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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

भविष्यपर्व ] चतुर्थोऽध्यायः ७५९


युगान्तकाल उपस्थित होनेपर पुत्र पिताओंको सभी कर्म करनेके लिये आदेश दिया करेंगे; इसी तरह बहुएँ अपनी सासोंपर हुकम चलाया करेंगी ॥ २५ ॥

वाक्छरैर्दर्दयिष्यन्ति गुरूञ्छिष्याः समन्ततः।
यज्ञकर्मण्युपरते रक्षांसि श्वापदानि च।
कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान् ॥ २६ ॥

सब ओर शिष्य गुरुजनोंको वाग्बाणोंसे पीड़ित करेंगे। यज्ञकर्म बंद हो जानेपर राक्षस, हिंसक जन्तु तथा कीड़े, चूहे और सर्प मनुष्योंपर आक्रमण करेंगे ॥ २६ ॥

क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं सामग्र्यं चापि बन्धुषु।
उद्देशतो नरश्रेष्ठ भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २७ ॥

नरश्रेष्ठ ! कलियुगमें क्षेम, सुभिक्ष, आरोग्य और भाई-बन्धुओंमें मेल-मिलाप या बन्धु-बान्धवोंकी पूर्णता आदि बातें बहुत कम हो जायेंगी ॥ २७ ॥

स्वयंपालाः स्वयंचौरा युगसम्भारसम्भूताः।
मण्डलैः प्रचलिष्यन्ति देशे देशे पृथक्पृथक् ॥ २८ ॥

उस समयके लोग स्वयं ही रक्षक और स्वयं ही चोर होंगे और युगकी आवश्यकताके अनुरूप उपकरणोंसे सम्पन्न हो पृथक् पृथक् झुंड बनाकर देश-देशमें घूमते फिरेंगे ॥ २८ ॥

स्वदेशेभ्यः परिभ्रष्टा निःसाराः सह बन्धुभिः।
नराः सर्वे भविष्यन्ति तदा कालपरिक्षयात् ॥ २९ ॥

उस समय कालवश अपनी अवनति होनेके कारण सब मनुष्य अपने-अपने देशोंसे निर्वासित होकर बन्धुओंसहित निःसार (निर्धन) हो जायँगे ॥ २९ ॥

तदा स्कन्धे समाधाय कुमारान्विद्रुता भयात्।
कौशिकीं प्रतरिष्यन्ति नराः क्षुद्भयपीडिताः ॥ ३० ॥

उन दिनों भूखके भयसे पीड़ित हुए मनुष्य बच्चोंको कंधेपर रखकर आतंकवश भागकर कोसी नदीको पार कर जायँगे ॥ ३० ॥

अङ्गान्वङ्गान कलिङ्गांश्च काश्मीरानाथ मेकलान्।
ऋषिकान्तर्गिरिद्रोणीः संश्रयिष्यन्ति मानवाः ॥ ३१ ॥

लोग जीविकाके लिये अङ्ग, वङ्ग, कलिङ्ग, काश्मीर, मेकल तथा ऋषिक आदि देशोंके भीतर चले जायँगे और पर्वतकी घाटियोंका आश्रय लेंगे ॥ ३१ ॥

कृत्स्नं वा हिमवत्पादंयैकूलं च लवणाम्भसः।
अरण्येषु च वत्स्यन्ति नरा म्लेच्छगणैः सहः ॥ ३२ ॥

उस समयके मनुष्य म्लेच्छोंके साथ समूचे हिमालयके पादभागमें, लवणसमुद्रके तटपर तथा वनोंमें निवास करेंगे॥

नैव शून्या न चाशून्या भविष्यति वसुंधरा।
गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः प्रभविष्यन्ति शस्त्रिणः ॥ ३३ ॥

पृथ्वी न तो मनुष्योंसे सूनी होगी और न भरी ही रहेगी। हाथमें शस्त्र लेकर रक्षाके कार्यमें नियुक्त हुए पुरुष भी किसीकी रक्षा नहीं कर सकेंगे ॥ ३३ ॥

मृगैर्मत्स्यैर्विहंगैश्च श्वापदैः सर्पकीटकैः।
मधुशाकफलैर्मूलैर्वर्तयिष्यन्ति मानवाः ॥ ३४ ॥

कलियुगके धर्मभ्रष्ट मनुष्य मृग, मत्स्य, पक्षी, हिंसक जन्तु, सर्प, कीट, मधु, शाक, फल और मूलसे जीवन-निर्वाह करेंगे ॥ ३४ ॥

चीरं पर्णं च बहुलं वल्कलान्यजिनानि च।
स्वयंकृतानि वत्स्यन्ति यथा मुनिजनास्तथा ॥ ३५ ॥

लोग ऋषि-मुनियोंकी भाँति चिथड़ों, पत्तों, वल्कलों, हिरनके चमड़ों तथा अपने बनाये हुए अन्य वस्त्रोंको धारण करेंगे ॥ ३५ ॥

बीजानामाकृतिं निम्नेष्वीहन्तः काष्ठशङ्कुभिः।
अजैंडकं खरोष्ट्रं च पालयिष्यन्ति यत्नतः ॥ ३६ ॥

कितने ही मनुष्य पर्वतकी कन्दरा आदि निम्न स्थानोंमें रहकर ग्रामीण और जङ्गली बीजों (अनाजों) की प्राप्तिके लिये चेष्टा करते हुए काठके खूँटोंमें बकरों और भेड़ोंको तथा काश्मीर आदि अन्य स्थानोंके लोग गधों और ऊँटोंको बाँधकर उनका यत्नपूर्वक पालन करेंगे ॥ ३६ ॥

नदीस्रोतांसि रोत्स्यन्तितोयार्थे कूलमाश्रिताः।
पक्वान्नव्यवहारेण विपणन्तः परस्परम् ॥ ३७ ॥
तनूरुहैर्यथा जातैः समूलान्तरसंवृतैः।

कलियुगके मनुष्य जलके लिये तटपर आकर नदीके प्रवाहको रोकेंगे। वे आपसमें पके-पकाये अन्नके लेन-देनका व्यवसाय करेंगे। जैसे अपने शरीरसे उत्पन्न हुई संतानोंके निमित्तसे लोग आपसमें लड़ते हैं, उसी प्रकार मूलधनके सहित सूदको छिपानेके कारण आपसमें विवाद करते हुए लोग परस्पर लेन-देनका व्यवहार करेंगे ॥ ३७½ ॥

बह्वपत्याः प्रजाहीनाः कुललक्षणवर्जिताः ॥ ३८ ॥
एवं भविष्यन्ति तदा मनुष्याः कालकारिताः।

उन दिनों कालसे प्रेरित हुए कुछ मनुष्य तो अधिक संतानवाले होंगे और कुछ लोगोंको एक भी संतान नहीं होगी। इसी तरह प्रायः सब लोग कुलोचित शुभ लक्षणोंसे हीन होंगे ॥ ३८½ ॥

हीनाद्धीनां तदा धर्मं प्रजाः समनुवर्त्स्यति ॥ ३९ ॥
आयुस्तत्र च मर्त्यानां परं त्रिंशद् भविष्यति।

उस समयकी प्रजा हीन-से-हीन धर्मका अनुसरण करेगी तथा उन दिनों मनुष्योंकी आयु अधिक-से-अधिक तीस वर्षकी होगी ॥ ३९½ ॥

दुर्बला विषयग्लानि रजसा समभिप्लुताः ॥ ४० ॥

७६०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

भविष्यति तदा तेषां रोगैरिन्द्रियसंक्षयः।
आयुःप्रक्षयसंरोधाद् विषादः प्रभविष्यति ॥ ४१ ॥

सब लोग दुर्बल, विषयसेवनके कारण कृश तथा रजो-गुणसे अभिव्याप्त होंगे। उस समय रोगोंके कारण उनकी इन्द्रियाँ क्षीण हो जायँगी, आयुके क्षय एवं निरोधसे उनके मनमें विषाद होगा ॥ ४०-४१ ॥

शुश्रूषवो भविष्यन्ति साधूनां दर्शने रताः।
सत्यं च प्रतिपत्स्यन्ति व्यवहारोपसंक्षयात् ॥ ४२ ॥

फिर वे धर्मोपदेश सुननेकी इच्छा रखकर साधु पुरुषोंके दर्शनमें मन लगानेवाले होंगे; व्यवहार या व्यवसाय क्षीण हो जानेके कारण वे सत्यको अपनायेंगे ॥ ४२ ॥

भविष्यन्ति च कामानामलाभाद् धर्मशीलिनः।
करिष्यन्ति च संकोचं स्वपक्षक्षयपीडिताः ॥ ४३ ॥

कामनाओंकी प्राप्ति न होनेसे धर्मशील बनेंगे और अपने पक्षके विनाशसे पीड़ित हो दुराचारको संकुचित कर देंगे ॥ ४३ ॥

एवं शुश्रूषणे ज्ञाने सत्ये प्राणाभिरक्षणे।
चतुष्पादः प्रवृत्तश्च धर्मः श्रेयोऽभिपत्स्यते ॥ ४४ ॥

इस प्रकार शुश्रूषा, दान, सत्य और प्राणरक्षामें प्रवृत्त हुआ चार चरणोंवाला धर्म श्रेयकी प्राप्ति करायेगा ॥ ४४ ॥

तेषां लब्धानुमानानां गुणेषु परिवर्तताम्।
स्वादु किं न्विति विज्ञाय धर्मं एवं वदिष्यति ॥ ४५ ॥

इस प्रकार जो श्रेयको प्राप्त हुए पुरुष अनुमानसे धर्म और अधर्मके फलको जान गये हैं और शब्दादि विषयोंमें रम रहे हैं, उनके लिये कौन-सी वस्तु स्वादिष्ट या सुखद है—विषयोंमें रमण या धर्मके मार्गपर संचरण, यह संदेह उठाकर तत्त्वका निश्चय करके लोग इस प्रकार कहेंगे ॥ ४५ ॥

यथा हानिः क्रमात् प्राप्ता तथा वृद्धिः क्रमाद् गता।
प्रगृहीते यतो धर्मे प्रवर्त्स्यन्ति कृतं युगम् ॥ ४६ ॥

जैसे क्रमशः धर्मकी हानि प्राप्त हुई थी, उसी प्रकार क्रमशः उसकी वृद्धि होगी; क्योंकि धर्मको पूर्णतः अपना लेनेपर मनुष्य सत्ययुगको प्राप्त कर लेंगे ॥ ४६ ॥

साधु वृत्तं कृतयुगे कषाये हानिरुच्यते।
एक एव तु कालः स हीनवर्णो यथा शशी ॥ ४७ ॥

सत्ययुगमें सबका बर्ताव उत्तम होता है और कलियुगमें सदाचारकी हानि बतायी जाती है, जैसे एक ही चन्द्रमा कभी कान्तिसे हीन और कभी कान्तिसे पूर्ण होता है, उसी प्रकार एक ही काल कभी कृतयुग और कभी कलियुगके रूपमें दृष्टिगोचर होता है ॥ ४७ ॥

छन्नो हि तमसा सोमो यथा कलियुगे तथा।
पूर्णश्च तमसा हीनो यथा कृतयुगे तथा ॥ ४८ ॥

जैसे चन्द्रमा अमावास्याको अन्धकारसे आच्छन्न होता है, उसी प्रकार कलियुगमें धर्म आच्छादित हो जाता है और जैसे पूर्णिमाको परिपूर्ण चन्द्रमा अन्धकारसे हीन होता है, उसी प्रकार सत्ययुगमें चारों चरणोंसे युक्त परिपूर्ण धर्म सर्वथा प्रकाशित होता है ॥ ४८ ॥

अर्थवादः परं ब्रह्म वेदार्थ इति तं विदुः।
अनिर्णीक्तमविज्ञातं दायाद्यमिव धार्यते ॥ ४९ ॥

जो परब्रह्म परमात्मा है, वह भूतार्थवाद है (परब्रह्मके रूपमें वेदके सत्य अर्थका ही प्रतिपादन हुआ) और विद्वान् पुरुष उसीको वेदका मुख्य अर्थ भी मानते हैं। (यदि ऐसी बात है तो वह सर्वव्यापी नित्यसिद्ध परमात्मा सबको प्राप्त क्यों नहीं होता? इसके उत्तरमें कहते हैं—) जैसे पैतृक सम्पत्तिके रूपमें मिला हुआ मलिन सुवर्णखण्ड जबतक उसका मल दूर न हो, तबतक अज्ञात दशामें ही धारण किया जाता है और उसे धारण करके भी मनुष्य अपनेको दरिद्र ही मानता है, उसी प्रकार अन्तःकरणके मलिन होनेसे परमात्मा अज्ञातरूपमें ही धारण किया जाता है; जब अन्तःकरण शुद्ध होता है; तब वह अपने आत्मासे अभिन्न रूपमें प्रकाशित हो उठता है और उसकी अप्राप्तिका भ्रम दूर हो जाता है ॥ ४९ ॥

इष्टवादस्तपो नाम तपो हि स्थावरं कृतम्।
गुणैः कर्माभिनिर्वृत्तिर्गुणांस्तथ्येन कर्मणा ॥ ५० ॥

तप (वर्णाश्रमोचित धर्म) स्वर्गादि अभीष्ट फलोंका प्रतिपादक है, तप स्थावर-अनादि अर्थात् अमोघ फलका साधक है, ऐसा शास्त्रमें निश्चय किया गया है। गुणों (देह-इन्द्रियादि) से कर्मकी सिद्धि होती है और यथार्थ कर्मसे गुणों (देह-इन्द्रियादि) की प्राप्ति होती है (अतः इस शरीर और कर्म आदिके बन्धनोंसे छुटकारा पानेके लिये परमात्माका आश्रय लेना चाहिये) ॥ ५० ॥

आशीस्तु पुरुषं दृष्ट्वा देशकालानुवर्तिनी।
युगे युगे यथाकालमृषिभिः समुदाहृता ॥ ५१ ॥

ऋषियोंने पुरुषकी योग्यताको सामने रखकर प्रत्येक युगमें यथासमय आशिष (कर्मफलकी प्राप्ति) का प्रतिपादन किया है, क्योंकि वह देश-कालका अनुसरण करनेवाली होती है ॥ ५१ ॥

इह धर्मार्थकामानां देवतानां प्रतिक्रिया।
आशिषश्च शुभाः पुण्यास्तथैवायुर्युगे युगे ॥ ५२ ॥

इस मर्त्यलोकमें धर्म, अर्थ और कामसम्बन्धी फल, देवाराधनके फल, शुभ एवं पुण्य आशिष तथा आयु प्रत्येक युगमें मनुष्योंकी श्रद्धाके तारतम्यके अनुसार होती हैं ॥ ५२ ॥

भविष्यपर्व ]पञ्चमोऽध्यायः७६१

| यथा युगानां परिवर्तनानि<br>चिरं प्रवृत्तानि विधिस्वभावात्।<br>क्षणं न संतिष्ठति जीवलोकः<br>क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः॥ ५३ ॥ | जैसे विधाताद्वारा नियत किये हुए स्वभावके अनुसार चिरकालसे युगोंके परिवर्तन होते रहते हैं, उसी प्रकार यह जीव जगत् ह्रास और वृद्धिके साथ निरन्तर चक्कर लगाता हुआ कभी क्षण भरके लिये भी स्थिर नहीं रहता ॥ ५३ ॥ |

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कलियुगवर्णने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कलियुगका वर्णनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥


पञ्चमोऽध्यायः

व्यासजी आदिका गमन, जनमेजयके अश्वमेध यज्ञमें इन्द्रका विघ्न डालना, जनमेजयद्वारा इन्द्रको शाप, ब्राह्मणोंका निर्वासन तथा अपनी पत्नीकी भर्त्सना, विश्वावसुका जनमेजयको समझाना

सूत उवाच

इत्येवमाश्वासयतो राजानं जनमेजयम् ।
अतीतानागतं वाक्यमृषेः परिषदा श्रुतम् ॥ १ ॥
**सूतजी कहते हैं—**शौनक ! इस प्रकार राजा जनमेजयको आश्वासन देते हुए महर्षि वेदव्यासका वह भूत, भविष्य-सम्बन्धी वचन उस राजसभाके सभी सदस्योंने सुना ॥ १ ॥

अमृतस्येव संवाहः प्रभा चन्द्रमसो यथा ।
अतर्पयत तच्छ्रोत्रं महर्षेर्वाङ्मयो रसः ॥ २ ॥
महर्षिका वह वाङ्मय रस मानो अमृतका प्रवाह था, चन्द्रमाकी प्रभाके समान मनको आह्लादित करनेवाला था । उसने सबके कानोंको तृप्त कर दिया ॥ २ ॥

