विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 779, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ] | चतुर्थोऽध्यायः | ७५७ |
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अग्निहोत्री मनुष्य भी अग्रग्रास निकाले बिना ही भोजन करेंगे, यति आदिको भिक्षा और देवता आदिके लिये बलि (भोजनका ग्रास या उपहारसामग्री) दिये बिना ही लोग स्वयं भोजन कर लेंगे ॥ ४१ ॥
पतीन् सुप्तान् वञ्चयित्वा गमिष्यन्ति स्त्रियोऽन्यतः।
पुरुषाश्च प्रसुप्तासु भार्यासु च परश्रियम् ॥ ४२ ॥
सोये हुए पतियोंको धोखा देकर स्त्रियाँ दूसरोंके पास चली जायँगी, इसी तरह पुरुष भी अपनी स्त्रियोंके सो जानेपर परायी स्त्रियोंके साथ समागम करेंगे ॥ ४२ ॥
नाप्याधितो नाप्यरुजो जनः सर्वोऽभ्यसूयकः।
न कृतप्रतिकर्ता च युगे क्षीणे भविष्यति ॥ ४३ ॥
उस समय कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं होगा, जो शारीरिक रोग और मानसिक पीड़ासे ग्रस्त न हो, सब लोग दूसरोंके दोष देखनेवाले होंगे। युगान्तकालमें कोई भी उपकारका बदला देनेवाला नहीं होगा ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कलियुगवर्णने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कलियुगका वर्णनविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
कलियुगका वर्णन
जनमेजय उवाच
एवं विलुलिते लोके मनुष्याः केन पालिताः।
निवत्स्यन्ति किमाचाराः किमाहारविहारिणः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**मुने! इस प्रकार अनाचारसे कलङ्कित हुए जगत्में मनुष्य किससे सुरक्षित हो निवास करेंगे? उनके आचार तथा आहार-विहार कैसे होंगे? ॥ १ ॥
किंकर्माणः किमीहन्तः किंप्रमाणाः किमायुषः।
कां च काष्ठां समासाद्य प्रपत्स्यन्ति कृतं युगम् ॥ २ ॥
उनका कर्म क्या होगा? वे कैसी चेष्टा करेंगे? उनके शरीरकी लंबाई या ऊँचाई कितनी होगी? उनकी आयु कितने वर्षोंकी होगी? तथा वे किस सीमातक पहुँचकर सत्ययुग प्राप्त करेंगे? ॥ २ ॥
व्यास उवाच
अत ऊर्ध्वं च्युते धर्मे गुणहीनाः प्रजास्ततः।
शीलव्यसनमासाद्य प्राप्स्यन्ते ह्रासमायुषः ॥ ३ ॥
**व्यासजीने कहा—**जनमेजय! इसके बाद धर्मके नष्ट हो जानेपर गुणहीन हुई सारी प्रजा अपना शील खोकर अल्पायु हो जायगी ॥ ३ ॥
आयुर्हान्या बलग्लानिर्बलग्लान्या विवर्णता।
वैवर्ण्याद् व्याधिसम्पीडा निर्वेदो व्याधिपीडनात् ॥ ४ ॥
आयुकी हानि होनेसे उनका बल क्षीण हो जायगा, बलके क्षीण होनेसे उनकी अङ्गकान्ति फीकी पड़ जायगी, कान्तिमें विकार आनेसे उनके शरीरमें रोगजनित पीड़ा होगी तथा रोगजनित पीड़ासे उनके मनमें निर्वेद (वैराग्यपूर्ण खेद) होगा ॥ ४ ॥
निर्वेदादात्मसम्बोधः सम्बोधाद् धर्मशीलता।
एवं गत्वा परां काष्ठां प्रपत्स्यन्ति कृतं युगम् ॥ ५ ॥
निर्वेदसे उन्हें आत्मबोध प्राप्त होगा, उस बोधसे उनमें धर्मशीलता आयेगी और इस प्रकार धर्मशीलताकी चरम सीमाको पहुँचकर वे सत्ययुग प्राप्त कर लेंगे ॥ ५ ॥
उद्देशतो धर्मशीलाः केचिन्मध्यस्थतां गताः।
विमर्षशीलाः केचित् तु हेतुवादकुतूहलाः ॥ ६ ॥
(कलियुगमे) कुछ लोग लेशमात्र धर्मका पालन करनेवाले होंगे, कुछ लोग धर्मकी ओरसे तटस्थ या उदासीन रहेंगे और कुछ लोग विवेकशील होनेपर भी धर्मके समर्थनमें अच्छी-अच्छी युक्ति देनेके लिये ही उत्सुक रहेंगे, स्वयं उस धर्मका आचरण नहीं करेंगे ॥ ६ ॥
प्रत्यक्षममुमानं च प्रमाणं चेति निश्चिताः।
प्रमाणैकं करिष्यन्ति नेति पण्डितमानिनः ॥ ७ ॥
कुछ लोग दृढ़ निश्चयके साथ केवल प्रत्यक्ष और अनुमानको ही प्रमाण मानेंगे (वेद अथवा शब्दको प्रमाण नहीं मानेंगे); कुछ पण्डितमानी पुरुष एकमात्र प्रत्यक्षको ही प्रमाण मानेंगे, दूसरे किसी प्रमाणको नहीं स्वीकार करेंगे ॥
अप्रमाणं करिष्यन्ति वेदोक्तमपरे जनाः।
तदा मुखभगाश्चैव भविष्यन्ति स्त्रियोऽपराः ॥ ८ ॥
दूसरे लोग वेदोक्त मतको प्रामाणिक नहीं मानेंगे। कलियुगमें कितनी ही स्त्रियाँ मुखसे ही भगका काम लेनेवाली होंगी ॥ ८ ॥
नास्तिक्यपरमास्थापि केचिद् धर्मविलोपकाः।
भविष्यन्ति नरा मूढा मन्दाः पण्डितमानिनः ॥ ९ ॥
कितने ही पण्डितमानी मन्दबुद्धि मूढ़ मानव नास्तिकतामें प्रवृत्त होकर धर्मका लोप करनेवाले होंगे ॥ ९ ॥
तद्भावमात्रे श्रद्धेयाः शास्त्रज्ञानबहिष्कृताः।
दाम्भिकास्ते भविष्यन्ति वादशीलकुतूहलाः ॥ १० ॥