विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 784, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७६२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उस यज्ञमें जो अश्व मारा गया था, उसके पास जाकर काशिराजकन्या महारानी वपुष्टमाने शास्त्रीय विधिके अनुसार शयन किया ॥ १२ ॥
तां तु सर्वांनवद्याङ्गीं चकमे वासवस्तदा ।
संज्ञप्तमश्वमाविश्य तया मिश्रीवभूव सः ॥ १३ ॥
उन दिनों उन सर्वाङ्गसुन्दरी रानीको देवराज इन्द्र प्राप्त करना चाहते थे। वे उस मारे गये अश्वमें आविष्ट हो रानीके साथ संयुक्त हो गये ॥ १३ ॥
तस्मिन् विकारे जनिते विदित्वा तत्त्वतश्च तत् ।
असंज्ञप्तोऽयमश्वस्ते ध्वंसेत्यध्वर्युमब्रवीत् ॥ १४ ॥
उस अश्वमें विकार उत्पन्न हो जानेपर यथार्थरूपसे इस बातको जानकर राजाने अध्वर्युसे कहा—'अहो ! तुम्हारा नाश हो; देखो, तुम्हारा यह अश्व अभी मरा नहीं है' ॥१४॥
अध्वर्युर्ज्ञानसम्पन्नस्तदिन्द्रस्य विचेष्टितम् ।
कथयामास राजर्षेः शशाप स पुरंदरम् ॥ १५ ॥
अध्वर्यु ज्ञानसे सम्पन्न थे, उन्होंने राजर्षि जनमेजयसे इन्द्रकी वह काली करतूत कह सुनायी, तब राजाने इन्द्रको शाप देते हुए कहा ॥ १५ ॥
जनमेजय उवाच
यद्यस्ति मे यज्ञफलं तपो वा रक्षतः प्रजाः ।
फलेनानेन सर्वेण ब्रवीमि श्रूयतामिदम् ॥ १६ ॥
जनमेजय बोले—यदि मेरे यज्ञोंका कुछ फल है अथवा प्रजाकी रक्षा करनेसे मुझमें कुछ तपोबल संचित हुआ है तो उन सबके फलसे मेरी कही हुई बात सत्य हो, मैं उस बातको बता रहा हूँ, आपलोग सुनें ॥ १६ ॥
अद्यप्रभृति देवेन्द्रमजितेन्द्रियमस्थिरम् ।
क्षत्रिया वाजिमेधेन न यक्ष्यन्तीति शौनक ॥ १७ ॥
'आजसे क्षत्रियलोग इस अजितेन्द्रिय और चञ्चल देवराज इन्द्रका अश्वमेध यज्ञके द्वारा यजन नहीं करेंगे' शौनक ! इस प्रकार उन्होंने इन्द्रको शाप दे दिया ॥ १७ ॥
ऋत्विजश्चाब्रवीत् क्रुद्धः स राजा जनमेजयः ।
दौर्बल्यं भवतामेतद् यदयं धर्षितः क्रतुः ॥ १८ ॥
तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए राजा जनमेजयने ऋत्विजोंसे कहा—'यह आपलोगोंकी दुर्बलता है, जिससे मेरा यह यज्ञ चौपट कर दिया गया ॥ १८ ॥
विषये मे न वस्तव्यं गच्छध्वं सह बान्धवैः ।
इत्युक्तास्त्यजुर्विप्रास्तं नृपं जातमन्यवः ॥ १९ ॥
'अब आपलोग मेरे राज्यमे न रहें, अपने बन्धु-बान्धवों-के साथ निकल जायें।' उनके ऐसा कहनेपर वे ब्राह्मण कुपित हो गये और राजाको छोड़कर चल दिये ॥ १९ ॥
अमर्षादन्वशासच्च पत्नीशालागताः स्त्रियः ।
राजा परमधर्मज्ञस्तामसौ जनमेजयः ॥ २० ॥
यद्यपि वे राजा जनमेजय बड़े धर्मज्ञ थे, तो भी अमर्ष-वश उन्होंने वपुष्टमाके लिये पत्नीशालामें बैठी हुई स्त्रियोंको इस प्रकार आदेश दिया—॥ २० ॥
असतीं वपुष्टमामेतां निर्यातयत मे गृहात् ।
यया मे चरणौ मूर्ध्नि पातितौ रेणुगुण्ठितौ ॥ २१ ॥
'यह वपुष्टमा असती (कुलटा) है, इसे मेरे घरसे निकाल दो। इसने इस कुकृत्यद्वारा मेरे मस्तकपर अपने धूलि-धूसर पैर रख दिये ॥ २१ ॥
शौण्डीर्यं मेऽनया भग्नं यशो मानश्च दूषितः ।
न चैनां द्रष्टुमिच्छामि परिक्लिष्टामिव स्रजम् ॥ २२ ॥
'इस पापिनीने मेरा महत्त्व नष्ट कर दिया, मेरे यश और मानमें धब्बा लगा दिया; मसली हुई फूलकी मालाकी तरह इस अपवित्र हुई नारीको अब मैं देखना भी नहीं चाहता ॥ २२ ॥
न स्वादु सोऽश्नाति नरः सुखं स्वपिति वा रहः ।
अन्वास्ते यः प्रियां भार्यां परेण मृदितामिह ।
पुनर्नैवोपभुञ्जीत श्वावलीढं हविर्यथा ॥ २३ ॥
'जो पर-पुरुषके द्वारा मर्दित हुई अपनी प्यारी भार्याके साथ रहता है, वह न तो स्वादिष्ट अन्न खाता है और न एकान्तमें सुखसे सो ही पाता है। उसे चाहिये कि कुत्तेके चाटे हुए हविष्यकी भाँति पर-पुरुषके समागमसे कलङ्कित हुई भार्याका फिर कभी उपभोग न करे' ॥ २३ ॥
एवमुच्चैः प्रभाषन्तं क्रुद्धं पारीक्षितं नृपम् ।
गन्धर्वराजः प्रोवाच विश्वावसुरिदं वचः ॥ २४ ॥
इस प्रकार क्रोधपूर्वक उच्चस्वरसे बोलते हुए राजा जनमेजयसे गन्धर्वराज विश्वावसुने यह बात कही ॥ २४ ॥
विश्वावसुरुवाच
त्रियज्ञशतयज्वानं वासवस्त्वां न मृष्यते ।
अप्सरास्तेन पत्नी ते विहितेयं वपुष्टमा ॥ २५ ॥
विश्वावसु बोले—राजन् ! आपने तीन सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया है, इसलिये इन्द्र आपके इस उत्कर्षको सहन नहीं कर पाते हैं। इसीलिये उन्होंने एक अप्सराको आपकी इस पत्नी वपुष्टमाके रूपमें परिणत कर दिया था ॥
रम्भानामाप्सरा देवी काशिराजसुता मता ।
सैषा योषिद्वरा राजन् रत्नभूतानुभूयताम् ॥ २६ ॥
जिसे आप काशिराजकी पुत्री रानी वपुष्टमा मानते थे, वह रम्भा नामक अप्सरा थी; अतः राजन् ! यह नारियोंमें श्रेष्ठ वपुष्टमा रमणीरत्न है, आप इसका उप-भोग करें ॥२६॥