धर्मकामार्थसंयुक्तं करुणं वीरहर्षणम् ।
रमणीयं तदाख्यानं कृत्स्नं परिषदा श्रुतम् ॥ ३ ॥
धर्म, काम और अर्थसे युक्त, करुणासे भरी हुई तथा वीरोचित हर्षोत्साहको बढ़ानेवाली वह सम्पूर्ण रमणीय वार्ता वहाँ सारी सभाने सुनी ॥ ३ ॥

केचिदश्रूणि मुमुचुः श्रुत्वा दध्युस्तथापरे ।
इतिहासं तमृषिणा पाणाविव निदर्शितम् ॥ ४ ॥
कुछ लोग आँसू बहाने लगे, कितने ही मनुष्य उस वार्ताको सुनकर ध्यानमग्न हो गये, महर्षि व्यासने उस भावी इतिहासको मानो हाथपर रखकर दिखा दिया था ॥ ४ ॥

सदस्यानु सोऽभ्यनुज्ञाय कृत्वा चापि प्रदक्षिणाम् ।
पुनर्द्रक्ष्याम इत्युक्त्वा जगाम भगवानृषिः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् वे महर्षि भगवान् व्यास सदस्योंकी अनुमति ले उन सबकी परिक्रमा करके 'हम फिर मिलेंगे' ऐसा कहकर वहाँसे चल दिये ॥ ५ ॥

अनुजग्मुस्तदा सर्वे प्रयान्तमृषिसत्तमम् ।
लोके प्रवदतां श्रेष्ठं ये विशिष्टास्तपोधनाः ॥ ६ ॥
उस समय वहाँ जो-जो श्रेष्ठ तपोधन मुनि थे, वे सब जगत्‌के सभी वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनिवर व्यासको जाते देख उनके पीछे हो लिये ॥ ६ ॥

याते भगवति व्यासे तदा ब्रह्मर्षिभिः सह ।
ऋत्विजः पार्थिवाश्चैव प्रतिजग्मुर्यथागतम् ॥ ७ ॥
ब्रह्मर्षियोंसहित भगवान् व्यासके चले जानेपर उस समय जो अन्य ऋत्विज और राजा थे, वे भी जैसे आये थे उसी तरह लौट गये ॥ ७ ॥

पन्नगानां सुघोराणां कृत्वा तां वैरयातनाम् ।
जगाम रोषमुत्सृज्य राजा विषमिवोरगः ॥ ८ ॥
अत्यन्त भयानक सर्पोंके वैरका वह बदला चुकाकर राजा जनमेजय विषको त्याग कर जानेवाले सर्पकी भाँति रोषको छोड़कर वहाँसे अपने नगरको चले गये ॥ ८ ॥

होत्राग्निदग्धशिरसं परित्राय च तक्षकम् ।
आस्तीकोऽप्याश्रमपदं जगाम स महामुनिः ॥ ९ ॥
हवनकी आगसे जिसका सिर तप गया था, उस तक्षकके प्राण बचाकर महामुनि आस्तीक भी अपने आश्रमको चले गये ॥ ९ ॥

राजापि हास्तिनपुरं जगाम स्वजनावृतः ।
अन्वशासच्च मुदितस्तदा प्रमुदिताः प्रजाः ॥ १० ॥
राजा जनमेजय भी स्वजनोंसे घिरे हुए वहाँसे हस्तिनापुरको गये और आनन्दपूर्वक रहकर सदा प्रसन्न रहनेवाली प्रजाका शासन एवं संरक्षण करने लगे ॥ १० ॥

कस्यचित्त्वथ कालस्य स राजा जनमेजयः ।
दीक्षितो वाजिमेधेन विधिवद् भूरिदक्षिणः ॥ ११ ॥
कुछ कालके बाद यज्ञोंमें बहुत-सी दक्षिणा देनेवाले राजा जनमेजयने विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ११ ॥

संज्ञप्तमश्वं तत्रास्य देवी काश्या वपुष्टमा ।
संनिवेशोपगम्याथ विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १२ ॥

७६२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उस यज्ञमें जो अश्व मारा गया था, उसके पास जाकर काशिराजकन्या महारानी वपुष्टमाने शास्त्रीय विधिके अनुसार शयन किया ॥ १२ ॥

तां तु सर्वांनवद्याङ्गीं चकमे वासवस्तदा ।
संज्ञप्तमश्वमाविश्य तया मिश्रीवभूव सः ॥ १३ ॥

उन दिनों उन सर्वाङ्गसुन्दरी रानीको देवराज इन्द्र प्राप्त करना चाहते थे। वे उस मारे गये अश्वमें आविष्ट हो रानीके साथ संयुक्त हो गये ॥ १३ ॥

तस्मिन् विकारे जनिते विदित्वा तत्त्वतश्च तत् ।
असंज्ञप्तोऽयमश्वस्ते ध्वंसेत्यध्वर्युमब्रवीत् ॥ १४ ॥

उस अश्वमें विकार उत्पन्न हो जानेपर यथार्थरूपसे इस बातको जानकर राजाने अध्वर्युसे कहा—'अहो ! तुम्हारा नाश हो; देखो, तुम्हारा यह अश्व अभी मरा नहीं है' ॥१४॥

अध्वर्युर्ज्ञानसम्पन्नस्तदिन्द्रस्य विचेष्टितम् ।
कथयामास राजर्षेः शशाप स पुरंदरम् ॥ १५ ॥

अध्वर्यु ज्ञानसे सम्पन्न थे, उन्होंने राजर्षि जनमेजयसे इन्द्रकी वह काली करतूत कह सुनायी, तब राजाने इन्द्रको शाप देते हुए कहा ॥ १५ ॥

जनमेजय उवाच

यद्यस्ति मे यज्ञफलं तपो वा रक्षतः प्रजाः ।
फलेनानेन सर्वेण ब्रवीमि श्रूयतामिदम् ॥ १६ ॥

जनमेजय बोले—यदि मेरे यज्ञोंका कुछ फल है अथवा प्रजाकी रक्षा करनेसे मुझमें कुछ तपोबल संचित हुआ है तो उन सबके फलसे मेरी कही हुई बात सत्य हो, मैं उस बातको बता रहा हूँ, आपलोग सुनें ॥ १६ ॥

अद्यप्रभृति देवेन्द्रमजितेन्द्रियमस्थिरम् ।
क्षत्रिया वाजिमेधेन न यक्ष्यन्तीति शौनक ॥ १७ ॥

'आजसे क्षत्रियलोग इस अजितेन्द्रिय और चञ्चल देवराज इन्द्रका अश्वमेध यज्ञके द्वारा यजन नहीं करेंगे' शौनक ! इस प्रकार उन्होंने इन्द्रको शाप दे दिया ॥ १७ ॥

ऋत्विजश्चाब्रवीत् क्रुद्धः स राजा जनमेजयः ।
दौर्बल्यं भवतामेतद् यदयं धर्षितः क्रतुः ॥ १८ ॥

तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए राजा जनमेजयने ऋत्विजोंसे कहा—'यह आपलोगोंकी दुर्बलता है, जिससे मेरा यह यज्ञ चौपट कर दिया गया ॥ १८ ॥

विषये मे न वस्तव्यं गच्छध्वं सह बान्धवैः ।
इत्युक्तास्त्यजुर्विप्रास्तं नृपं जातमन्यवः ॥ १९ ॥

'अब आपलोग मेरे राज्यमे न रहें, अपने बन्धु-बान्धवों-के साथ निकल जायें।' उनके ऐसा कहनेपर वे ब्राह्मण कुपित हो गये और राजाको छोड़कर चल दिये ॥ १९ ॥

अमर्षादन्वशासच्च पत्नीशालागताः स्त्रियः ।
राजा परमधर्मज्ञस्तामसौ जनमेजयः ॥ २० ॥

यद्यपि वे राजा जनमेजय बड़े धर्मज्ञ थे, तो भी अमर्ष-वश उन्होंने वपुष्टमाके लिये पत्नीशालामें बैठी हुई स्त्रियोंको इस प्रकार आदेश दिया—॥ २० ॥

असतीं वपुष्टमामेतां निर्यातयत मे गृहात् ।
यया मे चरणौ मूर्ध्नि पातितौ रेणुगुण्ठितौ ॥ २१ ॥

'यह वपुष्टमा असती (कुलटा) है, इसे मेरे घरसे निकाल दो। इसने इस कुकृत्यद्वारा मेरे मस्तकपर अपने धूलि-धूसर पैर रख दिये ॥ २१ ॥

शौण्डीर्यं मेऽनया भग्नं यशो मानश्च दूषितः ।
न चैनां द्रष्टुमिच्छामि परिक्लिष्टामिव स्रजम् ॥ २२ ॥

'इस पापिनीने मेरा महत्त्व नष्ट कर दिया, मेरे यश और मानमें धब्बा लगा दिया; मसली हुई फूलकी मालाकी तरह इस अपवित्र हुई नारीको अब मैं देखना भी नहीं चाहता ॥ २२ ॥

न स्वादु सोऽश्नाति नरः सुखं स्वपिति वा रहः ।
अन्वास्ते यः प्रियां भार्यां परेण मृदितामिह ।
पुनर्नैवोपभुञ्जीत श्वावलीढं हविर्यथा ॥ २३ ॥

'जो पर-पुरुषके द्वारा मर्दित हुई अपनी प्यारी भार्याके साथ रहता है, वह न तो स्वादिष्ट अन्न खाता है और न एकान्तमें सुखसे सो ही पाता है। उसे चाहिये कि कुत्तेके चाटे हुए हविष्यकी भाँति पर-पुरुषके समागमसे कलङ्कित हुई भार्याका फिर कभी उपभोग न करे' ॥ २३ ॥

एवमुच्चैः प्रभाषन्तं क्रुद्धं पारीक्षितं नृपम् ।
गन्धर्वराजः प्रोवाच विश्वावसुरिदं वचः ॥ २४ ॥

इस प्रकार क्रोधपूर्वक उच्चस्वरसे बोलते हुए राजा जनमेजयसे गन्धर्वराज विश्वावसुने यह बात कही ॥ २४ ॥

विश्वावसुरुवाच

त्रियज्ञशतयज्वानं वासवस्त्वां न मृष्यते ।
अप्सरास्तेन पत्नी ते विहितेयं वपुष्टमा ॥ २५ ॥

विश्वावसु बोले—राजन् ! आपने तीन सौ यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया है, इसलिये इन्द्र आपके इस उत्कर्षको सहन नहीं कर पाते हैं। इसीलिये उन्होंने एक अप्सराको आपकी इस पत्नी वपुष्टमाके रूपमें परिणत कर दिया था ॥

रम्भानामाप्सरा देवी काशिराजसुता मता ।
सैषा योषिद्वरा राजन् रत्नभूतानुभूयताम् ॥ २६ ॥

जिसे आप काशिराजकी पुत्री रानी वपुष्टमा मानते थे, वह रम्भा नामक अप्सरा थी; अतः राजन् ! यह नारियोंमें श्रेष्ठ वपुष्टमा रमणीरत्न है, आप इसका उप-भोग करें ॥२६॥

भविष्यपर्व ] पञ्चमोऽध्यायः ७६३


यज्ञे विवरमासाद्य विघ्नमिन्द्रेण ते कृतम्।
यज्वा ह्यसि कुरुश्रेष्ठ समृद्ध्या वासवोपमः॥ २७॥
बिभेत्यभिभवाच्छक्रस्तव क्रतुफलैर्नृप।
तस्मादावर्तितश्चैव क्रतुरिन्द्रेण ते विभो॥ २८॥

इस यज्ञमें कोई छिद्र पाकर इन्द्रने तुम्हारे लिये यह विघ्न उपस्थित किया था। कुरुश्रेष्ठ ! तुम यज्ञकर्ता हो, समृद्धिमें देवराज इन्द्रके समान हो। नरेश्वर ! तुम्हारे यज्ञोंके फलोंसे इन्द्रका पराभव न हो जाय, यही सोचकर वे तुमसे डरते हैं। प्रभो ! इसीलिये इन्द्रने तुम्हारे इस यज्ञमें विघ्न डाला है॥ २७-२८॥

मायैषा वासवेनेह प्रयुक्ता विघ्नमिच्छता।
क्रतोर्विवरमासाद्य संज्ञप्तं ददृशे वाजिनम्॥ २९॥
रतिमिन्द्रेण रम्भायां मन्यसे यां वपुष्टमाम्।

यज्ञमें कोई त्रुटि अथवा छिद्र मिल जानेसे विघ्न डालनेकी इच्छावाले इन्द्रने यह मायाका प्रयोग किया था। उन्होंने घोड़ेको मारा गया देख उसके भीतर प्रवेश करके रम्भाके साथ रमण किया था, जिसे तुम वपुष्टमा समझने लगे थे॥ २९½॥

अथ ते गुरवः शप्तास्त्रियज्ञशतयाजिनः॥ ३०॥
भ्रंशितस्त्वं च विप्राश्च बलादिन्द्रसमादिह।

इधर तुमने अपने उन गुरुजनोंको शाप दे दिया, जिन्होंने तुम्हारे तीन सौ यज्ञ कराये थे। तुम और तुम्हारे ब्राह्मण यहाँ इन्द्रके समान बलसे भ्रष्ट कर दिये गये ॥३०½॥

त्वत्तश्चैव सुदुर्धर्षात् त्रियज्ञशतयाजिनः॥ ३१॥
बिभेति हि सदा त्वत्तो ब्राह्मणेभ्योऽपि वासवः।
एकेन वै तदुभयं तीर्णं शक्रेण मायया॥ ३२॥

तुम तीन सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले अत्यन्त दुर्धर्ष वीर थे, तुमसे और उन ब्राह्मणोंसे भी इन्द्र सदा डरते रहते थे; अतः उन्होंने अकेले ही मायाके प्रयोगद्वारा उन दोनों प्रकारके भयोंको पार कर लिया॥ ३१-३२॥

स एष सुमहातेजा विजिगीषुः पुरंदरः।
कथमन्यैरनाचीर्णं नप्तुर्दारानतिक्रमेत्॥ ३३॥

विजयकी इच्छा रखनेवाले वे महातेजस्वी इन्द्र जिसे दूसरोंने कभी नहीं किया, वह पापकर्म कैसे कर सकते हैं? अपने पोतेकी पत्नीपर बलात्कार उनके द्वारा कैसे सम्भव हो सकता है?॥ ३३॥

यथैव हि परा बुद्धिः परो धर्मः परो दमः।
यथैव परमैश्वर्यं कीर्तितं हरिवाहने।
तथैव त्वयि दुर्धर्षे त्रियज्ञशतयाजिनि॥ ३४॥

हरिवाहन इन्द्रमें जिस प्रकार उत्तम बुद्धि, उत्कृष्ट धर्म, श्रेष्ठ इन्द्रिय-संयम और परम ऐश्वर्य बतलाया गया है, उसी प्रकार तीन सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले तुझ दुर्धर्ष वीरमें वे सभी बातें हैं॥ ३४॥

मा वासवं मा च गुरुमात्मानं मा वपुष्टमाम्।
गच्छ दोषेण कालो हि सर्वथा दुरतिक्रमः॥ ३५॥

अतः तुम इन्द्रमें, गुरु एवं पुरोहितमें, अपनेमें तथा रानी वपुष्टमामें दोषदृष्टि न करो; क्योंकि काल सर्वथा दुर्लङ्घ्य है॥ ३५॥

ऐश्वर्येणाश्वमाविश्य देवेन्द्रेणासि रोपितः।
आनुकूल्येन देवस्य वर्तितव्यं सुखार्थिना॥ ३६॥

देवेन्द्रने अपनी ऐश्वर्य-शक्तिसे अश्वमें प्रवेश करके तुम्हारे हृदयमें रोष उत्पन्न कर दिया था; अतः सुखार्थी मनुष्यको सदा देवताके अनुकूल बर्ताव करना चाहिये ॥३६॥

दुस्तरं प्रतिकूलं हि प्रतिस्रोतः इवाम्भसः।
स्त्रीरत्नमुपभुङ्क्ष्वेमामपापां विगतज्वरः॥ ३७॥

जैसे जलके प्रवाहके प्रतिकूल तैरना कठिन होता है, उसी प्रकार प्रतिकूल देवतासे पार पाना बहुत कठिन है। तुम्हारी रानी निष्पाप हैं, ये रमणियोंमें रत्न हैं, तुम निश्चिन्त होकर इनका उपभोग करो॥ ३७॥

