विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 759, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ ७३७
इसी बीचमें चित्रलेखा शीघ्रतापूर्वक वहाँ उपस्थित हुई और बोली—'देव ! जिसने भगवान् शङ्करको ही सर्वोपरि मानकर उनकी आराधना की है, उस दैत्यराज महात्मा बाणासुरका अन्तःपुर यही है। आप इसमें सुखपूर्वक प्रवेश कीजिये' ॥ ६-७ ॥
ततः प्रविष्टास्ते सर्वे ह्यनिरुद्धस्य मोक्षणे ।
बलः सुपर्णः कृष्णस्तु प्रद्युम्नो नारदस्तथा ॥ ८ ॥
तब बलराम, गरुड, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और नारद —ये सब लोग अनिरुद्धको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये बाणासुरके अन्तःपुरमें प्रविष्ट हुए ॥ ८ ॥
ततो दृष्ट्वैव गरुडं येऽनिरुद्धशरीरगाः ।
शररूपा महासर्पा वेष्टयित्वा तनुं स्थिताः ॥ ९ ॥
ते सर्वे सहसा देहात् तस्य निःसृत्य भोगिनः ।
क्षितिं समभवंस्तित्वा प्रकृत्यावस्थिताः शराः ॥ १० ॥
फिर तो गरुडको देखते ही अनिरुद्धके शरीरमें जो बाण-रूपी महासर्प उनके सारे अङ्गोंको आवेष्टित करके स्थित थे, वे सब सहसा उनकी देहसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़े और साधारण बाणोंके रूपमें परिणत हो गये ॥ ९-१० ॥
दृष्टः स्पृष्टश्च कृष्णेन सोऽनिरुद्धो महायशाः ।
स्थितः प्रीतमना भूत्वा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ११ ॥
श्रीकृष्णका दर्शन और स्पर्श पाकर महायशस्वी अनिरुद्ध मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और खड़े हो हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले ॥ ११ ॥
अनिरुद्ध उवाच
देवदेव सदा युद्धे जेता त्वमसि केशव ।
न शक्तः प्रमुखे स्थातुं साक्षादपि शतक्रतुः ॥ १२ ॥
अनिरुद्धने कहा—देवाधिदेव केशव ! आप सदा ही युद्धमें विजयी हैं। प्रभो ! आपके सामने साक्षात् इन्द्र भी ठहर नहीं सकते ॥ १२ ॥
ततो महाबलं देवं बलभद्रं यशस्विनम् ।
अभिवादयते हृष्टः सोऽनिरुद्धो महामनाः ॥ १३ ॥
तदनन्तर महामनस्वी अनिरुद्धने बड़े हर्षके साथ महान् बलशाली यशस्वी बलभद्रदेवको प्रणाम किया ॥ १३ ॥
माधवं च महात्मानमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
खगोत्तमं महावीर्यं सुपर्णमभिवाद्य च ॥ १४ ॥
ततो मकरकेतुं च विचित्रबाणधरं प्रभुम् ।
पितरं सोऽभ्युपागम्य प्रद्युम्नमभिवादयत् ॥ १५ ॥
फिर हाथ जोड़कर महात्मा माधव तथा महापराक्रमी पक्षिप्रवर गरुड़का पृथक्-पृथक् अभिवादन करके उन्होंने अपने पिता विचित्र बाणधारी सर्वसमर्थ मकरध्वज प्रद्युम्नके पास जाकर उन्हे भी प्रणाम किया ॥ १४-१५ ॥
सखीगणवृता चैव सा चोषा भवने स्थिता ।
बलं चातिबलं चैव वासुदेवं सुदुर्जयम् ॥ १६ ॥
असंख्यातगतिं चैव सुपर्णमभिवाद्य च ।
पुष्पबाणधरं चैव लजमानाभ्यवादयत् ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् उस भवनमें रहनेवाली सखियोंसहित उषाने आकर अत्यन्त बलशाली बलराम, परम दुर्जय वासुदेव और अप्रमेय गतिशील गरुड़को प्रणाम करके पुष्पबाणधारी प्रद्युम्नको भी लज्जापूर्वक नमस्कार किया ॥ १६-१७ ॥
ततः शक्रस्य वचनान्नारदः परमद्युतिः ।
वासुदेवसमीपं स प्रहसन् पुनरागतः ॥ १८ ॥
तब इन्द्रके कहनेसे परमतेजस्वी नारदजी पुनः भगवान् श्रीकृष्णके समीप हँसते हुए आये ॥ १८ ॥
वर्द्धापयति तं देवं गोविन्दं शत्रुसूदनम् ।
दिष्ट्या वर्द्धसि गोविन्द अनिरुद्धसमागमात् ॥ १९ ॥
वे शत्रुसूदन गोविन्ददेवको बधाई देते हुए बोले—'गोविन्द ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज आप अनिरुद्ध-से मिलकर अभ्युदयको प्राप्त हुए हैं' ॥ १९ ॥
ततोऽनिरुद्धसहिता नारदं प्रणताः स्थिताः ।
आशीर्भिर्वर्द्धयित्वा च देवर्षिः कृष्णमब्रवीत् ॥ २० ॥
तब अनिरुद्धसहित वे सब लोग नारदजीके चरणोंमें प्रणाम करके खड़े हो गये; तब देवर्षिने आशीर्वादसे उन सबके अभ्युदयकी कामना करके श्रीकृष्णसे कहा—॥ २० ॥
अनिरुद्धस्य वीर्याख्यो विवाहः क्रियतां विभो ।
जम्बूलमालिकां द्रष्टुं श्रद्धा हि मम जायते ॥ २१ ॥
'प्रभो ! आप यहाँ अनिरुद्धका 'वीर्य'¹ नामक विवाह कीजिये; मुझे जम्बूलमालिका देखने और सुननेके लिये बड़ी श्रद्धा (इच्छा) हो रही है'² ॥ २१ ॥
ततः प्रहसिताः सर्वे नारदस्य वचःश्रवात् ।
कृष्णःप्रोवाच भगवन् क्रियतामाशु मा चिरम् ॥ २२ ॥
नारदजीकी यह बात सुनकर सब लोग हँस पड़े। फिर श्रीकृष्णने कहा—'भगवन् ! शीघ्र ही अनिरुद्ध और उषाका विवाह कीजिये; विलम्ब न हो' ॥ २२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तात कुम्भाण्डः समुपस्थितः ।
वैवाहिकांस्तु सम्भारान् गृह्य कृष्णं नमस्य तु ॥ २३ ॥
१. बल-पराक्रमद्वारा जीती गयी कन्याका विवाह 'वीर्यविवाह' कहलाता है।
२. वर-वधूके विवाहके समय कन्या-पक्षकी स्त्रियोंद्वारा वरपक्षकी स्त्रियोंको जो प्रेमपूर्ण परिहासके रूपमें गाली दी जाती है, उसका नाम जम्बूल है। उसकी परम्पराको जम्बूलमालिका कहा गया है। (नीलकण्ठ)