भारतकोश
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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
[ विष्णुपर्व ]सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः७४१

तद् बलं ज्वलितं दृष्ट्वा वरुणः कृष्णमब्रवीत् ॥ ७१ ॥
स्मर स्वप्रकृतिं पूर्वामव्यक्तां व्यक्तलक्षणाम् ।
तमो जहि महाभाग तमसा मुह्यसे कथम् ॥ ७२ ॥

अपनी उस सेनाको जलती हुई देख वरुणने श्रीकृष्णसे कहा—'महाभाग ! आप अपनी उस पूर्व प्रकृतिका स्मरण कीजिये, जो व्यक्ताव्यक्त स्वरूप है। तमोगुणका नाश कीजिये, आप स्वयं तमोगुणसे क्यों मोहित हो रहे हैं ? ॥ ७१-७२ ॥

सत्त्वस्थो नित्यमासीस्त्वं योगीश्वर महामते ।
पञ्चभूताश्रयान् दोषानहंकारं च वर्जय ॥ ७३ ॥

'योगीश्वर ! महामते ! आप सदा ही सत्त्वगुणमें स्थित रहे हैं, अतः पञ्चभूतोंके आश्रित रहनेवाले अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—इन पाँच दोषों तथा अहंकारको त्याग दीजिये ॥ ७३ ॥

या या ते वैष्णवी मूर्तिस्तस्या ज्येष्ठो ह्यहं तव ।
ज्येष्ठभावेन मान्यो तु किंमां त्वं दग्धुमिच्छसि ॥ ७४ ॥

'आपकी जो-जो वैष्णवी मूर्ति है, उससे मैं ज्येष्ठ हूँ।* ज्येष्ठ होनेके नाते आपके आदरका पात्र हूँ, तो भी आप क्यों मुझे दग्ध करना चाहते हैं ? ॥ ७४ ॥

नाग्निर्विक्रमते ह्यग्नौ त्यज कोपं युधां वर ।
त्वयि न प्रभविष्यामि जगतः प्रभवो ह्यसि ॥ ७५ ॥

'योद्धाओंमे श्रेष्ठ श्रीकृष्ण ! आग आगपर अपना पराक्रम प्रकट नहीं करती है, अतः क्रोधको त्याग दीजिये। आपपर मेरी प्रभुता नहीं चल सकेगी, क्योंकि आप जगत्‌के आदि कारण हैं ॥ ७५ ॥

पूर्वं हि या त्वया सृष्टा प्रकृतिर्विकृतात्मिका ।
धर्मिणी वीजभावेन पूर्वं धर्मे समाश्रिता ॥ ७६ ॥

'पूर्वकालमें आपने जिस प्रकृति (माया) की सृष्टि की थी, वह महत्तत्त्व आदि विकारोंके रूपमें परिणत होनेवाली है, इसलिये परिणामधर्मिणी है। वह आपसे पूर्वधर्म (जन्म-भाव)† का आश्रय लेकर अर्थात् आपसे ही उत्पन्न होकर जगत्‌के कारणरूपसे विद्यमान है ॥ ७६ ॥


* भगवान् विष्णुके जितने अवतार हैं, उन सबमें मत्स्यावतार प्रथम माना गया है। यह अवतार जलमें हुआ था और जलके अधिष्ठाता वरुणदेव इसके पहलेसे विद्यमान थे, अतः ये सभी अवतारोंसे ज्येष्ठ सिद्ध होते हैं। वामन-अवतारके समय भगवान् इन्द्र-वरुण आदि देवताओंके छोटे भाई बने, इसलिये भी वरुणकी ज्येष्ठता सिद्ध होती है।
† जन्म, सत्ता, परिणाम, वृद्धि, क्षय और नाश—ये छः भावविकार प्राकृत शरीरके धर्म हैं । इनमें पहला भाव या धर्म 'जन्म' है, इसलिये यहाँ 'पूर्वधर्म' का अर्थ 'जन्म' किया गया है। नीलकण्ठने ऐसा ही माना है।

आग्नेयं वैष्णवं सौम्यं प्रकृत्यैवेदमार्दितः ।
त्वया सृष्टं जगदिदं स कथं मयि वर्तसे ॥ ७७ ॥

'उक्त प्रकृतिके द्वारा आपने ही पहले इस आग्नेय, वैष्णव एवं सौम्य अस्त्रकी सृष्टि की है और आपसे ही इस सम्पूर्ण जगत्‌की रचना हुई है, वे जगत्स्रष्टा परमात्मा होकर आप मेरे प्रति कैसा बर्ताव करते हैं ॥ ७७ ॥

अजेयः शाश्वतो देवः स्वयम्भूभूतभावनः ।
अक्षरं च क्षरं चैव भावाभावौ महाद्युते ॥ ७८ ॥

'महाद्युते ! आप अजेय, सनातन देवता, स्वयम्भू और भूतभावन हैं, अक्षर और क्षर तथा भाव और अभाव आप-हीके स्वरूप हैं ॥ ७८ ॥

रक्ष मां रक्षणीयोऽहं त्वयानघ नमोऽस्तु ते ।
आदिकर्तासि लोकानां त्वयैतद् बहुलीकृतम् ॥ ७९ ॥

'निष्पाप श्रीकृष्ण ! आप मेरी रक्षा कीजिये ! मैं आपके द्वारा संरक्षण पानेके योग्य हूँ, आपको नमस्कार है। आप समस्त लोकोंके आदिकर्ता हैं। आपने ही इस दृश्य जगत्‌का विस्तार किया है ॥ ७९ ॥

विक्रीडसि महादेव बालः क्रीडनकैरिव ।
न ह्यहं प्रकृतिद्वेषी नाहं प्रकृतिदूषकः ॥ ८० ॥

'महादेव ! जैसे बालक खिलौनोंसे खेलता है, उसी प्रकार आप इस जगत्‌के द्वारा क्रीड़ा करते हैं, आप ही इस जगत्‌की प्रकृति अर्थात् कारण हैं, न तो मैं आपसे द्वेष रखता हूँ और न आपपर दोषारोपण ही करता हूँ ॥ ८० ॥

प्रकृत्या विकारेषु वर्तते पुरुषर्षभ ।
तस्या विकारशमने वर्तसे त्वं महाद्युते ॥ ८१ ॥

'महातेजस्वी पुरुषोत्तम ! अहङ्कार आदि विकारोंमें जो प्रकृति (लोभ, द्वेषादि रूप पूर्ववासना) है, उसके विकारों (चोरी, हिंसा आदि दोषों) की शान्तिके लिये आप दुष्टोंका दमन आदि कार्य करते हैं ॥ ८१ ॥

विकारो वा विकाराणां विकाराय न तेऽनघ ।
तानधर्मविदो मन्दान् भवान् विकुरुते सदा ॥ ८२ ॥

'अनघ ! अथवा वे क्रोध आदि विकार विकारों (दुष्टों) के विकार (विनाश) के लिये ही होते हैं, आपको विकृत करनेके लिये नहीं। आप सदा उन अधर्मवेत्ता मूढ पुरुषोंका ही विनाश किया करते हैं (सत्पुरुषोंका नहीं) ॥ ८२ ॥

इदं प्रकृतिजैर्दोषैस्तमसा मुह्यते यदा ।
रजसा वापि संस्पृष्टं तदा मोहः प्रवर्तते ॥ ८३ ॥

'यह जगत् जब प्राकृत दोषों, तथा तमोगुणसे ग्रस्त होकर अपना विवेक खो बैठता है अथवा रजोगुणसे संयुक्त होकर संग्रह-परिग्रहमें व्यग्र हो जाता है, तब उसपर मोह छा जाता है ॥ ८३ ॥

७४२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

परावरज्ञः सर्वज्ञ ऐश्वर्यविधिमाश्रितः।
किं मोहयसि नः सर्वान् प्रजापतिरिव स्वयं ॥ ८४॥

'आप स्वयं प्रजापतिके समान कार्य और कारणके ज्ञाता, सर्वज्ञ तथा ऐश्वर्यविधिको आश्रय लेकर स्थित हैं, फिर भी हम सब लोगोंको मोहमें क्यों डाल रहे हैं?'॥ ८४॥

वरुणेनैवमुक्तस्तु कृष्णो लोकपरायणः।
भावज्ञः सर्वकृद् धीरस्ततः प्रीतमना ह्यभूत् ॥ ८५॥
इत्येवमुक्तः कृष्णस्तु प्रहसन् वाक्यमब्रवीत् ।

वरुणदेवके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण जगत्के आश्रय, हार्दिक भावके ज्ञाता, सर्वस्रष्टा एवं धीर स्वभाववाले भगवान् श्रीकृष्ण मन-ही-मन उनपर बहुत प्रसन्न हुए, उनकी पूर्वोक्त बात सुनकर वे हँसते हुए उनसे इस प्रकार बोले ॥ ८५ ½ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

गावः प्रयच्छ मे वीर शान्त्यर्थं भीमविक्रम ॥ ८६॥
इत्येवमुक्ते कृष्णेन वाक्यं वाक्यविशारदः।
वरुणो ह्यब्रवीद् भूयः शृणु मे मधुसूदन ॥ ८७॥

श्रीकृष्णने कहा—भयानक पराक्रमी वीर ! तुम इस विवादकी शान्तिके लिये ये गौएँ मुझे दे दो। श्रीकृष्णके ऐसी बात कहनेपर बातचीत करनेमें कुशल वरुणदेव पुनः इस प्रकार बोले—'मधुसूदन ! पहले मेरी बात सुन लीजिये' ॥

वरुण उवाच

बाणेन सार्धं समयो मया देव कृतः पुरा।
कथं च समयं कृत्वा कुर्यां विफलमन्यथा ॥ ८८॥

वरुणने कहा—देव ! मैंने पूर्वकालमें बाणासुरके साथ एक प्रतिज्ञा की है, वह प्रतिज्ञा करके उसके विपरीत आचरण-द्वारा मैं उसे निष्फल कैसे कर सकता हूँ ॥ ८८ ॥

त्वमेव वेद सर्वस्य यथा समयभेदकः।
चारित्रं दुष्यते तेन न च सद्भिः प्रशस्यते ॥ ८९॥

प्रतिज्ञा तोड़नेवाला कैसा होता है, इन सब बातोंको आप ही सबसे अधिक जानते हैं। प्रतिज्ञा तोड़नेसे चरित्र कलङ्कित होता है और साधु पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते ॥ ८९ ॥

धर्मभागिभिर्नरो नित्यं वर्ज्यते मधुसूदन।
न च लोकानवाप्नोति पापः समयभेदकः ॥ ९०॥

मधुसूदन ! धर्मात्मा पुरुष प्रतिज्ञा भङ्ग करनेवाले मनुष्यको सदाके लिये त्याग देते हैं, वह पापी उत्तम लोकोंको नहीं पाता ॥ ९० ॥

प्रसीद धर्मलोपश्च मा भून्मे मधुसूदन।
न मां समयभेदेन योक्तुमर्हसि माधव ॥ ९१॥

मधुसूदन ! प्रसन्न होइये ! मेरे धर्मका लोप न हो। माधव ! मुझे प्रतिज्ञा-भङ्गके पापसे संयुक्त न कीजिये ॥ ९१॥

जीवन्नाहं प्रदास्यामि गावो वै वृषभेक्षण।
हत्वा नयस्व मां गाव एष मे समयः पुरा ॥ ९२॥

वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले गोविन्द ! मैं जीते-जी इन गौओंको नहीं दूँगा। आप मेरा वध करके इन्हें ले जाइये। पूर्वकालमें मैंने यही प्रतिज्ञा की है ॥ ९२ ॥

एतच्च मे समाख्यातं समयं मधुसूदन।
सत्यमेव महाबाहो न मिथ्या तु सुरेश्वर ॥ ९३॥

'मधुसूदन ! महाबाहो ! यह मैंने अपनी प्रतिज्ञा कह सुनायी। सुरेश्वर ! यह सर्वथा सत्य ही है, मिथ्या नहीं है ॥

यद्येवाहमनुग्राह्यो रक्ष मां मधुसूदन।
अथवा गोषु निर्बन्धो हत्वा नय महाभुज ॥ ९४॥

महाबाहु मधुसूदन ! यदि मैं आपके अनुग्रहका पात्र हूँ, तो आप मेरी रक्षा कीजिये अथवा गौओंके लिये ही आग्रह हो, तो मुझे मारकर इन्हें ले जाइये ॥ ९४॥

वैशम्पायन उवाच

वरुणेनैवमुक्तस्तु यदूनां वंशवर्धनः।
अभेद्यं समयं मत्वा न्यस्तवादो गवां प्रति ॥ ९५॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वरुणदेवके ऐसा कहनेपर यदुवंशकी वृद्धि करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने उनकी प्रतिज्ञाको अभेद्य मानकर गौओंके लिये विवाद त्याग दिया ॥ ९५ ॥

स प्रहस्य ततो वाक्यं व्याजहारार्थकोविदः।
तस्मान्मुक्तोऽसि यद्येवं बाणेन समयः कृतः ॥ ९६॥

व्यवहारकुशल श्रीकृष्ण उस समय हँसकर बोले—'यदि आपने बाणासुरके साथ ऐसी प्रतिज्ञा कर ली है तो अब आप इस कलहसे मुक्त हैं' ॥ ९६ ॥

प्रश्रितैर्मधुरैर्वाक्यैस्तत्त्वार्थमधुभाषितैः।
कथं पापं करिष्यामि वरुण त्वय्यहं प्रभो ॥ ९७॥

फिर वे विनययुक्त मधुर वचनों तथा तात्त्विक अर्थसे युक्त मीठी बातोंद्वारा उन्हें प्रसन्न करते हुए बोले—'प्रभो ! वरुणदेव ! मैं आपके प्रति दुर्व्यवहार कैसे करूँगा ॥ ९७॥

गच्छ मुक्तोऽसि वरुण सत्यसंधोऽसि नो भवान्।
त्वत्प्रियार्थं मया मुक्ता बाणगावो न संशयः ॥ ९८॥

'वरुणदेव ! जाइये, अब आप मुक्त हैं। सत्यप्रतिज्ञ होनेके साथ ही हमारे सम्बन्धी हैं, आपका प्रिय करनेके लिये मैंने बाणासुरकी गौओंको छोड़ दिया, इसमें संशय नहीं है ॥ ९८॥

ततस्तूर्यनिनादैश्च भेरीणां च महास्वनैः।
अर्घ्यमादाय वरुणः केशवं प्रत्यपूजयत् ।

विष्णुपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७४३

केशवोऽर्घ्यं तदा गृह्य वरुणाद् यदुनन्दनः ॥ ९९ ॥

तदनन्तर वाद्योंकी ध्वनि और डंकोंकी बड़ी भारी आवाजके साथ वरुणदेवने अर्घ्य लेकर श्रीकृष्णका पूजन किया। यदुनन्दन श्रीकृष्णने वरुणसे वह अर्घ्य लेकर उनकी पूजा स्वीकार की ॥ ९९ ॥

बलं चापूजयद् देवः कुशलीव समाहितः ।
वरुणायाभयं दत्त्वा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १००॥
द्वारकां प्रस्थितः शौरिः शचीपतिसहायवान् ।

तत्पश्चात् वरुणदेवने सकुशल पुरुषकी भाँति एकाग्र-चित्त हो बलभद्रजीका भी पूजन किया। फिर प्रतापी शूरनन्दन श्रीकृष्ण वरुणदेवको अभयदान देकर शचीपति इन्द्रके साथ द्वारकाको प्रस्थित हुए ॥ १०० १/२ ॥

तत्र देवाः समरुतः साध्याः सिद्धचारणाः ॥ १०१॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव किन्नराश्चान्तरिक्षगाः ।
अनुगच्छन्ति भूतेशं सर्वभूतादिमव्ययम् ॥ १०२॥

वहाँ सम्पूर्ण भूतोंके आदिकारण, अविनाशी, भूतनाथ श्रीकृष्णके पीछे-पीछे देवता, मरुद्गण, साध्यगण, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा तथा किन्नर भी आकाशमार्गसे चल रहे थे ॥ १०१-१०२ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ यक्षराक्षसाः ।
विद्याधरगणाश्चैव ये चान्ये सिद्धचारणाः ।
गच्छन्तमनुगच्छन्ति यशसा विजयेन च ॥ १०३॥

आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, यक्ष, राक्षस, विद्याधर तथा जो अन्य सिद्ध-चारण थे, वे सब यश और विजयके साथ यात्रा करते हुए श्रीकृष्णका अनुसरण कर रहे थे ॥ १०३ ॥

नारदश्च महाभागः प्रस्थितो द्वारकां प्रति ।
तुष्टो वाणजयं दृष्ट्वा वरुणं च कृतप्रियम् ॥ १०४॥