अपापास्त्यज्यमाना वै त्यजेयुरपि योषितः।
अदुष्टास्तु स्त्रियो राजन् दिव्यास्तु सविशेषतः॥ ३८॥

राजन्! यदि निरपराध स्त्रियोंका त्याग किया जाय तो वे भी निष्पाप पतियोंका परित्याग करने लगेंगी। स्त्रियाँ प्रायः अल्प दोषवाली होती हैं, वे विशेषतः दिव्यभावसे सम्पन्न होती हैं॥ ३८॥

भानोः प्रभा शिखा वह्नेर्वेदी होत्रे तथाहूतिः।
परामृष्टाप्यसंसक्ता नोपदुष्यन्ति योषितः॥ ३९॥

जैसे सूर्यकी प्रभा, अग्निकी शिखा, यज्ञकी वेदी और होमकी आहुति दूसरेके स्पर्शसे दूषित नहीं होती, उसी प्रकार स्त्रियाँ भी यदि पर-पुरुषोंमें आसक्त न हों तो वे उनके बलपूर्वक किये गये स्पर्शसे कलङ्कित नहीं होतीं हैं॥ ३९॥

ग्राह्या लालयितव्याश्च पूज्याश्च सततं बुधैः।
शीलवत्यो नमस्कार्याः पूज्याः श्रिय इव स्त्रियः॥ ४०॥

शीलवती स्त्रियाँ विद्वान् पुरुषोंके लिये लक्ष्मीके समान ग्राह्य, लाड़-प्यारके योग्य, सतत आदरणीय, वन्दनीय तथा पूजनीय होती हैं॥ ४०॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि विश्वावसुवाक्ये पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें विश्वावसुका प्रवचनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥५॥

७६४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


षष्ठोऽध्यायः

जनमेजयका संतुष्ट होकर राज्यशासन करना तथा इस ग्रन्थके पाठ और श्रवणकी महिमा

सौतिरुवाच

एवं स विश्वावसुनानुनीतः
प्रसादमगम्य वपुष्टमायाः।
चकार मिथ्या व्यतिशङ्कितात्मा
शान्तिं परां मानवधर्महृष्टाम् ॥ १ ॥

सौति कहते हैं—अकारण ही जिनके मनमें संदेह उत्पन्न हो गया था, उन राजा जनमेजयको जब विश्वावसुने अनुनयपूर्वक समझाया, तब वे रानी वपुष्टमापर प्रसन्न हो गये और उन्होंने मानवधर्मके आचरणसे हृष्ट-पुष्ट शान्ति धारण की ॥ १ ॥


श्रममभिविनिवर्त्य मानसं स
समभिलपञ्जनमेज्यो यशः स्वम् ।
विषयमनुशशास धर्मवृद्धि-
र्मुदितमना रमयन् वपुष्टमां ताम् ॥ २ ॥

वे राजा जनमेजय मानसिक श्रमको दूर करके अपने लिये उत्तम यशकी अभिलाषा रखते हुए धर्मबुद्धिसे राज्यका शासन तथा प्रसन्नचित्त होकर वपुष्टमाके साथ रमण करने लगे ॥ २ ॥


न हि विरमति विप्रपूजना-
न्न च विनिवर्तति यज्ञदानशीलात् ।
न विषयपरिरक्षणाच्च्युतोऽभू-
न्न च परिगर्हति तां वपुष्टमां च ॥ ३ ॥

वे ब्राह्मणोंके पूजन, आदर-सत्कारसे कभी विरत नहीं होते थे, यज्ञ और दानरूप शीलसे कभी पीछे नहीं हटते थे, राज्यकी रक्षारूप कर्मसे च्युत नहीं होते थे और अपनी रानी वपुष्टमाकी कभी निन्दा नहीं करते थे ॥ ३ ॥


विधिविहितमशक्यमन्यथा हि कर्तुं
यदधिरचिन्तयतपाः पुराब्रवीत् सः।
इति स नृपतिरात्मवांस्तदासौ
तदनुविचिन्त्य बभूव वीतमन्युः॥ ४ ॥

'विधाताके विधानको उलट देना सर्वथा असम्भव है' यह बात जो अचिन्त्य तपस्वी महर्षि व्यासने पहले कही थी, उनके इस कथनपर उन मनस्वी नरेशने बारंबार विचार किया, इससे उनका रोष और खेद जाता रहा ॥ ४ ॥


इदं महाकाव्यमृषेर्महात्मनः
पठन् नृणां पूज्यतमो भवेन्नरः।
प्रकृष्टमायुः समवाप्य दुर्लभं
लभेत सर्वज्ञफलं च केशवम् ॥ ५ ॥

महात्मा महर्षि व्यासजीके इस महाकाव्यका पाठ करनेवाला मानव मनुष्योंमें परम पूजनीय हो जाता है। वह परम उत्तम दुर्लभ आयु पाकर सर्वज्ञतारूप फल और भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥


शतक्रतोः कल्मषविप्रमोक्षणं
पठन्निदं मुच्यति कल्मषान्नरः।
तथैव कामान् विविधान् समश्नुते
ह्यावाप्तकामश्च चिराय नन्दति॥ ६ ॥

इन्द्रके पापको छुड़ानेवाले इस काव्यका पाठ करनेवाला पुरुष स्वयं भी पापसे मुक्त हो जाता है। साथ ही नाना प्रकारकी मनोवाञ्छित कामनाओंका उपभोग करता और आप्तकाम होकर चिरकालतक आनन्दमें मग्न रहता है ॥ ६ ॥


यथा हि पुष्पप्रभवं फलं द्रुमाः
फलात् प्रजायन्ति पुनश्च पादपाः।
तथा महर्षिप्रभवा इमा गिरः
प्रवर्धयन्ते तमृषिं प्रवर्धिताः॥ ७ ॥

जैसे बढ़े हुए वृक्ष अपने फूलोंसे फलको प्रकट करते हैं और फलसे पुनः वृक्ष उत्पन्न होते एवं बढ़ते हैं, उसी प्रकार महर्षि व्याससे प्रकट हुई उनकी यह वाणी वक्ताओंद्वारा बढ़ायी-प्रचारमें लायी जानेपर उन महर्षिके ही महत्त्वको बढ़ाती है ॥ ७ ॥


पुत्रानपुत्रो लभते सुवर्चस-
श्च्युतः पुनर्विन्दति चात्मनः स्थितिम् ।
व्याधिं न चाप्नोति चिरं स बन्धनं
क्रियां च पुण्यां लभते गुणान्वितः॥ ८ ॥

इस ग्रन्थका पाठ अथवा श्रवण करनेवाला गुणवान् पुरुष यदि पुत्रहीन है तो उसे परम तेजस्वी पुत्र प्राप्त होते हैं, यदि वह धन, धर्म अथवा महत्त्वसे भ्रष्ट हुआ है तो पुनः अपनी उसी स्थितिको प्राप्त कर लेता है, उसे रोग नहीं होता, वह चिरकालतक बन्धनमें नहीं रहता तथा पुण्यकर्मका फल पाता है ॥ ८ ॥


पतिमभिलभते च सत्सु कन्या
श्रवणमुपेत्य शुभा मुनेस्तु वाचः।
जनयति च सुतान् गुणैरुपेतन्
रिपुजनमर्दनवीर्यशालिनश्च ॥ ९ ॥

महर्षि व्यासकी इस मङ्गलमयी वाणीको सुनकर कुमारी कन्या श्रेष्ठ पुरुषोंमेंसे किसी अभीष्ट पतिको पाती है तथा वह उत्तम गुणोंसे सम्पन्न एवं शत्रुओंका मर्दन करनेवाले पराक्रमसे सुशोभित अनेक पुत्रोंको जन्म देती है ॥ ९ ॥

भविष्यपर्व ] सप्तमोऽध्यायः ७६५


विजयति वसुधां च राजवृत्ति- र्धनमतुलं लभते द्विषञ्जयं च । विपुलमपि धनं लभेच्च वैश्यः सुगतिमियाच्छ्रवणाच्च शूद्रजातिः ॥ १० ॥

क्षत्रियवृत्तिसे रहनेवाला पुरुष इस ग्रन्थके पाठ और श्रवणसे भूमण्डलपर विजय पाता, अनुपम धनका भागी होता और शत्रुओंको परास्त कर देता है। वैश्य प्रचुर धन प्राप्त करता है और शूद्र जातिका पुरुष इसके श्रवणसे उत्तम गति पा लेता है ॥ १० ॥

पुराणमेतच्चरितं महात्मा- मधीत्य बुद्धिं लभते च नैष्ठिकीम् । विहाय दुःखानि विमुक्तसङ्गः स वीतरागो विचरेद् वसुन्धराम् ॥ ११ ॥

महात्माओंके चरित्रसे युक्त इस पुराणका अध्ययन करके मनुष्य नैष्ठिकी बुद्धि प्राप्त कर लेता है तथा वह दुःखोंका परित्याग करके आसक्तिशून्य एवं वीतराग होकर भूमण्डलपर विचरता रहता है ॥ ११ ॥

इत्येतदाख्यानमुदाहृतं वै प्रतिस्सरन्तो द्विजमण्डलेषु । स्थैर्येण धैर्येण पुनः स्मरन्तः सुखं भवन्तोऽनुचरन्तु लोकम् ॥ १२ ॥

मेरेद्वारा कहे गये इस आख्यानका ब्राह्मणोंके समाजमें चिन्तन एवं प्रवचन करते हुए आपलोग स्थिरता और धीरतापूर्वक इसका बारंबार स्मरण करें और संसारमें सुखपूर्वक विचरें ॥ १२ ॥

इति चरितमिदं महात्माना- मृषिकृतमद्भुतवीर्यकर्मणाम् । कथितमिदं हि समासविस्तरैः किमपरमिच्छसि किं ब्रवीमि ते ॥ १३ ॥

अद्भुत बल-पराक्रमवाले महात्माओंका यह चरित्र, जिसे महर्षि व्यासने ग्रन्थका रूप दिया है, मैंने संक्षेप और विस्तारके साथ कह सुनाया। शौनकजी ! अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ? मैं आपसे क्या कहूँ ? ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि भविष्यान्तग्रन्थार्थप्रकाशो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें भविष्यान्तग्रन्थके अर्थका प्रकाशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥


सप्तमोऽध्यायः

पुष्कर-प्रादुर्भावके विषयमें जनमेजयका प्रश्न और वैशम्पायनजीका उत्तर—

भगवान् नारायणकी महिमाका प्रतिपादन

जनमेजय उवाच

प्रभावं पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि । पुष्करे वै यथोद्भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा ॥ १ ॥ एतदाख्याहि निखिलं योगं योगविदां पते । शृण्वतस्तस्य मे कीर्तिं न तृप्तिरभिजायते ॥ २ ॥

जनमेजयने पूछा—योगवेत्ताओंके स्वामी वैशम्पायनजी ! आप समुद्रके जलमे शयन करनेवाले भगवान् पद्मनाभके प्रभावका वर्णन कीजिये। साथ ही यह भी बताइये कि पुष्करमें—भगवान्‌के नाभिकमलमें पहले देवताओं और ऋषियोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई, इस सम्पूर्ण रहस्यपर प्रकाश डालिये; क्योंकि भगवान् श्रीहरिकी कीर्तिका श्रवण करनेसे मुझे तृप्ति नहीं होती है (अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती है) ॥

कियन्तं चैव कालं वै शयिता पुरुषोत्तमः । किमर्थं च तथा शेते कश्च कालस्य सम्भवः ॥ ३ ॥

भगवान् पुरुषोत्तम कितने समयतक और किसलिये एकार्णवके जलमें शयन करते हैं तथा कालकी उत्पत्तिका कारण क्या है ? ॥ ३ ॥

कियता चैव कालेन प्रबुध्यति सुराधिपः। कथमुत्थाय भगवानसृजन्निखिलं जगत् ॥ ४ ॥

सुरेश्वर विष्णु कितने समयमे जागते हैं और उस योगनिद्रासे उठकर वे भगवान् किस प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करते हैं ? ॥ ४ ॥

के प्रजापतयस्तात आसन् पूर्वे महामुने। कथं निर्मितांश्चैव चित्रं लोकं सनातन ॥ ५ ॥

तात ! महामुने ! पूर्वकालमे कौन-कौन-से प्रजापति थे और सनातन श्रीहरिने इस विचित्र जगत्‌की सृष्टि किस प्रकार की थी ? ॥ ५ ॥

कथमेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे प्रणष्टोरगराक्षसे ॥ ६ ॥ नष्टानलानिले लोके नष्टाकाशमहीतले । केवलं गहनीभूते महाभूतविपर्यये ॥ ७ ॥ प्रभुर्महाभूतपतिर्महातेजा महाकृतिः । आस्ते सुरगुरुश्रेष्ठो विधिमादाय कं मुने ॥ ८ ॥

मुने ! उस भयानक एकार्णवमे जब कि समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, देवताओं और असुरोंका भी पता नहीं

७६६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


रहता, नाग और राक्षस भी कालके गालमें चले जाते हैं, अग्नि, वायु, आकाश और भूतलका भी कुछ पता नहीं चलता, महाभूतोंमें भारी उलट-फेर हो जाता है और संसार एक गहन गुफाके समान प्रतीत होता है, महाभूतोंके अधिपति महान् कर्म करनेवाले और महातेजस्वी सुरगुरुश्रेष्ठ भगवान् नारायण कैसे और किस विधिका आश्रय लेकर रहते हैं?॥

तन्मे त्वमुपपन्नाय ब्रह्मन्नेतदसंशयम् ।
वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ यशो नारायणात्मकम् ॥ ९ ॥

ब्रह्मन् ! धर्मिष्ठ महर्षे ! मैं शिष्यभावसे आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझसे भगवान् नारायणके यशका इस प्रकार वर्णन कीजिये कि मेरा सारा संशय दूर हो जाय ॥ ९ ॥

प्रादुर्भावं पुरस्कृत्य भूतं भव्यं महात्मनः ।
श्रद्दधानामुपविष्टानां भगवन् वक्तुमर्हसि ॥ १० ॥

भगवन् ! हमलोग श्रद्धापूर्वक आपकी बातें सुननेके लिये बैठे हैं, आप हमारे समक्ष महात्मा श्रीहरिके भूत और भविष्य अवतारोंको दृष्टिमें रखकर उनके सुयशका वर्णन कीजिये ॥ १० ॥

वैशम्पायन उवाच

नारायणयशोज्ञाने या भवेद् भवतः स्पृहा ।
त्वद्वंशानघ पूतस्य कार्यं कुरुकुलर्षभ ॥ ११ ॥

वैशम्पायनजीने कहा—निष्पाप कुरुकुलश्रेष्ठ जनमेजय ! भगवान् नारायणके यशका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये जो तुम्हें स्पृहा हो रही है, वह तुम्हारे कुलके अनुरूप ही है, ऐसी इच्छाका उदय होना पुण्यकर्मका फल है ॥ ११ ॥

शृणुष्वादिपुराणेभ्यो देवताभ्यो यथाश्रुति ।
ब्राह्मणानां च वदतां श्रुतोऽस्माभिर्महात्मनाम् ॥ १२ ॥

हमने पूर्वकालके पुरातन देवताओं तथा प्रवचन करनेवाले महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे श्रुतिके अनुसार भगवान् पद्मनाभके प्रभावका जैसा वर्णन सुना है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ १२ ॥

यथा च तपसा दृष्टो बृहस्पतिसमद्युतिः ।
पाराशर्यस्ततः श्रीमान् गुरुद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ १३ ॥
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।
न विज्ञातुं मया शक्यमृषिमात्रेण भारत ॥ १४ ॥

भारत ! जिनका तपस्याके प्रभावसे दर्शन हुआ है, उन बृहस्पतिके समान तेजस्वी श्रीमान् गुरुदेव पराशरनन्दन द्वैपायन व्यासने इस विषयमें जैसा मुझे उपदेश दिया है और जैसा मैंने सुना है, उसका मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन करता हूँ । केवल ऋषि होनेमात्रसे उनकी कही हुई बातोंको उन्हींकी भाँति ठीक-ठीक समझ लेना मेरे लिये भी सम्भव नहीं है ॥ १३-१४ ॥

कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम् ।
विश्वात्मनो यं ब्रह्मापि न वेत्थति तत्त्वतः ॥ १५ ॥

