विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 763, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| [ विष्णुपर्व ] | सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः | ७४१ |
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तद् बलं ज्वलितं दृष्ट्वा वरुणः कृष्णमब्रवीत् ॥ ७१ ॥
स्मर स्वप्रकृतिं पूर्वामव्यक्तां व्यक्तलक्षणाम् ।
तमो जहि महाभाग तमसा मुह्यसे कथम् ॥ ७२ ॥
अपनी उस सेनाको जलती हुई देख वरुणने श्रीकृष्णसे कहा—'महाभाग ! आप अपनी उस पूर्व प्रकृतिका स्मरण कीजिये, जो व्यक्ताव्यक्त स्वरूप है। तमोगुणका नाश कीजिये, आप स्वयं तमोगुणसे क्यों मोहित हो रहे हैं ? ॥ ७१-७२ ॥
सत्त्वस्थो नित्यमासीस्त्वं योगीश्वर महामते ।
पञ्चभूताश्रयान् दोषानहंकारं च वर्जय ॥ ७३ ॥
'योगीश्वर ! महामते ! आप सदा ही सत्त्वगुणमें स्थित रहे हैं, अतः पञ्चभूतोंके आश्रित रहनेवाले अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—इन पाँच दोषों तथा अहंकारको त्याग दीजिये ॥ ७३ ॥
या या ते वैष्णवी मूर्तिस्तस्या ज्येष्ठो ह्यहं तव ।
ज्येष्ठभावेन मान्यो तु किंमां त्वं दग्धुमिच्छसि ॥ ७४ ॥
'आपकी जो-जो वैष्णवी मूर्ति है, उससे मैं ज्येष्ठ हूँ।* ज्येष्ठ होनेके नाते आपके आदरका पात्र हूँ, तो भी आप क्यों मुझे दग्ध करना चाहते हैं ? ॥ ७४ ॥
नाग्निर्विक्रमते ह्यग्नौ त्यज कोपं युधां वर ।
त्वयि न प्रभविष्यामि जगतः प्रभवो ह्यसि ॥ ७५ ॥
'योद्धाओंमे श्रेष्ठ श्रीकृष्ण ! आग आगपर अपना पराक्रम प्रकट नहीं करती है, अतः क्रोधको त्याग दीजिये। आपपर मेरी प्रभुता नहीं चल सकेगी, क्योंकि आप जगत्के आदि कारण हैं ॥ ७५ ॥
पूर्वं हि या त्वया सृष्टा प्रकृतिर्विकृतात्मिका ।
धर्मिणी वीजभावेन पूर्वं धर्मे समाश्रिता ॥ ७६ ॥
'पूर्वकालमें आपने जिस प्रकृति (माया) की सृष्टि की थी, वह महत्तत्त्व आदि विकारोंके रूपमें परिणत होनेवाली है, इसलिये परिणामधर्मिणी है। वह आपसे पूर्वधर्म (जन्म-भाव)† का आश्रय लेकर अर्थात् आपसे ही उत्पन्न होकर जगत्के कारणरूपसे विद्यमान है ॥ ७६ ॥
* भगवान् विष्णुके जितने अवतार हैं, उन सबमें मत्स्यावतार प्रथम माना गया है। यह अवतार जलमें हुआ था और जलके अधिष्ठाता वरुणदेव इसके पहलेसे विद्यमान थे, अतः ये सभी अवतारोंसे ज्येष्ठ सिद्ध होते हैं। वामन-अवतारके समय भगवान् इन्द्र-वरुण आदि देवताओंके छोटे भाई बने, इसलिये भी वरुणकी ज्येष्ठता सिद्ध होती है।
