भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 800, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 800
५७८श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

पद्मस्यान्ते कुशं यत्तदेकार्णवजलं महत् ।
प्रोक्तास्ते दिक्षु संघाताश्चत्वारो जलसागराः ॥ १४ ॥

उस कमलके अन्तमें चारों ओर जो कुश अर्थात् जल है, वही एकार्णवकी अनन्त जलराशि है। उसके चार भाग चारों दिशाओंमें संचित हैं, जो जलके समुद्र कहे गये हैं ॥ १४ ॥

ऋषेर्नारायणस्यायं महापुष्करसम्भवः ।
प्रादुर्भावोऽप्ययं तस्मान्नाम्ना पुष्करसम्भवः ॥ १५ ॥

नारायण ऋषिकी नाभिसे यह महान् पद्मका प्राकट्य हुआ है, इसीलिये उसके इस प्रादुर्भावको पुष्करसम्भव (पुष्करप्रादुर्भाव) नामसे कहा गया है ॥ १५ ॥

एतस्मात् कारणात् तज्ज्ञैः पुराणैः परमर्षिभिः ।
यज्ञियैर्वेददृष्टार्थैर्यज्ञे पद्मचिती कृतः ॥ १६ ॥

इसी कारणसे उस पद्मको जाननेवाले पुरातन महर्षियोंने, जो यज्ञपरायण तथा वेदार्थके ज्ञाता हैं, यज्ञमें कमलके आकारका कुण्ड निर्माण किया है ॥ १६ ॥

एवं भगवता पद्मे विश्वस्य परमो विधिः ।
पर्वतानां नदीनां च देशानां च विनिर्मितः ॥ १७ ॥

इस प्रकार भगवान्ने उस कमलमें ही विश्वकी व्यावहारिक सृष्टि की है, पर्वतों, नदियों तथा विभिन्न देशोंकी भी रचना की है ॥ १७ ॥

विभुस्तथैवाप्रतिमप्रभावः
प्रभाकरो वै भगवान् महात्मा ।
स्वयं स्वयंभूः शयनेऽसृजत् तदा
जगन्मयं पद्मनिधिं महार्णवे ॥ १८ ॥

अप्रतिम प्रभावशाली, सर्वव्यापी, प्रभापुञ्ज, ऐश्वर्यसम्पन्न, महामना, स्वयम्भू भगवान् नारायणने उस महार्णवके भीतर शयन करते समय स्वयं ही उस जगन्मय पद्मनिधिकी सृष्टि की थी ॥ १८ ॥

इति श्रीमद्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सर्वभूतोत्पत्तौ द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौष्करप्रादुर्भावके प्रसङ्गमें सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥


त्रयोदशोऽध्यायः

मधु और कैटभका ब्रह्माजीके साथ संवाद तथा भगवान् विष्णुके द्वारा वध

वैशम्पायन उवाच

चतुर्युगादिसम्भूतो सहस्रयुगपर्यये ।
विघ्नस्तमसि सम्भूतो मधुर्नाम महासुरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सहस्र युगोंकी ब्रह्माजीकी रात्रि व्यतीत होनेपर चारों युगोंमें जो आदि सत्ययुग आया, उसमें आरम्भ होनेवाली सृष्टिके कार्यमें विघ्नस्वरूप एक महान् असुर उत्पन्न हुआ, जिसका नाम मधु था। वह तमोगुणसे प्रकट हुआ था ॥ १ ॥

तस्यैव च सहायोऽन्यो भूतो रजसि कैटभः ।
तौ रजस्तमसाविष्टौ सम्भूतौ कामरूपिणौ ॥ २ ॥

उसीका सहायक एक दूसरा असुर उत्पन्न हुआ था, जो रजोगुणसे प्रकट हुआ था; उसका नाम कैटभ था। वे दोनों इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे और रजोगुण तथा तमोगुणसे आविष्ट रहते थे ॥ २ ॥

एकार्णवजलं सर्वे क्षोभयन्तौ महासुरौ ।
कृष्णरक्ताम्बरधरौ श्वेतदीप्तोग्रदंष्ट्रिणौ ॥ ३ ॥

सम्पूर्ण एकार्णवके जलमें क्षोभ उत्पन्न करते हुए वे दोनों महान् असुर क्रमशः काले और लाल रंगके वस्त्र धारण करते थे। उनकी भयंकर दाढ़ें सफेद और चमकीली थीं ॥ ३ ॥

उभौ मदकटोद्दग्रौ केयूरवलयोज्ज्वलौ ।
महाविकृतताम्राक्षौ पीनोरस्कौ महाभुजौ ॥ ४ ॥

वे दोनों उत्कट मदसे उद्दण्ड हो रहे थे। बाजू-बंद और कड़े धारण करके उनकी दीप्तिसे दमक रहे थे। उनकी लाल-लाल आँखें बड़ी विकराल थीं। वक्षःस्थल मांससे भरे हुए थे और भुजाएँ लंबी थीं ॥ ४ ॥

महच्छिरःसंहननौ जङ्गमाविव पर्वतौ ।
नीलमेघाभ्रसंकाशावादित्यप्रतिमाननौ ॥ ५ ॥

उनके सिर और शरीर विशाल थे। वे दोनों दो चलते-फिरते पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे। मेघोंकी काली घटाके समान काले दिखायी देते थे। उनके मुख सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥ ५ ॥

विद्युदम्भोधताम्राभ्यां कराभ्यामतिभीषणौ ।
पादसंचारवेगाभ्यामुत्क्षिपन्ताविवार्णवम् ॥ ६ ॥

बिजलीसहित मेघोंके समान ताम्रवर्णवाले दोनों हाथोंसे वे अत्यन्त भीषण दिखायी देते थे। अपने पैरोंके चलनेके वेगसे उस महासागरको उछालते हुए-से जान पड़ते थे ॥ ६ ॥

कम्पयन्ताविव हरिं शयानमरिसूदनम् ।
तौ तत्र विहरन्तौ स्म पुष्करे विद्रवतोमुखम् ॥ ७ ॥