जिन्हें ब्रह्मा भी ठीक-ठीक नहीं जानते, उन विश्वात्माके नारायणनामक परमतत्त्वको कौन जान सकता है ॥ १५ ॥

श्रुतं मे विश्वदेवानां यद् रहस्यं महर्षिणाम् ।
तदिदं सर्वदेवानां तत्त्वतस्तत्त्ववादिनाम् ॥ १६ ॥

जिनकी दृष्टिमें सब कुछ नारायणदेव ही हैं तथा जो स्वभावसे ही परमतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले हैं, उन विश्वेदेवों और महर्षियोंके मुखसे मैंने जो गोपनीय रहस्य सुना है, वह वास्तवमें यह नारायणका यश ही है ॥ १६ ॥

तदध्यात्मविदां चिन्त्यं कारणं चैव कर्मिणाम् ।
अधिदैवं च यद् दैवं तद् दैवमिति संज्ञितम् ॥ १७ ॥

वह नारायण-तत्त्व ही अध्यात्मवेत्ता पुरुषोंके लिये चिन्तनीय वस्तु है, वही कर्मपरायण पुरुषोंका कारणतत्त्व है, वही अधिदैव और दैव है तथा उसीको प्रारब्ध या भाग्य नाम दिया गया है ॥ १७ ॥

यद् भूतर्माधभूतं च यत्परं च महर्षिणाम् ।
यत् सत्यं वेददृष्टं च यत् तद् वेदविदो विदुः ॥ १८ ॥

जो भूत और अधिभूत है, जो महर्षियोंका परम ज्ञेय तत्त्व है, जो सत्य है तथा जिसे वेदोंद्वारा देखा या जाना गया है, उस परमात्मतत्त्वको जो जानते हैं, वे ही वेदवेत्ता हैं।

यः कर्ता कारको बुद्धिर्मनः क्षेत्रज्ञ एव च ।
प्रधानं पुरुषः शास्ता एकस्तदभिभाष्यते ॥ १९ ॥

जो कर्ता, कारक, बुद्धि, मन, क्षेत्रज्ञ, प्रधान पुरुष और शास्ता है, जो अकेला ही इन शब्दोंद्वारा प्रतिपादित होता है, वह एकमात्र परमात्मा ही उ.ाने योग्य है ॥ १९ ॥

कालः कालं स्वपयति द्रष्टा स्वाधीन एव च ।
प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुवमक्षरमेव च ॥ २० ॥

वही काल बनकर कालको भी सुलाता है अर्थात् वही कालका भी काल है, वही सबका द्रष्टा तथा सर्वथा स्वतन्त्र है, पाँच प्रकारका प्राण भी वही है, वही ध्रुव एवं अक्षर ब्रह्म है ॥ २० ॥

उच्यते विविधैर्भावैस्तत्त्वैश्चानघ तत्परैः ।
स एव भगवान् सर्वं करोति विकरोति च ॥ २१ ॥

अनघ ! उनकी उपासनामें तत्पर रहनेवाले पुरुषोंद्वारा विविध भावोंसे उन्हींका प्रतिपादन किया जाता है। वे ही भगवान् सबको बनाते और बिगाड़ते हैं ॥ २१ ॥

योऽस्मान् कारयते कर्म तेनास्म व्याकुलीकृताः ।
यजामहे तमेवेशं तमेवेच्छाम निर्वृताः ॥ २२ ॥

जो हमसे कर्म कराता है, उसीने हमें विधि-निषेधके बन्धनमें बाँधकर व्याकुल कर रखा है । हम उसी ईश्वरका

भविष्यपर्व ] अष्टमोऽध्यायः [ ७६७

यज्ञोंद्वारा यजन करते हैं और शान्तभावसे उन्हींको पाना चाहते हैं ॥ २२ ॥
यो वक्ता यश्च वक्तव्यो यश्चाहं तद् ब्रवीमि वः ।
इदं शृणुत यच्छ्रेयो यच्चान्यत् परिजल्पथ ॥ २३ ॥
याः कथाश्चैव वर्तन्ते श्रुतयो वाथ गहराः ।
विश्वं विश्वपतिर्देवाः सर्वे नारायणात्मकम् ॥ २४ ॥
जो वक्ता (वाणीका प्रवर्तक) है, जो वक्तव्य विषय है तथा जो वक्तापनका अभिमान रखनेवाले मुझ जीवात्मा-के रूपमें भी विद्यमान है, उसके स्वरूपका मैं तुम्हारे समक्ष प्रतिपादन करता हूँ, तुम इसे सुनो। जो मुख्य श्रेय (मोक्ष) है तथा तुमलोग जिस स्वर्ग आदि दूसरे श्रेयकी चर्चा करते हो, जो भाँति-भाँतिकी कथाएँ हैं तथा जो गहन श्रुतियाँ हैं, वह सब भगवान् नारायणका स्वरूप ही है। यह विश्व, इस विश्वके पालक तथा देवता सब-के-सब नारायणरूप ही हैं ॥ २३-२४ ॥
यत् सत्यं यदनृतमादिमक्षरं वै
यद् भूतं भवति मिथश्च यद् भविष्यम् ।
यत् किंचिच्चरमचराव्ययं त्रिलोके
तत्सर्वं पुरुषवरः प्रभुर्वरिष्ठः ॥ २५ ॥
जो लौकिक सत्य और असत्य है, जो कारण और कार्य है, जो भूत है, जो परस्पर एक-दूसरेके जनक बीज-वृक्ष आदि हैं, जो भविष्य है तथा तीनों लोकोंमें जो कुछ भी चर-अचर और कूटस्थ वस्तु है, वह सब कुछ सर्वश्रेष्ठ पुरुषप्रवर भगवान् नारायण ही हैं ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पुष्करप्रादुर्भावे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥७॥


अष्टमोऽध्यायः

सत्ययुग आदिके परिमाणका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् ।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा जनमेजय ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! विद्वान् पुरुष सत्ययुगकी आयुका प्रमाण चार हजार दिव्य वर्ष बताते हैं। उससे दूने सौ अर्थात् आठ सौ वर्षोंकी उसकी संध्या होती है ॥ १ ॥

तत्र धर्मश्चतुष्पादो ह्यधर्मः पादविग्रहः ।
स्वधर्मनिरताः सन्तो यजन्ते चैव मानवाः ॥ २ ॥
उस युगमें धर्म अपने चारो चरणोंसे सम्पन्न होता है तथा अधर्मका सारा शरीर एक ही पैरपर स्थित होता है। उस समय अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले साधु पुरुष प्रायः यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का भजन किया करते हैं ॥ २ ॥

स्थिता धर्मपरा विप्रा राजवृत्तौ स्थिता नृपाः ।
कृष्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूषवस्तथा ॥ ३ ॥
ब्राह्मण स्वधर्मपालनमें तत्पर रहते हैं, राजालोग राजोचित वृत्तिमें स्थित होते हैं, वैश्य कृषि-कर्ममें लगे रहते हैं और शूद्र तीनो वर्णोंकी सेवा करते हैं ॥ ३ ॥

सदा सत्यं तपश्चैव धर्मश्चैव विवर्धते ।
सद्गिराचरितं यच्च क्रियते ख्यायते च यत् ॥ ४ ॥
उस युगमें सत्य, तप और धर्मकी सदा ही वृद्धि होती है। साधु पुरुष जिसका आचरण करते हैं, उसीका दूसरोंको उपदेश देते हैं ॥ ४ ॥

एतत् कृतयुगे वृत्तं सर्वेषामेव भारत ।
प्राणिनां धर्मबुद्धीनामपि चेन्नीचयोनिनाम् ॥ ५ ॥
भारत ! सत्ययुगमें सभी धर्मबुद्धि प्राणियोंका, वे नीच योनि या नीच कुलमें क्यों न उत्पन्न हुए हों, ऐसा ही बर्ताव होता है ॥ ५ ॥

त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्तिता ॥ ६ ॥
यहाँ तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग बताया जाता है। उसकी संध्या उससे दुगुने सौ (अर्थात् छः सौ) वर्षोंकी बतायी गयी है ॥ ६ ॥

द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यां त्रिभिर्धर्मो व्यवस्थितः ।
तत्र सत्यं च सत्त्वं च कृते सर्वं प्रवर्तते ॥ ७ ॥
उस युगमें धर्म तीन पैरोंसे और अधर्म दो पैरोंसे स्थित होता है। सत्ययुगमें सत्य और सत्त्वगुण सब अविकलरूपसे विद्यमान रहते हैं ॥ ७ ॥

त्रेतायां विकृतिं यान्ति वर्णा लौल्येन संयुताः ।
चातुर्वर्ण्यस्य चैकृत्याद् यान्ति दौर्बल्यमाश्रिताः ॥ ८ ॥
परंतु त्रेतामे लोलुपता (कर्मफलकी स्पृहा) से युक्त होनेके कारण सभी वर्ण विकारको प्राप्त होते हैं और चारों वर्णोंमे विकृति आनेसे सब लोग दुर्बल हो जाते हैं ॥ ८ ॥

एष त्रेतायुगविधिर्विहितो देवनिर्मितः ।
द्वापरस्यापि या चेष्टा तामपि श्रोतुमर्हसि ॥ ९ ॥


१. तप, शौच, दया और सत्य ये धर्मके चार चरण हैं।

७६८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


यह त्रेतायुगकी स्थिति बतायी गयी, जिसका निर्माण साक्षात् भगवान्‌ने ही किया है। अब द्वापरकी जो चेष्टा है, उसको भी तुम्हें सुन लेना चाहिये ॥ ९ ॥

द्वापरं द्वे सहस्रे तु वर्षाणां कुरुसत्तम ।
तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्तिता ॥ १० ॥

कुरुश्रेष्ठ ! द्वापर युग दो हजार दिव्य वर्षोंका होता है और उसकी संध्या चार सौ वर्षोंकी बतायी गयी है ॥ १० ॥

तत्राप्यर्थपरा विप्रा ज्ञानिनो रजसाऽऽवृताः ।
शठा नैकृतिकाः क्षुद्रा जायन्ते कुरुपुङ्गव ॥ ११ ॥

कुरुपुङ्गव ! उस युगमें भी अर्थपरायण, ज्ञानी, रजोगुणसे आच्छन्न, शठ, दुष्टता करनेवाले और क्षुद्र ब्राह्मण आदि पैदा होते हैं ॥ ११ ॥

द्वाभ्यां धर्मः स्थितः पद्भ्यामधर्मस्त्रिभिरुत्थितः ।
विपर्ययं शनैर्यान्ति कृते ये धर्मसेतवः ॥ १२ ॥

उस समय धर्म दो ही पैरोंसे स्थित होता है, किंतु अधर्म तीन पैरोंसे खड़ा होकर क्रमशः उत्थान करने लगता है। सत्ययुगमें जो धर्मकी मर्यादाएँ बँधी होती हैं, वे धीरे-धीरे इस युगमें आकर उलट जाती हैं ॥ १२ ॥

ब्राह्मण्यभावा नश्यन्ति तथास्तिक्यं विशीर्यते ।
व्रतोपवासास्त्यज्यन्ते द्वापरे युगपर्यये ॥ १३ ॥

ब्राह्मणत्वके भाव नष्ट हो जाते हैं, आस्तिकताकी दीवार ढह जाती है, द्वापरयुगके अन्तमें कलि-धर्मका सम्मिश्रण हो जानेके कारण लोग व्रत और उपवास छोड़ देते हैं ॥ १३ ॥

तथा वर्षसहस्रं तु वर्षाणां द्वे शते तथा ।
संध्यया सह संख्यातं क्रूरं कलियुगं स्मृतम् ॥ १४ ॥

क्रूर कलियुग अपनी दो सौ वर्षोंकी संध्याके साथ एक हजार दिव्यवर्षोंका बताया गया है ॥ १४ ॥

तत्राधर्मश्चतुष्पादः स्याद् धर्मः पादविग्रहः ।
कामनिष्ठास्तमश्छन्ना जायन्ते तत्र मानवाः ॥ १५ ॥

उस युगमें अधर्म अपने चारों पैरोंसे सम्पन्न होता है, किंतु धर्मका शरीर एक ही पैरसे टिका रहता है। उस युगके मनुष्य प्रायः कामपरायण और तमोगुणसे आच्छन्न होते हैं ॥ १५ ॥

नैवोपवासकृत् कश्चिन्न च साधुर्न सत्यवाक् ।
आस्तिको ब्रह्मवक्ता वा नरो भवति वै तदा ॥ १६ ॥

कलिकालमें प्रायः कोई मनुष्य उपवास करनेवाला, साधु, सत्यवादी, आस्तिक तथा ब्रह्मज्ञानका उपदेश करनेवाला नहीं होता है ॥ १६ ॥

अहंकारगृहीताश्च प्रक्षीणस्नेहबन्धनाः ।
विप्राः शूद्रसमाचाराः शूद्रास्त्वाचारलक्षणाः ॥ १७ ॥

कलियुगके ब्राह्मण अहंकारके वशीभूत तथा स्नेहबन्धनसे शून्य हो शूद्रोंके समान आचारवाले हो जायेंगे और शूद्र सदाचारका पालन करेंगे ॥ १७ ॥

दूषकास्त्वाश्रमाणां च वर्णानां चैव संकराः ।
अगम्यास्वभिरंस्यन्ते वर्तन्त्येवं कलौ युगे ॥ १८ ॥

लोग आश्रमोंको कलङ्कित करेंगे, वर्णसङ्कर उत्पन्न होकर अगम्या स्त्रियोंके साथ रमण करेंगे, कलियुगमें प्रायः लोगोंका ऐसा ही बर्ताव होता है ॥ १८ ॥

एवं द्वादशसाहस्रं तदेकं युगमुच्यते ।
तदेकसप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ १९ ॥

इस प्रकार बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग कहलाता है। यहाँ इकहत्तर चतुर्युगोंका एक मन्वन्तर कहा जाता है (इतने समयके बाद एक मनु नष्ट हो जाते हैं) ॥

त्रय्यां चैव न संदेहो युगान्ते जनमेजय ।
दिव्यं द्वादशसाहस्रं युगं तु कवयो विदुः ।
एतत्सहस्रपर्यन्तं तदह्नो ब्राह्ममुच्यते ॥ २० ॥

जनमेजय ! युगान्त (प्रलय) कालमे समस्त चराचर जगत्‌का नाश हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। तीनों वेदोंमें भी इसका वर्णन मिलता है। ज्ञानी पुरुष बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग मानते हैं। इस चतुर्युगकी जब एक सहस्र आवृत्ति हो जाती है, तब उसे ब्रह्माका एक दिन कहते हैं ॥ २० ॥

ततोऽहनि गते तस्मिन् सर्वेषामेव देहिनाम् ।
शरीरनिर्वृत्तिं दृष्ट्वा रुद्रः संहारबुद्धिमान् ॥ २१ ॥
देवतानां च सर्वेषां ब्राह्मणानां महीपते ।
दैत्यानां मानवानां च यक्षगन्धर्वरक्षसाम् ॥ २२ ॥
देवर्षीणां ब्रह्मर्षीणां तथा राजर्षिणामपि ।
किंनराणामप्सरसां भुजङ्गानां तथैव च ॥ २३ ॥
पर्वतानां नदीनां च पशूनां चैव भारत ।
तिर्यग्योनिगतानां च सत्त्वानां मृगपक्षिणाम् ॥ २४ ॥
महाभूतपतिर्देवः पञ्चभूतानि भूतकृत् ।
जगत्संहरणार्थाय कुरुते वैशसं महत् ॥ २५ ॥

पृथ्वीनाथ ! तदनन्तर ब्रह्माजीका वह दिन बीतनेपर समस्त देहधारियोंकी शारीरिक सुखमे आसक्ति देखकर संहारकुशल रुद्रदेव समस्त देवताओं, ब्राह्मणो, दैत्यों, मनुष्यों, यक्षों, गन्धर्वो, राक्षसों, देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों, राजर्षियों, किन्नरों, अप्सराओं, सर्पों, पर्वतों, नदियों, पशुओं, तिर्यग्योनिमें पड़े हुए जीवों, मृगों तथा पक्षियोंका भी महान् संहार करते हैं, महाभूतोंके पति वे भूतस्रष्टा भगवान् सारे भूतों एवं जगत्‌का संहार करनेके लिये ही उनकी सृष्टि करते हैं ॥ २१–२५ ॥

