भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 761

विष्णुपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७३९


आरूढवन्तो गरुडमनिरुद्धश्च वीर्यवान् ॥ ४० ॥

तत्पश्चात् बलभद्र, श्रीकृष्ण, महाबली प्रद्युम्न और पराक्रमी अनिरुद्ध—ये चारों गरुड़पर आरूढ़ हुए ॥ ४० ॥

प्रस्थितश्च स तेजस्वी गरुडः पततां वरः।
उन्मूलयंस्तरुगणान् कम्पयंश्चापि मेदिनीम् ॥ ४१ ॥

पक्षियोंमें श्रेष्ठ तेजस्वी गरुड़ वृक्षगणोंको उखाड़ते और पृथ्वीको कम्पित करते हुए वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ४१ ॥

आकुलाश्च दिशः सर्वा रेणुध्वस्तमिवाम्बरम् ।
गरुडे सम्प्रयातेऽभून्मन्दरश्मिर्दिवाकरः ॥ ४२ ॥

गरुड़के प्रस्थान करनेपर सम्पूर्ण दिशाएँ व्याकुल हो गयीं, आकाश धूलसे आच्छन्न-सा हो गया और सूर्यदेवकी किरणें मन्द पड़ गयीं ॥ ४२ ॥

ततस्ते दीर्घमध्वानं प्रययुः पुरुषर्षभाः।
आरुह्य गरुडं सर्वे जित्वा बाणं महौजसम् ॥ ४३ ॥

तत्पश्चात् वे सभी पुरुषप्रवर वीर अपने विशाल मार्गपर बढ़ने लगे। वे सब महाबली बाणासुरको परास्त करके गरुड़पर आरूढ़ हो द्वारकाकी ओर जा रहे थे ॥ ४३ ॥

ततोऽम्बरतलस्थास्ते वारुणीं दिशमास्थिताः।
अपश्यन्त महात्मानो गावो दिव्यपयःप्रदाः।
वेलावनविचारिण्यो नानावर्णाः सहस्रशः ॥ ४४ ॥

आकाशमें पहुँचकर वे सब लोग पश्चिम दिशाकी ओर बढ़ने लगे। उस समय उन महात्माओंने अनेक प्रकारके रूप-रंगवाली सहस्रों दिव्य गौओंको देखा, जो दिव्य दुग्ध प्रदान करनेवाली थीं। वे सब-की-सब समुद्रतटवर्ती वनमें विचर रही थीं ॥ ४४ ॥

अवध्याय तदा रूपं कुम्भाण्डवचनाश्रयात् ।
कृष्णः प्रहरतां श्रेष्ठस्तत्त्वतोऽर्थविशारदः ॥ ४५ ॥
निशाम्य बाणगावस्तु तासु चक्रे मनस्तदा ।
आस्थितो गरुडं प्राह स तु लोकादिरव्ययः ॥ ४६ ॥

कुम्भाण्डके वचनोंका स्मरण करके तत्काल उन गौओंके स्वरूपको पहचानकर प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ तथा तात्त्विक अर्थनीतिमें विशारद भगवान् श्रीकृष्णने बाणासुरकी उन गौओंको देखा और मन-ही-मन उन्हें ले लेनेका विचार किया। फिर सम्पूर्ण जगत्‌के आदिकारण वे अविनाशी प्रभु गरुड़पर बैठे-बैठे ही बोले ॥ ४५-४६ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

वैनतेय प्रयाहि त्वं यत्र बाणस्य गोधनम् ।
यासां पीत्वा किल क्षीरममृतत्वमवाप्नुयात् ॥ ४७ ॥

श्रीकृष्णने कहा—विनतानन्दन ! जहाँ बाणासुरकी गौएँ हैं, वहीं चलो। कहते हैं, उन गौओंका दूध पीकर मनुष्य अमरत्वको प्राप्त कर लेता है ॥ ४७ ॥

आह मां सत्यभामा च बाणगावो ममानय ।
यासां पीत्वा किल क्षीरं न जीर्यन्ति महासुराः ॥ ४८ ॥

सत्यभामाने मुझसे कहा था 'कि मेरे लिये बाणासुरकी गौएँ ले आइयेगा, जिनका दूध पीकर वे महान् असुर कभी बूढ़े नहीं होते हैं ॥ ४८ ॥

विजराश्च जरां त्यक्त्वा भवन्ति किल जन्तवः।
ता आनयस्व भद्रं ते यदि धर्मो न लुप्यते ॥ ४९ ॥
अथवा कार्यलोपो वै मैव तासु मनः कृथाः।
इति मामब्रवीत् सत्या ताश्चैता विदिता मम ॥ ५० ॥

'तथा बूढ़े प्राणी भी वृद्धावस्थाको त्यागकर अजर हो जाते हैं। नाथ ! आपका कल्याण हो, यदि धर्मका लोप न होता हो तो उन गौओंको ले आइयेगा अथवा यदि कार्यमें बाधा पड़ती हो तो उन गौओंकी ओर ध्यान न दीजियेगा' इस प्रकार सत्यभामाने मुझसे कहा था। वे बाणासुरकी गौएँ ये ही हैं, इन्हें मैंने पहचान लिया ॥ ४९-५० ॥

गरुड उवाच

दृश्यन्ते गाव एतास्ता दृष्ट्वा मां वरुणालयम् ।
विशन्ति सहसा सर्वाः कार्यमत्र विधीयताम् ॥ ५१ ॥

गरुड़ बोले—प्रभो ! ये ही तो वे गौएँ दिखायी दे रही हैं, परंतु मुझे देखकर सहसा सब-की-सब समुद्रमें समायी जा रही हैं; अतः यहाँ जो कार्य करना उचित हो, वह कीजिये ॥ ५१ ॥

इत्युक्त्वा चैव गरुडः पक्षवातेन सागरम् ।
सहसा क्षोभयित्वा च विवेश वरुणालयम् ॥ ५२ ॥

ऐसा कहकर गरुड़ने अपने पंखोंकी हवासे सहसा समुद्रको विक्षुब्ध करते हुए वरुणके निवासस्थानमें प्रवेश किया ॥ ५२ ॥

दृष्ट्वा जवेन गरुडं प्राप्तं वै वरुणालयम् ।
वारुणाश्च गणाः सर्वे विभ्रान्ताः प्राचलंस्तदा ॥ ५३ ॥

गरुड़को वेगपूर्वक वरुणालयमें आया हुआ देख वरुणके समस्त सैनिकगण तत्काल विभ्रान्त एवं विचलित हो उठे ॥ ५३ ॥

ततस्तु वारुणं सैन्यमभियातं सुदुर्जयम् ।
प्रमुखे वासुदेवस्य नानाप्रहरणोद्यतम् ।
तद् युद्धमभवद् घोरं वारुणैः पन्नगारिणा ॥ ५४ ॥

तत्पश्चात् वरुणकी अत्यन्त दुर्जय सेना नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो भगवान् श्रीकृष्णके सामने चढ़ आयी। उस समय वरुणके उन सैनिकोंके साथ गरुड़‌का बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ ५४ ॥

तेषामपततां संख्ये वारुणानां सहस्रशः।
भग्नं बलमनाधृष्यं केशवेन महात्मना ॥ ५५ ॥