विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 778, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७५६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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और पुरुषार्थसे रहित हो जायँगे ), कलियुगमें प्रायः सभी लोग तृष्णाके कारण सुखसे वञ्चित रहेंगे ॥ २६ ॥
वर्षासु वाताः परुषा नीचाः शर्करवर्षिणः ।
संदिग्धः परलोकश्च भविष्यति युगक्षये ॥ २७ ॥
युगान्तकाल आनेपर वर्षा ऋतुमें वायु रूखी, नीच (दुःखदायक) तथा रेत एवं कंकड़ बरसानेवाली होगी। परलोकके विषयमें सबको संशय बना रहेगा ॥ २७ ॥
आत्मनश्च दुराचारा ब्रह्मद्वेषणतत्पराः ।
आत्मानं बहु मन्यन्ते मन्युरेवाभ्ययाद् द्विजान् ॥ २८ ॥
उस समयके दुराचारी मनुष्य आत्मा और ब्रह्मकी निन्दा करनेमें तत्पर होंगे, वे अपने आपको ही सबसे बढ़कर मानेंगे और ब्राह्मणोंमें क्रोधका ही आवेश होगा ॥ २८ ॥
वैश्याचाराश्च राजन्या धनधान्योपजीविनः ।
युगापक्रमणे सर्वे भविष्यन्ति द्विजातयः ॥ २९ ॥
क्षत्रिय वैश्योंके आचारका पालन करनेवाले तथा धन-धान्यके व्यवसायसे जीविका चलानेवाले होंगे। कलियुगमें धर्ममर्यादाके भङ्ग होनेसे सब लोग द्विज बन जायँगे ॥ २९ ॥
अप्रवृत्ताः प्रपत्स्यन्ते समयाः शपथस्तथा ।
ऋणं सविनयभ्रंशं युगे क्षीणे भविष्यति ॥ ३० ॥
युगान्तकालमें परस्पर की हुई प्रतिज्ञाओं और शपथोंका पालन नहीं होगा, वे यों ही समाप्त हो जायँगी तथा विनयशील सज्जन पुरुष भी ऋण नहीं चुकाना चाहेंगे, फिर दुर्जनोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ३० ॥
भविष्यत्यफलो हर्षः क्रोधश्च सफलो नृणाम् ।
अजाश्चैषोपरोत्स्यन्ते पयसोऽर्थे युगक्षये ॥ ३१ ॥
कलियुगमें मनुष्योंका हर्ष निष्फल और क्रोध सफल होगा। दूधके लिये घरोंमें गौएँ नहीं, बकरियाँ बाँधी जायँगी ॥
अशास्त्रविदुषां पुंसामेवमेव स्वभावतः ।
अप्रमाणं वदिष्यन्ति नीतिं पण्डितमानिनः ॥ ३२ ॥
शास्त्रोंका ज्ञान न रखनेवाले मूढ़ मनुष्योंका यों ही अपनी इच्छाके अनुसार निर्णय होगा (वे अपनी इच्छासे जो कुछ कहेंगे, उसीको शास्त्रसम्मत बतायेंगे), अपनेको पण्डित माननेवाले वे मूर्ख मानव अप्रामाणिक बात कहेंगे और उसे नीतिके अनुकूल बतायेंगे ॥ ३२ ॥
शास्त्रोक्तस्याप्रवक्तारो भविष्यन्ति युगक्षये ।
सर्वे सर्वं हि जानन्ति वृद्धाननुपसेव्य वै ॥ ३३ ॥
युगान्तकालमें शास्त्रोक्त बातको बतानेवाले नहीं रहेंगे, बड़े-बूढ़ोंका सेवन किये बिना ही सब लोग सब कुछ जाननेका दावा करेंगे ॥ ३३ ॥
न कश्चिदकविर्नाम युगान्ते समुपस्थिते ।
न क्षत्राणि नियोक्ष्यन्ते विकर्मस्था द्विजातयः ।
चौरप्रायाश्च राजानो युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ३४ ॥
युगान्त उपस्थित होनेपर कोई भी ऐसा न होगा जो अपनेको कवि (सर्वज्ञ) न मानता हो। ब्राह्मणलोग शास्त्रविपरीत कर्ममें स्थित होनेके कारण क्षत्रियोंको धर्ममें नहीं नियुक्त करेंगे। उस समयके राजा प्रायः चोर होंगे ॥ ३४ ॥
कुण्डावृषा नैकृतिकाः सुरापा ब्रह्मवादिनः ।
अश्वमेधेन यक्ष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ३५ ॥
जनमेजय ! युगान्तकालमें कुण्डा (पतिके जीते-जी जार पुरुषके संयोगसे उत्पन्न की गयी कन्या) में गर्भाधान करनेवाले, कपटी और शराबी मनुष्य ब्रह्मवादी बनकर अश्वमेध यज्ञ करेंगे ॥ ३५ ॥
अयाज्यान् याजयिष्यन्ति तथाभक्ष्यस्य भक्षिणः ।
ब्राह्मणा धनतृष्णार्ता युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३६ ॥
युगान्तकाल उपस्थित होनेपर धनकी तृष्णासे पीड़ित हुए ब्राह्मण यज्ञके अनधिकारियोंसे भी यज्ञ करायेंगे और अभक्ष्य वस्तु (मांस आदि) का भक्षण करेंगे ॥ ३६ ॥
भोशब्दमभिधास्यन्ति न च कश्चित् पठिष्यति ।
एकशङ्खास्तदा नार्यो गवेधुकपिनड्काः ॥ ३७ ॥
सब लोग सबके लिये भो (ऐ ! अरे ! अजी ! इत्यादि) का ही उच्चारण करेंगे, कोई भी पढ़ेगा नहीं, उस समय स्त्रियोंके पास एकमात्र शंखके ही आभूषण होंगे, वे अपनेको गवेधुक नामक तृणविशेषसे अलंकृत करेंगी ॥ ३७ ॥
नक्षत्राणि वियोगीनि विपरीता दिशस्तथा ।
संध्यारागोऽथ दिग्दाहो भविष्यत्यवरे युगे ॥ ३८ ॥
अन्तिम युगमें नक्षत्र शास्त्रोक्त ग्रहसंयोग आदिसे रहित होंगे, दिशाएँ विपरीत प्रतीत होंगी, उनमें संध्याकालके समान लाली छायी रहेगी और वहाँ निरन्तर दाह (जलन या तपन) बना रहेगा ॥ ३८ ॥
पितॄन् पुत्रा नियोक्ष्यन्ति वध्वः श्वश्रूश्च कर्मसु ।
वियोनिषु चरिष्यन्ति प्रमदासु नरास्तथा ॥ ३९ ॥
पुत्र पिताओंको और बहुएँ सासोंको आज्ञा देकर काममें लगायेंगी। मनुष्य पशुयोनि या दूसरे वर्णकी स्त्रियोंके साथ भी समागम करेंगे ॥ ३९ ॥
वाक्छरैस्तर्जयिष्यन्ति गुरुंश्छिष्यास्तथैव च ।
मुखेषु च प्रयोक्ष्यन्ति प्रमत्ताश्च नरास्तदा ॥ ४० ॥
शिष्य गुरुजनोंको वाग्बाणोंसे छेदते हुए उन्हें डाँट बतायेंगे तथा कामोन्मत्त पुरुष मुखोंमें भी मैथुन करेंगे ॥
अकृतान्नाणि भोक्ष्यन्ति नराश्चैवाग्निहोत्रिणः ।
भिक्षां बलिमदत्त्वा च भोक्ष्यन्ति पुरुषाः स्वयम् ॥ ४१ ॥