भविष्यपर्व ] नवमोऽध्यायः [ ७६९


भूत्वा सूर्यश्चक्षुषी चाददानो
भूत्वा वायुः संहरन् प्राणिजातम्।
भूत्वा वह्निर्दहते सर्वलोकान्
मेघो भूत्वा भूय एवाभ्यवर्षत् ॥ २६ ॥

अपने दिनके अन्तमें रुद्रस्वरूप भगवान् ब्रह्मा सूर्य होकर समस्त लोकोंके नेत्र छीन लेते हैं, वायु होकर समस्त प्राणियोंके प्राण हर लेते हैं, अग्नि होकर समस्त लोकोंको दग्ध कर देते और मेघ बनकर पुनः बड़ी भारी वर्षा करते हैं (जिससे सब कुछ एकार्णवमें निमग्न हो जाता है) ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पुष्करप्रादुर्भावे कृतादियुगपरिमाणवर्णने अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावके प्रसङ्गमें युग आदिके प्रमाणका वर्णनविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥


नवमोऽध्यायः

प्रलयके पश्चात् एकार्णवके जलमें भगवान् नारायणका शयन

वैशम्पायन उवाच
भूत्वा नारायणो योगी सप्तमूर्तिर्विभावसुः।
गभस्तिभिः प्रदीप्ताभिः संशोषयति सागरान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! योगेश्वर भगवान् नारायण सात मूर्ति (शिखा) वाले अग्निदेवका रूप धारण करके अपनी प्रज्वलित किरणोंद्वारा समुद्रोंका जल सोख लेते हैं ॥ १ ॥

पीत्वार्णवांश्च सर्वान् स नदीः कूपांश्च सर्वशः।
पर्वतानां च सलिलं सर्वं पीत्वा च रश्मिभिः ॥ २ ॥
भित्त्वा सहस्रशश्चैव महीं नीत्वा रसातलम्।
रसातलगर्तं कृत्स्नं पिवते रसमुत्तमम् ॥ ३ ॥

सारे समुद्रों, नदियों, कूपों और पर्वतोंका सम्पूर्ण जल अपनी किरणोंद्वारा पीकर पृथ्वीके सहस्रों टुकड़े करके उसे रसातलमें ले जाकर वे रसातलका भी सारा उत्तम रस पी लेते हैं ॥ २-३ ॥

अप्सु सृजन् क्लेदमन्यद् ददाति प्राणिनां ध्रुवम्।
तत् सर्वमरविन्दाक्ष आदत्ते पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥

जलमें क्लेद (गीलापन) की सृष्टि करते हुए वे प्राणियोंको निश्चितरूपसे और जो कुछ देते हैं, वह सब प्रलयकालमें वे ही कमलनयन पुरुषोत्तम उनसे ले लेते हैं ॥ ४ ॥

वायुश्च बलवान् भूत्वा स विधूयाखिलं जगत्।
प्राणोदयं सुराणां च वायुना कुरुते हरिः ॥ ५ ॥

वे श्रीहरि बलवान् वायु होकर सम्पूर्ण जगत्‌को कम्पित करते हुए उस वायुके द्वारा ही देवताओंमें प्राणसंचार करते हैं ॥ ५ ॥

ततो देवगणानां च सर्वेषामेव देहिनाम्।
ये चेन्द्रियगुणाः सर्वे ये चान्ये च यतोद्भवाः।
पूर्वं घ्राणं शरीरं च पृथिवीमाश्रिता गुणाः ॥ ६ ॥

तदनन्तर देवताओं तथा समस्त देहधारियोंकी जो सारी इन्द्रियाँ हैं तथा जो अन्य विषय आदि हैं, उनकी जहाँसे उत्पत्ति हुई है, वे उसी कारणतत्त्वमें लीन हो जाते हैं। गन्ध घ्राणेन्द्रिय और शरीर—ये तीनों गुण पृथ्वीके आश्रित हैं ॥ ६ ॥

जिह्वा रसश्च क्लेदश्च संश्रिताः सलिलं गुणाः।
रूपं चक्षुर्विपाकश्च ज्योतिरेवाश्रिता गुणाः ॥ ७ ॥

जिह्वा, रस और क्लेद—ये जलके आश्रित रहनेवाले गुण हैं। रूप, नेत्र और पाक—ये अग्निके आश्रित रहनेवाले गुण हैं ॥ ७ ॥

स्पर्शः प्राणश्च चेष्टा च पवनं संश्रिता गुणाः।
परमेष्ठिनं वरेण्यं च हृषीकेशं समाश्रिताः ॥ ८ ॥

स्पर्श, प्राण और चेष्टा—ये वायुके आश्रित रहनेवाले गुण हैं। (शब्द, श्रवणेन्द्रिय और आकाश—ये शब्दके आश्रित रहनेवाले गुण हैं।) ये सब-के-सब परमेष्ठी, एवं वरणीय भगवान् हृषीकेशके आश्रित होते हैं ॥ ८ ॥

ततो भगवता तत्र रश्मिभिः परिवारिताः।
वायुना कृष्यमाणाश्च रूपान्योन्यसमाश्रयात् ॥ ९ ॥

फिर भगवान्‌की प्रेरणासे उनकी किरणोंसे आवेष्टित हो वे देवगण, इन्द्रिय-समुदाय आदि वायुसे आकर्षित हो एक दूसरेके आश्रित होनेसे परस्पर संघर्ष करने लगे ॥ ९ ॥

तेषां संघर्षजोद्भूतः पावकः शतधा ज्वलन्।
अदहन्निखिलांल्लोकानुग्रः संवर्तकोऽनलः ॥ १० ॥

उनके संघर्षसे प्रकट हुई अग्नि सौ-सौ स्थानोंमें जल उठी और महाभयंकर संवर्तक अग्निके रूपमें उद्भासित होने लगी। उसने सम्पूर्ण लोकोंको जलाकर भस्म कर दिया ॥ १० ॥

सम्पर्वतांस्तरून गुल्माल्लतावल्लीस्तृणानि च।
विमानानि च दिव्यानि पुराणि विविधानि च ॥ ११ ॥
आश्रमांश्च तथा पुण्यान् दिव्यान्यायतनौनि च।
यानि चाक्षयणीयानि तानि सर्वाणि सोऽदहत् ॥ १२ ॥

उस संवर्तक अग्निने पर्वत, वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली,

७७०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तृण, दिव्य विमान, नाना प्रकारके नगर, पुण्य आश्रम, दिव्य शोभासे सम्पन्न मन्दिर तथा अन्य जो-जो आश्रय लेने योग्य स्थान थे--उन सबको दग्ध कर डाला ॥११-१२॥
भस्मीभूतांस्ततः सर्वांल्लोकाँल्लोकगुरुर्हरिः।
भूयो निर्वापयामास जलयुक्तेन कर्मणा ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् लोकगुरु श्रीहरिने भस्मीभूत हुए उन समस्त लोकोंको पुनः जलका संयोग करानेवाले उपायसे बुझा दिया ॥
सहस्रदृङ्महातेजा भूत्वा कृष्णो महाघनः।
दिव्यतोयेन हविषा तर्पयामास मेदिनीम् ॥ १४ ॥
सहस्रों नेत्रोंवाले उन महातेजस्वी श्रीकृष्णने महान् मेघ बनकर दिव्य जलरूपी हविष्यसे पृथ्वीको तृप्त किया ॥ १४ ॥
ततः क्षीरनिकाशेन स्वादुना परमाम्भसा।
शिवेन पुण्येन मही निर्वाणमगमत् परम् ॥ १५ ॥
दूधके समान स्वादिष्ट उत्तम कल्याणकारी एवं पवित्र उस जलसे वह जलती हुई पृथ्वी पूर्णतः शान्त हो गयी १५
ते नगा जलसंछन्नाः पयसः सर्वतोधराः।
एकार्णवजला भूत्वा सर्वसत्त्वविवर्जिताः ॥ १६ ॥
वे पर्वत और वृक्ष आदि जलसे आच्छादित हो सब ओरसे जल-ही-जल धारण किये रहे और एकार्णवके जलमें विलीन होकर सब प्रकारके प्राणियोंसे शून्य हो गये ॥१६॥
महाभूतान्यपि च तं प्रविष्टान्यमितौजसम्।
नष्टार्कपवनाकाशे सूक्ष्मे जनविवर्जिते ॥ १७ ॥
संशोषयित्वा पीत्वा च वसत्येकः सनातनः।
पौराणं रूपमास्थाय किमप्यमितबुद्धिमान् ॥ १८ ॥
पाँचों महाभूत भी उन अमित बलशाली भगवान् विष्णुमें प्रविष्ट हो गये। जब सूर्य, वायु और आकाशका भी सूक्ष्म परमात्मतत्त्वमें लय हो गया, जीव-जन्तुओंका सर्वथा अभाव हो गया, तब वे एकमात्र अमित बुद्धिमान् सनातन पुरुष श्रीहरि अपने किसी अनिर्वचनीय पुरातन रूपका आश्रय ले पहलेके जलका शोषण और पान करके उस दिव्य एकार्णवके जलमें निवास करने लगे ॥ १७-१८ ॥
एकार्णवजले ह्यासीद् योगी योगमुपागतः।
अयुतानां सहस्राणि गतान्येकार्णवेऽम्भसि ।
न चैनं कश्चिद्व्यक्तं व्यक्तं वेदितुमर्हति ॥ १९ ॥
वे योगी श्रीहरि योगका आश्रय ले एकार्णवके जलमें रहने लगे; वहाँ रहते हुए उनके सहस्रों अयुतवर्ष व्यतीत हो गये। इन अव्यक्त परमेश्वरको कोई भी व्यक्तरूपसे नहीं जान सकता ॥ १९ ॥

जनमेजय उवाच
एकार्णवविधिः कोऽयं यश्चैव परिकीर्तितः।
क एष पुरुषो नाम कियोगः कश्च योगवान् ॥ २० ॥
जनमेजयने पूछा—जिसका यहाँ वर्णन किया है, इस एकार्णवकी विधि(अवधि)क्या है? अर्थात् भगवान् उसमें कबतक निवास करते हैं? यह पुरुष कौन है? इसके योगका स्वरूप क्या है? और योगवान् (योगेश्वर) कौन है?॥२०॥

वैशम्पायन उवाच
एतावन्तमसौ कालमेकार्णवविधिं प्रति।
करिष्यतीमं भगवानिति कश्चिन्न बुध्यते ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—वे भगवान् इतने समयतक एकार्णव-विधिको पालन करेंगे अर्थात् इतने समयतक ही एकार्णवके जलमें रहेंगे, यह कोई नहीं जानता ॥ २१ ॥
न वै माता न च द्रष्टा न ज्ञाता नैव पार्श्वगः।
न स्वावगच्छते कश्चिदृते तं देवमीश्वरम् ॥ २२ ॥
(यह पुरुष अनिर्वचनीय है) न तो वह प्रमाता है, न द्रष्टा है, न ज्ञाता है और न तटस्थ ही है; इन सबसे सर्वथा विलक्षण है। उसे उस परमेश्वरदेवके सिवा दूसरा कोई नहीं जान सकता (इसलिये उसका योग भी अनिर्वचनीय है) ॥ २२ ॥
नभः क्षितिं पवनमथ प्रकाशयन्
प्रजापतिं भुवनचरं सुरेश्वरम्।
पितामहं श्रुतिनिलयं महामुनिं
शशास भूः शयनमरोचयत् प्रभुः॥ २३ ॥
जिन्होंने आकाश, पृथ्वी और वायुको प्रकाशित करते हुए समस्त भुवनोंमें विचरनेवाले, सुरेश्वर, प्रजापति वेदनिष्ठ महामुनि पितामह ब्रह्माको भी ज्ञानका उपदेश दिया, वे सबकी उत्पत्तिके कारणभूत भगवान् योगवान् (योगेश्वर) हैं; उन्होंने ही एकार्णवके जलमें शयन करना पसंद किया ॥२३॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पुष्करप्रादुर्भावे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥९॥


दशमोऽध्यायः

एकार्णवमें भगवान् और मार्कण्डेयजीका संवाद

वैशम्पायन उवाच
एवमेकार्णवीभूते शेते लोके महाद्युतिः।
प्रच्छाद्य सलिलं सर्वं हरिनारायणः प्रभुः ॥ १ ॥
महतो रजसो मध्ये महार्णवसमस्य वै।
विरजस्को महाबाहुरक्षरं ब्रह्म यं विदुः ॥ २ ॥
आत्मरूपप्रकाशेन तपसा संवृतः प्रभुः।
त्रिकमास्थाय कालं तु ततः सुष्वाप सोऽव्ययः ॥ ३ ॥

भ विषयपर्व ] दशमोऽध्यायः ७७१


वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! आत्मस्वरूपको प्रकाशित करनेवाले तपसे सम्पन्न, सर्वसमर्थ, रजोगुणरहित महातेजस्वी, महाबाहु, अविनाशी, भगवान् नारायण हरिने इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्के एकार्णवमय हो जानेपर सम्पूर्ण जलको आच्छादित करके उसमें शयन किया। ये वे ही भगवान् हैं, जिन्हें विद्वान् पुरुष अविनाशी ब्रह्मके रूपमें जानते हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालका आश्रय लेकर वहाँ सोये थे ॥ १-३ ॥

पुरुषो यज्ञ इत्येवं यत्परं परिकीर्तितम् ।
यच्चान्यत् पुरुषाख्यं स्यात्सर्वं तत्पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥

जिस परम तत्त्वको यज्ञपुरुषके नामसे कहा गया है तथा पुरुष नामसे प्रसिद्ध जो अन्य वस्तुएँ हैं, वे सब पुरुषोत्तम श्रीहरि ही हैं ॥ ४ ॥

ये च यज्ञपरा विप्रा ऋत्विजा इति संज्ञिताः ।
आत्मदेहात् पुरा भूता यज्ञेभ्यः श्रूयतां तदा ॥ ५ ॥

यज्ञमें तत्पर रहनेवाले जो ब्राह्मण ऋत्विज् कहलाते हैं, वे उन्हीं परमात्मा श्रीहरिके श्रीविग्रहसे पूर्वकालमें प्रकट हुए थे। उस समय उन्होंने उनको किस तरह प्रकट किया, यह बताता हूँ; सुनो ॥ ५ ॥

ब्रह्माणं परमं वक्त्रादुद्गातारं च सामगम् ।
होतारमथ चाध्वर्युं बाहुभ्यामसृजत् प्रभुः ॥ ६ ॥

उन भगवान्ने सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मा और सामगान करनेवाले उद्गाताको अपने मुखसे उत्पन्न किया, होता और अध्वर्युकी सृष्टि अपनी दोनों भुजाओंसे की ॥ ६ ॥

ब्राह्मणो ब्राह्मणाच्छांसं सम्प्रस्तारं च सर्वशः ।
तन्मित्रं वरुणं सृष्ट्वा प्रतिष्ठातारमेव च ॥ ७ ॥

वेदाध्ययन करनेके कारण ब्राह्मणाच्छांसी नामवाला ब्राह्मण उन्हींसे प्रकट हुआ। उन्होंने प्रस्तोता और मैत्रावरुण नामक प्रशास्ताकी सृष्टि करके प्रतिप्रस्थाताको उत्पन्न किया ॥

उदरात् प्रतिहर्त्तारं पोतारं चैव भारत ।
अच्छावाकं मनोरूभ्यां नेष्टारं चैव भारत ॥ ८ ॥

भारत ! उन्हीं भगवान्ने उदरसे प्रतिहर्त्ता और पोताकी सृष्टि की। भरतनन्दन ! उन्होंने मन और ऊरुसे अच्छावाक् और नेष्टाको उत्पन्न किया ॥ ८ ॥

पाणिभ्यामथ चाग्नीध्रं सुब्रह्मण्यं च यज्ञियम् ।
ग्रावाणमथ बाहुभ्यामुन्नेतारं च यज्ञियम् ॥ ९ ॥

दोनों हाथोंसे अग्नीध्र और यज्ञसम्बन्धी सुब्रह्मण्यको उत्पन्न किया। भुजाओंसे ग्रावस्तोता और यज्ञसम्बन्धी उन्नेता-की सृष्टि की ॥ ९ ॥

एवमेवैष भगवान् षोडशैताञ्जगत्पतिः ।
प्रवक्तॄन् सर्वयज्ञानामृत्विजोऽसृजदुत्तमान् ॥ १० ॥

इस प्रकार इन जगदीश्वर भगवान् श्रीहरिने सम्पूर्ण यज्ञकर्मोंका उपदेश देनेवाले सोलह उत्तम ऋत्विजोंकी सृष्टि की ॥ १० ॥

