भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 765

विष्णुपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७४३

केशवोऽर्घ्यं तदा गृह्य वरुणाद् यदुनन्दनः ॥ ९९ ॥

तदनन्तर वाद्योंकी ध्वनि और डंकोंकी बड़ी भारी आवाजके साथ वरुणदेवने अर्घ्य लेकर श्रीकृष्णका पूजन किया। यदुनन्दन श्रीकृष्णने वरुणसे वह अर्घ्य लेकर उनकी पूजा स्वीकार की ॥ ९९ ॥

बलं चापूजयद् देवः कुशलीव समाहितः ।
वरुणायाभयं दत्त्वा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १००॥
द्वारकां प्रस्थितः शौरिः शचीपतिसहायवान् ।

तत्पश्चात् वरुणदेवने सकुशल पुरुषकी भाँति एकाग्र-चित्त हो बलभद्रजीका भी पूजन किया। फिर प्रतापी शूरनन्दन श्रीकृष्ण वरुणदेवको अभयदान देकर शचीपति इन्द्रके साथ द्वारकाको प्रस्थित हुए ॥ १०० १/२ ॥

तत्र देवाः समरुतः साध्याः सिद्धचारणाः ॥ १०१॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव किन्नराश्चान्तरिक्षगाः ।
अनुगच्छन्ति भूतेशं सर्वभूतादिमव्ययम् ॥ १०२॥

वहाँ सम्पूर्ण भूतोंके आदिकारण, अविनाशी, भूतनाथ श्रीकृष्णके पीछे-पीछे देवता, मरुद्गण, साध्यगण, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा तथा किन्नर भी आकाशमार्गसे चल रहे थे ॥ १०१-१०२ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ यक्षराक्षसाः ।
विद्याधरगणाश्चैव ये चान्ये सिद्धचारणाः ।
गच्छन्तमनुगच्छन्ति यशसा विजयेन च ॥ १०३॥

आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, यक्ष, राक्षस, विद्याधर तथा जो अन्य सिद्ध-चारण थे, वे सब यश और विजयके साथ यात्रा करते हुए श्रीकृष्णका अनुसरण कर रहे थे ॥ १०३ ॥

नारदश्च महाभागः प्रस्थितो द्वारकां प्रति ।
तुष्टो वाणजयं दृष्ट्वा वरुणं च कृतप्रियम् ॥ १०४॥

महाभाग नारद भी द्वारकाको ही प्रस्थान कर रहे थे। वे श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और वरुणके प्रिय कार्यका सम्पादन देखकर बहुत संतुष्ट थे ॥ १०४ ॥

कैलासशिखरप्रख्यैः प्रासादैः कन्दरैः शुभैः ।
दूराद्विशाम्य मधुहा द्वारकां द्वारमालिनीम् ॥ १०५॥
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं चक्रे चक्रगदाधरः ।
संज्ञां प्रयच्छते देवो द्वारकापुरवासिनाम् ॥ १०६॥

तदनन्तर चक्र और गदा धारण करनेवाले मधुसूदनने द्वारमालाओंसे अलंकृत तथा कैलासशिखरके समान कान्ति-मान् प्रासादों और सुन्दर कन्दराओंसे सुशोभित द्वारकापुरी-को दूरसे ही देखकर पाञ्चजन्य शङ्खका गम्भीर घोष किया। इस प्रकार भगवान् वासुदेवने द्वारकावासियोंको अपने आग-मनकी सूचना प्रदान की ॥ १०५-१०६ ॥

देवानुयाननिर्घोषं पाञ्चजन्यस्य निस्वनम् ।
श्रुत्वा द्वारवती सर्वा प्रहर्षमतुलं गता ॥ १०७॥

पीछे-पीछे आनेवाले देवताओंके विमानोंका गम्भीर घोष और पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि सुनकर सारी द्वारकापुरी अनुपम प्रसन्नतासे फूल उठी ॥ १०७ ॥

पूर्णकुम्भैश्च लाजैश्च बहुविन्यस्तविस्तरैः ।
द्वारोपशोभितां कृत्वा सर्वां द्वारवतीं पुरीम् ॥ १०८॥

नगरनिवासियोंने द्वारकापुरीके सभी द्वारोंपर जलसे भरे हुए कलश रखे, खील बिखेरे तथा बड़े विस्तारके साथ अनेक प्रकारकी सजावटें कीं। यह सब करके उन्होंने सम्पूर्ण नगरीको अभिनव शोभासे सम्पन्न कर दिया ॥ १०८ ॥

सुश्लिष्टरथ्यां सश्रीकां बहुरत्नोपशोभिताम् ।
विप्राश्चार्घ्यं समादाय तथैव कुलनैगमाः ॥ १०९॥
जयशब्दैश्च विविधैः पूजयन्ति स्म माधवम् ।
वैनतेये तमासीनं नीलाञ्जनचयोपमम् ॥ ११०॥

गलियाँ और सड़कें खूब झाड़-बुहारकर स्वच्छ एवं सुसज्जित कर दी गयीं, सारी पुरीकी शोभा बढ़ा दी गयी तथा उसे अनेक प्रकारके रत्नोंसे सजा दिया गया, ब्राह्मण तथा कुलाचारके ज्ञाता पुरोहित आदि अर्घ्य लेकर नाना प्रकारसे जय-जयकार करते हुए नीली अञ्जनराशिके समान श्यामसुन्दर माधवकी, जो गरुड़पर विराजमान थे, पूजा करने लगे ॥

ववन्दिरे तदा कृष्णं श्रिया परमया युतम् ।
तमानुपूर्व्या वर्णाश्च पूजयन्ति महाबलम् ॥ १११॥
अनन्तं केशहन्तारं श्रेष्ठिपूर्वाश्च श्रेणयः ।

उस समय सबने उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न भगवान् श्रीकृष्णकी वन्दना की। सभी वर्णोंके लोग, महाबली अनन्त (बलराम) एवं केशिहन्ता श्रीकृष्णकी क्रमशः पूजा करने लगे, सेठ आदि व्यापारियोंने भी उनका पूजन किया ॥

ऋषिभिर्देवगन्धर्वैश्चारणैश्च समन्ततः ॥ ११२॥
स्तूयते पुण्डरीकाक्षो द्वारकोपवने स्थितः ।

उस अवसरपर द्वारकाके उपवनमें ठहरे हुए कमलनयन श्रीकृष्णकी ऋषि, देवता, गन्धर्व और चारण आदि सब ओरसे स्तुति कर रहे थे ॥ ११२ १/२ ॥

तदाश्चर्यमपश्यन्त दाशार्हगणसत्तमाः ॥ ११३॥
प्रहर्षमतुलं प्राप्ता दृष्ट्वा कृष्णं महाभुजम् ।
वाणं जित्वा महादेवमायान्तं पुरुषोत्तमम् ॥ ११४॥

यदुकुलके श्रेष्ठ पुरुषोंने उस आश्चर्यको अपनी आँखों देखा था। बाणासुरको जीतकर लौटे हुए महान् देवता महाबाहु पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको देखकर उन्हें अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ था ॥ ११३-११४ ॥