महाभाग नारद भी द्वारकाको ही प्रस्थान कर रहे थे। वे श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और वरुणके प्रिय कार्यका सम्पादन देखकर बहुत संतुष्ट थे ॥ १०४ ॥

कैलासशिखरप्रख्यैः प्रासादैः कन्दरैः शुभैः ।
दूराद्विशाम्य मधुहा द्वारकां द्वारमालिनीम् ॥ १०५॥
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं चक्रे चक्रगदाधरः ।
संज्ञां प्रयच्छते देवो द्वारकापुरवासिनाम् ॥ १०६॥

तदनन्तर चक्र और गदा धारण करनेवाले मधुसूदनने द्वारमालाओंसे अलंकृत तथा कैलासशिखरके समान कान्ति-मान् प्रासादों और सुन्दर कन्दराओंसे सुशोभित द्वारकापुरी-को दूरसे ही देखकर पाञ्चजन्य शङ्खका गम्भीर घोष किया। इस प्रकार भगवान् वासुदेवने द्वारकावासियोंको अपने आग-मनकी सूचना प्रदान की ॥ १०५-१०६ ॥

देवानुयाननिर्घोषं पाञ्चजन्यस्य निस्वनम् ।
श्रुत्वा द्वारवती सर्वा प्रहर्षमतुलं गता ॥ १०७॥

पीछे-पीछे आनेवाले देवताओंके विमानोंका गम्भीर घोष और पाञ्चजन्य शङ्खकी ध्वनि सुनकर सारी द्वारकापुरी अनुपम प्रसन्नतासे फूल उठी ॥ १०७ ॥

पूर्णकुम्भैश्च लाजैश्च बहुविन्यस्तविस्तरैः ।
द्वारोपशोभितां कृत्वा सर्वां द्वारवतीं पुरीम् ॥ १०८॥

नगरनिवासियोंने द्वारकापुरीके सभी द्वारोंपर जलसे भरे हुए कलश रखे, खील बिखेरे तथा बड़े विस्तारके साथ अनेक प्रकारकी सजावटें कीं। यह सब करके उन्होंने सम्पूर्ण नगरीको अभिनव शोभासे सम्पन्न कर दिया ॥ १०८ ॥

सुश्लिष्टरथ्यां सश्रीकां बहुरत्नोपशोभिताम् ।
विप्राश्चार्घ्यं समादाय तथैव कुलनैगमाः ॥ १०९॥
जयशब्दैश्च विविधैः पूजयन्ति स्म माधवम् ।
वैनतेये तमासीनं नीलाञ्जनचयोपमम् ॥ ११०॥

गलियाँ और सड़कें खूब झाड़-बुहारकर स्वच्छ एवं सुसज्जित कर दी गयीं, सारी पुरीकी शोभा बढ़ा दी गयी तथा उसे अनेक प्रकारके रत्नोंसे सजा दिया गया, ब्राह्मण तथा कुलाचारके ज्ञाता पुरोहित आदि अर्घ्य लेकर नाना प्रकारसे जय-जयकार करते हुए नीली अञ्जनराशिके समान श्यामसुन्दर माधवकी, जो गरुड़पर विराजमान थे, पूजा करने लगे ॥

ववन्दिरे तदा कृष्णं श्रिया परमया युतम् ।
तमानुपूर्व्या वर्णाश्च पूजयन्ति महाबलम् ॥ १११॥
अनन्तं केशहन्तारं श्रेष्ठिपूर्वाश्च श्रेणयः ।

उस समय सबने उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न भगवान् श्रीकृष्णकी वन्दना की। सभी वर्णोंके लोग, महाबली अनन्त (बलराम) एवं केशिहन्ता श्रीकृष्णकी क्रमशः पूजा करने लगे, सेठ आदि व्यापारियोंने भी उनका पूजन किया ॥

ऋषिभिर्देवगन्धर्वैश्चारणैश्च समन्ततः ॥ ११२॥
स्तूयते पुण्डरीकाक्षो द्वारकोपवने स्थितः ।

उस अवसरपर द्वारकाके उपवनमें ठहरे हुए कमलनयन श्रीकृष्णकी ऋषि, देवता, गन्धर्व और चारण आदि सब ओरसे स्तुति कर रहे थे ॥ ११२ १/२ ॥

तदाश्चर्यमपश्यन्त दाशार्हगणसत्तमाः ॥ ११३॥
प्रहर्षमतुलं प्राप्ता दृष्ट्वा कृष्णं महाभुजम् ।
वाणं जित्वा महादेवमायान्तं पुरुषोत्तमम् ॥ ११४॥

यदुकुलके श्रेष्ठ पुरुषोंने उस आश्चर्यको अपनी आँखों देखा था। बाणासुरको जीतकर लौटे हुए महान् देवता महाबाहु पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको देखकर उन्हें अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ था ॥ ११३-११४ ॥

७४४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

द्वारकावासिनां वाचश्चरन्ति बहुधा तदा।
प्राप्ते कृष्णे महाभागे यादवानां महारथे ॥११५॥
यादव-महारथी महाभाग श्रीकृष्णके लौट आनेपर द्वारका-वासियोंके मुखसे उस समय नाना प्रकारकी बातें निकलने लगीं—॥ ११५ ॥

गत्वा च दूरमध्वानं सुपर्णो द्रुतमागतः।
धन्याः स्मोऽनुगृहीताः स्मो येषां वै जगतः पिता ॥११६॥
रक्षिता चैव गोप्ता च दीर्घबाहुर्महाभुजः।
वैनतेयं समारुह्य जित्वा वाणं सुदुर्जयम् ॥११७॥
प्राप्तोऽयं पुण्डरीकाक्षो मनांस्याह्लादयन्निव।
'ये गरुड़ बहुत दूरके मार्गपर जाकर शीघ्र ही लौट आये। हम धन्य हैं और भगवान्‌के द्वारा अनुगृहीत हैं, जिनके रक्षक और पालक लंबी भुजावाले जगत्पिता महाबाहु श्रीकृष्ण हैं। गरुड़पर आरूढ़ हो अत्यन्त दुर्जय बाणासुरको जीतकर ये कमलनयन श्रीकृष्ण हमारे मनको आह्लादित करते हुए-से यहाँ आ पहुँचे हैं' ॥ ११६-११७॥

एवं कथयतामेव द्वारकावासिनां तदा ॥११८॥
वासुदेवगृहं देवा विविशुस्ते महारथाः।
जब द्वारकावासी इस प्रकारकी बातें कह रहे थे, उस समय वे महारथी देवगण भगवान् श्रीकृष्णके भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ ११८॥

अवतीर्य सुपर्णात् तु वासुदेवो बलस्तदा ॥११९॥
प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च गृहान् प्रविशंस्तदा।
वहाँ पहुँचनेपर बलराम, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध भी तत्काल गरुड़से उतरकर अपने-अपने घरोंमें गये ॥११९॥

ततो देवविमानानि संचरन्ति तदा दिवम् ॥१२०॥
अवस्थितानि दृश्यन्ते नानारूपाणि सर्वशः।
तदनन्तर देवताओंके विमान, जो आकाशमें विचरते थे, उस समय वहाँ स्थिर दिखायी देने लगे; उन सबके स्वरूप नाना प्रकारके थे ॥ ॥ १२०॥

हंसर्षभमृगैर्नागैर्वाजिसारसवर्हिणैः ॥१२१॥
भास्वन्ति तानि दृश्यन्ते विमानानि सहस्रशः।
हंस, वृषभ, मृग, हाथी, घोड़े, सारस और मोर आदि-से युक्त वे सहस्रों तेजस्वी विमान वहाँ दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ १२१॥

अथ कृष्णोऽब्रवीद्वाक्यं कुमारांस्तान् सहस्रशः।
प्रद्युम्नादीन् समस्तांस्तु श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥१२२॥
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने सहस्रोंकी संख्यामें उपस्थित हुए प्रद्युम्न आदि समस्त यादवकुमारोंसे स्निग्ध एवं मधुर वाणीमें कहा—॥ १२२ ॥

एते रुद्रास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथाश्विनावपि।
साध्या देवास्तथान्ये च वन्दध्वं च यथाक्रमम् ॥१२३॥
'बच्चो ! ये रुद्र, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, साध्य-गण तथा अन्य देवता यहाँ पधारे हैं, तुमलोग क्रमशः इन सबकी वन्दना करो ॥ १२३ ॥

सहस्राक्षं महाभागं दानवानां भयंकरम्।
वन्दध्वं सहिताः शक्रं सगशं नागवाहनम् ॥१२४॥
'दानवोंको भय देनेवाले सहस्र नेत्रधारी महाभाग इन्द्र ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो अपने सेवकगणोंके साथ पधारे हैं, तुम एक साथ होकर इनकी भी वन्दना करो ॥ १२४ ॥

सप्तर्षयो महाभागा भृग्वाङ्गिरसमाश्रिताः।
ऋषयश्च महात्मानो वन्दध्वं च यथाक्रमम् ॥१२५॥
'ये महाभाग सप्तर्षि भृगु और बृहस्पति के पास खड़े हैं, अन्यान्य महात्मा ऋषि भी पधारे हैं; तुमलोग क्रमशः इन सबकी वन्दना करो ॥ १२५ ॥

एते चक्रधराश्चैव तान् वन्दध्वं च सर्वशः।
सागराश्च ह्रदाश्चैव मत्प्रियार्थमिहागताः ॥१२६॥
दिशश्च विदिशश्चैव वन्दध्वं च यथाक्रमम्।
'ये समस्त चक्रधारी (लोकपाल) खड़े हैं, इन सबको प्रणाम करो। सागर, सरोवर, दिशा और विदिशाएँ—ये सब मेरा प्रिय करनेके लिये यहाँ पधारे हैं, तुमलोग क्रमशः इनकी वन्दना करो ॥ १२६॥

वासुकिप्रमुखाश्चैव नागा वै सुमहाबलाः ॥१२७॥
गावश्च मत्प्रियार्थं वै वन्दध्वं च यथाक्रमम्।
'वासुकि आदि महाबली नाग तथा गौएँ मेरा प्रिय करनेके लिये आयी हैं, तुमलोग क्रमशः इन्हें प्रणाम करो ॥

ज्योतींषि सह नक्षत्रैर्यक्षराक्षसकिन्नरैः ॥१२८॥
आगता मत्प्रियार्थे वै वन्दध्वं च यथाक्रमम्।
'नक्षत्रोंसहित ग्रह और तारे, यक्ष, राक्षस और किन्नर—ये सभी मेरा प्रिय करनेके लिये यहाँ आये हैं, तुम क्रमशः इनकी वन्दना करो' ॥ १२८ ॥

वासुदेववचः श्रुत्वा कुमाराः प्रणताः स्थिताः ॥ १२९॥
यथाक्रमेण सर्वेषां देवतानां महात्मनाम्।
भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर वे समस्त यादव-कुमार क्रमशः सभी देवताओं और महात्माओंको प्रणाम करके खड़े हो गये ॥ १२९॥

सर्वान् दिवौकसो दृष्ट्वा पौरा विस्मयमागताः ॥१३०॥
पूजार्थमथ सम्भारान् प्रगृह्य द्रुतमागताः।
समस्त देवताओंको वहाँ उपस्थित देख पुरवासियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे पूजाकी सामग्री लेकर शीघ्रतापूर्वक वहाँ आये ॥ १३० ॥

अहो सुमहदाश्चर्यं वासुदेवस्य संश्रयात् ॥१३१॥
प्राप्यते यदिहास्माभिरिति वाचश्चरन्त्युत।

विष्णुपूर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७४५


उस समय उनके मुखसे निम्नाङ्कित बातें निकल रही थीं—'अहो ! भगवान् वासुदेवका आश्रय लेनेसे हमें महान् आश्चर्यकी वस्तु देखनेको मिल रही है' ॥ १३१ १/२ ॥
ततश्चन्दनचूर्णैश्च गन्धपुष्पैश्च सर्वशः ॥ १३२॥
किरन्ति पौराः सर्वांस्तान् पूजयन्तो दिवौकसः ।
तदनन्तर समस्त देवताओंकी पूजा करते हुए पुरवासी वहाँ सब ओर चन्दनके चूर्ण और सुगन्धित पुष्प बिखेरने लगे ॥
लाजैः प्रणामैर्धूपैश्च वाद्यध्वनियमैस्तथा ॥ १३३॥
द्वारकावासिनः सर्वै पूजयन्ति दिवौकसः ।
उन्होंने खील चढ़ाये, बारंबार प्रणाम किये, धूप-दीप आदि निवेदन किये, भाँति-भाँतिके वाद्योंकी ध्वनि की और अहिंसा आदि यमोंका पालन किया, इस प्रकार समस्त द्वारकावासियोंने देवताओंकी पूजा की ॥ १३३ १/२ ॥
आहुकं वासुदेवं च साम्बं च यदुनन्दनम् ॥ १३४॥
सात्यकिं चोल्मुकं चैव विपृथुं च महाबलम् ।
अक्रूरं च महाभागं तथा निशठमेव च ॥ १३५॥
एतान् परिष्वज्य तदा मूर्ध्नि चाघ्राय वासवः ।
अथ शक्रो महाभागः समक्षं यदुमण्डले ॥ १३६॥
स्तुवन्तं केशिहन्तारं तत्रोवाचोत्तरं वचः ।
इसके बाद देवराज इन्द्रने राजा उग्रसेन, भगवान् वासुदेव, यदुनन्दन साम्ब, सात्यकि, उल्मुक, महाबली विपृथु, महाभाग अक्रूर तथा निशठ—इन सबको हृदयसे लगाकर मस्तक सूँघा, फिर उन महाभाग इन्द्रने सारी यदु-मण्डलीके समक्ष अपनी (इन्द्रकी) स्तुति करते हुए केशि-हन्ता भगवान् श्रीकृष्णको उत्तर देते हुए उनके विषयमें वहाँ इस प्रकार उत्कृष्ट बात कही—॥ १३४-१३६ १/२ ॥
सात्वतः सात्वतामेष सर्वेषां यदुनन्दनः ॥ १३७॥
मोक्षयित्वा रणे चैव यशसा पौरुषेण च ।
महादेवस्य मिषतो गुहस्य च महात्मनः ॥ १३८॥
एष बाणं रणे जित्वा द्वारकां पुनरागतः ।
'ये श्रीकृष्ण समस्त सात्वतवंशी यादवोंमें सर्वश्रेष्ठ सात्वत हैं। इन्होंने रणभूमिमे अपने यश और पुरुषार्थके द्वारा यदुनन्दन अनिरुद्धको बन्धनमुक्त कराकर महादेवजी तथा महामना कार्तिकेयके देखते-देखते संग्राममे बाणासुरको परास्त करके पुनः द्वारकामे पदार्पण किया है ॥ १३७-१३८ १/२ ॥
सहस्रबाहोर्बाहूनां कृत्वा द्वयमनुत्तमम् ॥ ३९॥
स्थापयित्वा द्विबाहुत्वे प्राप्तोऽयं स्वपुरं हरिः ।
'सहस्र भुजाओंसे युक्त बाणासुरके लिये इन्होंने दो ही परम उत्तम भुजाएँ शेष छोड़ दीं और उसे द्विबाहुके पदपर प्रतिष्ठित करके ये श्रीहरि अपनी पुरीमें पधारे हैं ॥ १३९ १/२ ॥


