विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 777, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] तृतीयोऽध्यायः ७५५
उस समय सब लोग ब्रह्मवादी हो जायेंगे (ब्रह्मवादकी आड़ लेकर कर्म-भ्रष्ट हो जायेंगे), दूसरी शाखाओंका लोप हो जानेके कारण सभी अपनेको वाजसनेयी शाखाका बतलायेंगे और शूद्र अपनेसे बड़ोंके सम्मानमें केवल भो (अजी) कहनेवाले होंगे ॥ १३ ॥
तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजातयः।
ऋतवश्च भविष्यन्ति विपरीता युगक्षये ॥ १४ ॥
युगान्तकालमें ब्राह्मणलोग तप और यज्ञके फल बेचनेवाले होंगे। उस समय सभी ऋतुएँ विपरीत स्वभावकी हो जायँगी ॥ १४ ॥
शुक्लदन्ताऽजिताक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः।
शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति शाक्यबुद्धोपजीविनः ॥ १५ ॥
शूद्रलोग शाक्यवंशी बुद्धके मतका आश्रय लेकर (अर्थात् वेददूषक नास्तिक बनकर) वेद-विरोधी धर्मका आचरण करेंगे। वे दाँत सफेद किये रहेंगे, आँखोंमें अञ्जन लगायेंगे और मूँड मुड़ाकर गेरुआ वस्त्र धारण कर लेंगे ॥ १५ ॥
श्वापदप्रचुरत्वं च गवां चैव परिक्षयः।
स्वादूनां विनिवृत्तिश्च विद्यादन्तगते युगे ॥ १६ ॥
अन्तिम युग अर्थात् कलियुगमें कुत्ते, भेड़िये आदि हिंसक प्राणियोंकी अधिकता होगी; गौओंका ह्रास होता चला जायगा और उत्तम रसोंका अभाव हो जायगा ॥ १६ ॥
अन्त्या मध्ये निवत्स्यन्ति मध्याश्चान्तनिवासिनः।
तथा निम्नं प्रजाः सर्वा गमिष्यन्ति युगक्षये ॥ १७ ॥
कलियुगमें अन्त्यज या म्लेच्छ मध्यदेशमें निवास करेंगे और मध्यदेशके निवासी म्लेच्छ देशमें रहने लगेंगे तथा सारी प्रजा नीच मार्गका अनुसरण करने लगेगी ॥ १७ ॥
तथा द्विहायना दम्यास्तथा पल्वलकर्षकाः।
चित्रवर्षी च पर्जन्यो युगे क्षीणे भविष्यति ॥ १८ ॥
युगकी समाप्तिके समय दो वर्षके बछड़े गाड़ी और हलमें जोते जानेके योग्य समझे जायँगे तथा वे ही गड्ढों और तलैयोंकी भूमि जोतेंगे और मेघ विचित्र वर्षा करनेवाला होगा (अर्थात् ऐसी वर्षा होगी कि हलमें जोते हुए बैलका एक सींग भीगेगा और दूसरा सूखा रह जायगा) ॥ १८ ॥
सर्वे चौरकुले जाताश्चोरयानाः परस्परम्।
स्वल्पेनाढ्या भविष्यन्ति यत्किंचित्प्राप्य दुर्गताः ॥ १९ ॥
सभी चोरकुलमें पैदा होंगे और आपसमें एक दूसरेको लूटेंगे। थोड़े धनसे ही धनी हो जायेंगे और थोड़ा-सा ही कष्ट पाकर दुर्गतिमें पड़ जायँगे ॥ १९ ॥
न ते धर्मं करिष्यन्ति मानवा निर्गते युगे।
ऊषार्कबहुला भूमिः पन्थानस्तस्करावृताः ॥ २० ॥
युगकी समाप्तिके समय मनुष्य धर्माचरण नहीं करेंगे, भूमि प्रायः ऊसर हो जायगी और राह-बाट बटमारोंसे घिरे रहेंगे ॥ २० ॥
सर्वे वाणिज्यकाश्चैव भविष्यन्ति कलौ युगे।
पितृदत्तानि देयानि विभजन्ते सुतास्तदा।
हरणाय प्रपत्स्यन्ते लोभानृतविरोधिताः ॥ २१ ॥
कलियुगमें सभी व्यापार करनेवाले होंगे, पिताकी दी हुई देय-वस्तुओं (आभूषणादि) को भी (जो शास्त्रके अनुसार बाँटने योग्य नहीं हैं) पुत्र उस समय आपसमें बाँट लेंगे तथा लोभ और असत्यसे प्रेरित हो विरोधी बनकर लोग दूसरोंकी सम्पत्ति हर लेनेका भी प्रयत्न करेंगे ॥ २१ ॥
सौकुमार्ये तथा रूपे रत्ने चोपक्षयं गते।
भविष्यन्ति युगान्ते च नार्यः केशैरलंकृताः ॥ २२ ॥
कलियुगमें सुकुमारता, रूप तथा सुवर्ण आदि रत्नोंके क्षीण हो जानेके कारण नारियाँ भाँति-भाँतिके सँवारे हुए केशोंसे ही अलंकृत होंगी ॥ २२ ॥
निर्विहारस्य भूतस्य गृहस्थस्य भविष्यति।
युगान्ते समनुप्राप्ते नान्या भार्यासमा गतिः ॥ २३ ॥
युगान्तकाल आनेपर हार, चन्दन, दिव्य आस्तरण आदि भोग-सामग्रीसे रहित हुए गृहस्थके लिये भार्याके समान दूसरी कोई गति नहीं होगी ॥ २३ ॥
कुशीलानार्यभूयिष्ठं वृथारूपसमन्वितम्।
पुरुषाल्पं बहुस्त्रीकं तद् युगान्तस्य लक्षणम् ॥ २४ ॥
जब प्रजावर्गमें नीच दुराचारियोंकी संख्या अधिक हो, सब लोग व्यर्थ रूप बनाने लगें, पुरुष थोड़े हों और स्त्रियोंकी संख्या बहुत अधिक हो जाय, तब वही युगान्तकालका लक्षण है ॥ २४ ॥
बहुयाचनको लोको न दास्यति परस्परम्।
अविचार्य ग्रहीष्यन्ति दानं वर्णान्तरात् तथा ॥ २५ ॥
उस समय लोकमें याचकोंकी संख्या बढ़ जायगी, सभी लोग आपसमें किसीको कुछ नहीं देंगे और लोग बिना विचारे ही दूसरे वर्णोंसे दान ग्रहण करेंगे ॥ २५ ॥
राजचौराग्निदण्डात्तैं जनः क्षयमुपैष्यति।
सस्यनिष्पत्तिरफला तरुणा वृद्धशीलिनः।
ईह्यासुखिनो लोका भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २६ ॥
राजा, चोर और अग्निके दण्डसे पीड़ित हुई प्रजा धीरे-धीरे नष्ट हो जायगी, खेती निष्फल होगी और नौजवानोंका स्वभाव बूढ़ोंके समान हो जायगा (अर्थात् वे उत्साह, बल