विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 794, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७७२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
संचिन्तयति मध्यस्थो मार्कण्डेयोऽतिशङ्कितः ।
किंस्विन्नुवेदिदं चिन्ता मोहः स्वप्नोऽनुभूयते ॥ १९ ॥
वे मार्कण्डेय मुनि अत्यन्त शङ्कित हो मध्यस्थकी भाँति इस प्रकार विचार करने लगे—'मेरी यह चिन्ता क्या है ? मुझे मोह हो गया है या स्वप्नका अनुभव हो रहा है ? ॥ १९ ॥
व्यक्तमन्यतमो भावो ह्येतेषां भविता मम ।
न हीदृशमसंदिष्टमयुक्तं सत्यमर्हति ॥ २० ॥
'निश्चय ही मेरा यह भाव चिन्ता, मोह और स्वप्नमेंसे ही कोई हो सकता है; क्योंकि ऐसी असम्बद्ध और अयुक्त बात कभी सत्य नहीं हो सकती ॥ २० ॥
नष्टचन्द्रार्कपवने छन्नपर्वतभूतले ।
कतमः स्यादयं लोक इति चिन्ताव्यवस्थितः ॥ २१ ॥
'जहाँ चन्द्रमा, सूर्य और वायुका दर्शन नहीं होता, पर्वत और भूतल आच्छन्न हो गये हैं, ऐसा यह कौन-सा लोक है?' इसी चिन्तामें डूबे हुए मार्कण्डेयजी खड़े रहे ॥ २१ ॥
अपश्यच्चापि पुरुषं शयानं पर्वतोपमम् ।
तोयाढ्यमिव जीमूतं मध्ये मग्नं महार्णवे ॥ २२ ॥
वहाँ उन्होंने महासागरके मध्यमें मग्न होकर सोये हुए एक पर्वताकार पुरुषको भी देखा, जो सजल जलधरके समान जान पड़ता था ॥ २२ ॥
तपन्तमिव तेजोभीर्भासन्तंमिव वर्चसा ।
जाग्रन्तमिव गाम्भीर्यादुच्छ्वसन्तमिव पन्नगम् ॥ २३ ॥
वह पुरुष अपने तेजसे तप-सा रहा था । अपनी दीप्तिसे उद्भासित-सा होता था । गम्भीरताके कारण जागता-सा जान पड़ता था और सर्पके समान उच्छ्वास ले रहा था ॥ २३ ॥
स देवं प्रष्टुमायाति को भवानिति विस्मयात् ।
तथैव च शनैर्भूयो मुनिः कुक्षिं प्रवेशितः ॥ २४ ॥
वे मुनि आश्चर्यसे चकित होकर ज्यों ही भगवान्के पास यह पूछनेके लिये आये कि आप कौन हैं ? त्यों ही फिर धीरेसे भगवान्के उदरमें पहुँचा दिये गये ॥ २४ ॥
स प्रविष्टः पुनः कुक्षौ मार्कण्डेयः सुनिभ्रितः ।
तथैव चरते भूयो विजानन् स्वप्नदर्शनम् ॥ २५ ॥
पुनः उनकी कुक्षिमें प्रवेश करनेपर मार्कण्डेयजी सुस्थिर हुए । वे एकार्णवकी घटनाको स्वप्नदर्शन समझते हुए फिर इधर-उधर विचरने लगे ॥ २५ ॥
स तथैव यथापूर्वं पृथिवीमटते पुनः ।
पुण्यतीर्थानि पूतानि निरैक्षद् दिवि भूतले ॥ २६ ॥
वे पहलेकी ही भाँति पृथिवीपर घूमने और भूतल तथा स्वर्गके पवित्र पुण्यतीर्थोंका दर्शन करने लगे ॥ २६ ॥
ऋतुभिर्यजमानांश्च समाप्तवरदक्षिणैः ।
पश्यते देवकुक्षिस्थान् यज्ञियाञ्छतशो द्विजान् ॥ २७ ॥
उन्होंने भगवान्के उदरमें स्थित हुए सैकड़ों यज्ञ-सम्बन्धी ब्राह्मणों और उत्तम दक्षिणाके साथ समाप्त होनेवाले यज्ञोंके अनुष्ठानमें लगे हुए यजमानोंको देखा ॥ २७ ॥
सद्वृत्तमाश्रिताः सर्वे वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः ।
चत्वारश्चाश्रमाः सम्यग् यथोद्दिष्टपदानुगाः ॥ २८ ॥
ब्राह्मण आदि सभी वर्णोंके लोग सदाचारका पालन करते थे । ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रम उत्तम रीतिसे शास्त्रोक्त मर्यादाका अनुसरण करते थे ॥ २८ ॥
वर्षाणां शतसाहस्रं मार्कण्डेयो महामुनिः ।
विचरन् पृथिवीं कृत्स्नां न च कुक्ष्यन्तमैक्षत ॥ २९ ॥
महामुनि मार्कण्डेय एक लाख वर्षोंतक सारी पृथ्वीपर विचरते रहे, परंतु कहीं भी उन्हें भगवान्के उदरका अन्त नहीं दिखायी दिया ॥ २९ ॥
ततः कदाचिदथ वै पुनर्वक्त्राद् विनिःसृतः ।
सुप्तं न्यग्रोधशाखायां बालमेकं निरीक्षते ॥ ३० ॥
यथा चैकार्णवजले नीहारेण वृतान्तरे ।
अव्यक्तभीषणे लोके सर्वभूतविवर्जिते ॥ ३१ ॥
तदनन्तर किसी दिन वे फिर भगवान्के मुखसे बाहर निकल गये । वहाँ अव्यक्त एवं भीषण जगत्में जहाँ समस्त प्राणियोंका अभाव था, उन्होंने एकार्णवके जलमें, जिसका भीतरी भाग कुहरेसे घिरा हुआ था, वरगदकी शाखापर एक बालकको सोते देखा ॥ ३०-३१ ॥
स भूयो विस्मयाविष्टः कौतूहलसमन्वितः ।
बालमादित्यसंकाशं न शक्नोत्युपसर्पितुम् ॥ ३२ ॥
फिर वे आश्चर्यचकित और कौतूहलयुक्त होकर खड़े रह गये । उस सूर्यके समान तेजस्वी बालकके पास न जा सके ॥ ३२ ॥
सोऽचिन्तयदथैकान्ते स्थित्वा सलिलसंनिधौ ।
पूर्वदृष्टमिदं नेति शङ्कितो देवमायया ॥ ३३ ॥
उन्होंने जलके समीप एकान्तमें खड़े होकर सोचा कि—मैंने पहले कभी ऐसा आश्चर्य नहीं देखा था; यह विचार आते ही वे देवमायाके प्रभावसे शङ्कित हो गये ॥ ३३ ॥
अगाधे सलिलस्तम्भे मार्कण्डेयः प्लवन् मुनिः ।
न शान्तिं लभते तत्र श्रमात् संत्रस्तविक्लवः ॥ ३४ ॥
अगाध एवं सुस्थिर जलवाले एकार्णवमें तैरते हुए मार्कण्डेय मुनि श्रमसे भयभीत हो रहे थे, उन्हें वहाँ तनिक भी शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ३४ ॥
तथैव भगवान् हंसो गतो योगेन बालताम् ।
बभाषे मेघतुल्येन स्वरेण पुरुषोत्तमः ॥ ३५ ॥
इतनेहीमें योगसे बालकरूप हुए हंसस्वरूप भगवान् पुरुषोत्तमने मेघके समान गम्भीर स्वरमें कहा ॥ ३५ ॥