यदर्थं जन्म कृष्णस्य मानुषेषु महात्मनः ॥ १४०॥
तदप्यवसितं कार्यं नष्टशोका वयं कृताः ।
'जिसके लिये मनुष्योंमे महात्मा श्रीकृष्णका अवतार हुआ था, वह कार्य भी अब पूरा हो गया; इन्होंने हम देवताओंके सारे शोक नष्ट कर दिये ॥ १४० १/२ ॥
पिवतां मधु माध्वीकं भवतां प्रीतिपूर्वकम् ॥ १४१॥
कालो यास्यत्यविरतं विषयेष्वेव सज्जताम् ।
'यादवो ! अब मधुर मधुपान करते और निरन्तर मनोवाञ्छित विषयोंका ही सुख भोगते हुए तुमलोगोंका समय बड़ी प्रसन्नताके साथ बीतेगा ॥ १४१ १/२ ॥
बाहूनां संश्रयात् सर्वे वयमस्य महात्मनः ॥ १४२॥
प्रणष्टशोका रंस्यामः सर्वे एव यथासुखम् ।
'हम सब देवता इन महात्मा श्रीकृष्णकी भुजाओंका आश्रय लेनेसे सर्वथा शोकहीन हो गये। अब हम सभी सुखपूर्वक स्वर्गलोकमें रमण करेंगे' ॥ १४२ १/२ ॥
एवं स्तुत्वा सहस्राक्षः केशवं दानवान्तकम् ॥ १४३॥
आपृच्छथ तं महाभागः सर्वदेवगणैर्वृतः ।
ततः पुनः परिष्वज्य कृष्णं लोकनमस्कृतम् ।
पुरंदरो दिवं यातः सह देवमरुद्गणैः ॥ १४४॥
इस प्रकार दानवविनाशक भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करके सम्पूर्ण देवताओसे घिरे हुए महाभाग इन्द्रने उनसे जानेके लिये आज्ञा माँगी, तत्पश्चात् विश्ववन्दित श्रीकृष्णको पुनः हृदयसे लगाकर इन्द्र देवताओं और मरुद्गणोंके साथ स्वर्गलोकको चले गये ॥ १४३-१४४ ॥
ऋषयश्च महात्मानो जयाशीर्भिर्महौजसम् ।
यथागतं पुनर्याता यक्षराक्षसकिंनराः ॥ १४५॥
महात्मा ऋषि भी विजयसूचक आशीर्वादोंसे महाबली श्रीकृष्णका अभिनन्दन करके जैसे आये थे, वैसे फिर चले गये। इसी तरह यक्ष, राक्षस और किन्नर भी अपने-अपने स्थानको लौट गये ॥ १४५ ॥
पुरंदरे दिवं याते पद्मनाभो महाबलः ।
अपृच्छत महाभागः सर्वान् कुशलमव्ययम् ॥ १४६॥
देवराज इन्द्रके स्वर्गलोकको चले जानेपर महाबली, महाभाग, पद्मनाभ श्रीकृष्णने समस्त यादवोंका कुशल-मङ्गल पूछा ॥ १४६ ॥
ततः किलकिलाशब्दं निर्वमन्तः सहस्रशः ।
गच्छन्ति कौमुदीं द्रष्टुं सोऽनघः प्रीयते सदा ॥ १४७॥
तदनन्तर सहस्रों पुरवासी किलकारियाँ भरते और आश्चर्य प्रकट करते हुए श्रीकृष्णके मुखचन्द्रकी चन्द्रिकाका दर्शन करनेके लिये आने-जाने लगे। निष्पाप श्रीकृष्ण उनकी

७४६ श्रीमहाभारते खिलभाग [ हरिवंशे उस प्रेमभक्तिसे सदा प्रसन्न रहते थे ॥ १४७ ॥ द्वारकामें आकर उत्तम लक्ष्मीसे संयुक्त हुए भगवान् द्वारकां प्राप्य कृष्णस्तु रेमे यदुगणैः सह । श्रीकृष्ण नाना प्रकारके सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंका सद्- विविधान् सर्वकामार्थांश्छ्रिया परमया युतः ॥ १४८॥ पयोग करते हुए यादवोंके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि द्वारकाप्रत्यागमने सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकामें पुनरागमनविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥ अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः द्वारकामें उत्सव, उषाका अन्तःपुरमें प्रवेश और सत्कार, श्रीकृष्ण और विष्णुपर्वकी महिमा तथा पर्वका उपसंहार वैशम्पायन उवाच वाद्यन्ति पुरे तत्र नार्यो मदवशं गताः । अथाहुको महाबाहुः कृष्णं प्राह महाद्युतिः । नृत्यन्ते चाप्सरास्तत्र गायन्ति च तथापराः॥ ७ ॥ हर्षोद्रुतफुल्लनयनः श्रूयतां यदुनन्दन ॥ १ ॥ वहाँ नगरकी नारियाँ मदमत्त होकर बाजे बजाने वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर लगीं, कुछ अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और दूसरी गीत महाबाहु महातेजस्वी उग्रसेनने, जिनके नेत्र हर्षसे खिल उठे गाने लगीं ॥ ७ ॥ थे, भगवान् श्रीकृष्णसे कहा-यदुनन्दन ! सुनिये ॥ १ ॥ काश्चित् प्रमुदितास्तत्र काश्चिदन्योन्यमब्रुवन् । एवं गतेऽनिरुद्धस्य क्रियतां महदुत्सवः । नानावर्णावरधराः क्रीडमानास्ततस्ततः ॥ ८ ॥ क्षेमात् प्रत्यागतं दृष्ट्वा सेव्यमाना महामते ॥ २ ॥ कुछ स्त्रियाँ वहाँ आनन्द-विनोदमें मग्न थीं, कुछ उषापि च महाभागा सखीभिः परिवारिता । आपसमें बातें कर रहीं थीं तथा बहुत-सी स्त्रियाँ नाना प्रकार- रमते परया प्रीत्या चानिरुद्धेन संगता ॥ ३ ॥ के वस्त्र धारण किये इधर-उधर भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करती 'महामते ! जब अनिरुद्ध कुशलपूर्वक द्वारका लौट थीं ॥ ८ ॥ आये और उन्हें देख लिया गया, ऐसी दशामें उनके लिये अभियान्ति ततोऽन्योन्यं काश्चिन्मदवशात् स्वयम्। कोई महान् उत्सव रचाया जाय-ऐसा मेरा विचार है। क्रीडन्ति काश्चिदक्षैस्तु हर्षोद्रुतफुल्ललोचनाः ॥ ९ ॥ महाभागा उषा भी सखियोंसे सेवित हो उनसे घिरी रहती है कितनी ही स्त्रियाँ यौवनमदके वशीभूत हो स्वयं ही और अनिरुद्धसे मिलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ आनन्दपूर्वक परस्पर आलिङ्गन करती थीं और कितनी द्यूतक्रीड़ामें लगी समय बिताती है ॥ २-३ ॥ हुई थीं, उन सबके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे ॥ ९ ॥ कुम्भाण्डदुहिता रामा उषायाः सखिमण्डले । मायूरं रथमारुह्य सखीभिः परिवारिता । प्रवेश्यतां महाभागा वैदर्भी वर्द्धयेत् पुनः ॥ ४ ॥ उषा सम्प्रेषिता देव्या रुद्राण्या प्रतिगृह्यताम् ॥ १० ॥ 'उषाकी सखियोंके समुदायमें जो कुम्भाण्डकी पुत्री इयं चैव कुलश्लाघ्या नाम्नोषा सुन्दरी वरा । रामा है, उसका अन्तःपुरमें प्रवेश कराया जाय और वाणपुत्री तव वधूः प्रतिगृह्णीष्व भामिनीम् ॥ ११ ॥ महाभागा विदर्भनन्दिनी रुक्मिणी पुनः अपनी पुत्रवधूके ( जब पहले-पहल उषाका रथ द्वारपर आया । उस रूपमें उसका अभिनन्दन करें ॥ ४ ॥ समय भगवान् श्रीकृष्णने रुक्मिणीसे कहा--) 'देवि ! रुद्र- साम्बाय दीयतां रामा कुम्भाण्डदुहिता शुभा । पत्नी पार्वतीदेवीने सखियोंसे घिरी हुई उषाको मयूरयुक्त शेषाश्च कन्या न्यस्यन्तां कुमाराणां यथाक्रमम् ॥ ५ ॥ रथपर चढ़ाकर यहाँ भेजा है। तुम इसे ग्रहण करो। 'कुम्भाण्डकी शुभलक्षणा कन्या रामा साम्बको विवाह उत्तम कुलकी दृष्टिसे यह हमारे लिये स्पृहणीय है। इस श्रेष्ठ दी जाय और शेष कन्याएँ भी क्रमशः अन्यान्य कुमारोंको एवं सुन्दरी कन्याका नाम उषा है । यह बाणासुरकी पुत्री सौंप दी जायें' ॥ ५ ॥ और तुम्हारी बहू है, तुम इस भामिनीको सादर ग्रहण वर्तते सोत्सवस्तत्र अनिरुद्धस्य वेश्मनि । करो' ॥ १०-११ ॥ गृहे श्रीधन्वनश्चैव शुभस्तत्र प्रवर्त्तते ॥ ६ ॥ ततः प्रतिगृहीता सा स्त्रीभिराचारमङ्गलैः । ( उग्रसेनके ऐसा कहनेपर) अनिरुद्ध और श्रीधन्वाके प्रवेशिता च सा वेश्म अनिरुद्धस्य शोभना ॥ १२ ॥ भवनमें उस शुभ उत्सवका आरम्भ हुआ ॥ ६ ॥ तत्र अन्तःपुरकी स्त्रियोंने मङ्गलाचारपूर्वक उस सुन्दरी

विष्णुपर्व ] अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७४७

बहूको ग्रहण किया और उसे अनिरुद्धके महलमें पहुँचाया ॥ १२ ॥
देवकी रोहिणी चैव रुक्मिण्यथ विदर्भजा ।
दृष्ट्वानिरुद्धं रोदन्त्यः स्नेहहर्षसमन्विताः ॥ १३ ॥
देवकी, रोहिणी, रुक्मिणी और शुभाङ्गी आदि स्त्रियाँ अनिरुद्धको देखकर स्नेह और हर्षसे विह्वल हो रोने लगीं ॥ १३ ॥
रेवती रुक्मिणी चैव गृहमुल्यं प्रवेशयत् ।
वधूर्वर्धसि दिष्ट्या त्वमनिरुद्धस्य दर्शनात् ॥ १४ ॥
रेवती और रुक्मिणीने अनिरुद्धको उनके श्रेष्ठ भवनमें पहुँचाया और प्रद्युम्नपत्नी शुभाङ्गीसे कहा—'बहू ! आज तुम अपने पुत्र अनिरुद्धको देखकर अभ्युदयशालिनी हुई हो। यह बड़े सौभाग्यकी बात है' ॥ १४ ॥
ततस्तूर्यप्रणादैस्ता वरनार्यः शुभाननाः ।
क्रियामारेभिरे कर्तुमुषा च गृहसंस्थिता ॥ १५ ॥
तदनन्तर सुन्दर मुखवाली वे सुन्दरी स्त्रियाँ नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ कुलाचारका सम्पादन करने लगीं और उषा घरके भीतर विराजमान हुई ॥ १५ ॥
ततो हर्म्यतलस्था सा वृष्णिपुङ्गवसंस्थिता ।
रमते सर्वसदृशैरुपभोगैर्वरानना ॥ १६ ॥
सुमुखी उषा अट्टालिकामें वृष्णिपुङ्गव अनिरुद्धके साथ रहकर अपने योग्य समस्त उपभोगोंके द्वारा आनन्दपूर्वक समय बिताने लगी ॥ १६ ॥
चित्रलेखा च सुश्रोणी अप्सरारूपधारिणी ।
आपृच्छथ च सखीवर्गमुषां च त्रिदिवं गता ॥ १७ ॥
सुन्दर कटिप्रदेशवाली अप्सरारूपधारिणी चित्रलेखा उषा तथा अन्य सखियोंसे विदा ले स्वर्गलोकको चली गयी ॥ १७ ॥
गतासु तासु सर्वासु सखीष्वसुरसुन्दरी ।
मायावत्या गृहं नीता प्रथमं सा निमन्त्रिता ॥ १८ ॥
उन सब सखियोंके चले जानेपर असुरसुन्दरी उषाको सबसे पहले मायावतीने निमन्त्रित किया और वह उसे अपने घरमें ले गयी ॥ १८ ॥
सा तु प्रद्युम्नगृहिणी स्नुषां दृष्ट्वा सुमध्यमा ।
वासोभिरन्नपानैश्च पूजयामास सुन्दरीम् ॥ १९ ॥
प्रद्युम्नरती सुमध्यमा मायावतीने उस सुन्दरी पुत्रवधू- को देखकर अन्न, पान और वस्त्र आदिके द्वारा उसका सत्कार किया ॥ १९ ॥
ततः क्रमेण सर्वास्ता वधूमूषां यदुस्त्रियः ।
आचारमनुपश्यन्त्यः स्वधर्ममुपचक्रिरे ॥ २० ॥
तदनन्तर यदुकुलकी सभी स्त्रियोने अपने कुलाचारपर दृष्टि रखकर क्रमशः बहू उषाको बुलाया और स्वधर्मका पालन किया ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच
एतत् ते सर्वमाख्यातं मया कुरुकुलोद्वह ।
यथा बाणो जितः संख्ये जीवन्मुक्तश्च विष्णुना ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुकुलधुरन्धर जनमेजय ! भगवान् श्रीकृष्णने युद्धमें जिस प्रकार बाणासुर- को जीता और जीवित छोड़ दिया, यह सब प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया ॥ २१ ॥
द्वारकायां ततः कृष्णो रेमे यदुगणैर्वृतः ।
अन्वशासन्महीं कृत्स्नां परया संयुतो मुदा ॥ २२ ॥
तदनन्तर यादवोंसे घिरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकामें सुखपूर्वक रहने लगे। वे परमानन्दसे सम्पन्न होकर समस्त भूमण्डलका अनुशासन करते थे ॥ २२ ॥
एवमेषोऽवतीर्णो वै पृथिवीं पृथिवीपते ।
विष्णुर्यदुकुलश्रेष्ठो वासुदेवेति विश्रुतः ॥ २३ ॥
पृथिवीनाथ ! इस प्रकार ये भगवान् विष्णु पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर यदुकुलशिरोमणि वासुदेवके नामसे विख्यात हुए थे ॥ २३ ॥
एतैश्च कारणैः श्रीमान् वसुदेवकुले प्रभुः ।
जातो वृष्णिषु देवक्यां यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २४ ॥
इन्हीं सब कारणोंसे श्रीमान् भगवान् विष्णु वृष्णिवंशके अन्तर्गत वसुदेवकुलमें देवकीदेवीके गर्भसे प्रकट हुए । जिसके विषयमें तुमने मुझसे प्रश्न किया था ॥ २४ ॥
निवृत्ते नारदप्रश्ने यन्मयोक्तं समासतः ।
श्रुतास्ते विस्तराः सर्वे ये पूर्वं जनमेजय ॥ २५ ॥
जनमेजय ! नारदजीके प्रश्नका उत्तर मिल जानेसे जब वह प्रश्न निवृत्त हो गया, उस समय मैंने उसके विषयमें संक्षेपसे जो कुछ कहा था, वे सारी बातें तुम पहले विस्तार-पूर्वक सुन चुके हो * ॥ २५ ॥
विष्णोस्तु माथुरे कल्पे यन्न्र ते संशयो महान् ।
वासुदेवगतिश्चैव सा मया समुदाहृता ॥ २६ ॥
भगवान् विष्णुके मधुरामें होनेवाले अवतारके विषयमें तुम्हे महान् संदेह था, उसके समाधानके लिये मैंने वासुदेवके स्वरूपका एवं वासुदेव ही सबकी परम गति (आश्रय) हैं, इस सिद्धान्तका भलीभाँति प्रतिपादन कर दिया ॥ २६ ॥
आश्चर्यं चैव नान्यद् वै कृष्णश्चाश्चर्यसंनिधिः ।
सर्वेष्वाश्चर्यकल्पेषु नास्त्याश्चर्यमवैष्णवम् ॥ २७ ॥
श्रीकृष्णके सिवा दूसरी कोई आश्चर्यकी वस्तु नहीं है। श्रीकृष्ण ही आश्चर्यके अधिष्ठान या समुद्र हैं। समस्त आश्चर्य-


* विष्णुपर्वके एक सौ दसवें अध्यायमें धन्योपाख्यान आया है, उसमें सबसे बढकर धन्य कौन है ? यह नारदजीकी जिज्ञासा निवृत्त हुई है, उसीकी ओर यहां संकेत किया गया है।

७४८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मय वस्तुओंमें ऐसा कोई आश्चर्य नहीं है, जो भगवान् विष्णुके अंशसे शून्य हो ॥ २७ ॥

एष धन्यो हि धन्यानां धन्यकृद् धन्यभावनः।
देवेषु तु सदैत्येषु नास्ति धन्यतरोऽच्युतात् ॥ २८ ॥
ये श्रीकृष्ण धन्य हैं, ये ही धन्योंको धन्य बनानेवाले और धन्यभावन हैं, देवताओं तथा दैत्योंमें इन भगवान् अच्युतसे बढ़कर धन्य दूसरा कोई नहीं है ॥ २८ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ मरुतस्तथा।
गगनं भूर्दिशश्चैव सलिलं ज्योतिरेव च ॥ २९ ॥
ये ही आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, आकाश, भूमि, दिशा, जल और तेज हैं ॥ २९ ॥

एष धाता विधाता च संहर्ता चैव नित्यशः।
सत्यं धर्मस्तपश्चैव ब्रह्मा चैव पितामहः ॥ ३० ॥
ये ही धाता, विधाता और नित्यसंहर्ता हैं, सत्य, धर्म, तपस्या तथा पितामह ब्रह्मा. भी ये ही हैं ॥ ३० ॥

अनन्तश्चैव नागानां रुद्राणां शंकरः स्मृतः।
जङ्गमाजङ्गमं चैव जगन्नारायणोद्भवम् ॥ ३१ ॥
ये नागोंमें अनन्त और रुद्रोंमें शङ्कर माने गये हैं। यह समस्त चराचर जगत् इन नारायणदेवसे ही प्रकट हुआ है ॥ ३१ ॥

