विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 782, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७६० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भविष्यति तदा तेषां रोगैरिन्द्रियसंक्षयः।
आयुःप्रक्षयसंरोधाद् विषादः प्रभविष्यति ॥ ४१ ॥
सब लोग दुर्बल, विषयसेवनके कारण कृश तथा रजो-गुणसे अभिव्याप्त होंगे। उस समय रोगोंके कारण उनकी इन्द्रियाँ क्षीण हो जायँगी, आयुके क्षय एवं निरोधसे उनके मनमें विषाद होगा ॥ ४०-४१ ॥
शुश्रूषवो भविष्यन्ति साधूनां दर्शने रताः।
सत्यं च प्रतिपत्स्यन्ति व्यवहारोपसंक्षयात् ॥ ४२ ॥
फिर वे धर्मोपदेश सुननेकी इच्छा रखकर साधु पुरुषोंके दर्शनमें मन लगानेवाले होंगे; व्यवहार या व्यवसाय क्षीण हो जानेके कारण वे सत्यको अपनायेंगे ॥ ४२ ॥
भविष्यन्ति च कामानामलाभाद् धर्मशीलिनः।
करिष्यन्ति च संकोचं स्वपक्षक्षयपीडिताः ॥ ४३ ॥
कामनाओंकी प्राप्ति न होनेसे धर्मशील बनेंगे और अपने पक्षके विनाशसे पीड़ित हो दुराचारको संकुचित कर देंगे ॥ ४३ ॥
एवं शुश्रूषणे ज्ञाने सत्ये प्राणाभिरक्षणे।
चतुष्पादः प्रवृत्तश्च धर्मः श्रेयोऽभिपत्स्यते ॥ ४४ ॥
इस प्रकार शुश्रूषा, दान, सत्य और प्राणरक्षामें प्रवृत्त हुआ चार चरणोंवाला धर्म श्रेयकी प्राप्ति करायेगा ॥ ४४ ॥
तेषां लब्धानुमानानां गुणेषु परिवर्तताम्।
स्वादु किं न्विति विज्ञाय धर्मं एवं वदिष्यति ॥ ४५ ॥
इस प्रकार जो श्रेयको प्राप्त हुए पुरुष अनुमानसे धर्म और अधर्मके फलको जान गये हैं और शब्दादि विषयोंमें रम रहे हैं, उनके लिये कौन-सी वस्तु स्वादिष्ट या सुखद है—विषयोंमें रमण या धर्मके मार्गपर संचरण, यह संदेह उठाकर तत्त्वका निश्चय करके लोग इस प्रकार कहेंगे ॥ ४५ ॥
यथा हानिः क्रमात् प्राप्ता तथा वृद्धिः क्रमाद् गता।
प्रगृहीते यतो धर्मे प्रवर्त्स्यन्ति कृतं युगम् ॥ ४६ ॥
जैसे क्रमशः धर्मकी हानि प्राप्त हुई थी, उसी प्रकार क्रमशः उसकी वृद्धि होगी; क्योंकि धर्मको पूर्णतः अपना लेनेपर मनुष्य सत्ययुगको प्राप्त कर लेंगे ॥ ४६ ॥
साधु वृत्तं कृतयुगे कषाये हानिरुच्यते।
एक एव तु कालः स हीनवर्णो यथा शशी ॥ ४७ ॥
सत्ययुगमें सबका बर्ताव उत्तम होता है और कलियुगमें सदाचारकी हानि बतायी जाती है, जैसे एक ही चन्द्रमा कभी कान्तिसे हीन और कभी कान्तिसे पूर्ण होता है, उसी प्रकार एक ही काल कभी कृतयुग और कभी कलियुगके रूपमें दृष्टिगोचर होता है ॥ ४७ ॥
छन्नो हि तमसा सोमो यथा कलियुगे तथा।
पूर्णश्च तमसा हीनो यथा कृतयुगे तथा ॥ ४८ ॥
जैसे चन्द्रमा अमावास्याको अन्धकारसे आच्छन्न होता है, उसी प्रकार कलियुगमें धर्म आच्छादित हो जाता है और जैसे पूर्णिमाको परिपूर्ण चन्द्रमा अन्धकारसे हीन होता है, उसी प्रकार सत्ययुगमें चारों चरणोंसे युक्त परिपूर्ण धर्म सर्वथा प्रकाशित होता है ॥ ४८ ॥
अर्थवादः परं ब्रह्म वेदार्थ इति तं विदुः।
अनिर्णीक्तमविज्ञातं दायाद्यमिव धार्यते ॥ ४९ ॥
जो परब्रह्म परमात्मा है, वह भूतार्थवाद है (परब्रह्मके रूपमें वेदके सत्य अर्थका ही प्रतिपादन हुआ) और विद्वान् पुरुष उसीको वेदका मुख्य अर्थ भी मानते हैं। (यदि ऐसी बात है तो वह सर्वव्यापी नित्यसिद्ध परमात्मा सबको प्राप्त क्यों नहीं होता? इसके उत्तरमें कहते हैं—) जैसे पैतृक सम्पत्तिके रूपमें मिला हुआ मलिन सुवर्णखण्ड जबतक उसका मल दूर न हो, तबतक अज्ञात दशामें ही धारण किया जाता है और उसे धारण करके भी मनुष्य अपनेको दरिद्र ही मानता है, उसी प्रकार अन्तःकरणके मलिन होनेसे परमात्मा अज्ञातरूपमें ही धारण किया जाता है; जब अन्तःकरण शुद्ध होता है; तब वह अपने आत्मासे अभिन्न रूपमें प्रकाशित हो उठता है और उसकी अप्राप्तिका भ्रम दूर हो जाता है ॥ ४९ ॥
इष्टवादस्तपो नाम तपो हि स्थावरं कृतम्।
गुणैः कर्माभिनिर्वृत्तिर्गुणांस्तथ्येन कर्मणा ॥ ५० ॥
तप (वर्णाश्रमोचित धर्म) स्वर्गादि अभीष्ट फलोंका प्रतिपादक है, तप स्थावर-अनादि अर्थात् अमोघ फलका साधक है, ऐसा शास्त्रमें निश्चय किया गया है। गुणों (देह-इन्द्रियादि) से कर्मकी सिद्धि होती है और यथार्थ कर्मसे गुणों (देह-इन्द्रियादि) की प्राप्ति होती है (अतः इस शरीर और कर्म आदिके बन्धनोंसे छुटकारा पानेके लिये परमात्माका आश्रय लेना चाहिये) ॥ ५० ॥
आशीस्तु पुरुषं दृष्ट्वा देशकालानुवर्तिनी।
युगे युगे यथाकालमृषिभिः समुदाहृता ॥ ५१ ॥
ऋषियोंने पुरुषकी योग्यताको सामने रखकर प्रत्येक युगमें यथासमय आशिष (कर्मफलकी प्राप्ति) का प्रतिपादन किया है, क्योंकि वह देश-कालका अनुसरण करनेवाली होती है ॥ ५१ ॥
इह धर्मार्थकामानां देवतानां प्रतिक्रिया।
आशिषश्च शुभाः पुण्यास्तथैवायुर्युगे युगे ॥ ५२ ॥
इस मर्त्यलोकमें धर्म, अर्थ और कामसम्बन्धी फल, देवाराधनके फल, शुभ एवं पुण्य आशिष तथा आयु प्रत्येक युगमें मनुष्योंकी श्रद्धाके तारतम्यके अनुसार होती हैं ॥ ५२ ॥