भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 780, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 780

७५८ श्रीमद्भारते खिलभागे [. हरिवंशे


वे वर्तमान कालकी प्रत्यक्ष बातोंपर ही श्रद्धा या विश्वास करनेवाले, शास्त्रज्ञानसे रहित और पाखण्डी होंगे, धर्मकी चर्चा और आचरण दोनों ही उनके लिये आश्चर्यकी वस्तु होंगे (अर्थात् वे धर्मकी चर्चा भी नहीं करेंगे, फिर आचरणकी तो बात ही क्या है?) ॥ १० ॥

तदा विचालते धर्मे जनाः शेषपुरस्कृताः ।
शुभान्येवाचरिष्यन्ति दानसत्यसमन्विताः ॥ ११ ॥

उस समय धर्मके विचलित हो जानेपर लोग भगवत्-स्मरण आदि अवशिष्ट धर्मको सामने रखते हुए दान और सत्यसे संयुक्त हो दया आदि शुभकर्मोंका ही आचरण करेंगे ॥

सर्वभक्षो ह्यसंगुप्तो निर्गुणो निरपत्रपः ।
भविष्यति तदा लोकस्तत् कषायस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥

उस समयके लोग सर्वभक्षी, अजितेन्द्रिय, गुणहीन और निर्लज्ज होंगे, यही कलिकालजनित कषायका लक्षण है ॥ १२ ॥

विप्राणां शाश्वतीं वृत्तिं यदा वर्णावरा जनाः ।
प्रतिपत्स्यन्ति वृत्त्यर्थं तत् कषायस्य लक्षणम् ॥ १३ ॥

जब क्षत्रिय आदि वर्णोंके लोग जीविकाके लिये ब्राह्मणोंकी सनातन वृत्तिको अपना लेंगे, तब वही कलिके कालुष्यका सूचक होगा ॥ १३ ॥

कषायोपप्लवे लोके ज्ञानविद्याप्रणाशने ।
सिद्धिं स्वल्पेन कालेन यास्यन्ति निरुपस्कृताः ॥ १४ ॥

संसारमें कलिकालके कलुषका उपद्रव बढ़ जानेपर जब ज्ञान (शास्त्रीय बोध) और विद्या (आत्मदर्शन) का लोप हो जायगा, तब परिग्रहशून्य हुए मनुष्य केवल त्यागमात्रसे थोड़े ही समयमें सिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर लेंगे ॥ १४ ॥

महायुद्धं महावातं महावर्षे महाभयम् ।
भविष्यति युगे क्षीणे तत् कषायस्य लक्षणम् ॥ १५ ॥

युगान्तकालमें महान् युद्ध, प्रचण्ड आँधी, बड़ी भारी वर्षा और महान् भय उपस्थित होगा, वह कलिकालके कलुषका लक्षण है ॥ १५ ॥

विप्ररूपाणि रक्षांसि राजानः कर्णवेदिनः ।
पृथिवीमुपभोक्ष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ १६ ॥

युगान्तकाल उपस्थित होनेपर यहाँ ब्राह्मणोंके रूपमें राक्षस निवास करेंगे, राजालोग कानोंसे सुनी हुई बातको ही ठीक मानेंगे और चुगलखोरोंके साथ रहकर ही पृथ्वीका उपभोग करेंगे ॥ १६ ॥

निःस्वाध्यायवषट्कारा अनयान्नाभिमानिनः ।
विप्राः क्रव्यादरूपेण सर्वभक्षा वृथाव्रताः ॥ १७ ॥

ब्राह्मण स्वाध्याय और वषट्कारसे दूर हो नीतिशून्य और अभिमानी होकर राक्षसोंके समान सब कुछ भक्षण करेंगे और व्यर्थ (पाखण्डपूर्ण) व्रतका पालन करनेवाले होंगे ॥