एतस्माच्च जगत् सर्वं प्रसूयेत जनार्दनात्।
जगच्च सर्वं देवेशे तं नमस्कुरु भारत ॥ ३२ ॥
इन जनार्दनसे ही सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति होती है। भारत ! देवेश्वर श्रीकृष्णमें ही सम्पूर्ण जगत् विद्यमान है। तुम उन्हें नमस्कार करो ॥ ३२ ॥

पूज्यश्च सततं सर्वैर्देवैरेष सनातनः।
इत्युक्तं बाणयुद्धं ते माहात्म्यं केशवस्य तु ॥ ३३ ॥
ये सनातन पुरुष श्रीकृष्ण ही सदा सम्पूर्ण देवताओंके लिये पूजनीय हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे बाणासुरके युद्ध और केशवके माहात्म्यका वर्णन किया ॥ ३३ ॥

वंशप्रतिष्ठामतुलां श्रवणादेव लप्स्यसे।
ये चेदं धारयिष्यन्ति बाणयुद्धमनुत्तमम् ॥ ३४ ॥
केशवस्य च माहात्म्यं नाधर्मस्तान् भजिष्यति ।
तुम इसके श्रवणमात्रसे अनुपम वंशप्रतिष्ठा प्राप्त करोगे। जो लोग बाणासुरके इस परम उत्तम युद्धप्रसंग और केशवके माहात्म्यको अपने मनमें धारण करेंगे, उनके पास अधर्मका प्रवेश नहीं होगा ॥ ३४३ ॥

एषा तु वैष्णवी चर्चा मया कात्स्न्येन कीर्तिता ॥ ३५॥
पृच्छतस्तात यज्ञेऽस्मिन् निवृत्ते जनमेजय ।
तात जनमेजय ! इस यज्ञकी समाप्तिपर तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने भगवान् विष्णुकी इस सम्पूर्ण लीलाका वर्णन किया है ॥ ३५३ ॥

आश्चर्यपर्व निखिलं यो हीदं धारयेन्नरः ॥ ३६ ॥
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।
नरेश्वर ! जो इस सम्पूर्ण आश्चर्यमय पर्वको धारण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ३६३ ॥

कल्य उत्थाय यो नित्यं कीर्तयेत् सुसमाहितः ॥ ३७ ॥
न तस्य दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च।
जो प्रतिदिन सबेरे उठकर एकाग्रचित्त हो इसका कीर्तन करता है, उसके लिये इहलोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ३७३ ॥

ब्राह्मणः सर्ववेदी स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत्॥ ३८॥
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः कामानवाप्नुयात् ।
नाशुभं प्राप्नुयात् किंचिद् दीर्घमायुर्लभेत सः ॥ ३९॥
इस प्रसंगका अपने अधिकारके अनुसार पाठ या श्रवण करनेसे ब्राह्मण सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञाता होता है, क्षत्रिय-को युद्धमें विजय प्राप्त होती है, वैश्य धनसे सम्पन्न होता है और शूद्र अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त कर लेता है। उसे किसी भी अशुभ या अमङ्गलकी प्राप्ति नहीं होती तथा वह दीर्घायु होता है ॥ ३८-३९ ॥

सौतिरुवाच
इति पारिक्षितो राजा वैशम्पायनभाषितम् ।
श्रुतवानचलो भूत्वा हरिवंशं द्विजोत्तमाः ॥ ४० ॥
विप्रवरो ! इस प्रकार परीक्षित्‌के पुत्र राजा जनमेजय-ने स्थिरचित्त होकर वैशम्पायनके द्वारा कहे गये हरिवंशका श्रवण किया ॥ ४० ॥

एवं शौनक संक्षेपाद् विस्तरेण तथैव च।
प्रोक्ता वै सर्ववंशास्ते किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ४१ ॥
शौनक ! इस प्रकार मैंने संक्षेप और विस्तारके साथ सभी वंशोंका वर्णन किया है, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ॥ ४१ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उदाहरणसमाप्तौ अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उदाहरणके प्रसंगकी समाप्तिविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥

विष्णुपर्व सम्पूर्ण ॥ २ ॥

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

श्रीमहाभारतम्

तस्य खिलभागो हरिवंशः

( तत्र भविष्यपर्व )

प्रथमोऽध्यायः

जनमेजयकी संतति एवं पौरव तथा पाण्डववंशकी प्रतिष्ठाका वर्णन

नारायणं नमस्कृत्यं नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥

बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण (अथवा अन्तर्यामी नारायण), नर (नारायणसखा अर्जुन अथवा आदिजीव हिरण्यगर्भ) तथा नरोत्तम (इन हिरण्यगर्भ एवं अन्तर्यामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सच्चिदानन्दघन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण) को और (इन नरनारायण तथा नरोत्तमके तत्त्वको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वतीको एवं (देवी सरस्वतीने संसारपर अनुग्रह करनेके लिये जिनके शरीरमें प्रवेश किया है, उन) व्यासजीको प्रणाम करके अविद्यारूपी अज्ञानान्धकारको जीतनेवाले इतिहास-पुराण आदि ग्रन्थोंका पाठ आरम्भ करे ॥

शौनक उवाच
जनमेजयस्य के पुत्राः पठ्यन्ते लोमहर्षणे ।
कस्मिन् प्रतिष्ठितो वंशः पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १ ॥

**शौनकजीने पूछा—**लोमहर्षणकुमार ! जनमेजयके पुत्र कौन और कितने कहे जाते हैं ? महात्मा पाण्डवोंका वंश किसपर प्रतिष्ठित हुआ ? ॥ १ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ।
त्वत्तः कथयतः सर्वं वेद्म्यहं तत् परिस्रफुटम् ॥ २ ॥

मैं इसे सुनना चाहता हूँ, इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है। आपके बतानेसे मैं इन सब बातोंको स्पष्टरूपसे जान लूँगा ॥ २ ॥

सौतिरुवाच
पारीक्षितस्य काश्यायां द्वौ पुत्रौ सम्बभूवतुः ।
चन्द्रापीडश्च नृपतिः सूर्यापीडश्च मोक्षवित् ॥ ३ ॥

**सौतिने कहा—**शौनकजी ! परीक्षित्कुमार जनमेजयकी पत्नी काशिराजकन्या वपुष्टमाके गर्भसे दो पुत्र हुए। उनमेंसे एक थे चन्द्रापीड़, जो राजा हुए और दूसरेका नाम था सूर्यापीड़, जो मोक्षधर्मके ज्ञाता थे ॥ ३ ॥

चन्द्रापीडस्य पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम् ।
जनमेजय इत्येतं क्षात्रं भुवि परिश्रुतम् ॥ ४ ॥

चन्द्रापीड़के सौ पुत्र हुए, जो उत्तम धनुर्धर थे। क्षत्रियोंका वह समुदाय जनमेजय (अथवा जानमेजय) के नामसे भूमण्डलमें विख्यात हुआ ॥ ४ ॥

तेषां श्रेष्ठस्तु राजासीत् पुरे वारणसाह्वये ।
सत्यकर्णो महाबाहुर्यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ ५ ॥

उनमें सबसे बड़ा महाबाहु सत्यकर्ण था, जो हस्तिनापुरमें राजा हुआ। वह यज्ञ करनेवाला और उन यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाला था ॥ ५ ॥

सत्यकर्णस्य दायादः श्वेतकर्णः प्रतापवान् ।
अपुत्रः स तु धर्मात्मा प्रविवेश तपोवनम् ॥ ६ ॥

सत्यकर्णका पुत्र प्रतापी श्वेतकर्ण था, वह धर्मात्मा राजा श्वेतकर्ण पुत्रहीन होनेके कारण तपोवनमें चला गया ॥ ६ ॥

तस्माद् वनगताद् गर्भं यादवी प्रत्यपद्यत ।
सुचारोर्दुहिता सुभ्रूर्मानिनी भ्रातृमालिनी ॥ ७ ॥

वनमें जानेपर उनसे उनकी पत्नी मानिनीने, जो यदुकुलकी कन्या, सुचारुकी पुत्री, सुन्दर भौंहोंवाली तथा अनेक भ्राताओंकी बहिन थी, गर्भ धारण किया ॥ ७ ॥

स तु जन्मनि गर्भस्य श्वेतकर्णः प्रजेश्वरः ।
अन्वगच्छद् गतं पूर्वैर्महाप्रस्थानमच्युतम् ॥ ८ ॥

उस गर्भके जन्मकालमें राजा श्वेतकर्णने उस अच्युत महाप्रस्थानकी यात्रा की, जहाँ उनके पूर्वज पाण्डव जा चुके थे ॥ ८ ॥

सा दृष्ट्वा सम्प्रयातं तं मानिनी पृष्ठतोऽन्वयात् ।
पथि सा सुषुवे सुभ्रूवने राजीवलोचनम् ॥ ९ ॥

७५०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

उन्हें जाते देख मानिनी भी गर्भिणी अवस्थामें ही उनके पीछे-पीछे चल दी। उस सुन्दर भौंहोंवाली रानीने मार्गमें ही एक वनके भीतर बालकको जन्म दिया, जिसके नेत्र कमलके समान सुन्दर थे ॥ ९ ॥

कुमारं तं परित्यज्य भर्तारं चान्वगच्छत ।
पतिव्रता महाभागा द्रौपदीव पुरा पतीन् ॥ १० ॥

जैसे पूर्वकालमें पतिव्रता महाभागा द्रौपदीने सब कुछ छोड़कर महाप्रस्थानके पथपर पाँचों पतियोंका अनुसरण किया था, उसी प्रकार मानिनी उस नवजात शिशुको छोड़कर पतिके पीछे चली गयी ॥ १० ॥

स तु राजकुमारोऽसौ गिरिकुञ्जे रुरोद ह ।
छायार्थं तस्य मेघास्तु प्रादुरासन् समन्ततः ॥ ११ ॥

वह राजकुमार पर्वतके कुञ्जमें पड़ा-पड़ा रोने लगा। उस समय उसपर छाया करनेके लिये चारों ओर मेघ प्रकट हो गये ॥ ११ ॥

अविष्ठायाश्च पुत्रौ द्वौपिप्पलादश्च कौशिकः ।
दृष्ट्वा कृपान्वितौ गृह्य तं प्रक्षालयतां जलैः ।
निघृष्टौ तस्य तौ पार्श्वौ शिलायां रुधिरप्लुतौ ॥ १२ ॥

अविष्ठाके दो पुत्र पिप्पलाद और कौशिकने उसे देखकर दयासे द्रवित हो उठा लिया और जलसे नहलाया। उस समय उस बालकके दोनों पार्श्वभाग पत्थरपर घिस जानेसे लहूलुहान हो रहे थे ॥ १२ ॥

अजश्यामौ तु पार्श्वौ तावुभावपि समाहितौ ।
तथैव तु समारूढौ अजपार्श्वस्ततोऽभवत् ॥ १३ ॥

उस बालकके वे दोनों पार्श्व बकरेके समान काले हो गये थे और उसी रूपमें वे हृष्टपुष्ट हो गये, इसलिये वह बालक अजपार्श्व नामसे विख्यात हुआ ॥ १३ ॥

ततोऽजपार्श्व इति तौ चक्राते तस्य नाम ह ।
स तु वेमकशालायां द्विजाभ्यामभिवर्धितः ॥ १४ ॥

इसीलिये पिप्पलाद और कौशिकने उसका नाम अजपार्श्व रखा और वेमकमुनिके घरमें उन दोनों ब्राह्मणोंने उसका पालन-पोषण किया ॥ १४ ॥

वेमकस्य तु भार्या तमुद्वहत् पुत्रकारणात् ।
वेमक्याः स तु पुत्रोऽभूद् ब्राह्मणौ सचिवौ च तौ ॥ १५ ॥

वेमककी पत्नी वेमकीने पुत्रके लिये उस बालकका विवाह कर दिया। वह बालक तथा उसके सहायक वे दोनों ब्राह्मण वेमकीके पुत्ररूपमें प्रसिद्ध हुए ॥ १५ ॥

तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च युगपत्‌तुल्यजीविनः ।
स एष पौरवो वंशः पाण्डवानां प्रतिष्ठितः ॥ १६ ॥

उन तीनोंके पुत्र और पौत्र एक ही कालमें हुए और समान कालतक जीवित रहे, इस प्रकार यह पौरव तथा पाण्डववंश भूतलमें प्रतिष्ठित हुआ ॥ १६ ॥

श्लोकोऽपि चात्र गीतोऽयं नाहुषेण ययातिना ।
जरासंक्रमणे पूर्वे भृशं प्रीतेन धीमता ॥ १७ ॥

पूर्वकालमें पुरूके शरीरमें अपनी वृद्धावस्थाका संचार करते समय अत्यन्त प्रसन्न हुए बुद्धिमान् नहुषकुमार ययातिने इस पौरववंशके विषयमें यह श्लोक भी गाया था—॥ १७ ॥

अचन्द्रार्कग्रहा भूमिर्भवेद्वापि न संशयः ।
अपौरवा न तु मही भविष्यति कदाचन ॥ १८ ॥

'यह सम्भव है कि कभी भूमि चन्द्रमा, सूर्य और ग्रहोंके प्रकाश एवं प्रभावसे रहित हो जाय, परंतु वह पौरववंशसे शून्य कभी नहीं होगी; इसमें संशय नहीं है' ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पाण्डववंशप्रतिष्ठाकीर्तने प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पाण्डववंशकी प्रतिष्ठाके कथनविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥


द्वितीयोऽध्यायः

राजा जनमेजयका अश्वमेध यज्ञ करनेका विचार, व्यासजीका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार, आपने पाण्डवोंको राजसूय यज्ञ करनेसे क्यों नहीं रोका—यह जनमेजयका प्रश्न और उसके उत्तरमें व्यासजीद्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन

शौनक उवाच

उक्तोऽयं हरिवंशस्ते पर्वाणि निखिलानि च ।<br>यथा पुरोक्तानि तथा व्यासशिष्येण धीमता ॥ १ ॥तत् कथ्यमानममितमितिहाससमन्वितम् ।<br>प्रीणात्यस्मानमृतवत् सर्वपापविनाशनम् ॥ २ ॥
**शौनकने पूछा—**सूतनन्दन ! पूर्वकालमें व्यासजीके बुद्धिमान् शिष्य वैशम्पायनजीने जैसा वर्णन किया था, उसके अनुसार आपने यह हरिवंश और इसके सारे पर्व कह सुनाये ॥ १ ॥आपके मुखसे कहा जाता हुआ यह अनुपम ग्रन्थ, जो इतिहाससे युक्त और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, हम लोगोंको अमृतके समान तृप्ति प्रदान करता है ॥ २ ॥

सुश्रूषाद्यतया धीर मनो ह्लादयतीव नः ।
जनमेजयस्तु नृपतिः श्रुत्वा चाख्यानमुत्तमम् ।

[ भविष्यपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः ७५१


सौते किमकरोत् पश्चात् सर्पसत्रादनन्तरम् ॥ ३ ॥
धीर सूतकुमार ! सुखपूर्वक सुनने-सुनानेके योग्य होनेके कारण यह कथा हमारे मनको परम आह्लाद प्रदान करती है। इस। उत्तम आख्यानको सुनकर राजा जनमेजयने सर्पसत्रके पश्चात् कौन-सा कार्य किया ? ॥ ३ ॥

सौतिरुवाच
जनमेजयस्तु स नृपः श्रुत्वा चाख्यानमुत्तमम् ।
यदारभत् तदाख्यास्ये सर्पसत्रादनन्तरम् ॥ ४ ॥
सूतपुत्र उग्रश्रवाने कहा—शौनकजी ! यह उत्तम कथा सुनकर राजा जनमेजयने सर्पसत्रके पश्चात् जो कार्य आरम्भ किया, उसका वर्णन करता हूँ ॥ ४ ॥

तस्मिन् सत्रे समाप्तेऽथ राजा पारिक्षितस्तदा ।
यष्टुं स वाजिमेधेन सम्भारानुपचक्रमे ॥ ५ ॥
सर्पसत्र समाप्त होनेपर राजा जनमेजयने अश्वमेध यज्ञ करनेके लिये आवश्यक सामग्री जुटानी आरम्भ की ॥ ५ ॥

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यानाहूयेदमुवाच ह।
यक्ष्येऽहं वाजिमेधेन हय उत्सृज्यतामिति ॥ ६ ॥
फिर उन्होंने ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्यको बुलाकर इस प्रकार कहा—'मैं अश्वमेध यज्ञ करूँगा, आपलोग अश्व छोड़िये' ॥ ६ ॥

ततोऽस्य विज्ञाय चिकीर्षितं तदा
कृष्णो महात्मा सहसाऽऽजगाम ।
पारिक्षितं द्रष्टुमदीनसत्त्वं
द्वैपायनः सर्वपरावरज्ञः ॥ ७ ॥
जनमेजय क्या करना चाहते हैं, इस बातको जानकर उस समय सबके भूत और भविष्यको जाननेवाले महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, उदारचेता परीक्षित्कुमार जनमेजयसे मिलनेके लिये सहसा वहाँ आये ॥ ७ ॥