† जन्म, सत्ता, परिणाम, वृद्धि, क्षय और नाश—ये छः भावविकार प्राकृत शरीरके धर्म हैं । इनमें पहला भाव या धर्म 'जन्म' है, इसलिये यहाँ 'पूर्वधर्म' का अर्थ 'जन्म' किया गया है। नीलकण्ठने ऐसा ही माना है।
आग्नेयं वैष्णवं सौम्यं प्रकृत्यैवेदमार्दितः ।
त्वया सृष्टं जगदिदं स कथं मयि वर्तसे ॥ ७७ ॥
'उक्त प्रकृतिके द्वारा आपने ही पहले इस आग्नेय, वैष्णव एवं सौम्य अस्त्रकी सृष्टि की है और आपसे ही इस सम्पूर्ण जगत्की रचना हुई है, वे जगत्स्रष्टा परमात्मा होकर आप मेरे प्रति कैसा बर्ताव करते हैं ॥ ७७ ॥
अजेयः शाश्वतो देवः स्वयम्भूभूतभावनः ।
अक्षरं च क्षरं चैव भावाभावौ महाद्युते ॥ ७८ ॥
'महाद्युते ! आप अजेय, सनातन देवता, स्वयम्भू और भूतभावन हैं, अक्षर और क्षर तथा भाव और अभाव आप-हीके स्वरूप हैं ॥ ७८ ॥
रक्ष मां रक्षणीयोऽहं त्वयानघ नमोऽस्तु ते ।
आदिकर्तासि लोकानां त्वयैतद् बहुलीकृतम् ॥ ७९ ॥
'निष्पाप श्रीकृष्ण ! आप मेरी रक्षा कीजिये ! मैं आपके द्वारा संरक्षण पानेके योग्य हूँ, आपको नमस्कार है। आप समस्त लोकोंके आदिकर्ता हैं। आपने ही इस दृश्य जगत्का विस्तार किया है ॥ ७९ ॥
विक्रीडसि महादेव बालः क्रीडनकैरिव ।
न ह्यहं प्रकृतिद्वेषी नाहं प्रकृतिदूषकः ॥ ८० ॥
'महादेव ! जैसे बालक खिलौनोंसे खेलता है, उसी प्रकार आप इस जगत्के द्वारा क्रीड़ा करते हैं, आप ही इस जगत्की प्रकृति अर्थात् कारण हैं, न तो मैं आपसे द्वेष रखता हूँ और न आपपर दोषारोपण ही करता हूँ ॥ ८० ॥
प्रकृत्या विकारेषु वर्तते पुरुषर्षभ ।
तस्या विकारशमने वर्तसे त्वं महाद्युते ॥ ८१ ॥
'महातेजस्वी पुरुषोत्तम ! अहङ्कार आदि विकारोंमें जो प्रकृति (लोभ, द्वेषादि रूप पूर्ववासना) है, उसके विकारों (चोरी, हिंसा आदि दोषों) की शान्तिके लिये आप दुष्टोंका दमन आदि कार्य करते हैं ॥ ८१ ॥
विकारो वा विकाराणां विकाराय न तेऽनघ ।
तानधर्मविदो मन्दान् भवान् विकुरुते सदा ॥ ८२ ॥
'अनघ ! अथवा वे क्रोध आदि विकार विकारों (दुष्टों) के विकार (विनाश) के लिये ही होते हैं, आपको विकृत करनेके लिये नहीं। आप सदा उन अधर्मवेत्ता मूढ पुरुषोंका ही विनाश किया करते हैं (सत्पुरुषोंका नहीं) ॥ ८२ ॥
इदं प्रकृतिजैर्दोषैस्तमसा मुह्यते यदा ।
रजसा वापि संस्पृष्टं तदा मोहः प्रवर्तते ॥ ८३ ॥
'यह जगत् जब प्राकृत दोषों, तथा तमोगुणसे ग्रस्त होकर अपना विवेक खो बैठता है अथवा रजोगुणसे संयुक्त होकर संग्रह-परिग्रहमें व्यग्र हो जाता है, तब उसपर मोह छा जाता है ॥ ८३ ॥