भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 795

भविष्यपर्व ] दशमोऽध्यायः [ ७७३

श्रीभगवानुवाच मा भैर्वत्स न भेतव्यमिहैवायाहि चान्तिकम् ।
मार्कण्डेय मुने धीर बालस्त्वं श्रमपीडितः ॥ ३६ ॥

श्रीभगवान् बोले— बेटा ! डरो मत ! डरनेकी आवश्यकता नहीं है; यहीं मेरे निकट चले आओ ! धीर मुनि मार्कण्डेय ! तुम बालक हो, अतः श्रमसे पीड़ित हो रहे हो ॥ ३६ ॥

मार्कण्डेय उवाच को मां नाम्ना कीर्तयंते तपः परिभवन् मम ।
बहुवर्षसहस्रायुर्घर्षयंश्चैव मे वयः ॥ ३७ ॥

मार्कण्डेयजीने कहा— कौन मेरी तपस्या तथा अनेक सहस्र वर्षोंकी आयुवाली अवस्थाका तिरस्कार करता हुआ मुझे नाम लेकर पुकार रहा है ॥ ३७ ॥

न ह्येष समुदाचारो देवेष्वपि समाहितः ।
मां ब्रह्मापि स विश्वेशो दीर्घायुरिति भाषते ॥ ३८ ॥

देवताओंके यहाँ भी यह आचार प्रचलित नहीं है, साक्षात् लोकनाथ ब्रह्माजी भी मुझे दीर्घायु कहते हैं (मेरा नाम नहीं लेते हैं) ॥ ३८ ॥

कस्तपो घोरशिरसो ममाद्य त्यक्तजीवितः ।
मार्कण्डेयेति मां प्रोक्त्वा मृत्युमीक्षितुमिच्छति ॥ ३९ ॥

किसने अपने जीवनका मोह त्याग दिया है, जो आज मुझ घोरशिराके तपका तिरस्कार करता हुआ मुझे मार्कण्डेय कहकर अपनी मौत देखना चाहता है ॥ ३९ ॥

वैशम्पायन उवाच एवमाभाषते क्रोधान्मार्कण्डेयो महामुनिः ।
अथैनं भगवान् भूयो बभाषे तत्परायणम् ॥ ४० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जब महामुनि मार्कण्डेय क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोल रहे थे, उस समय भगवान्‌ने पुनः अपने शरणागत भक्त इन महर्षिसे यों कहा ॥ ४० ॥

श्रीभगवानुवाच अहं ते जनको वत्स हृषीकेशः पिता गुरुः ।
आयुःप्रदाता पौराणः किमर्थं नोपसर्पसि ॥ ४१ ॥

श्रीभगवान् बोले— वत्स ! मैं तुम्हें जन्म देनेवाला तुम्हारा पिता और गुरु हृषीकेश हूँ । तुम्हें दीर्घायु प्रदान करनेवाला पुरातन पुरुष मैं ही हूँ । तुम मेरे पास क्यों नहीं आते हो ॥ ४१ ॥

मां पुत्रकामः प्रथमं पिता ते ह्यङ्गिरा मुनिः ।
पूर्वमाराधयामास तपस्तीव्रमुपाश्रितः ॥ ४२ ॥

पूर्वकालमें पुत्रकी इच्छावाले तुम्हारे पिता अङ्गिरा मुनिने तीव्र तपस्याका आश्रय लेकर सर्वप्रथम मेरी ही आराधना की थी ॥ ४२ ॥

ततस्त्यां घोरशिरसं दहनोपमतेजसम् ।
दत्तवानहमात्मेष्टं महर्षिममितायुषम् ॥ ४३ ॥

तब मैंने अग्नि-तुल्य तेजस्वी अपरिमित आयुवाले, अपने परम प्रिय, महर्षि तुझ घोरशिराको उन्हें पुत्ररूपमें प्रदान किया ॥ ४३ ॥

तन्न नोत्सहते चान्यो यो न भूतो ममात्मकः ।
द्रष्टुमेकार्णवगतं क्रीडन्तं योगधर्मिणम् ॥ ४४ ॥

ऐसी स्थितिमें जो मुझसे अभिन्न नहीं हुआ है, वह दूसरा कोई भूत अचेतन होनेके कारण एकार्णवमें रहकर क्रीड़ा करनेवाले मुझ योगधर्मी परमात्माका दर्शन करनेका साहस नहीं कर सकता ॥ ४४ ॥

वैशम्पायन उवाच ततः प्रसन्नवदनो विस्मयोत्फुल्लोचनः ।
मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिपुटो मार्कण्डेयो महातपाः ॥ ४५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! यह सुनकर महातपस्वी मार्कण्डेयके मुखपर प्रसन्नता छा गयी, उनके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे, उन्होंने मस्तकपर दोनों हाथ जोड़ लिये ॥ ४५ ॥

नामगोत्रं ततः श्रुत्वा दीर्घायुर्लोकपूजितः ।
अथाकरोन्नमस्कारं प्रणतः शिरसा प्रभुम् ॥ ४६ ॥

उन लोकपूजित दीर्घायु महर्षिने भगवान्‌के मुखसे अपने नाम और गोत्रको सुनकर उनके चरणोंमें सिर झुका दिया और प्रणतभावसे नमस्कार किया ॥ ४६ ॥

मार्कण्डेय उवाच इच्छेऽहं तत्त्वतो मायामिमां ज्ञातुं तवानघ ।
यदेकार्णवमध्यस्थः शेषे त्वं बालरूपवान् ॥ ४७ ॥

मार्कण्डेय बोले— अनघ ! आप इस एकार्णवके मध्यमें जो बालकरूप धारण करके शयन कर रहे हैं, आपकी इस मायाको मैं ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ ॥ ४७ ॥

किंसंज्ञः कश्च भगवाँल्लोके विज्ञायसेऽनघ ।
तर्कये त्वां महाभूतं न भूतमिह तिष्ठति ॥ ४८ ॥

निष्पाप परमेश्वर ! सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश और श्रीसे सम्पन्न आप कौन हैं ? और किस नामसे लोकमें जाने जाते हैं ? मैं अनुमान करता हूँ कि आप कोई महान् भूत हैं, क्योंकि कोई साधारण भूत यहाँ नहीं ठहर सकता ॥ ४८ ॥

श्रीभगवानुवाच अहं नारायणो ब्रह्मा सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।
सर्वभूतोद्भवकरः सर्वभूतविनाशनः ॥ ४९ ॥