पारिक्षितस्तु नृपतिर्दृष्ट्वा तमृषिमागतम् ।
अर्घ्यपाद्यासनं दत्त्वा पूजयामास शास्त्रतः ॥ ८ ॥
उन महर्षिको आया देख राजा जनमेजयने अर्घ्य, पाद्य और आसन देकर शास्त्रविधिके अनुसार उनका पूजन किया॥

तौ चोपविष्टावभितः सदस्यास्तस्य शौनक ।
कथा बहुविधाश्चित्राश्चक्राते वेदसंहिताः ॥ ९ ॥
शौनक ! फिर वे दोनों यथायोग्य आसनोंपर बैठे। उनके आस-पास राजाके दूसरे सदस्य भी बैठ गये। तत्पश्चात् उन दोनोंने नाना प्रकारकी विचित्र कथाएँ एक दूसरेके प्रति कहीं, जो वेदोंमे वर्णित हैं ॥ ९ ॥

ततः कथान्ते नृपतिर्नोदयामास तं मुनिम् ।
पितामहं पाण्डवानामात्मनः प्रपितामहम् ॥ १० ॥
कथा वार्ताके अन्तमें राजा जनमेजयने पाण्डवोंके पितामह और अपने प्रपितामह मुनिवर व्याससे कहा—॥ १० ॥

महाभारतमाख्यानं बह्वर्थं श्रुतिविस्तरम् ।
निमेषमात्रमपि मे सुखश्राव्यतया गतम् ॥ ११ ॥
'महर्षे ! महाभारत नामक इतिहास अनेक अर्थोंसे भरा हुआ है; इसमें श्रुतियोंके अर्थका विस्तार है, फिर भी यह सुनने-सुनानेमें इतना सुखद है कि मेरा कई दिनोंका समय एक निमेषके समान बीत गया है ॥ ११ ॥

विभूतिविस्तारकरं सर्वेषां वै यशस्करम् ।
त्वया सुविहितं ब्रह्मञ्छङ्खे क्षीरमिवार्हितम् ॥ १२ ॥
'ब्रह्मन् ! यह इतिहास सबके लिये ऐश्वर्यका विस्तार करनेवाला और यशस्कर है, आपने इसकी इतनी सुन्दर रचना की है, मानो क्षीरसमुद्रको शङ्खमें भर दिया हो ॥ १२ ॥

अमृतेन तु तृप्तिः स्याद् यथा स्वर्गसुखेन च ।
तथा तृप्तिं न गच्छामि शृण्वेमां भारतीं कथाम् ॥ १३ ॥
'जैसे अमृत पीनेसे तृप्ति नहीं होती तथा जैसे स्वर्गीय सुखसे जी नहीं भरता है, उसी प्रकार इस भारती कथाको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ( अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ रही है ) ॥ १३ ॥

अनुमान्य तु सर्वज्ञं पृच्छामि भगवन्नहम् ।
हेतुः कुरूणां नाशस्य राजसूयो मतो मम ॥ १४ ॥
'भगवन् ! आप सर्वज्ञ हैं, मैं आपकी अनुमति लेकर कुछ पूछ रहा हूँ, मुझे ऐसा मालूम होता है कि-राजसूय यज्ञ ही कौरवोंके विनाशका कारण हुआ है ॥ १४ ॥

दुःसहानां यथा ध्वंसो राजन्यानामुपप्लवे ।
राजसूयं तथा मन्ये युद्धार्थमुपकल्पितम् ॥ १५॥
'महाभारतयुद्धमे जिस प्रकार दुःसह ( अजेय ) राजाओंका विनाश हुआ है, उसे देखते हुए मै यही मानता हूँ, राजसूयकी कल्पना युद्धके लिये ही हुई है ॥ १५ ॥

राजसूयस्तु सोमेन श्रूयते पूर्वमाहृतः ।
तस्यान्ते सुममहद् युद्धमभवत् तारकामयम् ॥ १६ ॥
'सुना जाता है कि पूर्वकालमे सोमने राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया था, उनके उस यज्ञके अन्तमें तारकामय नामक महान् युद्ध हुआ था ॥ १६ ॥

आहृतो वरुणेनाथ तस्यान्ते सुमहाक्रतोः ।
देव।सुरं महायुद्धं सर्वभूतक्षयावहम् ॥ १७ ॥
'तदनन्तर वरुणने वह यज्ञ किया, उनके उस महायज्ञके अन्तमें देवताओं और असुरोंके बीच बड़ा भारी संग्राम हुआ, जो सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाला था ॥ १७ ॥

हरिश्चन्द्रश्च राजर्षिः क्रतुमेनमुपाहरत् ।
तत्राप्याडीवकं नाम युद्धं क्षत्रियनाशनम् ॥ १८ ॥

७५२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंश

‘इसके बाद राजर्षि हरिश्चन्द्रने इस यज्ञका अनुष्ठान किया, उनके यज्ञके अन्तमें आडीवक-नामक महान् युद्ध हुआ, जो क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला था ॥

ततोऽनन्तरमार्येण पाण्डवेनातिदुस्तरः । महाभारत आरम्भः सम्भृतोऽग्निरिव क्रतुः ॥ १९ ॥

‘उसके बाद श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने उस अत्यन्त दुस्तर और अग्निके समान भयंकर यज्ञका आयोजन किया, जिसका आरम्भ महाभारत-युद्धको उपस्थित करनेमें कारण हुआ ॥ १९ ॥

तदस्य मूलं युद्धस्य लोकक्षयकरस्य तु । राजसूयो महायज्ञः किमर्थं न निवारितः ॥ २० ॥

‘अतः इस लोकविनाशकारी युद्धका जो मूल कारण था, उस राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान आपने क्यों नहीं रोक दिया था ? ॥ २० ॥

राजसूयो ह्यसंहार्थो यज्ञाङ्गैश्च दुरत्ययैः । मिथ्या प्रणीते यज्ञाङ्गे प्रजानां संक्षयो ध्रुवः ॥ २१ ॥

‘राजसूय यज्ञको सर्वाङ्गपूर्णरूपसे सम्पन्न करना असम्भव है, क्योंकि उस यज्ञके अङ्गभूत साधन दुर्लभ हैं । यदि यज्ञाङ्ग-का सम्यक् रूपसे सम्पादन न होनेके कारण उसमें वैगुण्य आ गया तो प्रजाजनोंका नाश अवश्यंभावी है ॥ २१ ॥

भवानपि च सर्वेषां पूर्वेषां नः पितामहः । अतीतानागतज्ञश्च नाथश्चादिकरश्च नः ॥ २२ ॥

‘आपभी हमारे समस्त पूर्वजोंके पितामह हैं, आपको भूत और भविष्यत्कालका ज्ञान है, आप हमारे कुलके रक्षक और हमारे पूर्वजोंके जन्मदाता हैं ॥ २२॥

ते कथं भवता नेत्रा बुद्धिमन्तश्च्युता नयात् । अनाथा ह्यपराध्यन्ते कुनेतारश्च मानवाः ॥ २३ ॥

‘आप-जैसे नेताके रहते हुए बुद्धिमान् पाण्डव नीतिमार्गसे भ्रष्ट कैसे हो गये ? क्योंकि जो मनुष्य अनाथ हैं और जिनके नेता अच्छे नहीं हैं, वे ही अपराध कर बैठते हैं (पाण्डवोंको तो आप-जैसा श्रेष्ठ नेता मिला था और वे आपको पाकर सनाथ थे, तो भी उनसे यह भूल क्यों हुई ?)’ ॥ २३ ॥

व्यास उवाच

कालेन विपरीतास्ते तव पूर्वपितामहाः । न मां भविष्यं पृच्छन्ति न चापृष्टो ब्रवीम्यहम् ॥ २४ ॥

व्यासजी बोले—जनमेजय ! तुम्हारे पूर्वपितामह पाण्डव कालकी प्रेरणासे विपरीत अवस्थाको प्राप्त हो गये थे, वे मुझसे भविष्य नहीं पूछते थे और मैं बिना पूछे किसीको कोई बात बताता नहीं हूँ ॥ २४ ॥

सामर्थ्यं च न पश्यामि भविष्यस्य निवर्तने । परिहर्तुं न शक्या हि कालेन विहिता गतिः ॥ २५ ॥

भविष्यको पलट देनेकी शक्ति मैं किसीमें नहीं देखता हूँ; क्योंकि कालने जिस गतिका विधान किया है, उसका परिहार असम्भव है ॥ २५ ॥

त्वया त्विदमहं पृष्टो वक्ष्याम्यागन्तु भावि यत् । अतश्च बलवान् कालः श्रुत्वापि न करिष्यसि ॥ २६ ॥

तुमने इस विषयको मुझसे पूछा है, इसलिये मैं तुम्हारे लिये आनेवाले भविष्यका वर्णन करूँगा, परंतु काल इससे भी बलवान् है, तुम मेरे मुखसे भविष्यके कर्तव्यको सुनकर भी उसका पालन नहीं करोगे ॥ २६ ॥

न संरम्भान्न चारम्भान्न वै स्थास्यसि पौरुषे । लेखा हि काललिखिताः सर्वथा दुरतिक्रमाः ॥ २७ ॥

संरम्भ (उत्तेजना) और आरम्भ (उद्योग) के कारण तुम पौरुषमें स्थिर नहीं रह सकोगे; क्योंकि कालके लिखे हुए लेखको लाँघ जाना सर्वथा कठिन है ॥ २७ ॥

अश्वमेधः क्रतुः श्रेष्ठः क्षत्रियाणां परिश्रुतः । तेन भावेन ते यज्ञं वासवो धर्षयिष्यति ॥ २८ ॥

क्षत्रियोंके लिये अश्वमेध यज्ञ सबसे श्रेष्ठ सुना गया है, उसके इस महत्त्वके कारण इन्द्र द्वेषवश तुम्हारे उस यज्ञको भ्रष्ट कर देंगे ॥ २८ ॥

यदि तच्छक्यते राजन् परिहर्तुं कथंचन । दैवं पुरुषकारेण मा यजेथाश्च तं क्रतुम् ॥ २९ ॥

राजन् ! यदि तुम पुरुषार्थसे किसी प्रकार दैवके विधानका निवारण कर सको तो तुम कदापि इस यज्ञका अनुष्ठान न करना ॥ २९ ॥

न चापराधः शक्रस्य नोपाध्यायगणस्य ते । तव वा यजमानस्य कालोऽत्र दुरतिक्रमः ॥ ३० ॥

इसमें न इन्द्रका अपराध है, न तुम्हारे उपाध्यायगणका और न तुम-जैसे यजमानका ही; यहाँ काल ही दुर्लङ्घ्य है ॥ ३० ॥

तस्य संस्थाकृतमिदं कालस्य परमेष्ठिनः । यथा दृष्टं प्रजासर्गे गमिष्यति युगक्षये ॥ ३१ ॥

यह जो भावी कलंक है, वह कालरूप ब्रह्माजीकी इच्छासे अश्वमेध यज्ञको भविष्यमे बंद करा देनेके लिये संघटित किया जानेवाला है, फिर तो कलियुगमे सारी प्रजा प्रायः असर्ग अर्थात् विनाशको ही प्राप्त होगी (यज्ञ आदि-के अनुष्ठानसे प्रजामें जो दीर्घजीवित्व आता था, उसका धीरे-धीरे अभाव हो जायगा) । यह बात ज्ञानदृष्टिसे देखी गयी है ॥ ३१ ॥

तथा यज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजातयः । तत्प्रणेयं निबोधध्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ३२ ॥

इसके सिवा ब्राह्मणलोग यज्ञोंके फल बेचने लगेंगे, अतः तुम यह जान लो कि चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी कालके ही अधीन है ॥ ३२ ॥

भविष्यपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः ७५३


जनमेजय उवाच

निवृत्तावश्वमेधस्य किं निमित्तं भविष्यति।
श्रुत्वा परिहरिष्यामि भगवन् यदि मन्यसे ॥ ३३ ॥

जनमेजयने कहा— भगवन् ! अश्वमेध यज्ञकी निवृत्तिमें कौन-सा कारण उपस्थित होगा। यदि आप ठीक समझें तो मैं उसे सुनकर उसका परिहार करूँगा ॥ ३३ ॥

व्यास उवाच

निमित्तं भविता तत्र ब्रह्मकोपकृतं प्रभो।
यतेथाः परिहर्तुं त्वमित्येतद् भद्रमस्तु ते ॥ ३४ ॥

व्यासजीने कहा— प्रभो ! ब्राह्मणोंके प्रति तुम्हारे मनमें क्रोध होगा, जिससे उस यज्ञको बंद करनेका निमित्त स्वयं बन जायगा। तुम इसके परिहारके लिये प्रयत्न करना, यही मुझे कहना है, तुम्हारा कल्याण हो ॥ ३४ ॥

त्वया वृत्तं क्रतुं चैव वाजिमेधं परंतप।
क्षत्रिया नाहरिष्यन्ति यावद् भूमिर्धरिष्यति ॥ ३५ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश ! तुम्हारे द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञको जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक भावी पीढ़ीके क्षत्रिय नहीं करेंगे ॥ ३५ ॥

जनमेजय उवाच

निवृत्तावश्वमेधस्य ब्रह्मशापाग्नितेजसा।
अहं निमित्तमिति मे भयं तीव्रं तु जायते ॥ ३६ ॥

जनमेजय बोले— भगवन् ! ब्राह्मणकी शापाग्निके तेजसे अश्वमेधयज्ञकी निवृत्ति होगी और मैं उसमें निमित्त बनूँगा, यह जानकर मुझे बड़ा भारी भय हो रहा है ॥

कथं ह्यकीर्त्या युज्येत सुकृती मह्विधो जनः।
लोकान्नुच्छेते गन्तुं खं सपाश इव द्विजः ॥ ३७ ॥

मेरे-जैसा पुण्यात्मा पुरुष कैसे अपयशसे युक्त होगा और जैसे जालमे बँधा हुआ पक्षी आकाशमे नहीं उड़ सकता उसी प्रकार अपयशसे कलङ्कित हुआ मुझ जैसा पुरुष लोगोंके सामने जानेका साहस कैसे कर सकेगा ? ॥ ३७ ॥

यथा ह्यनागतमिदं दृष्टमत्र प्रणाशनम्।
यद्यस्ति पुनरावृत्तिर्यज्ञस्याश्वासयस्व माम् ॥ ३८ ॥

जिस तरह आपने यहाँ इस यज्ञके भावी विनाशको देखा है, उसी प्रकार यदि इसकी पुनरावृत्ति भी सम्भव हो तो उसे बताकर मुझे आश्वासन दीजिये ॥ ३८ ॥

व्यास उवाच

उपात्तयज्ञो देवेषु ब्राह्मणेष्ूपपत्स्यते।
तेजसा व्याहृतं तेजस्तेजस्येवावतिष्ठते ॥ ३९ ॥

व्यासजीने कहा— राजन् ! अश्वमेध यज्ञका उपसंहार हो जानेपर वह देवताओं और ब्राह्मणोंमें ज्ञानरूपसे स्थित रहेगा, क्योंकि तेजसे अभिभूत हुआ तेज तेजमें ही स्थित होता है ॥ ३९ ॥

औद्भिद्जो भविता कश्चित् सेनानीः काश्यपो द्विजः।
अश्वमेधं कलियुगे पुनः प्रत्याहरिष्यति ॥ ४० ॥

भूमिको खोदनेसे कोई सेनानी नामक कश्यपवंशी ब्राह्मण प्रकट होगा, जो कलियुगमें पुनः अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करेगा ॥ ४० ॥

तदन्ते तत्कुलीनश्च राजसूयमपि क्रतुम्।
आहरिष्यति राजेन्द्र श्वेतग्रहमिवान्तकः ॥ ४१ ॥

राजेन्द्र ! उस यज्ञके अन्तमें उसी कुलमें उत्पन्न हुआ दूसरा पुरुष राजसूययज्ञका भी अनुष्ठान करेगा; ठीक उसी तरह जैसे प्रलयकाल श्वेतग्रह (उत्पातग्रह) की सृष्टि करता है ॥ ४१ ॥

यथाबलं मनुष्याणां कर्तॄणां दास्यते फलम्।
युगान्तद्वारमृषिभिः संवृतं विचरिष्यति ॥ ४२ ॥

यज्ञ करनेवाले मनुष्योंको श्रद्धादि रूप बलके अनुसार ही वह यज्ञ फल देगा, फिर ऋषियोंद्वारा सुरक्षित युगान्तकालके द्वारपर लोग विचरण करेंगे ॥ ४२ ॥

