विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 797, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] एकादशोऽध्यायः ७७५
मैं ही सृष्टि करूँगा। तुम मुझे देखो। मार्कण्डेय ! प्रत्येक युग (कल्प) में सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि मैं ही करूँगा ॥
तदेतदखिलं सर्वं मार्कण्डेयावधारय ।
शुश्रूषुर्मम धर्मेप्सुः कुक्षौ चर सुखी भव ॥ ६४ ॥
मार्कण्डेय ! यह सारा जगत् सम्पूर्णरूपसे मेरा ही स्वरूप है—ऐसा समझो । अब तुम धर्मोपदेश सुननेकी इच्छा रखकर मेरे धर्मकी प्राप्तिके लिये उत्सुक हो मेरे उदरमें विचरण करो और सुखी हो जाओ ॥ ६४ ॥
मम ब्रह्मा शरीरस्थो देवाश्च ऋषिभिः सह ।
व्यक्तमव्यक्तयोगं मामवगच्छापराजितम् ॥ ६५ ॥
ब्रह्माजी मेरे ही शरीरमें स्थित हैं। ऋषियोंसहित देवता भी मेरी देहमें ही हैं। तुम मुझे व्यक्त जगत्स्वरूप, अव्यक्त योगरूप परमात्मा तथा किसीसे भी पराजित न होनेवाला विष्णु समझो ॥ ६५ ॥
अहमेकाक्षरो मन्त्रस्त्र्यक्षरश्चैव सर्वशः ।
त्रिपदश्चैव परस्त्रिवर्गार्थनिदर्शनः ॥ ६६ ॥
मैं एकाक्षर मन्त्र अकार, त्र्यक्षर मन्त्र प्रणव तथा त्रिपद मन्त्र गायत्री हूँ। तथा मैं ही धर्म, अर्थ एवं कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्ति करानेवाला (और मोक्षकी भी) प्राप्ति करानेवाला परमात्मा हूँ ॥ ६६ ॥
वक्त्रे व्याहृतवानाशु मार्कण्डेयं महामुनिम् ।
प्रवेशयामास ततो जठरं विश्वरूपधृक् ॥ ६७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! इस प्रकार महामुनि व्यासने इस वेदान्तप्रसिद्ध परमतत्त्वका पुराणोंमें वर्णन किया है । विश्वरूपधारी भगवान् बालमुकुन्दने महामुनि मार्कण्डेयको अपने मुखमें डालनेके लिये उन्हें शीघ्र ही अपने पास बुलाया और उन्हें अपने उदरमें घुसा दिया ॥ ६७ ॥
ततो भगवतः कुक्षिं प्रविष्टो मुनिसत्तमः ।
रराम सुखमासाद्य शुश्रूषुर्हंसमव्ययम् ॥ ६८ ॥
तत्पश्चात् भगवान्के उदरमें प्रविष्ट हुए मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय हंसस्वरूप अविनाशी परमात्माकी आराधनाके लिये उत्सुक हो सुखपूर्वक विचरने लगे ॥ ६८ ॥
तदक्षरं विविधमथाश्रितो वपु-
र्महार्णवे व्यपगतचन्द्रभास्करे ।
शनैश्चरन्प्रभुरपि हंससंज्ञितो-
ऽसृजज्जगद्विसृजति कालपर्यये ॥ ६९ ॥
चन्द्रमा और सूर्यसे रहित उस एकार्णवमें अनेक प्रकारके स्वरूपका आश्रय लेनेवाले हंस-नामधारी भगवान्, जो अक्षरब्रह्मरूप हैं, धीरे-धीरे विचरने लगे । फिर सृष्टिकाल आनेपर उन्होंने ही जगत्की सृष्टि की तथा सदा ही विविध भौतिक वस्तुओंकी वे सृष्टि करते रहते हैं ॥ ६९ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमेतत् पुराणेषु वेदान्ते च महामुनिः ।
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे मार्कण्डेयकर्तृकभगवद्दर्शने दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसंगमें मार्कण्डेयजीको भगवान्का दर्शनविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः
परमात्माके द्वारा भूतोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीको प्रकट करनेके लिये उनकी नाभिसे एक महान् पद्मका प्रादुर्भाव
वैशम्पायन उवाच
आपवः स विभुर्भूत्वा कारयामास वै तपः ।
छादयित्वाऽऽत्मनो देहमात्मना कुम्भसम्भवः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! वे हंससंज्ञक परमात्मा कुम्भयोनि ब्रह्मर्षि वसिष्ठ होकर अपनी कुम्भजनित देहको अपने आत्मा (समष्टिके अभिमानी चेतन) से आच्छादित करके तपस्या करने लगे ॥ १ ॥
ततो महात्मातिबलो मतिं लोकस्य सर्जने ।
महतां पञ्चभूतानां विश्वभूतो व्यचिन्तयत् ॥ २ ॥
उस समय उन अत्यन्त शक्तिशाली विश्वरूप महात्माने भौतिक जगत् तथा उसके उपादानभूत पञ्चमहाभूतोंकी सृष्टिका विचार किया ॥ २ ॥
तस्य चिन्तयतस्तत्र तपसा भावितात्मनः ।
निराकाशे तोयमये सूक्ष्मे जगति गह्वरे ॥ ३ ॥
ईषत्संक्षोभयामास सोऽर्णवं सलिले स्थितः ।
सोऽनन्तरोर्मिणा सूक्ष्ममथ च्छिद्रमभूत्तदा ॥ ४ ॥
आकाशरहित जलस्वरूप सूक्ष्म गुफामें जगत्के लीन हो जानेपर वहाँ उस समय तपस्यासे भावित अन्तःकरणवाले वे परमेश्वर जब इस प्रकार चिन्तन कर रहे थे, तब सलिल-राशिमें स्थित हुए उन्होंने उस एकार्णवमें कुछ क्षोभ (हलचल) उत्पन्न कर दिया । तदनन्तर उनके मनमें जो सृष्टि-विषयक संकल्पकी दूसरी तरंग उठी, उससे उस जलमें सूक्ष्म छिद्र (आकाश या अवकाश) प्रकट हो गया ३-४
तत्र शब्दगतिर्भूत्वा मारुतद्रवसम्भवः ।
स लब्ध्वाऽऽन्तरमक्षोभ्यो व्यवर्धत समीरणः ॥ ५ ॥