भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 776, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 776

७५४ ] श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


तृतीयोऽध्यायः

व्यासजीद्वारा कलियुगकी स्थितिका वर्णन

जनमेजय उवाच

आसन्नं विप्रकृष्टं वा यदि कालं न विद्महे ।
तस्माद् द्वापरसंविद्धं युगान्तं स्पृहयाम्यहम् ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा—महर्षे! हमारे मोक्षका काल निकट है या दूर, यह हमलोग नहीं जानते; अतः जिसने द्वापरको अधर्मकी अधिकतासे दूषित कर दिया है, उस युगान्त अर्थात् कलियुगका वर्णन मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

प्राप्ता वयं तु तत् कालमनया धर्मतृष्णया ।
आदद्यात् परमं धर्मं सुखमल्पेन कर्मणा ॥ २ ॥

कलियुगमें मनुष्य थोड़े-से आयाससे किये जानेवाले सत्कर्मद्वारा सुखपूर्वक महान् धर्मके फलकी प्राप्ति कर सकता है, इस प्रकार इस धर्मविषयक लोभसे हमलोगोंने उस कलिकालमें जन्म ग्रहण किया है ॥ २ ॥

शौनक उवाच

प्रजासमुद्वेगकरं युगान्तं समुपस्थितम् ।
प्रणष्टधर्मे धर्मज्ञ निमित्तैर्वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥

शौनकजीने कहा—धर्मज्ञ सूतनन्दन ! प्रजाको उद्वेगमें डालनेवाला और धर्मको नष्ट कर देनेवाला कलियुग उपस्थित हो गया है, आप इसके भावी लक्षण बताते हुए इसका वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥

सौतिरुवाच

पृष्ट एवं भविष्यस्य गतिं तत्त्वेन चिन्तयन् ।
युगान्ते सर्वभूतानां भगवानब्रवीत् तदा ॥ ४ ॥

सौतिने कहा—शौनक ! राजा जनमेजयने भी ऐसा ही प्रश्न किया था। उसके उत्तरमें कलियुगमें समस्त प्राणियोंके भविष्यकी गतिका तत्त्वतः विचार करके भगवान् व्यासने उस समय इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥

व्यास उवाच

अरक्षितारो हर्तारो बलिभागस्य पार्थिवाः ।
युगान्ते प्रभविष्यन्ति स्वरक्षणपरायणाः ॥ ५ ॥

व्यासजी बोले—राजन् ! कलियुगमें प्रजाओंकी रक्षा न करते हुए उनसे कर लेनेवाले राजा उत्पन्न होंगे, जो सदा अपने शरीरमात्रकी रक्षामें संलग्न रहेंगे ॥ ५ ॥

अक्षत्रियाश्च राजानो विप्राः शूद्रोपजीविनः ।
शूद्राश्च ब्राह्मणाचारा भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ६ ॥

कलियुगमें जो क्षत्रिय नहीं हैं, ऐसे लोग भी राजा होंगे। ब्राह्मणलोग शूद्रोंके आश्रित होकर जीविका चलायेंगे और शूद्र ब्राह्मणोंके-से आचारका पालन करनेवाले होंगे ॥ ६ ॥

काण्डे स्पृष्टाः श्रोत्रियाश्च निष्क्रियाणि हवींष्यथ ।
एकपङ्क्त्यामशिष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ७ ॥

जनमेजय ! कलियुगमें धनुष-बाण धारण करनेवाले (क्षत्रियवृत्तिसे जीनेवाले) ब्राह्मण और श्रोत्रिय ब्राह्मण दोनों एक पंक्तिमें बैठकर पञ्चयज्ञोंसे रहित हविष्य भोजन करेंगे ॥ ७ ॥

शिल्पवन्तोऽनृतपरा नरा मद्यामिषप्रियाः ।
मित्रभार्या भविष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ८ ॥

जनमेजय ! कलियुगमें मनुष्य शिल्प कर्म करनेवाले, असत्यवादी, मदिरा और मांसके प्रेमी तथा पत्नीको ही मित्र माननेवाले होंगे ॥ ८ ॥

राजवृत्तिस्थिताश्चौरा राजानश्चौरशीलिनः ।
भृत्याश्चानिर्दिष्टभुजो भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ९ ॥

युगान्तकाल (कलियुग) में चोर राजोचितवृत्तिसे रहेंगे और राजाओंका स्वभाव चोरोंके समान हो जायगा तथा सेवक उन वस्तुओंका भी उपभोग करेंगे—जिन्हें भोगने-के लिये उन्हें स्वामीकी ओरसे आज्ञा नहीं मिली है ॥ ९ ॥

धनानि श्लाघनीयानि सतां वृत्तम्पूजितम् ।
अकुत्सना च पतिते भविष्यन्ति युगक्षये ॥ १० ॥

कलियुगमे धन ही सबके लिये स्पृहणीय होंगे, सत्पुरुषों-के आचार-व्यवहारका आदर नहीं होगा और धर्मसे पतित हुए मनुष्यके प्रति निन्दाका भाव रखनेवाले कोई न होंगे ॥ १० ॥

प्रणष्टचेतना मर्त्या मुक्तकेशा विचूलिनः ।
ऊनषोडशवर्षाश्च प्रजास्यन्ति नराः सदा ॥ ११ ॥

मनुष्य धर्म और अधर्मके विवेकसे रहित होंगे, विधवाएँ तथा संन्यासी परस्पर समागम करके बच्चे पैदा करेंगे। सोलह वर्षसे कम अवस्थावाले मनुष्य भी सदा संतानोत्पादन करेंगे ॥ ११ ॥

अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः ।
प्रमदाः केशशूलाश्च भविष्यन्ति युगक्षये ॥ १२ ॥

कलियुगमें जनपदके लोग अन्न बेचेंगे, चौराहोंपर द्विज लोग वेदोंका विक्रय करेंगे और युवती स्त्रियाँ मूल्य लेकर व्यभिचार करनेवाली होंगी ॥ १२ ॥

सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति सर्वे वाजसनेयिनः ।
शूद्रा भोवादिनश्चैव भविष्यन्ति युगक्षये ॥ १३ ॥