तदा प्रभृति हास्यन्ति नॄणां प्राणाः पुराकृतीः।
न निवर्तिष्यते लोके वृत्तान्तावर्तनेष्विह ॥ ४३ ॥

तभीसे मनुष्योंकी इन्द्रियाँ पुरातन कृत्यों शिष्टाचारोंका परित्याग कर देंगी। जगत्के भीतर लोगोंके बर्तावोंमें पहिले-जैसा वृत्तान्त (आचार-विचार) सर्वथा नहीं रहेगा ॥ ४३ ॥

तदा सूक्ष्मो महोदर्को दुस्तरो दानमूलवान्।
चातुराश्रम्यशिथिलो धर्मः प्रविचालिष्यति ॥ ४४ ॥

उस समय सूक्ष्म धर्म भी महान् फल देनेवाला होगा, परंतु अधिक विघ्नोंके कारण उस धर्मको पूरा करना कठिन होगा। उस धर्मका मूल दान होगा। उन चारों आश्रमोंके शिथिल हो जानेसे धर्म भी अपने स्वरूपसे विचलित हो जायगा ॥ ४४ ॥

तदा ह्यल्पेन तपसा सिद्धिं प्राप्स्यन्ति मानवाः।
धन्या धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ४५ ॥

जनमेजय ! उस युगान्त अर्थात् कलियुगमें मनुष्य थोड़ी-सी तपस्यासे भी सिद्धि प्राप्त कर लेंगे। उस समय कुछ धन्य पुरुष ही धर्मका आचरण करेंगे ॥ ४५ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि जनमेजयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें जनमेजयका प्रश्नविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

७५४ ] श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


तृतीयोऽध्यायः

व्यासजीद्वारा कलियुगकी स्थितिका वर्णन

जनमेजय उवाच

आसन्नं विप्रकृष्टं वा यदि कालं न विद्महे ।
तस्माद् द्वापरसंविद्धं युगान्तं स्पृहयाम्यहम् ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा—महर्षे! हमारे मोक्षका काल निकट है या दूर, यह हमलोग नहीं जानते; अतः जिसने द्वापरको अधर्मकी अधिकतासे दूषित कर दिया है, उस युगान्त अर्थात् कलियुगका वर्णन मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

प्राप्ता वयं तु तत् कालमनया धर्मतृष्णया ।
आदद्यात् परमं धर्मं सुखमल्पेन कर्मणा ॥ २ ॥

कलियुगमें मनुष्य थोड़े-से आयाससे किये जानेवाले सत्कर्मद्वारा सुखपूर्वक महान् धर्मके फलकी प्राप्ति कर सकता है, इस प्रकार इस धर्मविषयक लोभसे हमलोगोंने उस कलिकालमें जन्म ग्रहण किया है ॥ २ ॥

शौनक उवाच

प्रजासमुद्वेगकरं युगान्तं समुपस्थितम् ।
प्रणष्टधर्मे धर्मज्ञ निमित्तैर्वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥

शौनकजीने कहा—धर्मज्ञ सूतनन्दन ! प्रजाको उद्वेगमें डालनेवाला और धर्मको नष्ट कर देनेवाला कलियुग उपस्थित हो गया है, आप इसके भावी लक्षण बताते हुए इसका वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥

सौतिरुवाच

पृष्ट एवं भविष्यस्य गतिं तत्त्वेन चिन्तयन् ।
युगान्ते सर्वभूतानां भगवानब्रवीत् तदा ॥ ४ ॥

सौतिने कहा—शौनक ! राजा जनमेजयने भी ऐसा ही प्रश्न किया था। उसके उत्तरमें कलियुगमें समस्त प्राणियोंके भविष्यकी गतिका तत्त्वतः विचार करके भगवान् व्यासने उस समय इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥

व्यास उवाच

अरक्षितारो हर्तारो बलिभागस्य पार्थिवाः ।
युगान्ते प्रभविष्यन्ति स्वरक्षणपरायणाः ॥ ५ ॥

व्यासजी बोले—राजन् ! कलियुगमें प्रजाओंकी रक्षा न करते हुए उनसे कर लेनेवाले राजा उत्पन्न होंगे, जो सदा अपने शरीरमात्रकी रक्षामें संलग्न रहेंगे ॥ ५ ॥

अक्षत्रियाश्च राजानो विप्राः शूद्रोपजीविनः ।
शूद्राश्च ब्राह्मणाचारा भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ६ ॥

कलियुगमें जो क्षत्रिय नहीं हैं, ऐसे लोग भी राजा होंगे। ब्राह्मणलोग शूद्रोंके आश्रित होकर जीविका चलायेंगे और शूद्र ब्राह्मणोंके-से आचारका पालन करनेवाले होंगे ॥ ६ ॥

काण्डे स्पृष्टाः श्रोत्रियाश्च निष्क्रियाणि हवींष्यथ ।
एकपङ्क्त्यामशिष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ७ ॥

जनमेजय ! कलियुगमें धनुष-बाण धारण करनेवाले (क्षत्रियवृत्तिसे जीनेवाले) ब्राह्मण और श्रोत्रिय ब्राह्मण दोनों एक पंक्तिमें बैठकर पञ्चयज्ञोंसे रहित हविष्य भोजन करेंगे ॥ ७ ॥

शिल्पवन्तोऽनृतपरा नरा मद्यामिषप्रियाः ।
मित्रभार्या भविष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ८ ॥

जनमेजय ! कलियुगमें मनुष्य शिल्प कर्म करनेवाले, असत्यवादी, मदिरा और मांसके प्रेमी तथा पत्नीको ही मित्र माननेवाले होंगे ॥ ८ ॥

राजवृत्तिस्थिताश्चौरा राजानश्चौरशीलिनः ।
भृत्याश्चानिर्दिष्टभुजो भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ९ ॥

युगान्तकाल (कलियुग) में चोर राजोचितवृत्तिसे रहेंगे और राजाओंका स्वभाव चोरोंके समान हो जायगा तथा सेवक उन वस्तुओंका भी उपभोग करेंगे—जिन्हें भोगने-के लिये उन्हें स्वामीकी ओरसे आज्ञा नहीं मिली है ॥ ९ ॥

धनानि श्लाघनीयानि सतां वृत्तम्पूजितम् ।
अकुत्सना च पतिते भविष्यन्ति युगक्षये ॥ १० ॥

कलियुगमे धन ही सबके लिये स्पृहणीय होंगे, सत्पुरुषों-के आचार-व्यवहारका आदर नहीं होगा और धर्मसे पतित हुए मनुष्यके प्रति निन्दाका भाव रखनेवाले कोई न होंगे ॥ १० ॥

प्रणष्टचेतना मर्त्या मुक्तकेशा विचूलिनः ।
ऊनषोडशवर्षाश्च प्रजास्यन्ति नराः सदा ॥ ११ ॥

मनुष्य धर्म और अधर्मके विवेकसे रहित होंगे, विधवाएँ तथा संन्यासी परस्पर समागम करके बच्चे पैदा करेंगे। सोलह वर्षसे कम अवस्थावाले मनुष्य भी सदा संतानोत्पादन करेंगे ॥ ११ ॥

अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः ।
प्रमदाः केशशूलाश्च भविष्यन्ति युगक्षये ॥ १२ ॥

कलियुगमें जनपदके लोग अन्न बेचेंगे, चौराहोंपर द्विज लोग वेदोंका विक्रय करेंगे और युवती स्त्रियाँ मूल्य लेकर व्यभिचार करनेवाली होंगी ॥ १२ ॥

सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति सर्वे वाजसनेयिनः ।
शूद्रा भोवादिनश्चैव भविष्यन्ति युगक्षये ॥ १३ ॥

भविष्यपर्व ] तृतीयोऽध्यायः ७५५


उस समय सब लोग ब्रह्मवादी हो जायेंगे (ब्रह्मवादकी आड़ लेकर कर्म-भ्रष्ट हो जायेंगे), दूसरी शाखाओंका लोप हो जानेके कारण सभी अपनेको वाजसनेयी शाखाका बतलायेंगे और शूद्र अपनेसे बड़ोंके सम्मानमें केवल भो (अजी) कहनेवाले होंगे ॥ १३ ॥

तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजातयः।
ऋतवश्च भविष्यन्ति विपरीता युगक्षये ॥ १४ ॥

युगान्तकालमें ब्राह्मणलोग तप और यज्ञके फल बेचनेवाले होंगे। उस समय सभी ऋतुएँ विपरीत स्वभावकी हो जायँगी ॥ १४ ॥

शुक्लदन्ताऽजिताक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः।
शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति शाक्यबुद्धोपजीविनः ॥ १५ ॥

शूद्रलोग शाक्यवंशी बुद्धके मतका आश्रय लेकर (अर्थात् वेददूषक नास्तिक बनकर) वेद-विरोधी धर्मका आचरण करेंगे। वे दाँत सफेद किये रहेंगे, आँखोंमें अञ्जन लगायेंगे और मूँड मुड़ाकर गेरुआ वस्त्र धारण कर लेंगे ॥ १५ ॥

श्वापदप्रचुरत्वं च गवां चैव परिक्षयः।
स्वादूनां विनिवृत्तिश्च विद्यादन्तगते युगे ॥ १६ ॥

अन्तिम युग अर्थात् कलियुगमें कुत्ते, भेड़िये आदि हिंसक प्राणियोंकी अधिकता होगी; गौओंका ह्रास होता चला जायगा और उत्तम रसोंका अभाव हो जायगा ॥ १६ ॥

अन्त्या मध्ये निवत्स्यन्ति मध्याश्चान्तनिवासिनः।
तथा निम्नं प्रजाः सर्वा गमिष्यन्ति युगक्षये ॥ १७ ॥

कलियुगमें अन्त्यज या म्लेच्छ मध्यदेशमें निवास करेंगे और मध्यदेशके निवासी म्लेच्छ देशमें रहने लगेंगे तथा सारी प्रजा नीच मार्गका अनुसरण करने लगेगी ॥ १७ ॥

तथा द्विहायना दम्यास्तथा पल्वलकर्षकाः।
चित्रवर्षी च पर्जन्यो युगे क्षीणे भविष्यति ॥ १८ ॥

युगकी समाप्तिके समय दो वर्षके बछड़े गाड़ी और हलमें जोते जानेके योग्य समझे जायँगे तथा वे ही गड्ढों और तलैयोंकी भूमि जोतेंगे और मेघ विचित्र वर्षा करनेवाला होगा (अर्थात् ऐसी वर्षा होगी कि हलमें जोते हुए बैलका एक सींग भीगेगा और दूसरा सूखा रह जायगा) ॥ १८ ॥

सर्वे चौरकुले जाताश्चोरयानाः परस्परम्।
स्वल्पेनाढ्या भविष्यन्ति यत्किंचित्प्राप्य दुर्गताः ॥ १९ ॥

सभी चोरकुलमें पैदा होंगे और आपसमें एक दूसरेको लूटेंगे। थोड़े धनसे ही धनी हो जायेंगे और थोड़ा-सा ही कष्ट पाकर दुर्गतिमें पड़ जायँगे ॥ १९ ॥

न ते धर्मं करिष्यन्ति मानवा निर्गते युगे।
ऊषार्कबहुला भूमिः पन्थानस्तस्करावृताः ॥ २० ॥

युगकी समाप्तिके समय मनुष्य धर्माचरण नहीं करेंगे, भूमि प्रायः ऊसर हो जायगी और राह-बाट बटमारोंसे घिरे रहेंगे ॥ २० ॥

सर्वे वाणिज्यकाश्चैव भविष्यन्ति कलौ युगे।
पितृदत्तानि देयानि विभजन्ते सुतास्तदा।
हरणाय प्रपत्स्यन्ते लोभानृतविरोधिताः ॥ २१ ॥

कलियुगमें सभी व्यापार करनेवाले होंगे, पिताकी दी हुई देय-वस्तुओं (आभूषणादि) को भी (जो शास्त्रके अनुसार बाँटने योग्य नहीं हैं) पुत्र उस समय आपसमें बाँट लेंगे तथा लोभ और असत्यसे प्रेरित हो विरोधी बनकर लोग दूसरोंकी सम्पत्ति हर लेनेका भी प्रयत्न करेंगे ॥ २१ ॥

सौकुमार्ये तथा रूपे रत्ने चोपक्षयं गते।
भविष्यन्ति युगान्ते च नार्यः केशैरलंकृताः ॥ २२ ॥

कलियुगमें सुकुमारता, रूप तथा सुवर्ण आदि रत्नोंके क्षीण हो जानेके कारण नारियाँ भाँति-भाँतिके सँवारे हुए केशोंसे ही अलंकृत होंगी ॥ २२ ॥

निर्विहारस्य भूतस्य गृहस्थस्य भविष्यति।
युगान्ते समनुप्राप्ते नान्या भार्यासमा गतिः ॥ २३ ॥

युगान्तकाल आनेपर हार, चन्दन, दिव्य आस्तरण आदि भोग-सामग्रीसे रहित हुए गृहस्थके लिये भार्याके समान दूसरी कोई गति नहीं होगी ॥ २३ ॥

कुशीलानार्यभूयिष्ठं वृथारूपसमन्वितम्।
पुरुषाल्पं बहुस्त्रीकं तद् युगान्तस्य लक्षणम् ॥ २४ ॥

जब प्रजावर्गमें नीच दुराचारियोंकी संख्या अधिक हो, सब लोग व्यर्थ रूप बनाने लगें, पुरुष थोड़े हों और स्त्रियोंकी संख्या बहुत अधिक हो जाय, तब वही युगान्तकालका लक्षण है ॥ २४ ॥

बहुयाचनको लोको न दास्यति परस्परम्।
अविचार्य ग्रहीष्यन्ति दानं वर्णान्तरात् तथा ॥ २५ ॥

उस समय लोकमें याचकोंकी संख्या बढ़ जायगी, सभी लोग आपसमें किसीको कुछ नहीं देंगे और लोग बिना विचारे ही दूसरे वर्णोंसे दान ग्रहण करेंगे ॥ २५ ॥

राजचौराग्निदण्डात्तैं जनः क्षयमुपैष्यति।
सस्यनिष्पत्तिरफला तरुणा वृद्धशीलिनः।
ईह्यासुखिनो लोका भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २६ ॥

राजा, चोर और अग्निके दण्डसे पीड़ित हुई प्रजा धीरे-धीरे नष्ट हो जायगी, खेती निष्फल होगी और नौजवानोंका स्वभाव बूढ़ोंके समान हो जायगा (अर्थात् वे उत्साह, बल

७५६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

और पुरुषार्थसे रहित हो जायँगे ), कलियुगमें प्रायः सभी लोग तृष्णाके कारण सुखसे वञ्चित रहेंगे ॥ २६ ॥

वर्षासु वाताः परुषा नीचाः शर्करवर्षिणः ।
संदिग्धः परलोकश्च भविष्यति युगक्षये ॥ २७ ॥

युगान्तकाल आनेपर वर्षा ऋतुमें वायु रूखी, नीच (दुःखदायक) तथा रेत एवं कंकड़ बरसानेवाली होगी। परलोकके विषयमें सबको संशय बना रहेगा ॥ २७ ॥

आत्मनश्च दुराचारा ब्रह्मद्वेषणतत्पराः ।
आत्मानं बहु मन्यन्ते मन्युरेवाभ्ययाद् द्विजान् ॥ २८ ॥

उस समयके दुराचारी मनुष्य आत्मा और ब्रह्मकी निन्दा करनेमें तत्पर होंगे, वे अपने आपको ही सबसे बढ़कर मानेंगे और ब्राह्मणोंमें क्रोधका ही आवेश होगा ॥ २८ ॥

वैश्याचाराश्च राजन्या धनधान्योपजीविनः ।
युगापक्रमणे सर्वे भविष्यन्ति द्विजातयः ॥ २९ ॥

क्षत्रिय वैश्योंके आचारका पालन करनेवाले तथा धन-धान्यके व्यवसायसे जीविका चलानेवाले होंगे। कलियुगमें धर्ममर्यादाके भङ्ग होनेसे सब लोग द्विज बन जायँगे ॥ २९ ॥

अप्रवृत्ताः प्रपत्स्यन्ते समयाः शपथस्तथा ।
ऋणं सविनयभ्रंशं युगे क्षीणे भविष्यति ॥ ३० ॥

युगान्तकालमें परस्पर की हुई प्रतिज्ञाओं और शपथोंका पालन नहीं होगा, वे यों ही समाप्त हो जायँगी तथा विनयशील सज्जन पुरुष भी ऋण नहीं चुकाना चाहेंगे, फिर दुर्जनोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ३० ॥

भविष्यत्यफलो हर्षः क्रोधश्च सफलो नृणाम् ।
अजाश्चैषोपरोत्स्यन्ते पयसोऽर्थे युगक्षये ॥ ३१ ॥