तदेष वै वेदमयः पुरुषो यज्ञसम्मितः ।
वेदाश्च तन्मयाः सर्वे साङ्गोपनिषदक्रियाः ॥ ११ ॥

ये ही वेदमय और यज्ञसम्मित पुरुष हैं। छहों अङ्गों, उपनिषदों और कर्मकाण्डसहित सम्पूर्ण वेद भी इन्हींके स्वरूप हैं ॥ ११ ॥

स्वपितेकार्णवे चैव यदाश्चर्यमभूत्तदा ।
श्रूयते तद् यथावृत्तं मार्कण्डेयो यदन्वभूत् ॥ १२ ॥

जब वे एकार्णवके जलमें शयन करते थे, उस समय जो आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी, उसे मुनिवर मार्कण्डेय-जीने ठीक-ठीक अनुभव किया था—ऐसा सुना जाता है ॥

जीर्णो भगवतस्तस्य कुक्षावेव महामुनिः ।
बहुवर्षसहस्रायुस्तस्यैव वरतेजसा ॥ १३ ॥

महामुनि मार्कण्डेय उन भगवान् श्रीहरिके उदरमें ही जवानसे बूढ़े हो गये थे। उन भगवान्के ही उत्तम तेजसे मार्कण्डेयजीको अनेक सहस्र वर्षोंकी आयु प्राप्त हुई थी ॥

इति तीर्थप्रसङ्गेन पृथिवीतार्थगोचरः ।
आश्रमानपि पुण्यांश्च तीर्थान्यायतनानि च ॥ १४ ॥
देशान् राष्ट्राणि चित्राणि पुराणि विविधानि च ।
जपहोमरतः क्षान्तस्तपो घोरं समाश्रितः ॥ १५ ॥

इस तरह वे तीर्थयात्राके प्रसंगसे भगवान्के उदरमें ही भूमण्डलके तीर्थोंमें विचरते रहे। उन्होंने वहाँ पवित्र आश्रमों, तीर्थों, देवालयों, देशों, विचित्र राष्ट्रों और नाना प्रकारके नगरोंका दर्शन किया। तत्पश्चात् वे घोर तपस्याका आश्रय ले जप और होममें संलग्न होकर अत्यन्त दुर्बल हो गये ॥

मार्कण्डेयस्ततस्तस्य शनैर्वक्त्राद् विनिःसृतः ।
निष्क्रामन्तं न चात्मानं जानीते देवमायया ॥ १६ ॥

इसके बाद एक दिन मार्कण्डेयजी धीरे-से भगवान्के मुखसे बाहर निकल आये। देवमायासे मोहित होकर वे अपना निकलना नहीं जान सके ॥ १६ ॥

निष्क्रान्तस्तस्य वदनादेकार्णवमथो गतः ।
सर्वतस्तमसाच्छन्नं मार्कण्डेयो निरीक्षते ॥ १७ ॥

भगवान्के मुखसे निकलकर मार्कण्डेयजी एकार्णवके जलमें आ गये, फिर तो उन्होंने अपने-आपको सब ओरसे अन्धकार-से आच्छन्न देखा ॥ १७ ॥

तस्योत्पन्नं भयं तीव्रं संशयश्चात्मजीविते ।
देवदर्शनसंहृष्टो विस्मयं चागमत् परम् ॥ १८ ॥

अब उनके मनमें बड़ा भारी भय हुआ। अपने जीवनके लिये भी संशय उत्पन्न हो गया, परंतु भगवान्के दर्शनसे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। वे बड़े विस्मयमें पड़ गये थे ॥ १८ ॥

७७२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


संचिन्तयति मध्यस्थो मार्कण्डेयोऽतिशङ्कितः ।
किंस्विन्नुवेदिदं चिन्ता मोहः स्वप्नोऽनुभूयते ॥ १९ ॥

वे मार्कण्डेय मुनि अत्यन्त शङ्कित हो मध्यस्थकी भाँति इस प्रकार विचार करने लगे—'मेरी यह चिन्ता क्या है ? मुझे मोह हो गया है या स्वप्नका अनुभव हो रहा है ? ॥ १९ ॥

व्यक्तमन्यतमो भावो ह्येतेषां भविता मम ।
न हीदृशमसंदिष्टमयुक्तं सत्यमर्हति ॥ २० ॥

'निश्चय ही मेरा यह भाव चिन्ता, मोह और स्वप्नमेंसे ही कोई हो सकता है; क्योंकि ऐसी असम्बद्ध और अयुक्त बात कभी सत्य नहीं हो सकती ॥ २० ॥

नष्टचन्द्रार्कपवने छन्नपर्वतभूतले ।
कतमः स्यादयं लोक इति चिन्ताव्यवस्थितः ॥ २१ ॥

'जहाँ चन्द्रमा, सूर्य और वायुका दर्शन नहीं होता, पर्वत और भूतल आच्छन्न हो गये हैं, ऐसा यह कौन-सा लोक है?' इसी चिन्तामें डूबे हुए मार्कण्डेयजी खड़े रहे ॥ २१ ॥

अपश्यच्चापि पुरुषं शयानं पर्वतोपमम् ।
तोयाढ्यमिव जीमूतं मध्ये मग्नं महार्णवे ॥ २२ ॥

वहाँ उन्होंने महासागरके मध्यमें मग्न होकर सोये हुए एक पर्वताकार पुरुषको भी देखा, जो सजल जलधरके समान जान पड़ता था ॥ २२ ॥

तपन्तमिव तेजोभीर्भासन्तंमिव वर्चसा ।
जाग्रन्तमिव गाम्भीर्यादुच्छ्वसन्तमिव पन्नगम् ॥ २३ ॥

वह पुरुष अपने तेजसे तप-सा रहा था । अपनी दीप्तिसे उद्भासित-सा होता था । गम्भीरताके कारण जागता-सा जान पड़ता था और सर्पके समान उच्छ्वास ले रहा था ॥ २३ ॥

स देवं प्रष्टुमायाति को भवानिति विस्मयात् ।
तथैव च शनैर्भूयो मुनिः कुक्षिं प्रवेशितः ॥ २४ ॥

वे मुनि आश्चर्यसे चकित होकर ज्यों ही भगवान्‌के पास यह पूछनेके लिये आये कि आप कौन हैं ? त्यों ही फिर धीरेसे भगवान्‌के उदरमें पहुँचा दिये गये ॥ २४ ॥

स प्रविष्टः पुनः कुक्षौ मार्कण्डेयः सुनिभ्रितः ।
तथैव चरते भूयो विजानन् स्वप्नदर्शनम् ॥ २५ ॥

पुनः उनकी कुक्षिमें प्रवेश करनेपर मार्कण्डेयजी सुस्थिर हुए । वे एकार्णवकी घटनाको स्वप्नदर्शन समझते हुए फिर इधर-उधर विचरने लगे ॥ २५ ॥

स तथैव यथापूर्वं पृथिवीमटते पुनः ।
पुण्यतीर्थानि पूतानि निरैक्षद् दिवि भूतले ॥ २६ ॥

वे पहलेकी ही भाँति पृथिवीपर घूमने और भूतल तथा स्वर्गके पवित्र पुण्यतीर्थोंका दर्शन करने लगे ॥ २६ ॥

ऋतुभिर्यजमानांश्च समाप्तवरदक्षिणैः ।
पश्यते देवकुक्षिस्थान् यज्ञियाञ्छतशो द्विजान् ॥ २७ ॥

उन्होंने भगवान्‌के उदरमें स्थित हुए सैकड़ों यज्ञ-सम्बन्धी ब्राह्मणों और उत्तम दक्षिणाके साथ समाप्त होनेवाले यज्ञोंके अनुष्ठानमें लगे हुए यजमानोंको देखा ॥ २७ ॥

सद्वृत्तमाश्रिताः सर्वे वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः ।
चत्वारश्चाश्रमाः सम्यग् यथोद्दिष्टपदानुगाः ॥ २८ ॥

ब्राह्मण आदि सभी वर्णोंके लोग सदाचारका पालन करते थे । ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रम उत्तम रीतिसे शास्त्रोक्त मर्यादाका अनुसरण करते थे ॥ २८ ॥

वर्षाणां शतसाहस्रं मार्कण्डेयो महामुनिः ।
विचरन् पृथिवीं कृत्स्नां न च कुक्ष्यन्तमैक्षत ॥ २९ ॥

महामुनि मार्कण्डेय एक लाख वर्षोंतक सारी पृथ्वीपर विचरते रहे, परंतु कहीं भी उन्हें भगवान्‌के उदरका अन्त नहीं दिखायी दिया ॥ २९ ॥

ततः कदाचिदथ वै पुनर्वक्त्राद् विनिःसृतः ।
सुप्तं न्यग्रोधशाखायां बालमेकं निरीक्षते ॥ ३० ॥
यथा चैकार्णवजले नीहारेण वृतान्तरे ।
अव्यक्तभीषणे लोके सर्वभूतविवर्जिते ॥ ३१ ॥

तदनन्तर किसी दिन वे फिर भगवान्‌के मुखसे बाहर निकल गये । वहाँ अव्यक्त एवं भीषण जगत्‌में जहाँ समस्त प्राणियोंका अभाव था, उन्होंने एकार्णवके जलमें, जिसका भीतरी भाग कुहरेसे घिरा हुआ था, वरगदकी शाखापर एक बालकको सोते देखा ॥ ३०-३१ ॥

स भूयो विस्मयाविष्टः कौतूहलसमन्वितः ।
बालमादित्यसंकाशं न शक्नोत्युपसर्पितुम् ॥ ३२ ॥

फिर वे आश्चर्यचकित और कौतूहलयुक्त होकर खड़े रह गये । उस सूर्यके समान तेजस्वी बालकके पास न जा सके ॥ ३२ ॥

सोऽचिन्तयदथैकान्ते स्थित्वा सलिलसंनिधौ ।
पूर्वदृष्टमिदं नेति शङ्कितो देवमायया ॥ ३३ ॥

उन्होंने जलके समीप एकान्तमें खड़े होकर सोचा कि—मैंने पहले कभी ऐसा आश्चर्य नहीं देखा था; यह विचार आते ही वे देवमायाके प्रभावसे शङ्कित हो गये ॥ ३३ ॥

अगाधे सलिलस्तम्भे मार्कण्डेयः प्लवन् मुनिः ।
न शान्तिं लभते तत्र श्रमात् संत्रस्तविक्लवः ॥ ३४ ॥

अगाध एवं सुस्थिर जलवाले एकार्णवमें तैरते हुए मार्कण्डेय मुनि श्रमसे भयभीत हो रहे थे, उन्हें वहाँ तनिक भी शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ३४ ॥

तथैव भगवान् हंसो गतो योगेन बालताम् ।
बभाषे मेघतुल्येन स्वरेण पुरुषोत्तमः ॥ ३५ ॥

इतनेहीमें योगसे बालकरूप हुए हंसस्वरूप भगवान् पुरुषोत्तमने मेघके समान गम्भीर स्वरमें कहा ॥ ३५ ॥

भविष्यपर्व ] दशमोऽध्यायः [ ७७३

श्रीभगवानुवाच मा भैर्वत्स न भेतव्यमिहैवायाहि चान्तिकम् ।
मार्कण्डेय मुने धीर बालस्त्वं श्रमपीडितः ॥ ३६ ॥

श्रीभगवान् बोले— बेटा ! डरो मत ! डरनेकी आवश्यकता नहीं है; यहीं मेरे निकट चले आओ ! धीर मुनि मार्कण्डेय ! तुम बालक हो, अतः श्रमसे पीड़ित हो रहे हो ॥ ३६ ॥

मार्कण्डेय उवाच को मां नाम्ना कीर्तयंते तपः परिभवन् मम ।
बहुवर्षसहस्रायुर्घर्षयंश्चैव मे वयः ॥ ३७ ॥

मार्कण्डेयजीने कहा— कौन मेरी तपस्या तथा अनेक सहस्र वर्षोंकी आयुवाली अवस्थाका तिरस्कार करता हुआ मुझे नाम लेकर पुकार रहा है ॥ ३७ ॥

न ह्येष समुदाचारो देवेष्वपि समाहितः ।
मां ब्रह्मापि स विश्वेशो दीर्घायुरिति भाषते ॥ ३८ ॥

देवताओंके यहाँ भी यह आचार प्रचलित नहीं है, साक्षात् लोकनाथ ब्रह्माजी भी मुझे दीर्घायु कहते हैं (मेरा नाम नहीं लेते हैं) ॥ ३८ ॥

कस्तपो घोरशिरसो ममाद्य त्यक्तजीवितः ।
मार्कण्डेयेति मां प्रोक्त्वा मृत्युमीक्षितुमिच्छति ॥ ३९ ॥

किसने अपने जीवनका मोह त्याग दिया है, जो आज मुझ घोरशिराके तपका तिरस्कार करता हुआ मुझे मार्कण्डेय कहकर अपनी मौत देखना चाहता है ॥ ३९ ॥

वैशम्पायन उवाच एवमाभाषते क्रोधान्मार्कण्डेयो महामुनिः ।
अथैनं भगवान् भूयो बभाषे तत्परायणम् ॥ ४० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! जब महामुनि मार्कण्डेय क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोल रहे थे, उस समय भगवान्‌ने पुनः अपने शरणागत भक्त इन महर्षिसे यों कहा ॥ ४० ॥

श्रीभगवानुवाच अहं ते जनको वत्स हृषीकेशः पिता गुरुः ।
आयुःप्रदाता पौराणः किमर्थं नोपसर्पसि ॥ ४१ ॥

श्रीभगवान् बोले— वत्स ! मैं तुम्हें जन्म देनेवाला तुम्हारा पिता और गुरु हृषीकेश हूँ । तुम्हें दीर्घायु प्रदान करनेवाला पुरातन पुरुष मैं ही हूँ । तुम मेरे पास क्यों नहीं आते हो ॥ ४१ ॥

मां पुत्रकामः प्रथमं पिता ते ह्यङ्गिरा मुनिः ।
पूर्वमाराधयामास तपस्तीव्रमुपाश्रितः ॥ ४२ ॥

पूर्वकालमें पुत्रकी इच्छावाले तुम्हारे पिता अङ्गिरा मुनिने तीव्र तपस्याका आश्रय लेकर सर्वप्रथम मेरी ही आराधना की थी ॥ ४२ ॥

ततस्त्यां घोरशिरसं दहनोपमतेजसम् ।
दत्तवानहमात्मेष्टं महर्षिममितायुषम् ॥ ४३ ॥

तब मैंने अग्नि-तुल्य तेजस्वी अपरिमित आयुवाले, अपने परम प्रिय, महर्षि तुझ घोरशिराको उन्हें पुत्ररूपमें प्रदान किया ॥ ४३ ॥

तन्न नोत्सहते चान्यो यो न भूतो ममात्मकः ।
द्रष्टुमेकार्णवगतं क्रीडन्तं योगधर्मिणम् ॥ ४४ ॥

ऐसी स्थितिमें जो मुझसे अभिन्न नहीं हुआ है, वह दूसरा कोई भूत अचेतन होनेके कारण एकार्णवमें रहकर क्रीड़ा करनेवाले मुझ योगधर्मी परमात्माका दर्शन करनेका साहस नहीं कर सकता ॥ ४४ ॥

वैशम्पायन उवाच ततः प्रसन्नवदनो विस्मयोत्फुल्लोचनः ।
मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिपुटो मार्कण्डेयो महातपाः ॥ ४५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! यह सुनकर महातपस्वी मार्कण्डेयके मुखपर प्रसन्नता छा गयी, उनके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे, उन्होंने मस्तकपर दोनों हाथ जोड़ लिये ॥ ४५ ॥

नामगोत्रं ततः श्रुत्वा दीर्घायुर्लोकपूजितः ।
अथाकरोन्नमस्कारं प्रणतः शिरसा प्रभुम् ॥ ४६ ॥

उन लोकपूजित दीर्घायु महर्षिने भगवान्‌के मुखसे अपने नाम और गोत्रको सुनकर उनके चरणोंमें सिर झुका दिया और प्रणतभावसे नमस्कार किया ॥ ४६ ॥

मार्कण्डेय उवाच इच्छेऽहं तत्त्वतो मायामिमां ज्ञातुं तवानघ ।
यदेकार्णवमध्यस्थः शेषे त्वं बालरूपवान् ॥ ४७ ॥

मार्कण्डेय बोले— अनघ ! आप इस एकार्णवके मध्यमें जो बालकरूप धारण करके शयन कर रहे हैं, आपकी इस मायाको मैं ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ ॥ ४७ ॥

