भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 783, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 783
भविष्यपर्व ]पञ्चमोऽध्यायः७६१

| यथा युगानां परिवर्तनानि<br>चिरं प्रवृत्तानि विधिस्वभावात्।<br>क्षणं न संतिष्ठति जीवलोकः<br>क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः॥ ५३ ॥ | जैसे विधाताद्वारा नियत किये हुए स्वभावके अनुसार चिरकालसे युगोंके परिवर्तन होते रहते हैं, उसी प्रकार यह जीव जगत् ह्रास और वृद्धिके साथ निरन्तर चक्कर लगाता हुआ कभी क्षण भरके लिये भी स्थिर नहीं रहता ॥ ५३ ॥ |

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कलियुगवर्णने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कलियुगका वर्णनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥


पञ्चमोऽध्यायः

व्यासजी आदिका गमन, जनमेजयके अश्वमेध यज्ञमें इन्द्रका विघ्न डालना, जनमेजयद्वारा इन्द्रको शाप, ब्राह्मणोंका निर्वासन तथा अपनी पत्नीकी भर्त्सना, विश्वावसुका जनमेजयको समझाना

सूत उवाच

इत्येवमाश्वासयतो राजानं जनमेजयम् ।
अतीतानागतं वाक्यमृषेः परिषदा श्रुतम् ॥ १ ॥
**सूतजी कहते हैं—**शौनक ! इस प्रकार राजा जनमेजयको आश्वासन देते हुए महर्षि वेदव्यासका वह भूत, भविष्य-सम्बन्धी वचन उस राजसभाके सभी सदस्योंने सुना ॥ १ ॥

अमृतस्येव संवाहः प्रभा चन्द्रमसो यथा ।
अतर्पयत तच्छ्रोत्रं महर्षेर्वाङ्मयो रसः ॥ २ ॥
महर्षिका वह वाङ्मय रस मानो अमृतका प्रवाह था, चन्द्रमाकी प्रभाके समान मनको आह्लादित करनेवाला था । उसने सबके कानोंको तृप्त कर दिया ॥ २ ॥

धर्मकामार्थसंयुक्तं करुणं वीरहर्षणम् ।
रमणीयं तदाख्यानं कृत्स्नं परिषदा श्रुतम् ॥ ३ ॥
धर्म, काम और अर्थसे युक्त, करुणासे भरी हुई तथा वीरोचित हर्षोत्साहको बढ़ानेवाली वह सम्पूर्ण रमणीय वार्ता वहाँ सारी सभाने सुनी ॥ ३ ॥

केचिदश्रूणि मुमुचुः श्रुत्वा दध्युस्तथापरे ।
इतिहासं तमृषिणा पाणाविव निदर्शितम् ॥ ४ ॥
कुछ लोग आँसू बहाने लगे, कितने ही मनुष्य उस वार्ताको सुनकर ध्यानमग्न हो गये, महर्षि व्यासने उस भावी इतिहासको मानो हाथपर रखकर दिखा दिया था ॥ ४ ॥

सदस्यानु सोऽभ्यनुज्ञाय कृत्वा चापि प्रदक्षिणाम् ।
पुनर्द्रक्ष्याम इत्युक्त्वा जगाम भगवानृषिः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् वे महर्षि भगवान् व्यास सदस्योंकी अनुमति ले उन सबकी परिक्रमा करके 'हम फिर मिलेंगे' ऐसा कहकर वहाँसे चल दिये ॥ ५ ॥

अनुजग्मुस्तदा सर्वे प्रयान्तमृषिसत्तमम् ।
लोके प्रवदतां श्रेष्ठं ये विशिष्टास्तपोधनाः ॥ ६ ॥
उस समय वहाँ जो-जो श्रेष्ठ तपोधन मुनि थे, वे सब जगत्‌के सभी वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनिवर व्यासको जाते देख उनके पीछे हो लिये ॥ ६ ॥

याते भगवति व्यासे तदा ब्रह्मर्षिभिः सह ।
ऋत्विजः पार्थिवाश्चैव प्रतिजग्मुर्यथागतम् ॥ ७ ॥
ब्रह्मर्षियोंसहित भगवान् व्यासके चले जानेपर उस समय जो अन्य ऋत्विज और राजा थे, वे भी जैसे आये थे उसी तरह लौट गये ॥ ७ ॥

पन्नगानां सुघोराणां कृत्वा तां वैरयातनाम् ।
जगाम रोषमुत्सृज्य राजा विषमिवोरगः ॥ ८ ॥
अत्यन्त भयानक सर्पोंके वैरका वह बदला चुकाकर राजा जनमेजय विषको त्याग कर जानेवाले सर्पकी भाँति रोषको छोड़कर वहाँसे अपने नगरको चले गये ॥ ८ ॥

होत्राग्निदग्धशिरसं परित्राय च तक्षकम् ।
आस्तीकोऽप्याश्रमपदं जगाम स महामुनिः ॥ ९ ॥
हवनकी आगसे जिसका सिर तप गया था, उस तक्षकके प्राण बचाकर महामुनि आस्तीक भी अपने आश्रमको चले गये ॥ ९ ॥

राजापि हास्तिनपुरं जगाम स्वजनावृतः ।
अन्वशासच्च मुदितस्तदा प्रमुदिताः प्रजाः ॥ १० ॥
राजा जनमेजय भी स्वजनोंसे घिरे हुए वहाँसे हस्तिनापुरको गये और आनन्दपूर्वक रहकर सदा प्रसन्न रहनेवाली प्रजाका शासन एवं संरक्षण करने लगे ॥ १० ॥

कस्यचित्त्वथ कालस्य स राजा जनमेजयः ।
दीक्षितो वाजिमेधेन विधिवद् भूरिदक्षिणः ॥ ११ ॥
कुछ कालके बाद यज्ञोंमें बहुत-सी दक्षिणा देनेवाले राजा जनमेजयने विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ११ ॥

संज्ञप्तमश्वं तत्रास्य देवी काश्या वपुष्टमा ।
संनिवेशोपगम्याथ विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १२ ॥

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित) · पृष्ठ 783, कुल 1169 में से · BharatKosha