विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 799, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] द्वादशोऽध्यायः [ ७७७
दिखायी देनेवाला वह अतिशय कान्तिमान्, सुगन्धित कमल बड़ी शोभा पा रहा था । वह आगकी प्रज्वलित शिखाके समान अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित हो रहा था । उसका तेज शरत्कालके निर्मल सूर्यकी भाँति उद्भासित होता था ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे महापद्मोत्पत्तौ एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावके प्रसङ्गमें महापद्मकी उत्पत्तिविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः
नारायणके नाभिकमलके दलोंमें समस्त लोकोंकी कल्पना
वैशम्पायन उवाच
अथ योगविदां श्रेष्ठं सर्वभूतमनोमयम् ।
स्रष्टारं सर्वभूतानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम् ॥ १ ॥
तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहुयोजनविस्तृते ।
सर्वतेजोगुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्युते ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर आपस्वरूप परमात्माने अनेक योजन विस्तृत, सम्पूर्ण तेजोगुणोंसे सम्पन्न और पार्थिव लक्षणोंसे युक्त उस हिरण्मय कमलमें योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, सम्पूर्ण भूतोंके मनमें स्थित, सब ओर मुखवाले तथा समस्त प्राणियोंके स्रष्टा ब्रह्माजीको स्थापित कर दिया ॥ १-२ ॥
तच्च पद्मं पुराणाज्ञाः पृथिवीरुहमुत्तमम् ।
नारायणाङ्कसम्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः ॥ ३ ॥
पुराणोंके ज्ञाता महर्षिगण पृथ्वी ( शरीर ) से उत्पन्न होनेवाले उस उत्तम कमलको नारायणके अङ्गसे प्रकट हुआ बताते हैं ॥ ३ ॥
या तु पद्मासना देवी पृथिवीं तां प्रचक्षते ।
ये गर्भसाराङ्कुरस्तान् दिव्यान् पर्वतान् विदुः ॥ ४ ॥
वह पद्म जिस देवीका आसन है, उसे पृथ्वी कहते हैं तथा उस कमलके भीतरी भागमें जो पाषाणमय होनेके कारण सुदृढ़ और अङ्कुरकी भाँति ऊँचे उठे हुए भाग हैं, उन्हें दिव्य पर्वत माना गया है ॥ ४ ॥
हिमवन्तं च मेरुं च नीलं निषधमेव च ।
कैलासं मुञ्जवन्तं च तथाद्रिं गन्धमादनम् ॥ ५ ॥
पुण्यं त्रिशिखरं चैव कान्तं मन्दरमेव च ।
उदयं कन्दरं चैव विन्ध्यमस्तं च पर्वतम् ॥ ६ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—हिमवान्, मेरु, नील, निषध, कैलास, मुञ्जवान्, गन्धमादन, पवित्र त्रिकूट, कमनीय मन्दराचल, उदयाचल, कन्दराचल, विन्ध्याचल और अस्ताचल ॥ ५-६ ॥
एते देवगणानां च सिद्धानां च महात्मनाम् ।
आश्रमाः पुण्यशीलानां सर्वकामयुताद्रयः ॥ ७ ॥
ये सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न पर्वत, देवताओं, सिद्धों और पुण्यशील महात्माओंके आश्रम हैं ॥ ७ ॥
एतेषामन्तरो देशो जम्बूद्वीप इति स्मृतः ।
जम्बूद्वीपस्य संख्यानं याज्ञिया यत्र चक्रिरे ॥ ८ ॥
इनके बीचका देश जम्बूद्वीप माना गया है। जहाँ याज्ञिकोंने यज्ञ किया है, उसी प्रदेशको जम्बूद्वीपकी संज्ञा या ख्याति प्राप्त हुई है ॥ ८ ॥
गर्भाद् यत् स्रवते तोयं देवामृतरसोपमम् ।
दिव्यतीर्थशतापाङ्गस्तस्ता दिव्याः सरितः स्मृताः ॥ ९ ॥
उस कमलके गर्भसे जो देवताओंके अमृतरसके समान जल झरता है, उस जलको बहानेवाली दिव्य सरिताएँ मानी गयी हैं। सैकड़ों दिव्य तीर्थ उनके अपाङ्ग हैं ॥ ९ ॥
यान्येतानि तु पद्मस्य केसराणि समन्ततः ।
असंख्याताः पृथिव्यां तु विश्वे ते धातुपर्वताः ॥ १० ॥
उस पद्मके चारों ओर जो ये केसर हैं, वे ही भूमण्डलके सारे धातुपर्वत हैं, जिनकी गणना असम्भव है ॥ १० ॥
यानि पद्मस्य पत्राणि भूरीण्यूर्ध्वं नराधिप ।
ते दुर्गमाः शैलचिता म्लेच्छदेशा विकल्पिताः ॥ ११ ॥
नरेश्वर ! उस कमलके जो बहुत-से उपरी दल हैं, वे ही पर्वतोंसे भरे हुए दुर्गम म्लेच्छ देश कहे गये हैं ॥ ११ ॥
यान्यधः पद्मपत्राणि वासार्थे तानि भागशः ।
दैत्यानामुरगाणां च पातालं तन्महात्मनाम् ॥ १२ ॥
उक्त कमलके जो नीचेके पत्र हैं, वे पृथक्-पृथक् निवासके लिये चुन लिये गये हैं। उन्हींको महामना दैत्यों और सर्पोंका वासस्थान पाताल कहा गया है ॥ १२ ॥
तेषामधोगतं यत्तदुदकेत्यभिसंज्ञितम् ।
महापातकर्म्माणो मज्जन्ते यत्र मानवाः ॥ १३¹ ॥
उन पद्मपत्रोंके नीचे जो उदक नामक स्थान है, उसमें महापातकयुक्त कर्म करनेवाले मनुष्य डूबते हैं ॥ १३ ॥
¹ १. उद् उत्कृष्टं अकं दुःखं यत्र तत् उदकम् ( जहाँ उत्कृष्ट अर्थात् महान् अक-दुःख हैं, वह स्थान उदक है ) —इस व्युत्पत्तिके अनुसार नरकको ही यहाँ उदक कहा गया है ।