किंसंज्ञः कश्च भगवाँल्लोके विज्ञायसेऽनघ ।
तर्कये त्वां महाभूतं न भूतमिह तिष्ठति ॥ ४८ ॥

निष्पाप परमेश्वर ! सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश और श्रीसे सम्पन्न आप कौन हैं ? और किस नामसे लोकमें जाने जाते हैं ? मैं अनुमान करता हूँ कि आप कोई महान् भूत हैं, क्योंकि कोई साधारण भूत यहाँ नहीं ठहर सकता ॥ ४८ ॥

श्रीभगवानुवाच अहं नारायणो ब्रह्मा सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।
सर्वभूतोद्भवकरः सर्वभूतविनाशनः ॥ ४९ ॥

७७४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे

श्रीभगवान् बोले—मुने ! मैं नारायण, समस्त देहधारियोंकी उत्पत्तिका कारणभूत ब्रह्मा, सम्पूर्ण भूतोंका उद्भव करनेवाला तथा समस्त भूतोंका संहार करनेमें समर्थ (रुद्र) हूँ ॥ ४९ ॥

अहमैन्द्रे पदे शक्र ऋतूनामपि वत्सरः।
अहं युगे युगाक्षश्च युगस्यावर्त एव च ॥ ५० ॥

मैं ही शक्र नामसे प्रसिद्ध होकर इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुआ हूँ। मैं ही ऋतुओंका स्वामी संवत्सर हूँ। मैं ही प्रत्येक युगमें युगाक्ष और युगावर्त कहलाता हूँ ॥ ५० ॥

अहं सर्वाणि सत्त्वानि दैवतान्यखिलानि च।
भुजगानामहं शेषस्तार्क्ष्योऽहं सर्वपक्षिणाम् ॥ ५१ ॥

मैं ही सम्पूर्ण प्राणी और समस्त देवता, सर्पोंमें शेष तथा सारे पक्षियोंमें गरुड़ भी मैं ही हूँ ॥ ५१ ॥

अहं सहस्रशीर्षा द्यौर्यः पादैरभिसंवृतः।
आदित्यो यज्ञपुरुषो देवो यज्ञमयो मखः।
अहमग्निर्हव्यवाहो यादसां पतिरव्ययः ॥ ५२ ॥

मैं सहस्रों मस्तकोंसे युक्त विराट् पुरुष हूँ। मैं ही वह आकाश या स्वर्ग हूँ, जो मेरे चरणचिह्नोंसे व्याप्त है। मैं ही सूर्यदेव, यज्ञपुरुष तथा तपोयज्ञ, योगयज्ञ आदि अनेक प्रकारके यज्ञोंसे सम्पन्न होनेवाला मख (महायज्ञ) भी मैं ही हूँ। मैं ही देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाला अग्निदेव हूँ। जल-जन्तुओंका पालक अविनाशी वरुण भी मैं ही हूँ ॥ ५२ ॥

यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम्।
बहुजन्मनिरुद्धात्मा ब्राह्मणो यतिरुच्यते ॥ ५३ ॥

भूमण्डलमें स्वधर्मानुष्ठानरूप तपसे विशुद्ध अन्तःकरण-वाले पुरुषोंमेंसे जो अनेक जन्मोंतक चित्तवृत्तियोंका निरोध-रूप योग साधनेवाला ब्रह्मवेत्ता संन्यासी है, वह जिस ब्रह्म-का स्वरूप बताया जाता है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ ॥ ५३ ॥

ज्ञानवान् दृष्टविश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः।
कृतान्तः सर्वभूतानां विक्षेपां कालसंज्ञितः ॥ ५४ ॥

जिसने विश्वात्माका साक्षात्कार कर लिया है, वह ज्ञानी मैं ही हूँ। मैं ही योगियोंमें परम योगवेत्ता हूँ। मैं ही समस्त प्राणियोंका अन्त करनेवाला कृतान्त एवं समस्त लोकोंका काल हूँ ॥ ५४ ॥

अहं कर्म क्रिया जीवः सर्वेषां धर्मदर्शनः।
निष्क्रियः सर्वभूतेषु स्वात्मज्योतिः सनातनः ॥ ५५ ॥

मैं ही कर्म, क्रिया, जीव और सबको धर्मके स्वरूप या फलका दर्शन करानेवाला हूँ। मैं ही समस्त प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित, निष्क्रिय (साक्षी) आत्मज्योतिसे प्रकाशित सनातन परमात्मा हूँ ॥ ५५ ॥

प्रधानं पुरुषो देवोऽहमाद्यस्त्वक्षयोऽव्ययः।
अहं धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिवासिनाम् ॥ ५६ ॥

मैं ही प्रकृति, पुरुष और देवता हूँ। मैं ही सबका आदिकारण, अक्षय एवं अव्यय परमेश्वर हूँ। मैं ही सम्पूर्ण आश्रमोंमें निवास करनेवाले पुरुषोंका धर्म और तप हूँ ॥ ५६ ॥

अहं हयशिरो देवः क्षीरोदे यो महार्णवे।
ऋतं सत्यं च परममहमेकः प्रजापतिः ॥ ५७ ॥

मैं ही भगवान् हयग्रीव हूँ। जिन्होंने महान् क्षीरसागरमें प्रकट हो वेदोंकी रक्षा की थी। ऋत और परम सत्य भी मैं ही हूँ। एकमात्र मैं ही प्रजापति हूँ ॥ ५७ ॥

अहं सांख्यमहं योगमहं तत्परमं पदम्।
अहमिज्यो भवश्चाहमहं विद्याधिपः स्मृतः ॥ ५८ ॥

मैं ही सांख्य, मैं ही योग और मैं ही परमपद हूँ। मैं ही पूजनीय, मैं ही भव (शिव) और मैं ही विद्याओंका अधिपति हूँ ॥ ५८ ॥

अहं ज्योतिरहं वायुरहं भूमिरहं नभः।
अहमापः समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशो दश।
अहं वर्षमहं सोमः पर्जन्योऽहमहं रविः ॥ ५९ ॥

मैं ही अग्नि, मैं ही वायु, मैं ही भूमि और मैं ही आकाश हूँ। जल, समुद्र, नक्षत्र और दसों दिशाएँ भी मैं ही हूँ। मैं ही वर्षा, मैं ही सोम, मैं ही मेघ और मैं ही सूर्य हूँ ॥ ५९ ॥

क्षीरोदः सागरश्चाहं समुद्रो वडवामुखः।
वह्निः संवर्तको भूत्वा पिवंस्तोयमयं हविः ॥ ६० ॥

मैं ही क्षीरसागर समुद्र और बड़वामुख अग्नि हूँ। मैं ही संवर्तक अग्नि होकर जगत्के जलरूपी हविष्यको पी लेता हूँ ॥ ६० ॥

अहं पुराणं परमं तथैवेह परायणम्।
अहं भूतस्य भव्यस्य वर्तमानस्य सम्भवः ॥ ६१ ॥

मैं ही परम पुरातन ब्रह्म हूँ। मैं ही यहाँ सबका परम आश्रय हूँ। मैं ही भूत, भविष्य और वर्तमान जगत्की उत्पत्तिका कारण हूँ ॥ ६१ ॥

यत्किञ्चित् पश्यसे चैव यच्छृणोषि च किंचन।
यच्चानुभवसे लोके तत् सर्वं मामकं स्मृतम् ॥ ६२ ॥

तुम इस लोकमें जो कुछ देखते, जो कुछ सुनते और जो कुछ अनुभव करते हो, वह सब मेरा ही स्वरूप माना गया है ॥ ६२ ॥

विश्वं सृष्टं मया पूर्वं सृजेयं चाद्य पश्य माम्।
युगे युगे च स्रक्ष्यामि मार्कण्डेयाखिलं जगत् ॥ ६३ ॥

पूर्वकालमें मैंने ही विश्वकी सृष्टि की थी और आज भी

भविष्यपर्व ] एकादशोऽध्यायः ७७५

मैं ही सृष्टि करूँगा। तुम मुझे देखो। मार्कण्डेय ! प्रत्येक युग (कल्प) में सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि मैं ही करूँगा ॥

तदेतदखिलं सर्वं मार्कण्डेयावधारय ।
शुश्रूषुर्मम धर्मेप्सुः कुक्षौ चर सुखी भव ॥ ६४ ॥
मार्कण्डेय ! यह सारा जगत् सम्पूर्णरूपसे मेरा ही स्वरूप है—ऐसा समझो । अब तुम धर्मोपदेश सुननेकी इच्छा रखकर मेरे धर्मकी प्राप्तिके लिये उत्सुक हो मेरे उदरमें विचरण करो और सुखी हो जाओ ॥ ६४ ॥

मम ब्रह्मा शरीरस्थो देवाश्च ऋषिभिः सह ।
व्यक्तमव्यक्तयोगं मामवगच्छापराजितम् ॥ ६५ ॥
ब्रह्माजी मेरे ही शरीरमें स्थित हैं। ऋषियोंसहित देवता भी मेरी देहमें ही हैं। तुम मुझे व्यक्त जगत्स्वरूप, अव्यक्त योगरूप परमात्मा तथा किसीसे भी पराजित न होनेवाला विष्णु समझो ॥ ६५ ॥

अहमेकाक्षरो मन्त्रस्त्र्यक्षरश्चैव सर्वशः ।
त्रिपदश्चैव परस्त्रिवर्गार्थनिदर्शनः ॥ ६६ ॥
मैं एकाक्षर मन्त्र अकार, त्र्यक्षर मन्त्र प्रणव तथा त्रिपद मन्त्र गायत्री हूँ। तथा मैं ही धर्म, अर्थ एवं कामरूप त्रिवर्गकी प्राप्ति करानेवाला (और मोक्षकी भी) प्राप्ति करानेवाला परमात्मा हूँ ॥ ६६ ॥

वक्त्रे व्याहृतवानाशु मार्कण्डेयं महामुनिम् ।
प्रवेशयामास ततो जठरं विश्वरूपधृक् ॥ ६७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! इस प्रकार महामुनि व्यासने इस वेदान्तप्रसिद्ध परमतत्त्वका पुराणोंमें वर्णन किया है । विश्वरूपधारी भगवान् बालमुकुन्दने महामुनि मार्कण्डेयको अपने मुखमें डालनेके लिये उन्हें शीघ्र ही अपने पास बुलाया और उन्हें अपने उदरमें घुसा दिया ॥ ६७ ॥

ततो भगवतः कुक्षिं प्रविष्टो मुनिसत्तमः ।
रराम सुखमासाद्य शुश्रूषुर्हंसमव्ययम् ॥ ६८ ॥
तत्पश्चात् भगवान्के उदरमें प्रविष्ट हुए मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय हंसस्वरूप अविनाशी परमात्माकी आराधनाके लिये उत्सुक हो सुखपूर्वक विचरने लगे ॥ ६८ ॥

तदक्षरं विविधमथाश्रितो वपु-
र्महार्णवे व्यपगतचन्द्रभास्करे ।
शनैश्चरन्प्रभुरपि हंससंज्ञितो-
ऽसृजज्जगद्विसृजति कालपर्यये ॥ ६९ ॥
चन्द्रमा और सूर्यसे रहित उस एकार्णवमें अनेक प्रकारके स्वरूपका आश्रय लेनेवाले हंस-नामधारी भगवान्, जो अक्षरब्रह्मरूप हैं, धीरे-धीरे विचरने लगे । फिर सृष्टिकाल आनेपर उन्होंने ही जगत्की सृष्टि की तथा सदा ही विविध भौतिक वस्तुओंकी वे सृष्टि करते रहते हैं ॥ ६९ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमेतत् पुराणेषु वेदान्ते च महामुनिः ।

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे मार्कण्डेयकर्तृकभगवद्दर्शने दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावके प्रसंगमें मार्कण्डेयजीको भगवान्का दर्शनविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥


एकादशोऽध्यायः

परमात्माके द्वारा भूतोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीको प्रकट करनेके लिये उनकी नाभिसे एक महान् पद्मका प्रादुर्भाव

वैशम्पायन उवाच

आपवः स विभुर्भूत्वा कारयामास वै तपः ।
छादयित्वाऽऽत्मनो देहमात्मना कुम्भसम्भवः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! वे हंससंज्ञक परमात्मा कुम्भयोनि ब्रह्मर्षि वसिष्ठ होकर अपनी कुम्भजनित देहको अपने आत्मा (समष्टिके अभिमानी चेतन) से आच्छादित करके तपस्या करने लगे ॥ १ ॥

ततो महात्मातिबलो मतिं लोकस्य सर्जने ।
महतां पञ्चभूतानां विश्वभूतो व्यचिन्तयत् ॥ २ ॥
उस समय उन अत्यन्त शक्तिशाली विश्वरूप महात्माने भौतिक जगत् तथा उसके उपादानभूत पञ्चमहाभूतोंकी सृष्टिका विचार किया ॥ २ ॥

तस्य चिन्तयतस्तत्र तपसा भावितात्मनः ।
निराकाशे तोयमये सूक्ष्मे जगति गह्वरे ॥ ३ ॥
ईषत्संक्षोभयामास सोऽर्णवं सलिले स्थितः ।
सोऽनन्तरोर्मिणा सूक्ष्ममथ च्छिद्रमभूत्तदा ॥ ४ ॥
आकाशरहित जलस्वरूप सूक्ष्म गुफामें जगत्के लीन हो जानेपर वहाँ उस समय तपस्यासे भावित अन्तःकरणवाले वे परमेश्वर जब इस प्रकार चिन्तन कर रहे थे, तब सलिल-राशिमें स्थित हुए उन्होंने उस एकार्णवमें कुछ क्षोभ (हलचल) उत्पन्न कर दिया । तदनन्तर उनके मनमें जो सृष्टि-विषयक संकल्पकी दूसरी तरंग उठी, उससे उस जलमें सूक्ष्म छिद्र (आकाश या अवकाश) प्रकट हो गया ३-४

तत्र शब्दगतिर्भूत्वा मारुतद्रवसम्भवः ।
स लब्ध्वाऽऽन्तरमक्षोभ्यो व्यवर्धत समीरणः ॥ ५ ॥

७७६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तदनन्तर जो संकल्पकी पुनः तीसरी तरंग उठी, उससे उस आकाशमें शब्दकी गति हुई अर्थात् वे ईश्वर ही वहाँ शब्दरूपसे गतिशील हुए। उनके इस प्रकार गतिशील होनेमें वायुका वेग ही कारण था। यदि कहें उस समय वहाँ वायु कहाँ थी तो इसका उत्तर सुनो—वे ईश्वर वह छिद्र या अवकाश पाते ही अक्षोभ्य होकर भी स्वयं वायुरूपमें प्रकट हो वहाँ बढ़ने लगे (तात्पर्य यह है कि आकाशके अनन्तर उत्पन्न हुई वायु शब्द और गतिकी अभिव्यक्तिमें कारण हुई) ॥ ५ ॥

विवर्धता बलवता तेन संक्षोभितोऽर्णवः। अन्योन्यवेगाभिहता ममन्थुश्चोर्मयो भृशम् ॥ ६ ॥

उस बढ़ती हुई प्रबल वायुसे वह एकार्णवका जल सब ओरसे क्षुब्ध हो उठा। उसमें बहुत-सी तरंगें उठकर परस्पर वेगसे टकराती हुई उस महासागरको मथने लगीं ॥ ६ ॥

महार्णवस्य क्षुब्धस्य तस्मिन् नम्भसि मध्यति। कृष्णवर्त्मा समभवत् प्रभुर्वैश्वानरोऽर्चिमान् ॥ ७ ॥

उस क्षुब्ध महासागरका जल जब इस प्रकार मथा जाने लगा, तब उससे ज्वालामालाओंसे युक्त शक्तिशाली कृष्णवर्त्मा अग्निका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ७ ॥

तत्र संशोषयामास पावकः सलिलं बहु। क्षयाज्जलनिधेश्छिद्रमभवन्निःसृतं नभः ॥ ८ ॥

उस अग्निने वहाँ फैली हुई अगाध जलराशिको सोख लिया। उस जलराशिके क्षीण हो जानेसे वहाँका स्थान खाली हो गया और आकाश निकल आया ॥ ८ ॥

