भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 781

भविष्यपर्व ] चतुर्थोऽध्यायः ७५९


युगान्तकाल उपस्थित होनेपर पुत्र पिताओंको सभी कर्म करनेके लिये आदेश दिया करेंगे; इसी तरह बहुएँ अपनी सासोंपर हुकम चलाया करेंगी ॥ २५ ॥

वाक्छरैर्दर्दयिष्यन्ति गुरूञ्छिष्याः समन्ततः।
यज्ञकर्मण्युपरते रक्षांसि श्वापदानि च।
कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान् ॥ २६ ॥

सब ओर शिष्य गुरुजनोंको वाग्बाणोंसे पीड़ित करेंगे। यज्ञकर्म बंद हो जानेपर राक्षस, हिंसक जन्तु तथा कीड़े, चूहे और सर्प मनुष्योंपर आक्रमण करेंगे ॥ २६ ॥

क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं सामग्र्यं चापि बन्धुषु।
उद्देशतो नरश्रेष्ठ भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २७ ॥

नरश्रेष्ठ ! कलियुगमें क्षेम, सुभिक्ष, आरोग्य और भाई-बन्धुओंमें मेल-मिलाप या बन्धु-बान्धवोंकी पूर्णता आदि बातें बहुत कम हो जायेंगी ॥ २७ ॥

स्वयंपालाः स्वयंचौरा युगसम्भारसम्भूताः।
मण्डलैः प्रचलिष्यन्ति देशे देशे पृथक्पृथक् ॥ २८ ॥

उस समयके लोग स्वयं ही रक्षक और स्वयं ही चोर होंगे और युगकी आवश्यकताके अनुरूप उपकरणोंसे सम्पन्न हो पृथक् पृथक् झुंड बनाकर देश-देशमें घूमते फिरेंगे ॥ २८ ॥

स्वदेशेभ्यः परिभ्रष्टा निःसाराः सह बन्धुभिः।
नराः सर्वे भविष्यन्ति तदा कालपरिक्षयात् ॥ २९ ॥

उस समय कालवश अपनी अवनति होनेके कारण सब मनुष्य अपने-अपने देशोंसे निर्वासित होकर बन्धुओंसहित निःसार (निर्धन) हो जायँगे ॥ २९ ॥

तदा स्कन्धे समाधाय कुमारान्विद्रुता भयात्।
कौशिकीं प्रतरिष्यन्ति नराः क्षुद्भयपीडिताः ॥ ३० ॥

उन दिनों भूखके भयसे पीड़ित हुए मनुष्य बच्चोंको कंधेपर रखकर आतंकवश भागकर कोसी नदीको पार कर जायँगे ॥ ३० ॥

अङ्गान्वङ्गान कलिङ्गांश्च काश्मीरानाथ मेकलान्।
ऋषिकान्तर्गिरिद्रोणीः संश्रयिष्यन्ति मानवाः ॥ ३१ ॥

लोग जीविकाके लिये अङ्ग, वङ्ग, कलिङ्ग, काश्मीर, मेकल तथा ऋषिक आदि देशोंके भीतर चले जायँगे और पर्वतकी घाटियोंका आश्रय लेंगे ॥ ३१ ॥

कृत्स्नं वा हिमवत्पादंयैकूलं च लवणाम्भसः।
अरण्येषु च वत्स्यन्ति नरा म्लेच्छगणैः सहः ॥ ३२ ॥

उस समयके मनुष्य म्लेच्छोंके साथ समूचे हिमालयके पादभागमें, लवणसमुद्रके तटपर तथा वनोंमें निवास करेंगे॥

नैव शून्या न चाशून्या भविष्यति वसुंधरा।
गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः प्रभविष्यन्ति शस्त्रिणः ॥ ३३ ॥

पृथ्वी न तो मनुष्योंसे सूनी होगी और न भरी ही रहेगी। हाथमें शस्त्र लेकर रक्षाके कार्यमें नियुक्त हुए पुरुष भी किसीकी रक्षा नहीं कर सकेंगे ॥ ३३ ॥

मृगैर्मत्स्यैर्विहंगैश्च श्वापदैः सर्पकीटकैः।
मधुशाकफलैर्मूलैर्वर्तयिष्यन्ति मानवाः ॥ ३४ ॥

कलियुगके धर्मभ्रष्ट मनुष्य मृग, मत्स्य, पक्षी, हिंसक जन्तु, सर्प, कीट, मधु, शाक, फल और मूलसे जीवन-निर्वाह करेंगे ॥ ३४ ॥

चीरं पर्णं च बहुलं वल्कलान्यजिनानि च।
स्वयंकृतानि वत्स्यन्ति यथा मुनिजनास्तथा ॥ ३५ ॥

लोग ऋषि-मुनियोंकी भाँति चिथड़ों, पत्तों, वल्कलों, हिरनके चमड़ों तथा अपने बनाये हुए अन्य वस्त्रोंको धारण करेंगे ॥ ३५ ॥

बीजानामाकृतिं निम्नेष्वीहन्तः काष्ठशङ्कुभिः।
अजैंडकं खरोष्ट्रं च पालयिष्यन्ति यत्नतः ॥ ३६ ॥

कितने ही मनुष्य पर्वतकी कन्दरा आदि निम्न स्थानोंमें रहकर ग्रामीण और जङ्गली बीजों (अनाजों) की प्राप्तिके लिये चेष्टा करते हुए काठके खूँटोंमें बकरों और भेड़ोंको तथा काश्मीर आदि अन्य स्थानोंके लोग गधों और ऊँटोंको बाँधकर उनका यत्नपूर्वक पालन करेंगे ॥ ३६ ॥

नदीस्रोतांसि रोत्स्यन्तितोयार्थे कूलमाश्रिताः।
पक्वान्नव्यवहारेण विपणन्तः परस्परम् ॥ ३७ ॥
तनूरुहैर्यथा जातैः समूलान्तरसंवृतैः।

कलियुगके मनुष्य जलके लिये तटपर आकर नदीके प्रवाहको रोकेंगे। वे आपसमें पके-पकाये अन्नके लेन-देनका व्यवसाय करेंगे। जैसे अपने शरीरसे उत्पन्न हुई संतानोंके निमित्तसे लोग आपसमें लड़ते हैं, उसी प्रकार मूलधनके सहित सूदको छिपानेके कारण आपसमें विवाद करते हुए लोग परस्पर लेन-देनका व्यवहार करेंगे ॥ ३७½ ॥

बह्वपत्याः प्रजाहीनाः कुललक्षणवर्जिताः ॥ ३८ ॥
एवं भविष्यन्ति तदा मनुष्याः कालकारिताः।

उन दिनों कालसे प्रेरित हुए कुछ मनुष्य तो अधिक संतानवाले होंगे और कुछ लोगोंको एक भी संतान नहीं होगी। इसी तरह प्रायः सब लोग कुलोचित शुभ लक्षणोंसे हीन होंगे ॥ ३८½ ॥

हीनाद्धीनां तदा धर्मं प्रजाः समनुवर्त्स्यति ॥ ३९ ॥
आयुस्तत्र च मर्त्यानां परं त्रिंशद् भविष्यति।

उस समयकी प्रजा हीन-से-हीन धर्मका अनुसरण करेगी तथा उन दिनों मनुष्योंकी आयु अधिक-से-अधिक तीस वर्षकी होगी ॥ ३९½ ॥

दुर्बला विषयग्लानि रजसा समभिप्लुताः ॥ ४० ॥