विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 766, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७४४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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द्वारकावासिनां वाचश्चरन्ति बहुधा तदा।
प्राप्ते कृष्णे महाभागे यादवानां महारथे ॥११५॥
यादव-महारथी महाभाग श्रीकृष्णके लौट आनेपर द्वारका-वासियोंके मुखसे उस समय नाना प्रकारकी बातें निकलने लगीं—॥ ११५ ॥
गत्वा च दूरमध्वानं सुपर्णो द्रुतमागतः।
धन्याः स्मोऽनुगृहीताः स्मो येषां वै जगतः पिता ॥११६॥
रक्षिता चैव गोप्ता च दीर्घबाहुर्महाभुजः।
वैनतेयं समारुह्य जित्वा वाणं सुदुर्जयम् ॥११७॥
प्राप्तोऽयं पुण्डरीकाक्षो मनांस्याह्लादयन्निव।
'ये गरुड़ बहुत दूरके मार्गपर जाकर शीघ्र ही लौट आये। हम धन्य हैं और भगवान्के द्वारा अनुगृहीत हैं, जिनके रक्षक और पालक लंबी भुजावाले जगत्पिता महाबाहु श्रीकृष्ण हैं। गरुड़पर आरूढ़ हो अत्यन्त दुर्जय बाणासुरको जीतकर ये कमलनयन श्रीकृष्ण हमारे मनको आह्लादित करते हुए-से यहाँ आ पहुँचे हैं' ॥ ११६-११७॥
एवं कथयतामेव द्वारकावासिनां तदा ॥११८॥
वासुदेवगृहं देवा विविशुस्ते महारथाः।
जब द्वारकावासी इस प्रकारकी बातें कह रहे थे, उस समय वे महारथी देवगण भगवान् श्रीकृष्णके भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ ११८॥
अवतीर्य सुपर्णात् तु वासुदेवो बलस्तदा ॥११९॥
प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च गृहान् प्रविशंस्तदा।
वहाँ पहुँचनेपर बलराम, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध भी तत्काल गरुड़से उतरकर अपने-अपने घरोंमें गये ॥११९॥
ततो देवविमानानि संचरन्ति तदा दिवम् ॥१२०॥
अवस्थितानि दृश्यन्ते नानारूपाणि सर्वशः।
तदनन्तर देवताओंके विमान, जो आकाशमें विचरते थे, उस समय वहाँ स्थिर दिखायी देने लगे; उन सबके स्वरूप नाना प्रकारके थे ॥ ॥ १२०॥
हंसर्षभमृगैर्नागैर्वाजिसारसवर्हिणैः ॥१२१॥
भास्वन्ति तानि दृश्यन्ते विमानानि सहस्रशः।
हंस, वृषभ, मृग, हाथी, घोड़े, सारस और मोर आदि-से युक्त वे सहस्रों तेजस्वी विमान वहाँ दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ १२१॥
अथ कृष्णोऽब्रवीद्वाक्यं कुमारांस्तान् सहस्रशः।
प्रद्युम्नादीन् समस्तांस्तु श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥१२२॥
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने सहस्रोंकी संख्यामें उपस्थित हुए प्रद्युम्न आदि समस्त यादवकुमारोंसे स्निग्ध एवं मधुर वाणीमें कहा—॥ १२२ ॥
एते रुद्रास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथाश्विनावपि।
साध्या देवास्तथान्ये च वन्दध्वं च यथाक्रमम् ॥१२३॥
'बच्चो ! ये रुद्र, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, साध्य-गण तथा अन्य देवता यहाँ पधारे हैं, तुमलोग क्रमशः इन सबकी वन्दना करो ॥ १२३ ॥
सहस्राक्षं महाभागं दानवानां भयंकरम्।
वन्दध्वं सहिताः शक्रं सगशं नागवाहनम् ॥१२४॥
'दानवोंको भय देनेवाले सहस्र नेत्रधारी महाभाग इन्द्र ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो अपने सेवकगणोंके साथ पधारे हैं, तुम एक साथ होकर इनकी भी वन्दना करो ॥ १२४ ॥
सप्तर्षयो महाभागा भृग्वाङ्गिरसमाश्रिताः।
ऋषयश्च महात्मानो वन्दध्वं च यथाक्रमम् ॥१२५॥
'ये महाभाग सप्तर्षि भृगु और बृहस्पति के पास खड़े हैं, अन्यान्य महात्मा ऋषि भी पधारे हैं; तुमलोग क्रमशः इन सबकी वन्दना करो ॥ १२५ ॥
एते चक्रधराश्चैव तान् वन्दध्वं च सर्वशः।
सागराश्च ह्रदाश्चैव मत्प्रियार्थमिहागताः ॥१२६॥
दिशश्च विदिशश्चैव वन्दध्वं च यथाक्रमम्।
'ये समस्त चक्रधारी (लोकपाल) खड़े हैं, इन सबको प्रणाम करो। सागर, सरोवर, दिशा और विदिशाएँ—ये सब मेरा प्रिय करनेके लिये यहाँ पधारे हैं, तुमलोग क्रमशः इनकी वन्दना करो ॥ १२६॥
वासुकिप्रमुखाश्चैव नागा वै सुमहाबलाः ॥१२७॥
गावश्च मत्प्रियार्थं वै वन्दध्वं च यथाक्रमम्।
'वासुकि आदि महाबली नाग तथा गौएँ मेरा प्रिय करनेके लिये आयी हैं, तुमलोग क्रमशः इन्हें प्रणाम करो ॥
ज्योतींषि सह नक्षत्रैर्यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥१२८॥
आगता मत्प्रियार्थे वै वन्दध्वं च यथाक्रमम्।
'नक्षत्रोंसहित ग्रह और तारे, यक्ष, राक्षस और किन्नर—ये सभी मेरा प्रिय करनेके लिये यहाँ आये हैं, तुम क्रमशः इनकी वन्दना करो' ॥ १२८ ॥
वासुदेववचः श्रुत्वा कुमाराः प्रणताः स्थिताः ॥ १२९॥
यथाक्रमेण सर्वेषां देवतानां महात्मनाम्।
भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर वे समस्त यादव-कुमार क्रमशः सभी देवताओं और महात्माओंको प्रणाम करके खड़े हो गये ॥ १२९॥
सर्वान् दिवौकसो दृष्ट्वा पौरा विस्मयमागताः ॥१३०॥
पूजार्थमथ सम्भारान् प्रगृह्य द्रुतमागताः।
समस्त देवताओंको वहाँ उपस्थित देख पुरवासियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे पूजाकी सामग्री लेकर शीघ्रतापूर्वक वहाँ आये ॥ १३० ॥
अहो सुमहदाश्चर्यं वासुदेवस्य संश्रयात् ॥१३१॥
प्राप्यते यदिहास्माभिरिति वाचश्चरन्त्युत।