आत्मतेजोद्भवाः पुण्या आपोऽमृतरसोपमाः। आकाशं छिद्रसम्भूतं वायुराकाशसम्भवः ॥ ९ ॥

अमृतरसके समान मधुर एवं पवित्र जल परमात्माके तेजसे प्रकट हुआ है। उस जलमें जो छिद्र प्रकट हुआ, उससे आकाशका आविर्भाव हुआ और आकाशसे वायुकी उत्पत्ति हुई ॥ ९ ॥

आज्यसंघर्षणोद्भूतं पावकं चाज्यसम्भवम्। दृष्ट्वा प्रीतियुतो देवो महाभूतादिभावनः ॥ १० ॥

घीके समान द्रवस्वरूप जो जल है, उसके पारस्परिक संघर्षसे पृथ्वीका प्रादुर्भाव हुआ। उस पृथ्वी या पार्थिव शरीरमें जठरानलका प्राकट्य हुआ, जो परम्परया जलसे ही उत्पन्न है। उसे देखकर महाभूतोंके आदिकारण परमात्मदेव बहुत प्रसन्न हुए ॥ १० ॥

दृष्ट्वा भूतानि भगवाँल्लोकसृष्ट्यर्थतत्त्ववित्। ब्रह्मणो जन्म स हितं बहुरूपो विचिन्वति ॥ ११ ॥

लोकसृष्टिके प्रयोजन और तत्त्वको जाननेवाले अनेक रूपधारी वे भगवान् प्रत्येक कल्पमें इस प्रकार भूतोंका प्राकट्य देखकर सृष्टि-विस्तारके लिये हितकर ब्रह्माजीके जन्मका चिन्तन करते हैं (अर्थात् मानसिक संकल्पसे ब्रह्माजीको उत्पन्न करते हैं) ॥ ११ ॥

चतुर्युगादिसंख्यान्ते सहस्रयुगपर्यये। यत्पृथिव्यां द्विजेन्द्राणां तपसा भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥ बहुजन्मनिरुद्धात्मा ब्राह्मणो यतिरुत्तमः। ज्ञानवान् दृष्टविश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः ॥ १३ ॥

एक सहस्र चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है (और इसी दिनसे वे सौ वर्षोंतक जीवित रहते हैं)। वे ब्रह्मा पूर्वकल्पमें इस पृथ्वीपर तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले द्विजराजोंमें श्रेष्ठ, ब्रह्मके उपासक, यत्नशील, अनेक जन्मोंतक चित्त-वृत्तियोंका निरोध करनेवाले, ज्ञानवान्, विश्वात्माका साक्षात्कार करनेवाले और योगियोंमें सर्वश्रेष्ठ योगवेत्ता रहे होते हैं ॥ १२-१३ ॥

तं योगवन्तं विश्वेशं सम्पूर्णैश्वर्यविक्रमम्। देवो ब्रह्मणि विश्वे च नियोजयति योगवित् ॥ १४ ॥

योगवेत्ता विश्वेश्वरदेव उन योगवान्, सबके लिये उपास्य तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्य और विक्रमसे सम्पन्न ब्रह्माजीको वेद और जगत्की परम्परा बनाये रखनेके कार्यमें नियुक्त करते हैं॥

ततस्तस्मिन् महातोये हविषो हरिरच्युतः। स्वपन् क्रीडंश्च विविधं मोदते चैष पावकिः ॥ १५ ॥

ब्रह्माजीको नियुक्त करनेके अनन्तर भगवान् श्रीहरि अपने स्वरूपभूत उस महान् जलमें अच्युतरूपसे स्थित होते हैं और ये नियुक्त हुए तैजस ब्रह्मा प्राणियोंके कर्मवश उनके कर्मोंसे उपरत होनेपर सोते तथा सबके कर्मोंके उद्भव होनेपर नाना प्रकारसे क्रीडाएँ करते हुए आनन्दमग्न होते हैं ॥१५॥

पद्मं नाभ्युद्भवं चैकं समुत्पादितवांस्तदा। सहस्रपत्रं विरजो भास्कराभं हिरण्मयम् ॥ १६ ॥

उस समय जब कि ब्रह्माके जन्मका समय उपस्थित हुआ था, भगवान् श्रीहरिने अपनी नाभिसे एक सहस्रदल कमल प्रकट किया, जो रजोगुण या रजसे रहित सूर्यके समान तेजस्वी तथा सुवर्णमय था ॥ १६ ॥

हुताशनज्वलितशिखोज्ज्वलप्रभं सुगन्धिनं शरदमलार्कतेजसम्। विराजते कमलमुदारवर्चसं महात्मनस्तनुरुहचारुदर्शनम् ॥ १७ ॥

महात्मा श्रीहरिके शरीरसे प्रकट हो अत्यन्त मनोहर

भविष्यपर्व ] द्वादशोऽध्यायः [ ७७७


दिखायी देनेवाला वह अतिशय कान्तिमान्, सुगन्धित कमल बड़ी शोभा पा रहा था । वह आगकी प्रज्वलित शिखाके समान अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित हो रहा था । उसका तेज शरत्कालके निर्मल सूर्यकी भाँति उद्भासित होता था ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे महापद्मोत्पत्तौ एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावके प्रसङ्गमें महापद्मकी उत्पत्तिविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥


द्वादशोऽध्यायः

नारायणके नाभिकमलके दलोंमें समस्त लोकोंकी कल्पना

वैशम्पायन उवाच

अथ योगविदां श्रेष्ठं सर्वभूतमनोमयम् ।
स्रष्टारं सर्वभूतानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम् ॥ १ ॥
तस्मिन् हिरण्मये पद्मे बहुयोजनविस्तृते ।
सर्वतेजोगुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्युते ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर आपस्वरूप परमात्माने अनेक योजन विस्तृत, सम्पूर्ण तेजोगुणोंसे सम्पन्न और पार्थिव लक्षणोंसे युक्त उस हिरण्मय कमलमें योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, सम्पूर्ण भूतोंके मनमें स्थित, सब ओर मुखवाले तथा समस्त प्राणियोंके स्रष्टा ब्रह्माजीको स्थापित कर दिया ॥ १-२ ॥

तच्च पद्मं पुराणाज्ञाः पृथिवीरुहमुत्तमम् ।
नारायणाङ्कसम्भूतं प्रवदन्ति महर्षयः ॥ ३ ॥

पुराणोंके ज्ञाता महर्षिगण पृथ्वी ( शरीर ) से उत्पन्न होनेवाले उस उत्तम कमलको नारायणके अङ्गसे प्रकट हुआ बताते हैं ॥ ३ ॥

या तु पद्मासना देवी पृथिवीं तां प्रचक्षते ।
ये गर्भसाराङ्कुरस्तान् दिव्यान् पर्वतान् विदुः ॥ ४ ॥

वह पद्म जिस देवीका आसन है, उसे पृथ्वी कहते हैं तथा उस कमलके भीतरी भागमें जो पाषाणमय होनेके कारण सुदृढ़ और अङ्कुरकी भाँति ऊँचे उठे हुए भाग हैं, उन्हें दिव्य पर्वत माना गया है ॥ ४ ॥

हिमवन्तं च मेरुं च नीलं निषधमेव च ।
कैलासं मुञ्जवन्तं च तथाद्रिं गन्धमादनम् ॥ ५ ॥
पुण्यं त्रिशिखरं चैव कान्तं मन्दरमेव च ।
उदयं कन्दरं चैव विन्ध्यमस्तं च पर्वतम् ॥ ६ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—हिमवान्, मेरु, नील, निषध, कैलास, मुञ्जवान्, गन्धमादन, पवित्र त्रिकूट, कमनीय मन्दराचल, उदयाचल, कन्दराचल, विन्ध्याचल और अस्ताचल ॥ ५-६ ॥

एते देवगणानां च सिद्धानां च महात्मनाम् ।
आश्रमाः पुण्यशीलानां सर्वकामयुताद्रयः ॥ ७ ॥

ये सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न पर्वत, देवताओं, सिद्धों और पुण्यशील महात्माओंके आश्रम हैं ॥ ७ ॥

एतेषामन्तरो देशो जम्बूद्वीप इति स्मृतः ।
जम्बूद्वीपस्य संख्यानं याज्ञिया यत्र चक्रिरे ॥ ८ ॥

इनके बीचका देश जम्बूद्वीप माना गया है। जहाँ याज्ञिकोंने यज्ञ किया है, उसी प्रदेशको जम्बूद्वीपकी संज्ञा या ख्याति प्राप्त हुई है ॥ ८ ॥

गर्भाद् यत् स्रवते तोयं देवामृतरसोपमम् ।
दिव्यतीर्थशतापाङ्गस्तस्ता दिव्याः सरितः स्मृताः ॥ ९ ॥

उस कमलके गर्भसे जो देवताओंके अमृतरसके समान जल झरता है, उस जलको बहानेवाली दिव्य सरिताएँ मानी गयी हैं। सैकड़ों दिव्य तीर्थ उनके अपाङ्ग हैं ॥ ९ ॥

यान्येतानि तु पद्मस्य केसराणि समन्ततः ।
असंख्याताः पृथिव्यां तु विश्वे ते धातुपर्वताः ॥ १० ॥

उस पद्मके चारों ओर जो ये केसर हैं, वे ही भूमण्डलके सारे धातुपर्वत हैं, जिनकी गणना असम्भव है ॥ १० ॥

यानि पद्मस्य पत्राणि भूरीण्यूर्ध्वं नराधिप ।
ते दुर्गमाः शैलचिता म्लेच्छदेशा विकल्पिताः ॥ ११ ॥

नरेश्वर ! उस कमलके जो बहुत-से उपरी दल हैं, वे ही पर्वतोंसे भरे हुए दुर्गम म्लेच्छ देश कहे गये हैं ॥ ११ ॥

यान्यधः पद्मपत्राणि वासार्थे तानि भागशः ।
दैत्यानामुरगाणां च पातालं तन्महात्मनाम् ॥ १२ ॥

उक्त कमलके जो नीचेके पत्र हैं, वे पृथक्-पृथक् निवासके लिये चुन लिये गये हैं। उन्हींको महामना दैत्यों और सर्पोंका वासस्थान पाताल कहा गया है ॥ १२ ॥

तेषामधोगतं यत्तदुदकेत्यभिसंज्ञितम् ।
महापातकर्म्माणो मज्जन्ते यत्र मानवाः ॥ १३¹ ॥

उन पद्मपत्रोंके नीचे जो उदक नामक स्थान है, उसमें महापातकयुक्त कर्म करनेवाले मनुष्य डूबते हैं ॥ १३ ॥


¹ १. उद् उत्कृष्टं अकं दुःखं यत्र तत् उदकम् ( जहाँ उत्कृष्ट अर्थात् महान् अक-दुःख हैं, वह स्थान उदक है ) —इस व्युत्पत्तिके अनुसार नरकको ही यहाँ उदक कहा गया है ।

५७८श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

पद्मस्यान्ते कुशं यत्तदेकार्णवजलं महत् ।
प्रोक्तास्ते दिक्षु संघाताश्चत्वारो जलसागराः ॥ १४ ॥

उस कमलके अन्तमें चारों ओर जो कुश अर्थात् जल है, वही एकार्णवकी अनन्त जलराशि है। उसके चार भाग चारों दिशाओंमें संचित हैं, जो जलके समुद्र कहे गये हैं ॥ १४ ॥

ऋषेर्नारायणस्यायं महापुष्करसम्भवः ।
प्रादुर्भावोऽप्ययं तस्मान्नाम्ना पुष्करसम्भवः ॥ १५ ॥

नारायण ऋषिकी नाभिसे यह महान् पद्मका प्राकट्य हुआ है, इसीलिये उसके इस प्रादुर्भावको पुष्करसम्भव (पुष्करप्रादुर्भाव) नामसे कहा गया है ॥ १५ ॥

एतस्मात् कारणात् तज्ज्ञैः पुराणैः परमर्षिभिः ।
यज्ञियैर्वेददृष्टार्थैर्यज्ञे पद्मचिती कृतः ॥ १६ ॥

इसी कारणसे उस पद्मको जाननेवाले पुरातन महर्षियोंने, जो यज्ञपरायण तथा वेदार्थके ज्ञाता हैं, यज्ञमें कमलके आकारका कुण्ड निर्माण किया है ॥ १६ ॥

एवं भगवता पद्मे विश्वस्य परमो विधिः ।
पर्वतानां नदीनां च देशानां च विनिर्मितः ॥ १७ ॥

इस प्रकार भगवान्ने उस कमलमें ही विश्वकी व्यावहारिक सृष्टि की है, पर्वतों, नदियों तथा विभिन्न देशोंकी भी रचना की है ॥ १७ ॥

विभुस्तथैवाप्रतिमप्रभावः
प्रभाकरो वै भगवान् महात्मा ।
स्वयं स्वयंभूः शयनेऽसृजत् तदा
जगन्मयं पद्मनिधिं महार्णवे ॥ १८ ॥

अप्रतिम प्रभावशाली, सर्वव्यापी, प्रभापुञ्ज, ऐश्वर्यसम्पन्न, महामना, स्वयम्भू भगवान् नारायणने उस महार्णवके भीतर शयन करते समय स्वयं ही उस जगन्मय पद्मनिधिकी सृष्टि की थी ॥ १८ ॥

इति श्रीमद्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सर्वभूतोत्पत्तौ द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पौष्करप्रादुर्भावके प्रसङ्गमें सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥


त्रयोदशोऽध्यायः

मधु और कैटभका ब्रह्माजीके साथ संवाद तथा भगवान् विष्णुके द्वारा वध

वैशम्पायन उवाच

चतुर्युगादिसम्भूतो सहस्रयुगपर्यये ।
विघ्नस्तमसि सम्भूतो मधुर्नाम महासुरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सहस्र युगोंकी ब्रह्माजीकी रात्रि व्यतीत होनेपर चारों युगोंमें जो आदि सत्ययुग आया, उसमें आरम्भ होनेवाली सृष्टिके कार्यमें विघ्नस्वरूप एक महान् असुर उत्पन्न हुआ, जिसका नाम मधु था। वह तमोगुणसे प्रकट हुआ था ॥ १ ॥

तस्यैव च सहायोऽन्यो भूतो रजसि कैटभः ।
तौ रजस्तमसाविष्टौ सम्भूतौ कामरूपिणौ ॥ २ ॥

उसीका सहायक एक दूसरा असुर उत्पन्न हुआ था, जो रजोगुणसे प्रकट हुआ था; उसका नाम कैटभ था। वे दोनों इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे और रजोगुण तथा तमोगुणसे आविष्ट रहते थे ॥ २ ॥

एकार्णवजलं सर्वे क्षोभयन्तौ महासुरौ ।
कृष्णरक्ताम्बरधरौ श्वेतदीप्तोग्रदंष्ट्रिणौ ॥ ३ ॥

सम्पूर्ण एकार्णवके जलमें क्षोभ उत्पन्न करते हुए वे दोनों महान् असुर क्रमशः काले और लाल रंगके वस्त्र धारण करते थे। उनकी भयंकर दाढ़ें सफेद और चमकीली थीं ॥ ३ ॥

उभौ मदकटोद्दग्रौ केयूरवलयोज्ज्वलौ ।
महाविकृतताम्राक्षौ पीनोरस्कौ महाभुजौ ॥ ४ ॥

वे दोनों उत्कट मदसे उद्दण्ड हो रहे थे। बाजू-बंद और कड़े धारण करके उनकी दीप्तिसे दमक रहे थे। उनकी लाल-लाल आँखें बड़ी विकराल थीं। वक्षःस्थल मांससे भरे हुए थे और भुजाएँ लंबी थीं ॥ ४ ॥

महच्छिरःसंहननौ जङ्गमाविव पर्वतौ ।
नीलमेघाभ्रसंकाशावादित्यप्रतिमाननौ ॥ ५ ॥

उनके सिर और शरीर विशाल थे। वे दोनों दो चलते-फिरते पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे। मेघोंकी काली घटाके समान काले दिखायी देते थे। उनके मुख सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥ ५ ॥

विद्युदम्भोधताम्राभ्यां कराभ्यामतिभीषणौ ।
पादसंचारवेगाभ्यामुत्क्षिपन्ताविवार्णवम् ॥ ६ ॥

बिजलीसहित मेघोंके समान ताम्रवर्णवाले दोनों हाथोंसे वे अत्यन्त भीषण दिखायी देते थे। अपने पैरोंके चलनेके वेगसे उस महासागरको उछालते हुए-से जान पड़ते थे ॥ ६ ॥

कम्पयन्ताविव हरिं शयानमरिसूदनम् ।
तौ तत्र विहरन्तौ स्म पुष्करे विद्रवतोमुखम् ॥ ७ ॥