कलियुगमें मनुष्योंका हर्ष निष्फल और क्रोध सफल होगा। दूधके लिये घरोंमें गौएँ नहीं, बकरियाँ बाँधी जायँगी ॥

अशास्त्रविदुषां पुंसामेवमेव स्वभावतः ।
अप्रमाणं वदिष्यन्ति नीतिं पण्डितमानिनः ॥ ३२ ॥

शास्त्रोंका ज्ञान न रखनेवाले मूढ़ मनुष्योंका यों ही अपनी इच्छाके अनुसार निर्णय होगा (वे अपनी इच्छासे जो कुछ कहेंगे, उसीको शास्त्रसम्मत बतायेंगे), अपनेको पण्डित माननेवाले वे मूर्ख मानव अप्रामाणिक बात कहेंगे और उसे नीतिके अनुकूल बतायेंगे ॥ ३२ ॥

शास्त्रोक्तस्याप्रवक्तारो भविष्यन्ति युगक्षये ।
सर्वे सर्वं हि जानन्ति वृद्धाननुपसेव्य वै ॥ ३३ ॥

युगान्तकालमें शास्त्रोक्त बातको बतानेवाले नहीं रहेंगे, बड़े-बूढ़ोंका सेवन किये बिना ही सब लोग सब कुछ जाननेका दावा करेंगे ॥ ३३ ॥

न कश्चिदकविर्नाम युगान्ते समुपस्थिते ।
न क्षत्राणि नियोक्ष्यन्ते विकर्मस्था द्विजातयः ।
चौरप्रायाश्च राजानो युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ३४ ॥

युगान्त उपस्थित होनेपर कोई भी ऐसा न होगा जो अपनेको कवि (सर्वज्ञ) न मानता हो। ब्राह्मणलोग शास्त्रविपरीत कर्ममें स्थित होनेके कारण क्षत्रियोंको धर्ममें नहीं नियुक्त करेंगे। उस समयके राजा प्रायः चोर होंगे ॥ ३४ ॥

कुण्डावृषा नैकृतिकाः सुरापा ब्रह्मवादिनः ।
अश्वमेधेन यक्ष्यन्ति युगान्ते जनमेजय ॥ ३५ ॥

जनमेजय ! युगान्तकालमें कुण्डा (पतिके जीते-जी जार पुरुषके संयोगसे उत्पन्न की गयी कन्या) में गर्भाधान करनेवाले, कपटी और शराबी मनुष्य ब्रह्मवादी बनकर अश्वमेध यज्ञ करेंगे ॥ ३५ ॥

अयाज्यान् याजयिष्यन्ति तथाभक्ष्यस्य भक्षिणः ।
ब्राह्मणा धनतृष्णार्ता युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३६ ॥

युगान्तकाल उपस्थित होनेपर धनकी तृष्णासे पीड़ित हुए ब्राह्मण यज्ञके अनधिकारियोंसे भी यज्ञ करायेंगे और अभक्ष्य वस्तु (मांस आदि) का भक्षण करेंगे ॥ ३६ ॥

भोशब्दमभिधास्यन्ति न च कश्चित् पठिष्यति ।
एकशङ्खास्तदा नार्यो गवेधुकपिनड्काः ॥ ३७ ॥

सब लोग सबके लिये भो (ऐ ! अरे ! अजी ! इत्यादि) का ही उच्चारण करेंगे, कोई भी पढ़ेगा नहीं, उस समय स्त्रियोंके पास एकमात्र शंखके ही आभूषण होंगे, वे अपनेको गवेधुक नामक तृणविशेषसे अलंकृत करेंगी ॥ ३७ ॥

नक्षत्राणि वियोगीनि विपरीता दिशस्तथा ।
संध्यारागोऽथ दिग्दाहो भविष्यत्यवरे युगे ॥ ३८ ॥

अन्तिम युगमें नक्षत्र शास्त्रोक्त ग्रहसंयोग आदिसे रहित होंगे, दिशाएँ विपरीत प्रतीत होंगी, उनमें संध्याकालके समान लाली छायी रहेगी और वहाँ निरन्तर दाह (जलन या तपन) बना रहेगा ॥ ३८ ॥

पितॄन् पुत्रा नियोक्ष्यन्ति वध्वः श्वश्रूश्च कर्मसु ।
वियोनिषु चरिष्यन्ति प्रमदासु नरास्तथा ॥ ३९ ॥

पुत्र पिताओंको और बहुएँ सासोंको आज्ञा देकर काममें लगायेंगी। मनुष्य पशुयोनि या दूसरे वर्णकी स्त्रियोंके साथ भी समागम करेंगे ॥ ३९ ॥

वाक्छरैस्तर्जयिष्यन्ति गुरुंश्छिष्यास्तथैव च ।
मुखेषु च प्रयोक्ष्यन्ति प्रमत्ताश्च नरास्तदा ॥ ४० ॥

शिष्य गुरुजनोंको वाग्बाणोंसे छेदते हुए उन्हें डाँट बतायेंगे तथा कामोन्मत्त पुरुष मुखोंमें भी मैथुन करेंगे ॥

अकृतान्नाणि भोक्ष्यन्ति नराश्चैवाग्निहोत्रिणः ।
भिक्षां बलिमदत्त्वा च भोक्ष्यन्ति पुरुषाः स्वयम् ॥ ४१ ॥

भविष्यपर्व ]चतुर्थोऽध्यायः७५७

अग्निहोत्री मनुष्य भी अग्रग्रास निकाले बिना ही भोजन करेंगे, यति आदिको भिक्षा और देवता आदिके लिये बलि (भोजनका ग्रास या उपहारसामग्री) दिये बिना ही लोग स्वयं भोजन कर लेंगे ॥ ४१ ॥

पतीन् सुप्तान् वञ्चयित्वा गमिष्यन्ति स्त्रियोऽन्यतः।
पुरुषाश्च प्रसुप्तासु भार्यासु च परश्रियम् ॥ ४२ ॥
सोये हुए पतियोंको धोखा देकर स्त्रियाँ दूसरोंके पास चली जायँगी, इसी तरह पुरुष भी अपनी स्त्रियोंके सो जानेपर परायी स्त्रियोंके साथ समागम करेंगे ॥ ४२ ॥

नाप्याधितो नाप्यरुजो जनः सर्वोऽभ्यसूयकः।
न कृतप्रतिकर्ता च युगे क्षीणे भविष्यति ॥ ४३ ॥
उस समय कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं होगा, जो शारीरिक रोग और मानसिक पीड़ासे ग्रस्त न हो, सब लोग दूसरोंके दोष देखनेवाले होंगे। युगान्तकालमें कोई भी उपकारका बदला देनेवाला नहीं होगा ॥ ४३ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि कलियुगवर्णने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें कलियुगका वर्णनविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥


चतुर्थोऽध्यायः

कलियुगका वर्णन

जनमेजय उवाच
एवं विलुलिते लोके मनुष्याः केन पालिताः।
निवत्स्यन्ति किमाचाराः किमाहारविहारिणः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**मुने! इस प्रकार अनाचारसे कलङ्कित हुए जगत्में मनुष्य किससे सुरक्षित हो निवास करेंगे? उनके आचार तथा आहार-विहार कैसे होंगे? ॥ १ ॥

किंकर्माणः किमीहन्तः किंप्रमाणाः किमायुषः।
कां च काष्ठां समासाद्य प्रपत्स्यन्ति कृतं युगम् ॥ २ ॥
उनका कर्म क्या होगा? वे कैसी चेष्टा करेंगे? उनके शरीरकी लंबाई या ऊँचाई कितनी होगी? उनकी आयु कितने वर्षोंकी होगी? तथा वे किस सीमातक पहुँचकर सत्ययुग प्राप्त करेंगे? ॥ २ ॥

व्यास उवाच
अत ऊर्ध्वं च्युते धर्मे गुणहीनाः प्रजास्ततः।
शीलव्यसनमासाद्य प्राप्स्यन्ते ह्रासमायुषः ॥ ३ ॥
**व्यासजीने कहा—**जनमेजय! इसके बाद धर्मके नष्ट हो जानेपर गुणहीन हुई सारी प्रजा अपना शील खोकर अल्पायु हो जायगी ॥ ३ ॥

आयुर्हान्या बलग्लानिर्बलग्लान्या विवर्णता।
वैवर्ण्याद् व्याधिसम्पीडा निर्वेदो व्याधिपीडनात् ॥ ४ ॥
आयुकी हानि होनेसे उनका बल क्षीण हो जायगा, बलके क्षीण होनेसे उनकी अङ्गकान्ति फीकी पड़ जायगी, कान्तिमें विकार आनेसे उनके शरीरमें रोगजनित पीड़ा होगी तथा रोगजनित पीड़ासे उनके मनमें निर्वेद (वैराग्यपूर्ण खेद) होगा ॥ ४ ॥

निर्वेदादात्मसम्बोधः सम्बोधाद् धर्मशीलता।
एवं गत्वा परां काष्ठां प्रपत्स्यन्ति कृतं युगम् ॥ ५ ॥
निर्वेदसे उन्हें आत्मबोध प्राप्त होगा, उस बोधसे उनमें धर्मशीलता आयेगी और इस प्रकार धर्मशीलताकी चरम सीमाको पहुँचकर वे सत्ययुग प्राप्त कर लेंगे ॥ ५ ॥

उद्देशतो धर्मशीलाः केचिन्मध्यस्थतां गताः।
विमर्षशीलाः केचित् तु हेतुवादकुतूहलाः ॥ ६ ॥
(कलियुगमे) कुछ लोग लेशमात्र धर्मका पालन करनेवाले होंगे, कुछ लोग धर्मकी ओरसे तटस्थ या उदासीन रहेंगे और कुछ लोग विवेकशील होनेपर भी धर्मके समर्थनमें अच्छी-अच्छी युक्ति देनेके लिये ही उत्सुक रहेंगे, स्वयं उस धर्मका आचरण नहीं करेंगे ॥ ६ ॥

प्रत्यक्षममुमानं च प्रमाणं चेति निश्चिताः।
प्रमाणैकं करिष्यन्ति नेति पण्डितमानिनः ॥ ७ ॥
कुछ लोग दृढ़ निश्चयके साथ केवल प्रत्यक्ष और अनुमानको ही प्रमाण मानेंगे (वेद अथवा शब्दको प्रमाण नहीं मानेंगे); कुछ पण्डितमानी पुरुष एकमात्र प्रत्यक्षको ही प्रमाण मानेंगे, दूसरे किसी प्रमाणको नहीं स्वीकार करेंगे ॥

अप्रमाणं करिष्यन्ति वेदोक्तमपरे जनाः।
तदा मुखभगाश्चैव भविष्यन्ति स्त्रियोऽपराः ॥ ८ ॥
दूसरे लोग वेदोक्त मतको प्रामाणिक नहीं मानेंगे। कलियुगमें कितनी ही स्त्रियाँ मुखसे ही भगका काम लेनेवाली होंगी ॥ ८ ॥

नास्तिक्यपरमास्थापि केचिद् धर्मविलोपकाः।
भविष्यन्ति नरा मूढा मन्दाः पण्डितमानिनः ॥ ९ ॥
कितने ही पण्डितमानी मन्दबुद्धि मूढ़ मानव नास्तिकतामें प्रवृत्त होकर धर्मका लोप करनेवाले होंगे ॥ ९ ॥

तद्भावमात्रे श्रद्धेयाः शास्त्रज्ञानबहिष्कृताः।
दाम्भिकास्ते भविष्यन्ति वादशीलकुतूहलाः ॥ १० ॥

७५८ श्रीमद्भारते खिलभागे [. हरिवंशे


वे वर्तमान कालकी प्रत्यक्ष बातोंपर ही श्रद्धा या विश्वास करनेवाले, शास्त्रज्ञानसे रहित और पाखण्डी होंगे, धर्मकी चर्चा और आचरण दोनों ही उनके लिये आश्चर्यकी वस्तु होंगे (अर्थात् वे धर्मकी चर्चा भी नहीं करेंगे, फिर आचरणकी तो बात ही क्या है?) ॥ १० ॥

तदा विचालते धर्मे जनाः शेषपुरस्कृताः ।
शुभान्येवाचरिष्यन्ति दानसत्यसमन्विताः ॥ ११ ॥

उस समय धर्मके विचलित हो जानेपर लोग भगवत्-स्मरण आदि अवशिष्ट धर्मको सामने रखते हुए दान और सत्यसे संयुक्त हो दया आदि शुभकर्मोंका ही आचरण करेंगे ॥

सर्वभक्षो ह्यसंगुप्तो निर्गुणो निरपत्रपः ।
भविष्यति तदा लोकस्तत् कषायस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥

उस समयके लोग सर्वभक्षी, अजितेन्द्रिय, गुणहीन और निर्लज्ज होंगे, यही कलिकालजनित कषायका लक्षण है ॥ १२ ॥

विप्राणां शाश्वतीं वृत्तिं यदा वर्णावरा जनाः ।
प्रतिपत्स्यन्ति वृत्त्यर्थं तत् कषायस्य लक्षणम् ॥ १३ ॥

जब क्षत्रिय आदि वर्णोंके लोग जीविकाके लिये ब्राह्मणोंकी सनातन वृत्तिको अपना लेंगे, तब वही कलिके कालुष्यका सूचक होगा ॥ १३ ॥

कषायोपप्लवे लोके ज्ञानविद्याप्रणाशने ।
सिद्धिं स्वल्पेन कालेन यास्यन्ति निरुपस्कृताः ॥ १४ ॥

संसारमें कलिकालके कलुषका उपद्रव बढ़ जानेपर जब ज्ञान (शास्त्रीय बोध) और विद्या (आत्मदर्शन) का लोप हो जायगा, तब परिग्रहशून्य हुए मनुष्य केवल त्यागमात्रसे थोड़े ही समयमें सिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर लेंगे ॥ १४ ॥

महायुद्धं महावातं महावर्षे महाभयम् ।
भविष्यति युगे क्षीणे तत् कषायस्य लक्षणम् ॥ १५ ॥

युगान्तकालमें महान् युद्ध, प्रचण्ड आँधी, बड़ी भारी वर्षा और महान् भय उपस्थित होगा, वह कलिकालके कलुषका लक्षण है ॥ १५ ॥

विप्ररूपाणि रक्षांसि राजानः कर्णवेदिनः ।
पृथिवीमुपभोक्ष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ १६ ॥

युगान्तकाल उपस्थित होनेपर यहाँ ब्राह्मणोंके रूपमें राक्षस निवास करेंगे, राजालोग कानोंसे सुनी हुई बातको ही ठीक मानेंगे और चुगलखोरोंके साथ रहकर ही पृथ्वीका उपभोग करेंगे ॥ १६ ॥

निःस्वाध्यायवषट्कारा अनयान्नाभिमानिनः ।
विप्राः क्रव्यादरूपेण सर्वभक्षा वृथाव्रताः ॥ १७ ॥

ब्राह्मण स्वाध्याय और वषट्कारसे दूर हो नीतिशून्य और अभिमानी होकर राक्षसोंके समान सब कुछ भक्षण करेंगे और व्यर्थ (पाखण्डपूर्ण) व्रतका पालन करनेवाले होंगे ॥


मूर्खाः स्वार्थपरा लुब्धाः क्षुद्राः क्षुद्रपरिच्छदाः ।
व्यवहारोपवृत्ताश्च च्युता धर्माच्च शाश्वतात् ॥ १८ ॥

वे मूर्ख, स्वार्थपरायण, लोभी और नीच विचारके होंगे; उनके आश्रित रहनेवाले लोग भी वैसे ही होंगे, वे सनातन धर्मसे भ्रष्ट होकर केवल भोजनाच्छादनादि व्यवहारमें ही तत्पर रहेंगे ॥ १८ ॥

हर्तारः पररत्नानां परदारापहारकाः ।
कामात्मानो दुरात्मानः सोपधाः प्रियसाहसाः ॥ १९ ॥

उस समयके मनुष्य पराये रत्नों और परायी स्त्रियोंका अपहरण करनेवाले होंगे, उन सबके चित्त कामसे कलुषित होंगे, वे दुरात्मा, कपटी और दुःसाहसको पसंद करनेवाले होंगे ॥ १९ ॥

तेषु प्रभवमाणेषु तुल्यशीलेषु सर्वतः ।
अभाविनो भविष्यन्ति मुनयो बहुरूपिणः ॥ २० ॥

एक समान शीलवाले और प्रभुतासे सम्पन्न वे दुष्ट मनुष्य जब सब ओर फैल जायँगे, तब अनेक रूपधारी एवं आत्माके अभावका प्रतिपादन करनेवाले बहुत-से (वैनाशिक मतावलम्बी) मुनि प्रकट हो जायँगे ॥ २० ॥

उत्पन्ना ये कृतयुगे प्रधानपुरुषाश्रयाः ।
कथायोगेन तान् सर्वान् पूजयिष्यन्ति मानवाः ॥ २१ ॥

