विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 798, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७७६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
तदनन्तर जो संकल्पकी पुनः तीसरी तरंग उठी, उससे उस आकाशमें शब्दकी गति हुई अर्थात् वे ईश्वर ही वहाँ शब्दरूपसे गतिशील हुए। उनके इस प्रकार गतिशील होनेमें वायुका वेग ही कारण था। यदि कहें उस समय वहाँ वायु कहाँ थी तो इसका उत्तर सुनो—वे ईश्वर वह छिद्र या अवकाश पाते ही अक्षोभ्य होकर भी स्वयं वायुरूपमें प्रकट हो वहाँ बढ़ने लगे (तात्पर्य यह है कि आकाशके अनन्तर उत्पन्न हुई वायु शब्द और गतिकी अभिव्यक्तिमें कारण हुई) ॥ ५ ॥
विवर्धता बलवता तेन संक्षोभितोऽर्णवः। अन्योन्यवेगाभिहता ममन्थुश्चोर्मयो भृशम् ॥ ६ ॥
उस बढ़ती हुई प्रबल वायुसे वह एकार्णवका जल सब ओरसे क्षुब्ध हो उठा। उसमें बहुत-सी तरंगें उठकर परस्पर वेगसे टकराती हुई उस महासागरको मथने लगीं ॥ ६ ॥
महार्णवस्य क्षुब्धस्य तस्मिन् नम्भसि मध्यति। कृष्णवर्त्मा समभवत् प्रभुर्वैश्वानरोऽर्चिमान् ॥ ७ ॥
उस क्षुब्ध महासागरका जल जब इस प्रकार मथा जाने लगा, तब उससे ज्वालामालाओंसे युक्त शक्तिशाली कृष्णवर्त्मा अग्निका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ७ ॥
तत्र संशोषयामास पावकः सलिलं बहु। क्षयाज्जलनिधेश्छिद्रमभवन्निःसृतं नभः ॥ ८ ॥
उस अग्निने वहाँ फैली हुई अगाध जलराशिको सोख लिया। उस जलराशिके क्षीण हो जानेसे वहाँका स्थान खाली हो गया और आकाश निकल आया ॥ ८ ॥
आत्मतेजोद्भवाः पुण्या आपोऽमृतरसोपमाः। आकाशं छिद्रसम्भूतं वायुराकाशसम्भवः ॥ ९ ॥
अमृतरसके समान मधुर एवं पवित्र जल परमात्माके तेजसे प्रकट हुआ है। उस जलमें जो छिद्र प्रकट हुआ, उससे आकाशका आविर्भाव हुआ और आकाशसे वायुकी उत्पत्ति हुई ॥ ९ ॥
आज्यसंघर्षणोद्भूतं पावकं चाज्यसम्भवम्। दृष्ट्वा प्रीतियुतो देवो महाभूतादिभावनः ॥ १० ॥
घीके समान द्रवस्वरूप जो जल है, उसके पारस्परिक संघर्षसे पृथ्वीका प्रादुर्भाव हुआ। उस पृथ्वी या पार्थिव शरीरमें जठरानलका प्राकट्य हुआ, जो परम्परया जलसे ही उत्पन्न है। उसे देखकर महाभूतोंके आदिकारण परमात्मदेव बहुत प्रसन्न हुए ॥ १० ॥
दृष्ट्वा भूतानि भगवाँल्लोकसृष्ट्यर्थतत्त्ववित्। ब्रह्मणो जन्म स हितं बहुरूपो विचिन्वति ॥ ११ ॥
लोकसृष्टिके प्रयोजन और तत्त्वको जाननेवाले अनेक रूपधारी वे भगवान् प्रत्येक कल्पमें इस प्रकार भूतोंका प्राकट्य देखकर सृष्टि-विस्तारके लिये हितकर ब्रह्माजीके जन्मका चिन्तन करते हैं (अर्थात् मानसिक संकल्पसे ब्रह्माजीको उत्पन्न करते हैं) ॥ ११ ॥
चतुर्युगादिसंख्यान्ते सहस्रयुगपर्यये। यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥ बहुजन्मनिरुद्धात्मा ब्राह्मणो यतिरुत्तमः। ज्ञानवान् दृष्टविश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः ॥ १३ ॥
एक सहस्र चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है (और इसी दिनसे वे सौ वर्षोंतक जीवित रहते हैं)। वे ब्रह्मा पूर्वकल्पमें इस पृथ्वीपर तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले द्विजराजोंमें श्रेष्ठ, ब्रह्मके उपासक, यत्नशील, अनेक जन्मोंतक चित्त-वृत्तियोंका निरोध करनेवाले, ज्ञानवान्, विश्वात्माका साक्षात्कार करनेवाले और योगियोंमें सर्वश्रेष्ठ योगवेत्ता रहे होते हैं ॥ १२-१३ ॥
तं योगवन्तं विश्वेशं सम्पूर्णैश्वर्यविक्रमम्। देवो ब्रह्मणि विश्वे च नियोजयति योगवित् ॥ १४ ॥
योगवेत्ता विश्वेश्वरदेव उन योगवान्, सबके लिये उपास्य तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्य और विक्रमसे सम्पन्न ब्रह्माजीको वेद और जगत्की परम्परा बनाये रखनेके कार्यमें नियुक्त करते हैं॥
ततस्तस्मिन् महातोये हविषो हरिरच्युतः। स्वपन् क्रीडंश्च विविधं मोदते चैष पावकिः ॥ १५ ॥
ब्रह्माजीको नियुक्त करनेके अनन्तर भगवान् श्रीहरि अपने स्वरूपभूत उस महान् जलमें अच्युतरूपसे स्थित होते हैं और ये नियुक्त हुए तैजस ब्रह्मा प्राणियोंके कर्मवश उनके कर्मोंसे उपरत होनेपर सोते तथा सबके कर्मोंके उद्भव होनेपर नाना प्रकारसे क्रीडाएँ करते हुए आनन्दमग्न होते हैं ॥१५॥
पद्मं नाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवांस्तदा। सहस्रपत्रं विरजो भास्कराभं हिरण्मयम् ॥ १६ ॥
उस समय जब कि ब्रह्माके जन्मका समय उपस्थित हुआ था, भगवान् श्रीहरिने अपनी नाभिसे एक सहस्रदल कमल प्रकट किया, जो रजोगुण या रजसे रहित सूर्यके समान तेजस्वी तथा सुवर्णमय था ॥ १६ ॥
हुताशनज्वलितशिखोज्ज्वलप्रभं सुगन्धिनं शरदमलार्कतेजसम्। विराजते कमलमुदारवर्चसं महात्मनस्तनुरुहचारुदर्शनम् ॥ १७ ॥
महात्मा श्रीहरिके शरीरसे प्रकट हो अत्यन्त मनोहर