एह्यावयोर्बाहुयुद्धं प्रयच्छ कमलोद्भव। आवाभ्यामतिवीराभ्यां न शक्यं स्थातुमाहवे ॥ ११ ॥
'कमलोद्भव पुरुष ! आ। हमें बाहुयुद्धका अवसर दे। हम दोनों अत्यन्त वीर हैं। हमारे साथ तू युद्धमें नहीं टिक सकता है ॥ ११ ॥
कस्त्वं कश्चोद्भवस्तुभ्यं केन वासीह चोदितः। कः स्रष्टा कश्च वै गोप्ता केन नाम्नाभिधीयसे ॥ १२ ॥
'बता ! तू कौन है ? तुझे उत्पन्न करनेवाला कौन है ? किसने तुझे यहाँ सृष्टिके कार्यमें लगाया है ? तेरा स्रष्टा और संरक्षक कौन है ? तू किस नामसे पुकारा जाता है' ? ॥ १२ ॥
ब्रह्मोवाच
यः क इत्युच्यते लोके ह्यविज्ञातः सहस्रशः। तत्सम्भवं योगवन्तं किं मां नाभ्यवगच्छथः ॥ १३ ॥
ब्रह्माजीने कहा-जो लोकमें 'क' नामसे कहे जाते हैं। जिन्हें सहस्रों प्रयत्न करके भी किसीने पूर्णरूपसे नहीं जाना है। मैं उन्हीं परमात्मासे उत्पन्न और योगशक्तिसे सम्पन्न हूँ। क्या तुम दोनों मुझे नहीं जानते ? ॥ १३ ॥
मधुकैटभावूचतुः
नावयोः परमं लोके किंचिदस्ति महामते। आवाभ्यां छाद्यते विश्वं तमसा रजसा तथा ॥ १४ ॥
आच्छादित करनेवाले रजोगुण और तमोगुणसे हम दोनों प्रकट हुए हैं; अतः) हम दोनों अपने स्वरूपभूत तमोगुण और रजोगुणके द्वारा इस विश्वको आच्छादित करते हैं ॥ १४ ॥
रजस्तमोमयावावां यतीनां दुःखलक्षणौ। छलकौ धर्मशीलानां दुस्तरौ सर्वदेहिनाम् ॥ १५ ॥
हम दोनों क्रमशः रजोमय और तमोमय हैं। यत्नशील साधकोंको दुःख देना हमारा काम है। हम धर्मशील पुरुषोंको छलते हैं। हमें लाँघ जाना सभी देहधारियोंके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ १५ ॥
आवाभ्यां मुह्यते लोक उच्छ्रिताभ्यां युगे युगे। आवामर्थश्च कामश्च यशः सर्वपरिग्रहाः ॥ १६ ॥
हम प्रत्येक युगमें उन्नत हो सारे संसारको मोहमें डाल देते हैं। अर्थ, काम, यश और समस्त परिग्रह हम दोनों ही हैं ॥ १६ ॥
सुखं यत्र मुदो यत्र यत्र श्रीः सन्नतिर्नयः। एषां यत्काङ्क्षितं चैव तत्तदावां विचिन्तय ॥ १७ ॥
जहाँ सुख है, आनन्द है। जहाँ श्री, सन्नति और नय है तथा इन सबके द्वारा जो-जो अभिलषित वस्तु है, वह-वह हम दोनों ही हैं। ऐसा चिन्तन कर ॥ १७ ॥
ब्रह्मोवाच
यत् तद् योगवतां श्रेष्ठं यच्च पूर्वं मयार्चितम्। तत् समाधाय गुणवान् सत्त्वे चास्मि प्रतिष्ठितः ॥ १८ ॥
ब्रह्माजी बोले-जो योगयुक्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं और जिनकी पहले मैंने आराधना की है, उन्हीं परमात्माको हृदयमें धारण करके मैं सत्त्वमें प्रतिष्ठित हूँ। गुणवान् हूँ—सृष्टिके साधनभूत त्रिगुणात्मक वस्तुओंका मेरे पास संग्रह है ॥ १८ ॥
यत्परं योगयुक्तानामक्षरं सत्त्वमेव च। रजस्तमश्चैव यत्स्रष्टा जीवसम्भवः ॥ १९ ॥ यतो भूतानि जायन्ते सात्त्विकानीतराणि च। स एव युद्ध्वा समरे वशी वां शमयिष्यति ॥ २० ॥
जो योगियोंके परम तत्त्व हैं, अविनाशी सत्त्व हैं, रजोगुण और तमोगुणके स्रष्टा हैं तथा जीवोंकी उत्पत्तिके कारण हैं, जिनसे सात्त्विक और असात्त्विक सभी भूत उत्पन्न होते हैं, सबको वशमें रखनेवाले वे ही परमात्मा समरभूमिमें युद्ध करके तुम दोनोंको शान्त कर देंगे ॥ १९-२० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः शयानं श्रीमन्तं बहुयोजनविस्तृतम्। पद्मनाभं हृषीकेशं प्रणम्यावोचतामुभौ ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय ! तदनन्तर वहाँ अनेक योजन विस्तृत शरीर धारण करके सोये हुए सबकी इन्द्रियोंके प्रेरक श्रीमान् भगवान् पद्मनाभको प्रणाम करके वे दोनों मधु और कैटभ उनसे इस प्रकार बोले- ॥ २१ ॥