सत्ययुगमें ईश्वरका आश्रय लेनेवाले जो भक्त पैदा हो गये हैं, उन सबकी कलियुगके मनुष्य कथावार्ताके प्रसङ्गमें पूजा करेंगे (उनके प्रति आदरका भाव प्रकट करेंगे, परंतु स्वयं उनके जैसा आचरण नहीं करेंगे) ॥ २१ ॥

सस्यचौरा भविष्यन्ति तथा चैलापहारिणः ।
भक्ष्यभोज्यापहाराश्च करण्डानां च हारिणः ॥ २२ ॥

कलिकालके मनुष्य खेतोंमें लगी हुई खेतीकी चोरी करेंगे, दूसरोंके वस्त्र चुरा लेंगे, खाने-पीनेकी वस्तुएँ हड़प लेंगे, कंदों अथवा बाँसकी पिटारियोंको भी उड़ा ले जायँगे ॥ २२ ॥

चौराश्चौरस्य हर्तारो हन्ता हन्तुर्भविष्यति ।
चौरैश्चौरक्षये चापि कृते क्षेमं भविष्यति ॥ २३ ॥

उस समयके चोर चोरके घरमें भी चोरी करेंगे, हत्यारेकी भी हत्या करनेवाले पैदा हो जायँगे, इस प्रकार जब चोरोंके द्वारा चोरोंका विनाश कर दिया जायगा, तब जगत्‌का कल्याण होगा ॥ २३ ॥

निःसारे क्षुभिते लोके निष्क्रिये व्यन्तरे स्थिते ।
नराः श्रयिष्यन्ति वनं करभारप्रपीडिताः ॥ २४ ॥

जब सारा संसार निर्धन, संध्यावन्दन आदि सत्कर्मोंसे रहित तथा वर्णभेदसे शून्य हो जायगा, उस समय करोंके भारसे अत्यन्त पीड़ित हुए मनुष्य वनका आश्रय लेंगे ॥ २४ ॥

पितृनाज्ञापयिष्यन्ति पुत्राः कर्मणि सर्वशः ।
स्नुषा श्वश्रूस्तथा चैव युगान्ते प्रत्युपस्थिते ॥ २५ ॥

भविष्यपर्व ] चतुर्थोऽध्यायः ७५९


युगान्तकाल उपस्थित होनेपर पुत्र पिताओंको सभी कर्म करनेके लिये आदेश दिया करेंगे; इसी तरह बहुएँ अपनी सासोंपर हुकम चलाया करेंगी ॥ २५ ॥

वाक्छरैर्दर्दयिष्यन्ति गुरूञ्छिष्याः समन्ततः।
यज्ञकर्मण्युपरते रक्षांसि श्वापदानि च।
कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान् ॥ २६ ॥

सब ओर शिष्य गुरुजनोंको वाग्बाणोंसे पीड़ित करेंगे। यज्ञकर्म बंद हो जानेपर राक्षस, हिंसक जन्तु तथा कीड़े, चूहे और सर्प मनुष्योंपर आक्रमण करेंगे ॥ २६ ॥

क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं सामग्र्यं चापि बन्धुषु।
उद्देशतो नरश्रेष्ठ भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २७ ॥

नरश्रेष्ठ ! कलियुगमें क्षेम, सुभिक्ष, आरोग्य और भाई-बन्धुओंमें मेल-मिलाप या बन्धु-बान्धवोंकी पूर्णता आदि बातें बहुत कम हो जायेंगी ॥ २७ ॥

स्वयंपालाः स्वयंचौरा युगसम्भारसम्भूताः।
मण्डलैः प्रचलिष्यन्ति देशे देशे पृथक्पृथक् ॥ २८ ॥

उस समयके लोग स्वयं ही रक्षक और स्वयं ही चोर होंगे और युगकी आवश्यकताके अनुरूप उपकरणोंसे सम्पन्न हो पृथक् पृथक् झुंड बनाकर देश-देशमें घूमते फिरेंगे ॥ २८ ॥

स्वदेशेभ्यः परिभ्रष्टा निःसाराः सह बन्धुभिः।
नराः सर्वे भविष्यन्ति तदा कालपरिक्षयात् ॥ २९ ॥

उस समय कालवश अपनी अवनति होनेके कारण सब मनुष्य अपने-अपने देशोंसे निर्वासित होकर बन्धुओंसहित निःसार (निर्धन) हो जायँगे ॥ २९ ॥

तदा स्कन्धे समाधाय कुमारान्विद्रुता भयात्।
कौशिकीं प्रतरिष्यन्ति नराः क्षुद्भयपीडिताः ॥ ३० ॥

उन दिनों भूखके भयसे पीड़ित हुए मनुष्य बच्चोंको कंधेपर रखकर आतंकवश भागकर कोसी नदीको पार कर जायँगे ॥ ३० ॥

अङ्गान्वङ्गान कलिङ्गांश्च काश्मीरानाथ मेकलान्।
ऋषिकान्तर्गिरिद्रोणीः संश्रयिष्यन्ति मानवाः ॥ ३१ ॥

लोग जीविकाके लिये अङ्ग, वङ्ग, कलिङ्ग, काश्मीर, मेकल तथा ऋषिक आदि देशोंके भीतर चले जायँगे और पर्वतकी घाटियोंका आश्रय लेंगे ॥ ३१ ॥

कृत्स्नं वा हिमवत्पादंयैकूलं च लवणाम्भसः।
अरण्येषु च वत्स्यन्ति नरा म्लेच्छगणैः सहः ॥ ३२ ॥

उस समयके मनुष्य म्लेच्छोंके साथ समूचे हिमालयके पादभागमें, लवणसमुद्रके तटपर तथा वनोंमें निवास करेंगे॥

नैव शून्या न चाशून्या भविष्यति वसुंधरा।
गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः प्रभविष्यन्ति शस्त्रिणः ॥ ३३ ॥

पृथ्वी न तो मनुष्योंसे सूनी होगी और न भरी ही रहेगी। हाथमें शस्त्र लेकर रक्षाके कार्यमें नियुक्त हुए पुरुष भी किसीकी रक्षा नहीं कर सकेंगे ॥ ३३ ॥

मृगैर्मत्स्यैर्विहंगैश्च श्वापदैः सर्पकीटकैः।
मधुशाकफलैर्मूलैर्वर्तयिष्यन्ति मानवाः ॥ ३४ ॥

कलियुगके धर्मभ्रष्ट मनुष्य मृग, मत्स्य, पक्षी, हिंसक जन्तु, सर्प, कीट, मधु, शाक, फल और मूलसे जीवन-निर्वाह करेंगे ॥ ३४ ॥

चीरं पर्णं च बहुलं वल्कलान्यजिनानि च।
स्वयंकृतानि वत्स्यन्ति यथा मुनिजनास्तथा ॥ ३५ ॥

लोग ऋषि-मुनियोंकी भाँति चिथड़ों, पत्तों, वल्कलों, हिरनके चमड़ों तथा अपने बनाये हुए अन्य वस्त्रोंको धारण करेंगे ॥ ३५ ॥

बीजानामाकृतिं निम्नेष्वीहन्तः काष्ठशङ्कुभिः।
अजैंडकं खरोष्ट्रं च पालयिष्यन्ति यत्नतः ॥ ३६ ॥

कितने ही मनुष्य पर्वतकी कन्दरा आदि निम्न स्थानोंमें रहकर ग्रामीण और जङ्गली बीजों (अनाजों) की प्राप्तिके लिये चेष्टा करते हुए काठके खूँटोंमें बकरों और भेड़ोंको तथा काश्मीर आदि अन्य स्थानोंके लोग गधों और ऊँटोंको बाँधकर उनका यत्नपूर्वक पालन करेंगे ॥ ३६ ॥

नदीस्रोतांसि रोत्स्यन्तितोयार्थे कूलमाश्रिताः।
पक्वान्नव्यवहारेण विपणन्तः परस्परम् ॥ ३७ ॥
तनूरुहैर्यथा जातैः समूलान्तरसंवृतैः।

कलियुगके मनुष्य जलके लिये तटपर आकर नदीके प्रवाहको रोकेंगे। वे आपसमें पके-पकाये अन्नके लेन-देनका व्यवसाय करेंगे। जैसे अपने शरीरसे उत्पन्न हुई संतानोंके निमित्तसे लोग आपसमें लड़ते हैं, उसी प्रकार मूलधनके सहित सूदको छिपानेके कारण आपसमें विवाद करते हुए लोग परस्पर लेन-देनका व्यवहार करेंगे ॥ ३७½ ॥

बह्वपत्याः प्रजाहीनाः कुललक्षणवर्जिताः ॥ ३८ ॥
एवं भविष्यन्ति तदा मनुष्याः कालकारिताः।

उन दिनों कालसे प्रेरित हुए कुछ मनुष्य तो अधिक संतानवाले होंगे और कुछ लोगोंको एक भी संतान नहीं होगी। इसी तरह प्रायः सब लोग कुलोचित शुभ लक्षणोंसे हीन होंगे ॥ ३८½ ॥

हीनाद्धीनां तदा धर्मं प्रजाः समनुवर्त्स्यति ॥ ३९ ॥
आयुस्तत्र च मर्त्यानां परं त्रिंशद् भविष्यति।

उस समयकी प्रजा हीन-से-हीन धर्मका अनुसरण करेगी तथा उन दिनों मनुष्योंकी आयु अधिक-से-अधिक तीस वर्षकी होगी ॥ ३९½ ॥

दुर्बला विषयग्लानि रजसा समभिप्लुताः ॥ ४० ॥

७६०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

भविष्यति तदा तेषां रोगैरिन्द्रियसंक्षयः।
आयुःप्रक्षयसंरोधाद् विषादः प्रभविष्यति ॥ ४१ ॥

सब लोग दुर्बल, विषयसेवनके कारण कृश तथा रजो-गुणसे अभिव्याप्त होंगे। उस समय रोगोंके कारण उनकी इन्द्रियाँ क्षीण हो जायँगी, आयुके क्षय एवं निरोधसे उनके मनमें विषाद होगा ॥ ४०-४१ ॥

शुश्रूषवो भविष्यन्ति साधूनां दर्शने रताः।
सत्यं च प्रतिपत्स्यन्ति व्यवहारोपसंक्षयात् ॥ ४२ ॥

फिर वे धर्मोपदेश सुननेकी इच्छा रखकर साधु पुरुषोंके दर्शनमें मन लगानेवाले होंगे; व्यवहार या व्यवसाय क्षीण हो जानेके कारण वे सत्यको अपनायेंगे ॥ ४२ ॥

भविष्यन्ति च कामानामलाभाद् धर्मशीलिनः।
करिष्यन्ति च संकोचं स्वपक्षक्षयपीडिताः ॥ ४३ ॥

कामनाओंकी प्राप्ति न होनेसे धर्मशील बनेंगे और अपने पक्षके विनाशसे पीड़ित हो दुराचारको संकुचित कर देंगे ॥ ४३ ॥

एवं शुश्रूषणे ज्ञाने सत्ये प्राणाभिरक्षणे।
चतुष्पादः प्रवृत्तश्च धर्मः श्रेयोऽभिपत्स्यते ॥ ४४ ॥

इस प्रकार शुश्रूषा, दान, सत्य और प्राणरक्षामें प्रवृत्त हुआ चार चरणोंवाला धर्म श्रेयकी प्राप्ति करायेगा ॥ ४४ ॥

तेषां लब्धानुमानानां गुणेषु परिवर्तताम्।
स्वादु किं न्विति विज्ञाय धर्मं एवं वदिष्यति ॥ ४५ ॥

इस प्रकार जो श्रेयको प्राप्त हुए पुरुष अनुमानसे धर्म और अधर्मके फलको जान गये हैं और शब्दादि विषयोंमें रम रहे हैं, उनके लिये कौन-सी वस्तु स्वादिष्ट या सुखद है—विषयोंमें रमण या धर्मके मार्गपर संचरण, यह संदेह उठाकर तत्त्वका निश्चय करके लोग इस प्रकार कहेंगे ॥ ४५ ॥

यथा हानिः क्रमात् प्राप्ता तथा वृद्धिः क्रमाद् गता।
प्रगृहीते यतो धर्मे प्रवर्त्स्यन्ति कृतं युगम् ॥ ४६ ॥

जैसे क्रमशः धर्मकी हानि प्राप्त हुई थी, उसी प्रकार क्रमशः उसकी वृद्धि होगी; क्योंकि धर्मको पूर्णतः अपना लेनेपर मनुष्य सत्ययुगको प्राप्त कर लेंगे ॥ ४६ ॥

साधु वृत्तं कृतयुगे कषाये हानिरुच्यते।
एक एव तु कालः स हीनवर्णो यथा शशी ॥ ४७ ॥

सत्ययुगमें सबका बर्ताव उत्तम होता है और कलियुगमें सदाचारकी हानि बतायी जाती है, जैसे एक ही चन्द्रमा कभी कान्तिसे हीन और कभी कान्तिसे पूर्ण होता है, उसी प्रकार एक ही काल कभी कृतयुग और कभी कलियुगके रूपमें दृष्टिगोचर होता है ॥ ४७ ॥

छन्नो हि तमसा सोमो यथा कलियुगे तथा।
पूर्णश्च तमसा हीनो यथा कृतयुगे तथा ॥ ४८ ॥

जैसे चन्द्रमा अमावास्याको अन्धकारसे आच्छन्न होता है, उसी प्रकार कलियुगमें धर्म आच्छादित हो जाता है और जैसे पूर्णिमाको परिपूर्ण चन्द्रमा अन्धकारसे हीन होता है, उसी प्रकार सत्ययुगमें चारों चरणोंसे युक्त परिपूर्ण धर्म सर्वथा प्रकाशित होता है ॥ ४८ ॥

अर्थवादः परं ब्रह्म वेदार्थ इति तं विदुः।
अनिर्णीक्तमविज्ञातं दायाद्यमिव धार्यते ॥ ४९ ॥

जो परब्रह्म परमात्मा है, वह भूतार्थवाद है (परब्रह्मके रूपमें वेदके सत्य अर्थका ही प्रतिपादन हुआ) और विद्वान् पुरुष उसीको वेदका मुख्य अर्थ भी मानते हैं। (यदि ऐसी बात है तो वह सर्वव्यापी नित्यसिद्ध परमात्मा सबको प्राप्त क्यों नहीं होता? इसके उत्तरमें कहते हैं—) जैसे पैतृक सम्पत्तिके रूपमें मिला हुआ मलिन सुवर्णखण्ड जबतक उसका मल दूर न हो, तबतक अज्ञात दशामें ही धारण किया जाता है और उसे धारण करके भी मनुष्य अपनेको दरिद्र ही मानता है, उसी प्रकार अन्तःकरणके मलिन होनेसे परमात्मा अज्ञातरूपमें ही धारण किया जाता है; जब अन्तःकरण शुद्ध होता है; तब वह अपने आत्मासे अभिन्न रूपमें प्रकाशित हो उठता है और उसकी अप्राप्तिका भ्रम दूर हो जाता है ॥ ४९ ॥

इष्टवादस्तपो नाम तपो हि स्थावरं कृतम्।
गुणैः कर्माभिनिर्वृत्तिर्गुणांस्तथ्येन कर्मणा ॥ ५० ॥

तप (वर्णाश्रमोचित धर्म) स्वर्गादि अभीष्ट फलोंका प्रतिपादक है, तप स्थावर-अनादि अर्थात् अमोघ फलका साधक है, ऐसा शास्त्रमें निश्चय किया गया है। गुणों (देह-इन्द्रियादि) से कर्मकी सिद्धि होती है और यथार्थ कर्मसे गुणों (देह-इन्द्रियादि) की प्राप्ति होती है (अतः इस शरीर और कर्म आदिके बन्धनोंसे छुटकारा पानेके लिये परमात्माका आश्रय लेना चाहिये) ॥ ५० ॥

आशीस्तु पुरुषं दृष्ट्वा देशकालानुवर्तिनी।
युगे युगे यथाकालमृषिभिः समुदाहृता ॥ ५१ ॥

ऋषियोंने पुरुषकी योग्यताको सामने रखकर प्रत्येक युगमें यथासमय आशिष (कर्मफलकी प्राप्ति) का प्रतिपादन किया है, क्योंकि वह देश-कालका अनुसरण करनेवाली होती है ॥ ५१ ॥

इह धर्मार्थकामानां देवतानां प्रतिक्रिया।
आशिषश्च शुभाः पुण्यास्तथैवायुर्युगे युगे ॥ ५२ ॥

इस मर्त्यलोकमें धर्म, अर्थ और कामसम्बन्धी फल, देवाराधनके फल, शुभ एवं पुण्य आशिष तथा आयु प्रत्येक युगमें मनुष्योंकी श्रद्धाके तारतम्यके अनुसार होती हैं ॥ ५२ ॥