विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 774, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें७५२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंश
‘इसके बाद राजर्षि हरिश्चन्द्रने इस यज्ञका अनुष्ठान किया, उनके यज्ञके अन्तमें आडीवक-नामक महान् युद्ध हुआ, जो क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला था ॥
ततोऽनन्तरमार्येण पाण्डवेनातिदुस्तरः । महाभारत आरम्भः सम्भृतोऽग्निरिव क्रतुः ॥ १९ ॥
‘उसके बाद श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने उस अत्यन्त दुस्तर और अग्निके समान भयंकर यज्ञका आयोजन किया, जिसका आरम्भ महाभारत-युद्धको उपस्थित करनेमें कारण हुआ ॥ १९ ॥
तदस्य मूलं युद्धस्य लोकक्षयकरस्य तु । राजसूयो महायज्ञः किमर्थं न निवारितः ॥ २० ॥
‘अतः इस लोकविनाशकारी युद्धका जो मूल कारण था, उस राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान आपने क्यों नहीं रोक दिया था ? ॥ २० ॥
राजसूयो ह्यसंहार्थो यज्ञाङ्गैश्च दुरत्ययैः । मिथ्या प्रणीते यज्ञाङ्गे प्रजानां संक्षयो ध्रुवः ॥ २१ ॥
‘राजसूय यज्ञको सर्वाङ्गपूर्णरूपसे सम्पन्न करना असम्भव है, क्योंकि उस यज्ञके अङ्गभूत साधन दुर्लभ हैं । यदि यज्ञाङ्ग-का सम्यक् रूपसे सम्पादन न होनेके कारण उसमें वैगुण्य आ गया तो प्रजाजनोंका नाश अवश्यंभावी है ॥ २१ ॥
भवानपि च सर्वेषां पूर्वेषां नः पितामहः । अतीतानागतज्ञश्च नाथश्चादिकरश्च नः ॥ २२ ॥
‘आपभी हमारे समस्त पूर्वजोंके पितामह हैं, आपको भूत और भविष्यत्कालका ज्ञान है, आप हमारे कुलके रक्षक और हमारे पूर्वजोंके जन्मदाता हैं ॥ २२॥
ते कथं भवता नेत्रा बुद्धिमन्तश्च्युता नयात् । अनाथा ह्यपराध्यन्ते कुनेतारश्च मानवाः ॥ २३ ॥
‘आप-जैसे नेताके रहते हुए बुद्धिमान् पाण्डव नीतिमार्गसे भ्रष्ट कैसे हो गये ? क्योंकि जो मनुष्य अनाथ हैं और जिनके नेता अच्छे नहीं हैं, वे ही अपराध कर बैठते हैं (पाण्डवोंको तो आप-जैसा श्रेष्ठ नेता मिला था और वे आपको पाकर सनाथ थे, तो भी उनसे यह भूल क्यों हुई ?)’ ॥ २३ ॥
व्यास उवाच
कालेन विपरीतास्ते तव पूर्वपितामहाः । न मां भविष्यं पृच्छन्ति न चापृष्टो ब्रवीम्यहम् ॥ २४ ॥
व्यासजी बोले—जनमेजय ! तुम्हारे पूर्वपितामह पाण्डव कालकी प्रेरणासे विपरीत अवस्थाको प्राप्त हो गये थे, वे मुझसे भविष्य नहीं पूछते थे और मैं बिना पूछे किसीको कोई बात बताता नहीं हूँ ॥ २४ ॥
सामर्थ्यं च न पश्यामि भविष्यस्य निवर्तने । परिहर्तुं न शक्या हि कालेन विहिता गतिः ॥ २५ ॥
भविष्यको पलट देनेकी शक्ति मैं किसीमें नहीं देखता हूँ; क्योंकि कालने जिस गतिका विधान किया है, उसका परिहार असम्भव है ॥ २५ ॥
त्वया त्विदमहं पृष्टो वक्ष्याम्यागन्तु भावि यत् । अतश्च बलवान् कालः श्रुत्वापि न करिष्यसि ॥ २६ ॥
तुमने इस विषयको मुझसे पूछा है, इसलिये मैं तुम्हारे लिये आनेवाले भविष्यका वर्णन करूँगा, परंतु काल इससे भी बलवान् है, तुम मेरे मुखसे भविष्यके कर्तव्यको सुनकर भी उसका पालन नहीं करोगे ॥ २६ ॥
न संरम्भान्न चारम्भान्न वै स्थास्यसि पौरुषे । लेखा हि काललिखिताः सर्वथा दुरतिक्रमाः ॥ २७ ॥
संरम्भ (उत्तेजना) और आरम्भ (उद्योग) के कारण तुम पौरुषमें स्थिर नहीं रह सकोगे; क्योंकि कालके लिखे हुए लेखको लाँघ जाना सर्वथा कठिन है ॥ २७ ॥
अश्वमेधः क्रतुः श्रेष्ठः क्षत्रियाणां परिश्रुतः । तेन भावेन ते यज्ञं वासवो धर्षयिष्यति ॥ २८ ॥
क्षत्रियोंके लिये अश्वमेध यज्ञ सबसे श्रेष्ठ सुना गया है, उसके इस महत्त्वके कारण इन्द्र द्वेषवश तुम्हारे उस यज्ञको भ्रष्ट कर देंगे ॥ २८ ॥
यदि तच्छक्यते राजन् परिहर्तुं कथंचन । दैवं पुरुषकारेण मा यजेथाश्च तं क्रतुम् ॥ २९ ॥
राजन् ! यदि तुम पुरुषार्थसे किसी प्रकार दैवके विधानका निवारण कर सको तो तुम कदापि इस यज्ञका अनुष्ठान न करना ॥ २९ ॥
न चापराधः शक्रस्य नोपाध्यायगणस्य ते । तव वा यजमानस्य कालोऽत्र दुरतिक्रमः ॥ ३० ॥
इसमें न इन्द्रका अपराध है, न तुम्हारे उपाध्यायगणका और न तुम-जैसे यजमानका ही; यहाँ काल ही दुर्लङ्घ्य है ॥ ३० ॥
तस्य संस्थाकृतमिदं कालस्य परमेष्ठिनः । यथा दृष्टं प्रजासर्गे गमिष्यति युगक्षये ॥ ३१ ॥
यह जो भावी कलंक है, वह कालरूप ब्रह्माजीकी इच्छासे अश्वमेध यज्ञको भविष्यमे बंद करा देनेके लिये संघटित किया जानेवाला है, फिर तो कलियुगमे सारी प्रजा प्रायः असर्ग अर्थात् विनाशको ही प्राप्त होगी (यज्ञ आदि-के अनुष्ठानसे प्रजामें जो दीर्घजीवित्व आता था, उसका धीरे-धीरे अभाव हो जायगा) । यह बात ज्ञानदृष्टिसे देखी गयी है ॥ ३१ ॥
तथा यज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजातयः । तत्प्रणेयं निबोधध्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ३२ ॥
इसके सिवा ब्राह्मणलोग यज्ञोंके फल बेचने लगेंगे, अतः तुम यह जान लो कि चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी कालके ही अधीन है ॥ ३२ ॥