भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 762
७४०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

युद्धमें आक्रमण करनेवाले उन सहस्रों वरुणसैनिकोंकी उस अजेय सेनाको महात्मा केशवने मार भगाया ॥ ५५ ॥

ततस्ते प्रद्रुता यान्ति तमेव वरुणालयम् ।
षष्टिं रथसहस्राणि षष्टिं रथशतानि च ॥ ५६ ॥
वारुणानि च युद्धानि दीप्तशस्त्राणि संयुगे ।

तब वे भागे हुए सैनिक उस वरुणालयमें ही जा घुसे, इसके बाद वरुणके छाछठ हजार रथी सैनिक चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो रणक्षेत्रमें आकर युद्ध करने लगे ॥

तद् बलं बलिभिः शूरैर्बलदेवजनार्दनैः ॥ ५७ ॥
प्रद्युम्नेनानिरुद्धेन गरुडेन च सर्वशः ।
शरौघैर्विविधैस्तीक्ष्णैर्वध्यमानं समन्ततः ॥ ५८ ॥

बलदेव, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और गरुड़—इन सभी बलवान् शूरवीरोंने नाना प्रकारके तीखे बाणसमूहोंद्वारा वरुणकी उस रथसेनाको सब ओरसे मार भगाया ॥ ५७-५८ ॥

ततो भग्नं बलं दृष्ट्वा कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।
वरुणस्त्वथ संक्रुद्धो निर्ययौ यत्र केशवः ॥ ५९ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णके द्वारा अपनी सेनाको भगायी गयी देख वरुण देवता अत्यन्त कुपित हो उठे और घरसे निकलकर उस स्थानपर आये जहाँ श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ ५९ ॥

ऋषिभिर्देवगन्धर्वैस्तथैवाप्सरसां गणैः ।
संस्तूयमानो बहुधा वरुणः प्रत्यदृश्यत ॥ ६० ॥

उस समय बहुत-से ऋषि, देवता, गन्धर्व तथा अप्सराओं-के समुदाय अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति कर रहे थे। इस रूपमें वरुणदेवका वहाँ दर्शन हुआ ॥ ६० ॥

छत्रेण ध्रियमाणेन पाण्डुरेण वपुष्मता ।
सलिलस्राविणा श्रेष्ठं चापमुद्यम्य धिष्ठितः ॥ ६१ ॥

उनके मस्तकपर सुन्दर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे जलकी बूँदें झर रही थीं। वे एक श्रेष्ठ धनुष हाथमें लेकर खड़े थे ॥ ६१ ॥

अपां पतिरतिक्रुद्धः पुत्रपौत्रबलान्वितः ।
आह्वयन्निव युद्धाय विस्फारितमहाधनुः ॥ ६२ ॥

जलके स्वामी वरुण अत्यन्त क्रोधमें भरकर अपने पुत्रों-पौत्रों तथा सैनिकोंके साथ आकर अपने विशाल धनुषको फैलाये हुए इस तरह खड़े थे, मानो युद्धके लिये ललकार रहे हों ॥ ६२ ॥

स तु प्राध्मापयच्छङ्खं वरुणः समधावत ।
हरिं हर इव क्रुद्धो बाणजालैः समावृणोत् ॥ ६३ ॥

वरुणने पहले तो शङ्ख बजाया, फिर क्रोधमें भरकर श्रीकृष्णपर उसी तरह धावा किया, जैसे रुद्रदेवने भगवान् विष्णुपर आक्रमण किया हो। उन्होंने कुपित हो अपने बाणोंके जालसे श्रीकृष्णको ढक दिया ॥ ६३ ॥

ततः प्रध्माय जलजं पाञ्चजन्यं जनार्दनः ।
बाणजालैर्दिशः सर्वास्ततश्चक्रे महाबलः ॥ ६४ ॥

तब महाबली जनार्दनने पाञ्चजन्य शङ्ख बजाकर अपने बाणसमूहोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ६४ ॥

ततः शरौघैर्विमलैर्वरुणः पीडितो रणे ।
स्मयन्निव ततः कृष्णं वरुणः प्रत्ययुध्यत ॥ ६५ ॥

रणभूमिमें उन निर्मल बाणसमूहोंसे पीड़ित होनेपर भी मुसकराते हुए-से वरुण श्रीकृष्णके साथ युद्ध करने लगे ॥

ततोऽस्त्रं वैष्णवं घोरमभिमन्त्र्याहवे स्थितः ।
वासुदेवोऽब्रवीद् वाक्यं प्रमुखे तस्य धीमतः ॥ ६६ ॥

तब घोर वैष्णवास्त्रको अभिमन्त्रित करके युद्धस्थलमें बुद्धिमान् वरुणके सामने खड़े हुए भगवान् वासुदेव उनसे इस प्रकार बोले-॥ ६६ ॥

इदमस्त्रं महाघोरं वैष्णवं शत्रुसूदनम् ।
मयोद्यतं वधार्थं ते तिष्ठेदानीं स्थिरो भव ॥ ६७ ॥

'वरुणदेव ! मैंने तुम्हारे वधके लिये शत्रुओंका संहार करनेवाले इस महाघोर वैष्णवास्त्रको उठा रखा है, अब तुम स्थिरतापूर्वक खड़े रहो' ॥ ६७ ॥

ततोऽस्त्रं वरुणो देवो ह्यस्त्रं वैष्णवमुद्यतः ।
वारुणास्त्रेण संयोज्य विननाद महाबलः ॥ ६८ ॥

यह सुनकर महाबली वरुणदेव वैष्णवास्त्रका सामना करनेके लिये उद्यत हो उसे वारुणास्त्रसे संयुक्त करके जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ६८ ॥

तस्यास्त्रे वितता ह्यापो वरुणस्य विनिःस्रुताः ।
वैष्णवास्त्रस्य शमने वर्तते समितिंजयः ॥ ६९ ॥

वरुणके अस्त्रमें राशि-राशि जल व्याप्त था, जो तत्काल प्रकट होने लगा। युद्धविजयी वरुण उसीसे वैष्णवास्त्रको बुझा देनेके लिये उद्यत थे ॥ ६९ ॥

आपस्तु वारुणास्तत्र क्षिप्ताः क्षिप्ता ज्वलन्ति वै ।
दह्यन्ते वारुणास्तत्र ततोऽस्त्रे ज्वलिते पुनः ॥ ७० ॥
वैष्णवे तु महावीर्ये दिशो भीता विदुद्रुवुः ।

परंतु वारुणास्त्रके द्वारा फेंकी गयी जलधाराएँ जब-जब वैष्णवास्त्रपर पड़ती थीं, तब तब अग्निके समान प्रज्वलित हो उठती थीं और उनके द्वारा वहाँ वरुणके सैनिक ही दग्ध होने लगते थे। इस प्रकार महान् शक्तिशाली वैष्णवास्त्रके प्रज्वलित होनेपर वरुणके सैनिक पुनः भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगे ॥ ७० १/२ ॥