मूर्खाः स्वार्थपरा लुब्धाः क्षुद्राः क्षुद्रपरिच्छदाः ।
व्यवहारोपवृत्ताश्च च्युता धर्माच्च शाश्वतात् ॥ १८ ॥

वे मूर्ख, स्वार्थपरायण, लोभी और नीच विचारके होंगे; उनके आश्रित रहनेवाले लोग भी वैसे ही होंगे, वे सनातन धर्मसे भ्रष्ट होकर केवल भोजनाच्छादनादि व्यवहारमें ही तत्पर रहेंगे ॥ १८ ॥

हर्तारः पररत्नानां परदारापहारकाः ।
कामात्मानो दुरात्मानः सोपधाः प्रियसाहसाः ॥ १९ ॥

उस समयके मनुष्य पराये रत्नों और परायी स्त्रियोंका अपहरण करनेवाले होंगे, उन सबके चित्त कामसे कलुषित होंगे, वे दुरात्मा, कपटी और दुःसाहसको पसंद करनेवाले होंगे ॥ १९ ॥

तेषु प्रभवमाणेषु तुल्यशीलेषु सर्वतः ।
अभाविनो भविष्यन्ति मुनयो बहुरूपिणः ॥ २० ॥

एक समान शीलवाले और प्रभुतासे सम्पन्न वे दुष्ट मनुष्य जब सब ओर फैल जायँगे, तब अनेक रूपधारी एवं आत्माके अभावका प्रतिपादन करनेवाले बहुत-से (वैनाशिक मतावलम्बी) मुनि प्रकट हो जायँगे ॥ २० ॥

उत्पन्ना ये कृतयुगे प्रधानपुरुषाश्रयाः ।
कथायोगेन तान् सर्वान् पूजयिष्यन्ति मानवाः ॥ २१ ॥

सत्ययुगमें ईश्वरका आश्रय लेनेवाले जो भक्त पैदा हो गये हैं, उन सबकी कलियुगके मनुष्य कथावार्ताके प्रसङ्गमें पूजा करेंगे (उनके प्रति आदरका भाव प्रकट करेंगे, परंतु स्वयं उनके जैसा आचरण नहीं करेंगे) ॥ २१ ॥

सस्यचौरा भविष्यन्ति तथा चैलापहारिणः ।
भक्ष्यभोज्यापहाराश्च करण्डानां च हारिणः ॥ २२ ॥

कलिकालके मनुष्य खेतोंमें लगी हुई खेतीकी चोरी करेंगे, दूसरोंके वस्त्र चुरा लेंगे, खाने-पीनेकी वस्तुएँ हड़प लेंगे, कंदों अथवा बाँसकी पिटारियोंको भी उड़ा ले जायँगे ॥ २२ ॥

चौराश्चौरस्य हर्तारो हन्ता हन्तुर्भविष्यति ।
चौरैश्चौरक्षये चापि कृते क्षेमं भविष्यति ॥ २३ ॥

उस समयके चोर चोरके घरमें भी चोरी करेंगे, हत्यारेकी भी हत्या करनेवाले पैदा हो जायँगे, इस प्रकार जब चोरोंके द्वारा चोरोंका विनाश कर दिया जायगा, तब जगत्‌का कल्याण होगा ॥ २३ ॥

निःसारे क्षुभिते लोके निष्क्रिये व्यन्तरे स्थिते ।
नराः श्रयिष्यन्ति वनं करभारप्रपीडिताः ॥ २४ ॥

जब सारा संसार निर्धन, संध्यावन्दन आदि सत्कर्मोंसे रहित तथा वर्णभेदसे शून्य हो जायगा, उस समय करोंके भारसे अत्यन्त पीड़ित हुए मनुष्य वनका आश्रय लेंगे ॥ २४ ॥

पितृनाज्ञापयिष्यन्ति पुत्राः कर्मणि सर्वशः ।
स्नुषा श्वश्रूस्तथा चैव युगान्ते प्रत्युपस्थिते ॥ २५ ॥

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