भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 758
७३६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

बाण उवाच
वैरूप्यमङ्गजं यन्मे मा भूद् देव कदाचन ।
द्विबाहुरपि मे देहो न विरूपो भवेद् भव ॥१६१॥
बाणासुर बोला—देव ! शङ्कर ! मेरे शरीरमें कभी कुरूपता न रहे; दो बाँहोंसे युक्त होनेपर भी मेरी देह कुरूप न प्रतीत हो ॥ १६१ ॥

श्रीहर उवाच
भविता सर्वमेतत् ते यथेच्छसि महासुर ।
भवत्येवं न चादेयं भक्तानां विद्यते मम ॥१६२॥
श्रीमहादेवजी बोले—महासुर ! तुम जैसा चाहते हो, यह सब तुम्हारे लिये सुलभ होगा । मेरे पास भक्तोंके लिये कुछ भी अदेय नहीं है ॥ १६२ ॥

वैशम्पायन उवाच
ततोऽब्रवीन्महादेवो बाणं स्थितमथान्तिके ।
एवं भविष्यते सर्वं यत् त्वया समुदाहृतम् ॥१६३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब महादेवजीने अपने पास खड़े हुए बाणासुरसे कहा—‘वत्स ! तुमने जो कुछ कहा या माँगा है, वह सब इसी रूपमें पूर्ण होगा’ ॥ १६३ ॥

एतावदुक्त्वा भगवांस्त्रिनेत्रो गणसंवृतः ।
पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत ॥१६४॥
ऐसा कहकर अपने गणोंसे घिरे हुए त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव समस्त प्राणियोंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १६४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उपाहरणे बाणासुरवरप्रदाने षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥१२६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उपाहरणके प्रसंगमें बाणासुरको भगवान् शिवका वरदानविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥


सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

अनिरुद्धका नागपाशसे छुटकारा और उनके द्वारा श्रीकृष्ण आदिकी वन्दना, नारदजीके कहनेसे उनका वीर्य-विवाह, उषाकी विदाई, सबका द्वारकाको प्रस्थान, मार्गमें श्रीकृष्णद्वारा वरुण देवतापर विजय, वरुणद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति और पूजा, श्रीकृष्णके आगमनसे द्वारकावासियोंका हर्ष, भगवान्‌के आदेशसे पुरवासियोंद्वारा देवताओंकी वन्दना, इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी प्रशंसा और सब देवताओं तथा ऋषियों आदिका अपने-अपने स्थानको जाना

वैशम्पायन उवाच
एवं वरान् बहून् प्राप्य बाणः प्रीतमनाऽभवत् ।
जगाम सह रुद्रेण महाकालत्वमागतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार बहुत-से वर पाकर बाणासुरका मन प्रसन्न हो गया । वह महाकालत्वको प्राप्त होकर भगवान् शिवके साथ चला गया ॥ १ ॥

वासुदेवोऽपि बहुधा नारदं पर्यपृच्छत ।
क्वानिरुद्धोऽस्ति भगवन् संयतो नागबन्धनैः ॥ २ ॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन स्नेहक्लिन्नं हि मे मनः ।
अनिरुद्धे हृते वीरे क्षुभिता द्वारका पुरी ॥ ३ ॥
इधर भगवान् श्रीकृष्णने नारदजीसे बारंबार पूछा—‘भगवन् ! अनिरुद्ध कहाँ नागपाशमें बँधे हुए हैं, मैं इसे ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ । मेरा हृदय स्नेहसे आकुल हो रहा है। वीर अनिरुद्धका अपहरण होनेसे सारी द्वारकापुरी क्षुब्ध हो उठी है ॥ २-३ ॥

शीघ्रं तं मोक्षयिष्यामो यदर्थं वयमागताः ।
अद्य तं नष्टशत्रुं वै द्रष्टुमिच्छामहे वयम् ॥ ४ ॥
स प्रदेशस्तु भगवन् विदितस्तव सुव्रत ।
‘अतः हमलोग शीघ्र उन्हें बन्धनसे छुड़ायेंगे, जिसके लिये कि हमारा यहाँ आगमन हुआ है। अनिरुद्धका शत्रु नष्ट हो गया, अब हम उन्हें देखना और उनसे मिलना चाहते हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले भगवान् नारद ! जहाँ अनिरुद्ध हैं, वह स्थान आपको विदित है’ ॥ ४½ ॥

एवमुक्तस्तु कृष्णेन नारदः प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥
कन्यापुरे कुमारोऽसौ बद्धो नागैश्च माधव ।
श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर नारदजीने उत्तर दिया—‘माधव ! कुमार अनिरुद्ध कन्याके अन्तःपुरमें नागपाशसे बँधे हुए हैं’ ॥ ५½ ॥

एतस्मिन्नन्तरे शीघ्रं चित्रलेखा ह्युपस्थिता ॥ ६ ॥
बाणस्योत्तमशर्वस्य दैत्येन्द्रस्य महात्मनः ।
इदमन्तःपुरं देव प्रविशस्व यथासुखम् ॥ ७ ॥