विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 775, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः ७५३
जनमेजय उवाच
निवृत्तावश्वमेधस्य किं निमित्तं भविष्यति।
श्रुत्वा परिहरिष्यामि भगवन् यदि मन्यसे ॥ ३३ ॥
जनमेजयने कहा— भगवन् ! अश्वमेध यज्ञकी निवृत्तिमें कौन-सा कारण उपस्थित होगा। यदि आप ठीक समझें तो मैं उसे सुनकर उसका परिहार करूँगा ॥ ३३ ॥
व्यास उवाच
निमित्तं भविता तत्र ब्रह्मकोपकृतं प्रभो।
यतेथाः परिहर्तुं त्वमित्येतद् भद्रमस्तु ते ॥ ३४ ॥
व्यासजीने कहा— प्रभो ! ब्राह्मणोंके प्रति तुम्हारे मनमें क्रोध होगा, जिससे उस यज्ञको बंद करनेका निमित्त स्वयं बन जायगा। तुम इसके परिहारके लिये प्रयत्न करना, यही मुझे कहना है, तुम्हारा कल्याण हो ॥ ३४ ॥
त्वया वृत्तं क्रतुं चैव वाजिमेधं परंतप।
क्षत्रिया नाहरिष्यन्ति यावद् भूमिर्धरिष्यति ॥ ३५ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश ! तुम्हारे द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञको जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक भावी पीढ़ीके क्षत्रिय नहीं करेंगे ॥ ३५ ॥
जनमेजय उवाच
निवृत्तावश्वमेधस्य ब्रह्मशापाग्नितेजसा।
अहं निमित्तमिति मे भयं तीव्रं तु जायते ॥ ३६ ॥
जनमेजय बोले— भगवन् ! ब्राह्मणकी शापाग्निके तेजसे अश्वमेधयज्ञकी निवृत्ति होगी और मैं उसमें निमित्त बनूँगा, यह जानकर मुझे बड़ा भारी भय हो रहा है ॥
कथं ह्यकीर्त्या युज्येत सुकृती मह्विधो जनः।
लोकान्नुच्छेते गन्तुं खं सपाश इव द्विजः ॥ ३७ ॥
मेरे-जैसा पुण्यात्मा पुरुष कैसे अपयशसे युक्त होगा और जैसे जालमे बँधा हुआ पक्षी आकाशमे नहीं उड़ सकता उसी प्रकार अपयशसे कलङ्कित हुआ मुझ जैसा पुरुष लोगोंके सामने जानेका साहस कैसे कर सकेगा ? ॥ ३७ ॥
यथा ह्यनागतमिदं दृष्टमत्र प्रणाशनम्।
यद्यस्ति पुनरावृत्तिर्यज्ञस्याश्वासयस्व माम् ॥ ३८ ॥
जिस तरह आपने यहाँ इस यज्ञके भावी विनाशको देखा है, उसी प्रकार यदि इसकी पुनरावृत्ति भी सम्भव हो तो उसे बताकर मुझे आश्वासन दीजिये ॥ ३८ ॥
व्यास उवाच
उपात्तयज्ञो देवेषु ब्राह्मणेष्ूपपत्स्यते।
तेजसा व्याहृतं तेजस्तेजस्येवावतिष्ठते ॥ ३९ ॥
व्यासजीने कहा— राजन् ! अश्वमेध यज्ञका उपसंहार हो जानेपर वह देवताओं और ब्राह्मणोंमें ज्ञानरूपसे स्थित रहेगा, क्योंकि तेजसे अभिभूत हुआ तेज तेजमें ही स्थित होता है ॥ ३९ ॥
औद्भिद्जो भविता कश्चित् सेनानीः काश्यपो द्विजः।
अश्वमेधं कलियुगे पुनः प्रत्याहरिष्यति ॥ ४० ॥
भूमिको खोदनेसे कोई सेनानी नामक कश्यपवंशी ब्राह्मण प्रकट होगा, जो कलियुगमें पुनः अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करेगा ॥ ४० ॥
तदन्ते तत्कुलीनश्च राजसूयमपि क्रतुम्।
आहरिष्यति राजेन्द्र श्वेतग्रहमिवान्तकः ॥ ४१ ॥
राजेन्द्र ! उस यज्ञके अन्तमें उसी कुलमें उत्पन्न हुआ दूसरा पुरुष राजसूययज्ञका भी अनुष्ठान करेगा; ठीक उसी तरह जैसे प्रलयकाल श्वेतग्रह (उत्पातग्रह) की सृष्टि करता है ॥ ४१ ॥
यथाबलं मनुष्याणां कर्तॄणां दास्यते फलम्।
युगान्तद्वारमृषिभिः संवृतं विचरिष्यति ॥ ४२ ॥
यज्ञ करनेवाले मनुष्योंको श्रद्धादि रूप बलके अनुसार ही वह यज्ञ फल देगा, फिर ऋषियोंद्वारा सुरक्षित युगान्तकालके द्वारपर लोग विचरण करेंगे ॥ ४२ ॥
तदा प्रभृति हास्यन्ति नॄणां प्राणाः पुराकृतीः।
न निवर्तिष्यते लोके वृत्तान्तावर्तनेष्विह ॥ ४३ ॥
तभीसे मनुष्योंकी इन्द्रियाँ पुरातन कृत्यों शिष्टाचारोंका परित्याग कर देंगी। जगत्के भीतर लोगोंके बर्तावोंमें पहिले-जैसा वृत्तान्त (आचार-विचार) सर्वथा नहीं रहेगा ॥ ४३ ॥
तदा सूक्ष्मो महोदर्को दुस्तरो दानमूलवान्।
चातुराश्रम्यशिथिलो धर्मः प्रविचालिष्यति ॥ ४४ ॥
उस समय सूक्ष्म धर्म भी महान् फल देनेवाला होगा, परंतु अधिक विघ्नोंके कारण उस धर्मको पूरा करना कठिन होगा। उस धर्मका मूल दान होगा। उन चारों आश्रमोंके शिथिल हो जानेसे धर्म भी अपने स्वरूपसे विचलित हो जायगा ॥ ४४ ॥
तदा ह्यल्पेन तपसा सिद्धिं प्राप्स्यन्ति मानवाः।
धन्या धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ४५ ॥
जनमेजय ! उस युगान्त अर्थात् कलियुगमें मनुष्य थोड़ी-सी तपस्यासे भी सिद्धि प्राप्त कर लेंगे। उस समय कुछ धन्य पुरुष ही धर्मका आचरण करेंगे ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि जनमेजयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें जनमेजयका प्रश्नविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