भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 796, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 796

७७४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे

श्रीभगवान् बोले—मुने ! मैं नारायण, समस्त देहधारियोंकी उत्पत्तिका कारणभूत ब्रह्मा, सम्पूर्ण भूतोंका उद्भव करनेवाला तथा समस्त भूतोंका संहार करनेमें समर्थ (रुद्र) हूँ ॥ ४९ ॥

अहमैन्द्रे पदे शक्र ऋतूनामपि वत्सरः।
अहं युगे युगाक्षश्च युगस्यावर्त एव च ॥ ५० ॥

मैं ही शक्र नामसे प्रसिद्ध होकर इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुआ हूँ। मैं ही ऋतुओंका स्वामी संवत्सर हूँ। मैं ही प्रत्येक युगमें युगाक्ष और युगावर्त कहलाता हूँ ॥ ५० ॥

अहं सर्वाणि सत्त्वानि दैवतान्यखिलानि च।
भुजगानामहं शेषस्तार्क्ष्योऽहं सर्वपक्षिणाम् ॥ ५१ ॥

मैं ही सम्पूर्ण प्राणी और समस्त देवता, सर्पोंमें शेष तथा सारे पक्षियोंमें गरुड़ भी मैं ही हूँ ॥ ५१ ॥

अहं सहस्रशीर्षा द्यौर्यः पादैरभिसंवृतः।
आदित्यो यज्ञपुरुषो देवो यज्ञमयो मखः।
अहमग्निर्हव्यवाहो यादसां पतिरव्ययः ॥ ५२ ॥

मैं सहस्रों मस्तकोंसे युक्त विराट् पुरुष हूँ। मैं ही वह आकाश या स्वर्ग हूँ, जो मेरे चरणचिह्नोंसे व्याप्त है। मैं ही सूर्यदेव, यज्ञपुरुष तथा तपोयज्ञ, योगयज्ञ आदि अनेक प्रकारके यज्ञोंसे सम्पन्न होनेवाला मख (महायज्ञ) भी मैं ही हूँ। मैं ही देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाला अग्निदेव हूँ। जल-जन्तुओंका पालक अविनाशी वरुण भी मैं ही हूँ ॥ ५२ ॥

यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम्।
बहुजन्मनिरुद्धात्मा ब्राह्मणो यतिरुच्यते ॥ ५३ ॥

भूमण्डलमें स्वधर्मानुष्ठानरूप तपसे विशुद्ध अन्तःकरण-वाले पुरुषोंमेंसे जो अनेक जन्मोंतक चित्तवृत्तियोंका निरोध-रूप योग साधनेवाला ब्रह्मवेत्ता संन्यासी है, वह जिस ब्रह्म-का स्वरूप बताया जाता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ ॥ ५३ ॥

ज्ञानवान् दृष्टविश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः।
कृतान्तः सर्वभूतानां विक्षेपां कालसंज्ञितः ॥ ५४ ॥

जिसने विश्वात्माका साक्षात्कार कर लिया है, वह ज्ञानी मैं ही हूँ। मैं ही योगियोंमें परम योगवेत्ता हूँ। मैं ही समस्त प्राणियोंका अन्त करनेवाला कृतान्त एवं समस्त लोकोंका काल हूँ ॥ ५४ ॥

अहं कर्म क्रिया जीवः सर्वेषां धर्मदर्शनः।
निष्क्रियः सर्वभूतेषु स्वात्मज्योतिः सनातनः ॥ ५५ ॥

मैं ही कर्म, क्रिया, जीव और सबको धर्मके स्वरूप या फलका दर्शन करानेवाला हूँ। मैं ही समस्त प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित, निष्क्रिय (साक्षी) आत्मज्योतिसे प्रकाशित सनातन परमात्मा हूँ ॥ ५५ ॥

प्रधानं पुरुषो देवोऽहमाद्यस्त्वक्षयोऽव्ययः।
अहं धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिवासिनाम् ॥ ५६ ॥

मैं ही प्रकृति, पुरुष और देवता हूँ। मैं ही सबका आदिकारण, अक्षय एवं अव्यय परमेश्वर हूँ। मैं ही सम्पूर्ण आश्रमोंमें निवास करनेवाले पुरुषोंका धर्म और तप हूँ ॥ ५६ ॥

अहं हयशिरो देवः क्षीरोदे यो महार्णवे।
ऋतं सत्यं च परममहमेकः प्रजापतिः ॥ ५७ ॥

मैं ही भगवान् हयग्रीव हूँ। जिन्होंने महान् क्षीरसागरमें प्रकट हो वेदोंकी रक्षा की थी। ऋत और परम सत्य भी मैं ही हूँ। एकमात्र मैं ही प्रजापति हूँ ॥ ५७ ॥

अहं सांख्यमहं योगमहं तत्परमं पदम्।
अहमिज्यो भवश्चाहमहं विद्याधिपः स्मृतः ॥ ५८ ॥

मैं ही सांख्य, मैं ही योग और मैं ही परमपद हूँ। मैं ही पूजनीय, मैं ही भव (शिव) और मैं ही विद्याओंका अधिपति हूँ ॥ ५८ ॥

अहं ज्योतिरहं वायुरहं भूमिरहं नभः।
अहमापः समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशो दश।
अहं वर्षमहं सोमः पर्जन्योऽहमहं रविः ॥ ५९ ॥

मैं ही अग्नि, मैं ही वायु, मैं ही भूमि और मैं ही आकाश हूँ। जल, समुद्र, नक्षत्र और दसों दिशाएँ भी मैं ही हूँ। मैं ही वर्षा, मैं ही सोम, मैं ही मेघ और मैं ही सूर्य हूँ ॥ ५९ ॥

क्षीरोदः सागरश्चाहं समुद्रो वडवामुखः।
वह्निः संवर्तको भूत्वा पिवंस्तोयमयं हविः ॥ ६० ॥

मैं ही क्षीरसागर समुद्र और बड़वामुख अग्नि हूँ। मैं ही संवर्तक अग्नि होकर जगत्के जलरूपी हविष्यको पी लेता हूँ ॥ ६० ॥

अहं पुराणं परमं तथैवेह परायणम्।
अहं भूतस्य भव्यस्य वर्तमानस्य सम्भवः ॥ ६१ ॥

मैं ही परम पुरातन ब्रह्म हूँ। मैं ही यहाँ सबका परम आश्रय हूँ। मैं ही भूत, भविष्य और वर्तमान जगत्की उत्पत्तिका कारण हूँ ॥ ६१ ॥

यत्किञ्चित् पश्यसे चैव यच्छृणोषि च किंचन।
यच्चानुभवसे लोके तत् सर्वं मामकं स्मृतम् ॥ ६२ ॥

तुम इस लोकमें जो कुछ देखते, जो कुछ सुनते और जो कुछ अनुभव करते हो, वह सब मेरा ही स्वरूप माना गया है ॥ ६२ ॥

विश्वं सृष्टं मया पूर्वं सृजेयं चाद्य पश्य माम्।
युगे युगे च स्रक्ष्यामि मार्कण्डेयाखिलं जगत् ॥ ६३ ॥

पूर्वकालमें मैंने ही विश्वकी सृष्टि की थी और आज भी

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