भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 785

भविष्यपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः ७६३


यज्ञे विवरमासाद्य विघ्नमिन्द्रेण ते कृतम्।
यज्वा ह्यसि कुरुश्रेष्ठ समृद्ध्या वासवोपमः॥ २७॥
बिभेत्यभिभवाच्छक्रस्तव क्रतुफलैर्नृप।
तस्मादावर्तितश्चैव क्रतुरिन्द्रेण ते विभो॥ २८॥

इस यज्ञमें कोई छिद्र पाकर इन्द्रने तुम्हारे लिये यह विघ्न उपस्थित किया था। कुरुश्रेष्ठ ! तुम यज्ञकर्ता हो, समृद्धिमें देवराज इन्द्रके समान हो। नरेश्वर ! तुम्हारे यज्ञोंके फलोंसे इन्द्रका पराभव न हो जाय, यही सोचकर वे तुमसे डरते हैं। प्रभो ! इसीलिये इन्द्रने तुम्हारे इस यज्ञमें विघ्न डाला है॥ २७-२८॥

मायैषा वासवेनेह प्रयुक्ता विघ्नमिच्छता।
क्रतोर्विवरमासाद्य संज्ञप्तं ददृशे वाजिनम्॥ २९॥
रतिमिन्द्रेण रम्भायां मन्यसे यां वपुष्टमाम्।

यज्ञमें कोई त्रुटि अथवा छिद्र मिल जानेसे विघ्न डालनेकी इच्छावाले इन्द्रने यह मायाका प्रयोग किया था। उन्होंने घोड़ेको मारा गया देख उसके भीतर प्रवेश करके रम्भाके साथ रमण किया था, जिसे तुम वपुष्टमा समझने लगे थे॥ २९½॥

अथ ते गुरवः शप्तास्त्रियज्ञशतयाजिनः॥ ३०॥
भ्रंशितस्त्वं च विप्राश्च बलादिन्द्रसमादिह।

इधर तुमने अपने उन गुरुजनोंको शाप दे दिया, जिन्होंने तुम्हारे तीन सौ यज्ञ कराये थे। तुम और तुम्हारे ब्राह्मण यहाँ इन्द्रके समान बलसे भ्रष्ट कर दिये गये ॥३०½॥

त्वत्तश्चैव सुदुर्धर्षात् त्रियज्ञशतयाजिनः॥ ३१॥
बिभेति हि सदा त्वत्तो ब्राह्मणेभ्योऽपि वासवः।
एकेन वै तदुभयं तीर्णं शक्रेण मायया॥ ३२॥

तुम तीन सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले अत्यन्त दुर्धर्ष वीर थे, तुमसे और उन ब्राह्मणोंसे भी इन्द्र सदा डरते रहते थे; अतः उन्होंने अकेले ही मायाके प्रयोगद्वारा उन दोनों प्रकारके भयोंको पार कर लिया॥ ३१-३२॥

स एष सुमहातेजा विजिगीषुः पुरंदरः।
कथमन्यैरनाचीर्णं नप्तुर्दारानतिक्रमेत्॥ ३३॥

विजयकी इच्छा रखनेवाले वे महातेजस्वी इन्द्र जिसे दूसरोंने कभी नहीं किया, वह पापकर्म कैसे कर सकते हैं? अपने पोतेकी पत्नीपर बलात्कार उनके द्वारा कैसे सम्भव हो सकता है?॥ ३३॥

यथैव हि परा बुद्धिः परो धर्मः परो दमः।
यथैव परमैश्वर्यं कीर्तितं हरिवाहने।
तथैव त्वयि दुर्धर्षे त्रियज्ञशतयाजिनि॥ ३४॥

हरिवाहन इन्द्रमें जिस प्रकार उत्तम बुद्धि, उत्कृष्ट धर्म, श्रेष्ठ इन्द्रिय-संयम और परम ऐश्वर्य बतलाया गया है, उसी प्रकार तीन सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले तुझ दुर्धर्ष वीरमें वे सभी बातें हैं॥ ३४॥

मा वासवं मा च गुरुमात्मानं मा वपुष्टमाम्।
गच्छ दोषेण कालो हि सर्वथा दुरतिक्रमः॥ ३५॥

अतः तुम इन्द्रमें, गुरु एवं पुरोहितमें, अपनेमें तथा रानी वपुष्टमामें दोषदृष्टि न करो; क्योंकि काल सर्वथा दुर्लङ्घ्य है॥ ३५॥

ऐश्वर्येणाश्वमाविश्य देवेन्द्रेणासि रोपितः।
आनुकूल्येन देवस्य वर्तितव्यं सुखार्थिना॥ ३६॥

देवेन्द्रने अपनी ऐश्वर्य-शक्तिसे अश्वमें प्रवेश करके तुम्हारे हृदयमें रोष उत्पन्न कर दिया था; अतः सुखार्थी मनुष्यको सदा देवताके अनुकूल बर्ताव करना चाहिये ॥३६॥

दुस्तरं प्रतिकूलं हि प्रतिस्रोतः इवाम्भसः।
स्त्रीरत्नमुपभुङ्क्ष्वेमामपापां विगतज्वरः॥ ३७॥

जैसे जलके प्रवाहके प्रतिकूल तैरना कठिन होता है, उसी प्रकार प्रतिकूल देवतासे पार पाना बहुत कठिन है। तुम्हारी रानी निष्पाप हैं, ये रमणियोंमें रत्न हैं, तुम निश्चिन्त होकर इनका उपभोग करो॥ ३७॥

अपापास्त्यज्यमाना वै त्यजेयुरपि योषितः।
अदुष्टास्तु स्त्रियो राजन् दिव्यास्तु सविशेषतः॥ ३८॥

राजन्! यदि निरपराध स्त्रियोंका त्याग किया जाय तो वे भी निष्पाप पतियोंका परित्याग करने लगेंगी। स्त्रियाँ प्रायः अल्प दोषवाली होती हैं, वे विशेषतः दिव्यभावसे सम्पन्न होती हैं॥ ३८॥

भानोः प्रभा शिखा वह्नेर्वेदी होत्रे तथाहूतिः।
परामृष्टाप्यसंसक्ता नोपदुष्यन्ति योषितः॥ ३९॥

जैसे सूर्यकी प्रभा, अग्निकी शिखा, यज्ञकी वेदी और होमकी आहुति दूसरेके स्पर्शसे दूषित नहीं होती, उसी प्रकार स्त्रियाँ भी यदि पर-पुरुषोंमें आसक्त न हों तो वे उनके बलपूर्वक किये गये स्पर्शसे कलङ्कित नहीं होतीं हैं॥ ३९॥

ग्राह्या लालयितव्याश्च पूज्याश्च सततं बुधैः।
शीलवत्यो नमस्कार्याः पूज्याः श्रिय इव स्त्रियः॥ ४०॥

शीलवती स्त्रियाँ विद्वान् पुरुषोंके लिये लक्ष्मीके समान ग्राह्य, लाड़-प्यारके योग्य, सतत आदरणीय, वन्दनीय तथा पूजनीय होती हैं॥ ४०॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि विश्वावसुवाक्ये पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें विश्वावसुका प्रवचनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥५॥